Jun 30, 2008

राजपूत वेबसाइट



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Jun 29, 2008

क्षत्रिय राजपूत वेबसाइट नये रूप में


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झांसी की रानी लक्ष्मी बाई

सन अट्ठारह सौ पैंतीस में रानी झांसी ने था जन्म लिया
भारत की सोई जनता को उसने स्वतंत्रता पाठ पढ़ा दिया
दिखला दिया उसने फ़िरंगी को, है सिंहनी भारत की नारी
जिसे देख के वो तो दंग हुए, पर गद्दारों ने मार दिया



अकसर बालक बचपन में हैं खेलते खेल खिलौनों से
पर शुरु से ही इस कन्या ने ऐसा अपने को ढाल लिया
वो खेलती थी तलवारों से, तोड़ती नकली महलों को
और साथ में उसके नाना थे, जिनसे युद्ध का ज्ञान लिया

बचपन का नाम मनु उसका, सब कहते उसे छबीली थे
वो चिढ़ती, सब हँसते थे, यूँ यौवन देहरी को पार किया
झांसी के राजा गंगाधर से जब पाणिग्रहण संस्कार हुआ
मनु से बनी लक्ष्मी बाई, नया नाम सहर्ष स्वीकार किया

हुआ एक पुत्र, पर उसने जल्दी अपनी आँखें बन्द करीं
दामोदर राव को रानी ने पुत्र मान कर गोद लिया
थे सदा ही उसकी सेवा में सुन्दर, मुन्दर और काशी भी
जिनके हाथों की चोटों ने, शत्रु को पानी पिला दिया

कुछ समय बाद राजा ने भी इस जग से नाता तोड़ा
फिर रानी गद्दी पर बैठी, सत्ता को अपने हाथ लिया
सागर सिंह डाकू को उसने और मुन्दर ने यूँ जा पकड़ा
वो वीर थी जैसे दुर्गा हो, सब ने यह लोहा मान लिया

अब अंग्रेज़ों ने सोचा झांसी बिल्कुल ही लावारिस है
उसे घेर हथियाने का कपट, उन्होंने मन में धार लिया
बढ़ा रोज़ सोच यह आगे, झांसी बस अब अपने हाथ में है
पर धन्य वो रानी जिसने युद्ध चुनौती को स्वीकार किया

रानी कूदी रणभूमी में, हज़ारों अंग्रेज़ों के आगे
दो दो तलवारें हाथ में थीं, मुँह से घोड़े को थाम लिया
बिछ जाती दुशमन की लाशें जिधर से वो निकले
अंग्रेज़ भी बहुत हैरान हुए, किस आफ़त ने आ घेर लिया

मोती बाई की तोपों ने शत्रु के मुँह को बन्द किया
सुन्दर मुन्दर की चोटों ने रण छोड़ दास को जन्म दिया
शाबाश बढ़ो आगे को जब रानी ऐसा चिल्लाती थी
मुठ्ठी भर की फ़ौज ने मिल, अंग्रेज़ों को बेहाल किया

जब कुछ भी हाथ नहीं आया, रोज़ दिल ही दिल घबराया
इक अबला के हाथों से पिटकर सोचने पर मजबूर किया
छल, कपट और मक्करी से मैं करूँ इस को कब्ज़े में
पीर अली और दुल्हाज़ू ने, गद्दारी में रोज़ का साथ दिया

दुल्हाजू ने जब किले का फाटक अंग्रेज़ों को खोल दिया
फिर टिड्डी दल की भाँती उस शत्रु ने पूरा वार किया
रानी निकली किले से अपने पुत्र को पीठ पे लिए हुए
सीधी पहुँची वो कालपी कुछ सेना को अपने साथ लिया

फिर घमासान युद्ध हुआ वहाँ थोड़ी सी सेना बची रही
इक दुशमन ने गोली मारी, दूजे ने सिर पर वार किया
पर भारत की उस देवी ने दोनों को मार नरक भेजा
और साथ उसने भी अपने प्राणों का मोह त्याग दिया

रानी तो स्वर्ग सिधार गई पर काम अभी पूरा न हुआ
स्वतंत्रता संग्राम के दीपक को अगली पीढ़ी को सौंप दिया
तुम तोड़ फेंकना मिलकर सब ग़ुलामी की इन ज़ंज़ीरों को
और भारत को स्वतंत्र करने का सपना सभी पर छोड़ दिया

