Grab the widget  IWeb Gator

दानवीर महाराज रघु

उदयपुर से भूपेंद्र सिंह चुण्डावत

महाराज रघु अयोध्या के सम्राट थे। वे भगवान श्रीराम के प्रपितामह थे। उनके नाम से ही उनके वंश के क्षत्रिय रघुवंशी कहे जाते हैं। एक बार महाराज रघु ने एक बडा भारी यज्ञ किया। जब यज्ञ पूरा हो गया, तब महाराज ने ब्राह्मणों तथा दीन-दुखियों को अपना सारा धन दान कर दिया। महाराज इतने बडे दानी थे कि उन्होंने अपने आभूषण, सुंदर वस्त्र और सारे बर्तन तक दान कर दिए। महाराज के पास साधारण वस्त्र ही रह गए। वे मिट्टी के बर्तनों से काम चलाने लगे। यज्ञ में जब महाराज रघु सर्वस्व दान कर चुके, तब उनके पास ऋषि कौत्सनाम के एक ब्राह्मण कुमार आए। महाराज ने उनको प्रणाम किया, आसन पर बैठाया और मिट्टी के पात्र वाले जल से उनके पैर धोए। स्वागत-सत्कार हो जाने पर महाराज ने पूछा- आप मेरे पास कैसे पधारे? मैं क्या सेवा करूं?

कौत्सने कहा-महाराज मैं आया तो किसी काम से ही था, किंतु आपने तो पहले ही सर्वस्व दान कर दिया है। मैं आप जैसे महादानी उदार पुरुष को संकोच में नहीं डालूंगा। महाराज रघु ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की, आप अपने आने का उद्देश्य जरूर बता दें। कौत्सने बताया कि उनका अध्ययन पूरा हो गया है। अपने गुरुदेव के आश्रम से घर जाने से पहले गुरुदेव से उन्होंने गुरु दक्षिणा मांगने की प्रार्थना की। गुरुदेव बडे स्नेह से कहा- बेटा तूने यहां रहकर जो मेरी सेवा की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरी गुरु दक्षिणा तो हो गई। तू संकोच मत कर। प्रसन्नता से घर जा। लेकिन कौत्सने जब गुरु दक्षिणा देने का हठ कर लिया, तब गुरुदेव को थोडा क्रोध आ गया। वे बोले-तूने मुझसे चौदह विद्याएं पढी हैं, अतःप्रत्येक विद्या के लिए एक करोड सोने की मोहरें लाकर दे। गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड सोने की मोहरें लेने के लिए ही कौत्सअयोध्या आए थे।

महाराज ने कौत्सकी बात सुनकर कहा- जैसे आपने यहां तक आने की कृपा की है, वैसे ही मुझ पर थोडी-सी कृपा और करें। तीन दिन तक आप मेरी अग्निशालामें ठहरें। रघु के यहां से एक ब्राह्मण कुमार निराश लौट जाए, यह तो बडे दुःख एवं कलंक की बात होगी! मैं तीन दिन में आपकी गुरु दक्षिणा का कोई-न-कोई प्रबंध अवश्य कर दूंगा। कौत्सने अयोध्या में रुकना स्वीकार कर लिया। महाराज ने अपने मंत्री को बुलाकर कहा-यज्ञ में सभी सामंत नरेश कर दे चुके हैं। उनसे दुबारा कर लेना न्याय नहीं है। लेकिन कुबेरजीने मुझे कभी कर नहीं दिया। वे देवता हैं, तो क्या हुआ? कैलाश पर्वत पर रहते हैं, इसलिए पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को उन्हें कर देना चाहिए। मेरे सब अस्त्र-शस्त्र मेरे रथ में रखवा दो। मैं कल सबेरे कुबेर पर चढाई करूंगा। आज रात मैं उस रथ पर ही सोऊंगा। जब तक ब्राह्मण कुमार को दक्षिणा न मिले, राजमहल में पैर नहीं रख सकता। उस रात महाराज रघु रथ में ही सोए। लेकिन बडे सवेरे उनका कोषाध्यक्ष उनके पास दौडा आया और कहने लगा-महाराज खजाने का घर सोने की मोहरों से ऊपर तक भरा पडा है। रात में उसमें मोहरों की वर्षा हुई है। महाराज समझ गए कि कुबेरजीने यह मोहरों की वर्षा की है। महाराज ने सब मोहरों का ढेर लगवा दिया और कौत्ससे बोले-आप इस धन को ले जाएं। कौत्सने कहा, मुझे तो गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड मोहरें चाहिए। उससे अधिक एक मोहर भी मैं नहीं लूंगा। महाराज ने कहा, लेकिन यह धन आफ लिए ही आया है। ब्राह्मण का धन हम अपने यहां नहीं रख सकते। आपको ही यह सब लेना पडेगा। कौत्सने बडी दृढता से कहा-महाराज मैं एक ब्राह्मण हूं। धन का मुझे करना क्या है! आप इसका चाहे जो करें। मैं तो एक भी मोहर अधिक नहीं लूंगा। कौत्सचौदह करोड मोहरें लेकर चले गए। शेष मोहरें महाराज रघु ने दूसरे ब्राह्मणों को दान कर दिया।
»»  read more