संकलन :

Jun 27, 2008

क्षत्रिय वंदना

क्षत्रिय कुल में जन्म दिया तो ,क्षत्रिय के हित में जीवन बिताऊं |
धर्म के कंटकाकीर्ण मग पर ,धीरज से में कदम बढ़ाऊँ ||
भरे हलाहल है ये विष के प्याले ,दिल में है दुवेष के हाय फफोले |
जातीय गगन में चंद्र सा बन प्रभु, शीतल चांदनी में छिटकाऊँ ||
विचारानुकुल आचार बनाकर ,वास्तविक भक्ति से तुम्हे रिझाऊँ || १ ||
उच्च सिंहासन न मुझे बताना,स्वर्ग का चाहे न द्वार दिखाना |
जाति की फुलवारी में पुष्प बनाना , ताकि में सोरभ से जग को रिझाऊँ ||
डाली से तोडा भी जाऊँ तो भगवन, तेरा ही नेवेधे बन चरणों में आऊं || २ ||
साधन की कमी है कार्य कठिन है , मार्ग में माया के अनगिनत विध्न है |
बाधाओं दुविधावों के बंधन को तोड़के , सेवा के मार्ग में जीवन बिछाऊँ ||
पतों से फूलों से नदियों की कल कल से ,गुंजित हो जीवन का संदेश सुनाऊँ || ३ ||

पु. स्व. श्री तन सिंह जी द्वारा रचित

Jun 26, 2008

चार बांस चोवीस गज, अंगुळ अष्ट प्रमाण।




चार बांस चोवीस गज, अंगुळ अष्ट प्रमाण।


ईते पर सुळतान है, मत चूकैं चौहाण॥


ईहीं बाणं चौहाण, रा रावण उथप्यो।


ईहीं बाणं चौहाण, करण सिर अरजण काप्यौ॥


ईहीं बाणं चौहाण, संकर त्रिपरासुर संध्यो।


सो बाणं आज तो कर चढयो, चंद विरद सच्चों चवें।


चौवान राण संभर धणी, मत चूकैं मोटे तवे॥


ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो गोकुळ में कानह।


ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो हथह भीम कर॥


ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो राम रावण संतावणईसो राज पृथ्वीराज, जिसो अहंकारी रावण॥


बरसी तीस सह आगरों, लछन बतीस संजुत तन।


ईम जपे चंद वरदाय वर, पृथ्वीराज उति हार ईन॥


संकलन


Jun 17, 2008

राणा प्रताप के प्रन की जेय.....

दूग दूग दूग रन के डंके, मारू के साथ भ्याद बाजे!
ताप ताप ताप घोड़े कूद पड़े, काट काट मतंग के राद बजे!

कल कल कर उठी मुग़ल सेना, किलकर उठी, लालकर उठी!
ऐसी मायाण विवार से निकली तुरंत, आही नागिन सी फुल्कर उठी!

फ़र फ़र फ़र फ़र फ़र फेहरा उठ, अकबर का अभिमान निशान!
बढ़ चला पटक लेकर अपार, मद मस्त द्वीरध पेर मस्तमान!!

कॉलहाल पेर कॉलहाल सुन, शस्त्रों की सुन झंकार प्रबल!
मेवाड़ केसरी गर्ज उठा, सुन कर आही की लालकार प्रबल!!

हैर एक्लिंग को माता नवा, लोहा लेने चल पड़ा वीर!
चेतक का चंचल वेग देख, तट महा महा लजित समीर!!

लड़ लड़ कर अखिल महिताम को, शॉड़िंत से भर देने वाली!
तलवार वीर की तड़प उठी, आही कंठ क़ातर देने वाली!!

राणा को भर आनंद, सूरज समान छम चमा उठा!
बन माहाकाल का माहाकाल, भीषन भला दम दमा उठा!!

भारी प्रताप की वज़ी तुरत, बज चले दमामे धमार धमार!
धूम धूम रन के बाजे बजे, बज चले नगरे धमार धमार!!

अपने पेन हथियार लिए पेनी पेनी तलवार लिए !
आए ख़ार, कुंत, क़तर लिए जन्नी सेवा का भर लिए !!

कुछ घोड़े पेर कुछ हाथी पेर, कुछ योधा पैदल ही आए!
कुछ ले बर्चे , कुछ ले भाले, कुछ शार से तर्कस भर ले आए!!

रन यात्रा करते ही बोले, राणा की जेय राणा की जेय !
मेवाड़ सिपाही बोल उठे, शत बार महा-राणा की जेय!!

हल्दी-घाटी की रन की जेय, राणा प्रताप के प्रन की जेय!
जेय जेय भारत माता की , देश कन कन की जेय!!

Jun 10, 2008

धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।


धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।

धन्य हुआ रे सारा मेवाड़, जहां कदम रखे थे प्रताप ने॥

फीका पड़ा था तेज़ सुरज का, जब माथा उन्चा तु करता था।

फीकी हुई बिजली की चमक, जब-जब आंख खोली प्रताप ने॥

जब-जब तेरी तलवार उठी, तो दुश्मन टोली डोल गयी।

फीकी पड़ी दहाड़ शेर की, जब-जब तुने हुंकार भरी॥

था साथी तेरा घोड़ा चेतक, जिस पर तु सवारी करता था।

थी तुझमे कोई खास बात, कि अकबर तुझसे डरता था॥

हर मां कि ये ख्वाहिश है, कि एक प्रताप वो भी पैदा करे।

देख के उसकी शक्ती को, हर दुशमन उससे डरा करे॥

करता हुं नमन मै प्रताप को,जो वीरता का प्रतीक है।

तु लोह-पुरुष तु मातॄ-भक्त,तु अखण्डता का प्रतीक है॥

हे प्रताप मुझे तु शक्ती दे,दुश्मन को मै भी हराऊंगा।

मै हु तेरा एक अनुयायी,दुश्मन को मार भगाऊंगा॥

है धर्म हर हिन्दुस्तानी का,कि तेरे जैसा बनने का।

चलना है अब तो उसी मार्ग,जो मार्ग दिखाया प्रताप ने॥..