परमवीर मेजर पीरु सिंह शेखावत

6 राजपुताना रायफल्स के हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत झुंझुनू के पास बेरी गांव के लाल सिंह शेखावत के पुत्र थे जिनका जन्म 20 मई 1918 को हुआ था | जम्मू कश्मीर में तिथवाल के दक्षिण में इन्हे शत्रु के पहाड़ी मोर्चे को विजय करने का आदेश मिला | दुश्मन ने यहाँ काफी मजबूत मोर्चा बंदी कर रखी थी ज्योही ही ये मोर्चे की और अग्रसर हुए दोनों और से शत्रु की और भयंकर फायरिंग हुयी व भारी मात्रा में इन पर बम भी फेंके गए | पीरु सिंह आगे वाली कंपनी के साथ थे और भारी संख्या में इनके साथी मारे गए और कई घायल हो गए ये अपने साथियों को जोश दिलाते हुए युद्ध घोष के साथ शत्रु के एम एम जी मोर्चे पर टूट पड़े और बुरी तरह घायल होने बावजूद अपनी स्टेनगन और संगीन से पोस्ट पर मौजूद दुश्मनों को खत्म कर एम एम जी की फायरिंग को खामोश कर दिया लेकिन तब तक उनकी कम्पनी के सारे साथी सैनिक मारे जा चुके थे वे एक मात्र जिन्दा लेकिन बुरी तरह घायल अवस्था में बचे थे चेहरे पर भी बम लगने के कारण खून बह रहा था लेकिन जोश और मातृभूमि के लिए बलिदान की कामना लिए वे शत्रु के दुसरे मोर्चे पर हथगोले फेंकते हुए घुस गए दुसरे मोर्चे को भी नेस्तनाबूत कर वे अपने क्षत-विक्षत शरीर के साथ दुश्मन के तीसरे मोर्चे पर टूट पड़े ,रास्ते में सिर में गोली लगने पर ये १९ जुलाई १९४८ को वीर गति को प्राप्त हुए |
भारत सरकार ने इन्हे मरणोपरांत इनकी इस महान और अदम्य वीरता के लिए वीरता के सबसे उच्च पदक परमवीर चक्र से सम्मानित किया |
»»  read more

गणतंत्र दिवस परेड समारोह में रणथम्भौर के दुर्ग के रूप में सजेगी राजस्थान की झांकी

जयपुर।(भूपेंद्र सिंह चुण्डावत) नई दिल्ली के राजपथ पर 26 जनवरी, 2009 को आयोजित होने वाले गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य समारोह में इस वर्ष राजस्थान की झांकी को रणथम्भौर के दुर्ग के रूप मे सजाया जाएगा। राजस्थानी लोक कला, गौरवशाली इतिहास और समृद्घ संस्कृति को समेटे राजस्थान की यह झांकी गणतंत्र दिवस परेड में लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र रहेगी। इस शानदार झांकी की डिजाईन राजस्थान ललित कला अकादमी के श्री हर शिव शर्मा द्वारा तैयार की गई है।