Jun 6, 2008

विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप


‘‘माई ऐहडा-पूत जण, जेहा राण प्रताप।
अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणे सांप ।।
भारतीय इतिहास में एक गौरवशाली रणक्षेत्र् हल्दीघाटी का नाम आते ही मन में वीरोचित भाव उमडने - घुमडने लगते हैं। अरावली पर्वतमाला की उपत्यकाओं से आच्छादित इस रणक्षेत्र् में स्थित 432 वर्ष पूर्व के विशाल वृक्ष और जल प्रवाह के नाले मूक साक्षी बने आज भी वद्यमान है। यह घाटी दूर कहीं से आ रही घोडों की टाप को रोमांचित करती आवाज और हाथियों की चिघांड से मानो गुंजायमान होने लगती है। रणभेरियों की आवाजें मन को मथने सी लगती है। उसी क्षण दूर से एक श्वेत रेखा दृष्टिगत होती है। समीप आती हुई यह रेखा चेतक का रूप ले लेती है। यही आसमानी रंग का घोडा राणा प्रताप को प्राणों की तरह प्रिय था। लगता था मानों यह अश्व अपने अद्वितीय सवार को लेकर हवा में उडा जा रहा था। दृढ प्रतिज्ञ एवं विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुम्भलगढ में हुआ । पिता उदयसिंह की मृत्यु के उपरान्त राणा प्रताप का राज्याभिषेक 28 फरवरी, 1572 को गोगुन्दा में हुआ। विरासत में उन्हें मेवाड की प्रतिष्ठा और स्वाधीनता की रक्षा करने का भार ऐसे समय में मिला जबकि महत्वाकांक्षी सम्राट अकबर से शत्र्ुता के कारण समूचा मेवाड एक विचित्र् स्थिति में था। सम्राट अकबर ने मैत्रीपूर्ण संधि के लिए एक कूटनीतिक प्रस्ताव महाराणा को भेजा परन्तु वह शूरवीर इस प्रस्ताव से गुमराह होने की बजाय मुगलिया सेना को सबक सिखाने का निश्चय कर मेवाड की राजधानी गोगुन्दा से बदल कर कुम्भलगढ कर ली। प्रताप ने अपने दूरदराज के अंचलों से भारी संख्या में भीलों को एकत्र्ति किया। उनकी सेना में दो हजार पैदल, एक सौ हाथी, तीन हजार घुडसवार व एक सौ भाला सैनिक तथा दुन्दुभि व नगाडे बजाने वाले थे। अकबर की ओर से मानसिंह के नेतृत्व में पांच हजार सैनिकों की एक टुकडी व तीन हजार अन्य विश्वस्त व्यक्तियों ने मेवाड में बनास नदी के तट पर पडाव डाल दिया। 21 जून, 1576 को प्रातः दोनों ओर की सेनायें आमने-सामने आ पहुंची। प्रताप की सेना घाटी में तथा मुगलिया सेना बादशाह बाग के उबड - खाबड मैदान में डट गई। दोनों और से पहले पहल करने की ताक में खडी सेनाओं में मुगलों की सेना के कोई अस्सी जवानों की टुकडी ने घुसपैठ शुरू कर दी। प्रताप को यह कब सहन होने वाला था ? रणभेरी के बजते ही प्रताप ने हल्दीघाटी के संकरे दर्रे पर ही मुगलों को करारी हार का प्रथम सबक सिखा दिया और ऐसा जबरदस्त प्रहार किया कि शाही सेना में खलबलाहट मच गई। देखते ही देखते यह युद्ध रक्त तलाई के चौडे स्थल में होने लगा। तलवारों की झंकार से गुंजायमान यह रणक्षेत्र् दोनों ही सेनाओं के सैनिकों के रक्त से लाल हो उठा। इस विप्लवकारी नाजुक हालत में प्रताप ने अपने चेतक घोडे को ऐड लगा हाथी पर सवार मानसिंह पर भाले से तेज प्रहार किया परन्तु हाथी के दांत में बंधी तलवार से चेतक बुरी तरह घायल हो गया। हालात ने राणा को रणक्षेत्र् छोडने के लिए विवश कर दिया। झाला मान ने मुगलिया सेना से घिरे अपने स्वामी प्रताप को राष्ट्रहित में बचाने के लिए मेवाड का राजमुकुट अपने सिर पर रखकर प्रताप को युद्ध क्षेत्र् से सुरक्षित बाहर निकालने में तो सफल हो गया परन्तु स्वयं ने लडते हुए वीरगति प्राप्त कर ली। हल्दीघाटी के इस विश्व विख्यात युद्ध में प्रताप की सीधी जीत भले ही नहीं हुई हो परन्तु मातृभूमि के रक्षक, स्वतंत्र्ता सेनानी, महान त्यागी, स्वाभिमानी, पक्के इरादों के धनी के रूप में महाराणा प्रताप राजपुताने के गौरव और उसकी शानदार परम्पराओं के द्योतक बने हुए हैं। मुगलों के अभिमान के लिए सदैव सिरदर्द बने रहे प्रताप ने अपनी नई राजधानी चावण्ड बनाई जहां 19 जनवरी, 1597 को उनका देहान्त हो गया। चावण्ड में बनी उनकी समाधि पर पहुंचते ही यह दोहा स्मृति पटल पर उभरने लगता है ः- ‘‘माई ऐहडा-पूत जण, जेहा राण प्रताप। अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणे सांप ।। कहना न होगा कि हल्दीघाटी का युद्ध एक विचार शक्ति बन कर जन मानस को आंदोलित करते हुए प्रकाश स्तम्भ के रूप में इस तरह उभरा कि विश्व की महानतम शक्तिशाली रही भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को स्वामी भक्त अश्व चेतक की समाधि तक आने के लिए विवश होना पडा। 21 जून, 1976 को राजस्थान सरकार द्वारा हल्दीघाटी स्वातन्त्र््य, संग्राम की स्मृति में आयोजित चतुःशती समारोह में इन्दिरा जी शिरकत करने हल्दीघाटी के ऐतिहासिक रणक्षेत्र् में पहुंची तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जोशी के नेतृत्व में वहां उपस्थित विशाल जन समूह ने तुमूल करतल ध्वनि से उनका स्वागत व अभिनन्दन किया। श्रीमती गांधी सीधी चेतक की समाधि पर पहुंची और अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद प्रतापी प्रताप के जिरह बख्तर के संग्रहालय का अवलोकन करने गई। उन्होंने इस रणक्षेत्र् की महत्ता को अक्षुण्य बनाये रखने के उपायों पर चर्चा करते हुए अपने अमूल्य सुझाव भी दिये। वे इस महान सपूत के अद्वितीय कृतित्व से अभिभूत हो एक नई स्फूर्ति, दिशा और संकल्प के साथ लौटी। हल्दीघाटी का विश्व विख्यात रणक्षेत्र् हमारी राष्ट्रीय धरोहर के रूप में जाना और माना जाता रहा है। परन्तु आजादी के बाद विकास की पिपासा शांत करने के लिए जिस तरह इस धरोहर का मौलिक स्वरूप ही बदल दिया गया। वह निश्चित ही ऐतिहासिक प्रतीकों को धूरि धूसरित करने से कम नहीं है। रण क्षेत्र् का मुख्य स्थल रक्त तलाई पर सरकारी भवनों का निर्माण और खेती के लिए अतिक्रमण तथा संकरे दर्रे को तोडकर चौडा स्थान बना देना, इसके साक्षात प्रमाण हैं। इसीलिए इन्दिरा गांधी ने इस स्थल को अक्षुण्य बनाये रखने की आवश्यकता प्रतिपादित की थी। आशा की जानी चाहिए कि केन्द्र और राज्य की सरकारें इस ओर कुछ करने के प्रति सचेष्ट होंगी।