राजस्थान ललित कला अकादमी के प्रदर्शनी अधिकारी श्री विनय शर्मा ने बताया कि राजस्थान की झांकी के अग्रिम भाग में ग्यारहवीं शताब्दी के राव राजा हमीर सिंह की छतरी दिखाई गई है। झांकी के पश्च भाग को पहाडियों पर स्थित दुर्ग के रूप में सजाया गया है जहाँ टाईगर, हिरण, लंगूर व अन्य वन्य-प्राणियों को विचरण करते हुए दिखाया गया है। उन्होंने बताया कि झांकी के सबसे अग्र भाग में पच्चीस लोक नृत्य कलाकार प्रदेश के प्रसिद्घ ‘‘गैर-नृत्य’’ की जीवन्त प्रस्तुति देगें। उन्होंने बताया कि रक्षा मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी की हाल ही में दिल्ली में हुई बैठक में राजस्थान की उक्त झांकी के मॉडल को अनुमोदित कर दिया गया है।

श्री विनय शर्मा ने बताया कि ‘‘रणथम्भौर’’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’ इन दो शब्दों के मेल से हुई है। ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’ दो पहाडियां है। थम्भौर वह पहाडी है जिस पर रणथम्भौर का विश्व प्रसिद्घ किला स्थित है और ‘‘रण’’ उसके पास ही स्थित दूसरी पहाडी है। रणथम्भौर का किला लगभग सात किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जहां से रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क का विहंगावलोकन किया जा सकता है।

उन्होनें बताया कि रणथम्भौर दुर्ग भारत के सबसे पुराने किलों में से एक माना जाता है। इस किले का निर्माण सन् 944 ए.डी. में चौहान वंश के राजा ने करवाया था। इस दुर्ग पर अल्लाउदीन खिजली, कुतुबुद्दीन ऐबक, फिरोजशाह तुगलक और गुजरात के बहादुरशाह जैसे अनेक शासकों ने आक्रमण किये। यह मान्यता रही है कि लगभग 1000 महिलाओं ने इस किले में ‘जौहर’ किया था। ‘‘जौहर’’ (जिसके अंतर्गत किलों को अन्य शासक द्वारा जीत लेने पर वहां की निवासी राजपूत महिलाएं अपने ‘शील’ की रक्षा के लिए जलती आग में कूद कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लिया करती थी।)

उन्होंने तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि ग्यारहवीं शताब्दी में राजा हमीर ने और सन् 1558-59 में मुगल बादशाह अकबर ने इस दुर्ग पर अपना अधिकार जमाया था। अंततः यह दुर्ग जयपुर के राजाओं को लौटा दिया गया था, जिन्होंन दुर्ग के आस पास के जंगल को शिकार के लिए सुरक्षित रखा। जंगल के संरक्षण की यही प्रवृत्ति बाद में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के अभ्युदय का कारण बनी और आज देश-विदेश से सैलानी यहां बाघ और अन्य वन्य प्राणियों को देखने आते हैं।

उन्होंने प्रदेश के प्रसिद्घ गेर नृत्य के संबंध में बताया कि ‘‘गेर’’ का मूल अर्थ गोले या घेरे से है। चूंकि इस नृत्य का निष्पादन गोले में घूम कर किया जाता है इस लिए इसका नाम ‘‘गेर’’ नृत्य पडा। यद्यपि यह नृत्य सभी समुदायों द्वारा किया जाता है किन्तु मेवाड व मारवाड में यह ज्यादा प्रसिद्घ है। इसे गेर घालना, गेर रमना, गेर खेलना और गेर नाचना भी कहा जाता है।

श्री शर्मा ने बताया कि प्रदेश में सभी जगहों का गैर नृत्य एक जैसा नही होता बल्कि हर स्थान की अपनी अनोखी ताल, घेरा डालने की विशिष्ट शैली व अपनी विशिष्ट वेशभूषा होती है। इस नृत्य के दौरान नृत्यकार सीधी व उल्टी दोनों दिशाओं में धूमर लेते हैं।

रंगीली वेशभूषा में सजे नर्तक चुन्नटों वाला खुला लम्बा स्कर्ट पहनते है। फाल्गुन के महीने में ढोल, थाली और मृदाल की ध्वनि सुनी जा सकती हैं और लोक नर्तक लम्बी छडियों को लिए इनकी ताल में ताल मिलाते हुए परस्पर टकराते देखे जा सकते हैं। जब वे नृत्य करते ह तो युद्घ के मैदान जैसा परिदृश्य दिखाई देता है। लोक मान्यता है कि इस नृत्य का सम्भावित रूप से युद्घों से कोई अनोखा सम्बन्ध रहा होगा।

उन्होंने बताया कि गैर नृत्य की इस अनुपम छटा को प्रदेश के लोक कलाकार प्रदेश की झाँकी के आगे प्रकट करेंगे।
»»  read more