Jun 5, 2008

स्रियों की दशा का उज्जवल पक्ष



- टॉड के अनुसार ""राजस्थान में स्रियों को राजपूतों ने जो सम्मान दिया, वह किसी दूसरे देश में नहीं मिलता। संसार में किसी भी जाति ने स्रियों को उतना आदर नहीं दिया, जितना राजपूतों ने।''
राजपूतों ने स्रियों को लक्ष्मी, दुर्गा तथा सरस्वती के रुप में देखा। उस दृष्टि से उनकी पूजा की। यहाँ लोग यह मानते थे कि स्री के बिना मनुष्य को सुख शांति प्राप्त नहीं हो सकती। मनुष्य के जीवन व उसके घर में उसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसे गृहणी माना जाता था, अर्थात् वह अपने घर की अधिकारिणी होती थी। राजपूतों के धार्मिक ग्रन्थों में लिखा है कि जिस घर में स्री नहीं होती है, वह घर, घर नहीं होता। शास्रों में भी लिखा है कि जिस पुरुष के स्री न हो, उसे जंगल में निवास करना चाहिए। स्री का अपमान करके कोई भी मनुष्य कल्याणकारी जीवन का आनन्द नहीं उठा सकता।

कर्नल टॉड ने स्रियों के इस स्थान का वर्णन करने के बाद उनकी तुलना प्राचीन जर्मनी की स्रियों से की है। स्रियाँ पूजा-पाठ करके पुरुषों की सफलता के लिए कामना करती थी तथा शकुन आदि मनाया करती थी। यहूदी स्रियों की भांति राजस्थान की नारी घर की चार दीवारी में बन्द नहीं रखी जाती थी, अपितु वे खेतों पर काम करती थी, कुएँ से पानी भरकर लाती थी, तथा मेलों व उत्सवों में खुलकर भाग लेती थी और उसका आनन्द उठाती थी।
स्रियों को घर-घर में सावित्री-सत्यवान, नल-दमयंती आदि महाभारत की कथाएँ सुनाई जाती थी। माता-पिता का यही सपना होता थि कि उनकी लड़की शादी के बाद ससुराल वालों के प्रति सुशिल साबित हो। इसके विपरीत घटित होने वाली घटनाओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देका जाता था। यद्यपि राजपूतों में स्रियों का बहुत सम्मान किया जाता था, तथापि वे पति की आज्ञाकारिणी होती थी। आदर्श महिलाएँ अपने पति के साथ सती हो जाया करती थी।
मनुस्मृति की टीकाओं में लिखा गया है ""अपने अटूट परिणाम स्वरुप वीर राजपूत अपनी पत्नी की छोटी से छोटी इच्छा की भी अवहेलना नहीं करता था।''
कर्नल टॉड के अनुसार ""पति के प्रति राजपूत रमणी का जो अनुराग होता है वह संसार के इतिहास में कहीं नहीं मिलेगा। मनुष्य के जीवन की यह सबसे बड़ी सभ्यता है, जिसको सजीव मैंने राजपूतों में देखा है।''
स्रियों के नामों का अर्थ कोमलता, नम्रता, मृदुलता, प्यार, स्नेह, सुन्दरता आदि से जुड़ा होता था। स्रियों के कारण ही राजपूतों के घरों में जैसा सौन्दर्य व समृद्धि देखने को मिलती है, वैसा अन्य जातियों के घरों में दृष्टिगोचर नही होता। राजस्थान की स्रियों एवं उनके अधिकारों की प्रशंसा विदेशी इतिहासकारों ने भी की है।