जौहर और शाका

विश्व की सभी सभी जातियां अपनी स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए और समृद्धि के लिए निरंतर बलिदान करती आई है | मनुष्य जाति में परस्पर युद्धों का श्री गणेश भी इसी आशंका से हुआ कि कोई उसकी स्वतंत्रता छिनने आ रहा है तो कोई उसे बचाने के लिए अग्रिम प्रयास कर रहा है | और आज भी इसी आशंका के चलते आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ कर हमें अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए अग्रिम प्रयास जारी रखने होंगे |
राजस्थान की युद्ध परम्परा में "जौहर और शाकों" का विशिष्ठ स्थान है जहाँ पराधीनता के बजाय मृत्यु का आलिंगन करते हुए यह स्थिति आ जाती है कि अब ज्यादा दिन तक शत्रु के घेरे में रहकर जीवित नही रहा जा सकता, तब जौहर और शाके किए जाते थे |
जौहर : युद्ध के बाद अनिष्ट परिणाम और होने वाले अत्याचारों व व्यभिचारों से बचने और अपनी पवित्रता कायम रखने हेतु महिलाएं अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा कर,तुलसी के साथ गंगाजल का पानकर जलती चिताओं में प्रवेश कर अपने सूरमाओं को निर्भय करती थी कि नारी समाज की पवित्रता अब अग्नि के ताप से तपित होकर कुंदन बन गई है | पुरूष इससे चिंता मुक्त हो जाते थे कि युद्ध परिणाम का अनिष्ट अब उनके स्वजनों को ग्रसित नही कर सकेगा | महिलाओं का यह आत्मघाती कृत्य जौहर के नाम से विख्यात हुआ |सबसे ज्यादा जौहर और शाके चित्तोड़ के दुर्ग में हुए | चित्तोड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तोड़ की महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 हजार रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था |
शाका : महिलाओं को अपनी आंखों के आगे जौहर की ज्वाला में कूदते देख पुरूष कसुम्बा पान कर,केशरिया वस्त्र धारण कर दुश्मन सेना पर आत्मघाती हमला कर इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करते हुए रणभूमि में चिरनिंद्रा में शयन करेंगे | पुरुषों का यह आत्मघाती कदम शाका के नाम से विख्यात हुआ |
»»  read more

राव विरमदेव, मेड़ता

राव विरमदेव ने 38 वर्ष की आयु में 1515 ई. में अपने पिता राव दुदा के निधन के बाद मेड़ता का शासन संभाला | व्यक्तित्व और वीरता की द्रष्टि से वे अपने पिता के ही समान थे और उन्होंने भी पिता की भांति जोधपुर राज्य से सहयोग और सामंजस्य रखा |
इसीलिए सारंग खां व मल्लू खां जैसे बलवानों को परास्त करने में विरमदेव सफल रहे | विरमदेव चित्तोड़ के महाराणा सांगा के विश्वासपात्र व्यक्ति थे | उन्होंने सांगा द्वारा गुजरात के बादशाह मुज्जफरशाह के विरुद्ध,सांगा के ईडर अभियान के अलावा मालवा और दिल्ली के सुल्तानों से सांगा के युधों में अपने शोर्य का डंका बजाया था |
लेकिन राव सुजा के पश्चात् जोधपुर की राजगद्दी के लिए जो उठापटक हुयी उसके चलते जोधपुर और मेड़ता के बीच वैमनस्य के बीज बो दिए | और दोनों राज्यों के बीच विरोध की खाई अधिक गहरी हो गई | जो सोहार्दपूर्ण सम्बन्ध मेड़ता और मेवाड़ के बीच रहे उसी प्रकार के संबंध जोधपुर के साथ भी रहते तो आज इतिहास कुछ और ही होता | 12 मई 1531 को राव गंगा के निधन के बाद राव मालदेव जोधपुर के शासक बनें जो अपने समय के राजपुताना के सबसे शक्तिशाली शासक माने जाते थे उनके मन में विरमदेव के प्रति घृणा के बीज पहले से ही मौजूद थे अतः शासक बनते ही उन्होंने मेड़ता पर आक्रमण शुरू कर दिए | पराकर्मी विरमदेव ने अजमेर में मालवा के सुल्तान के सूबेदार को भगाकर अजमेर पर भी कब्जा कर लिया जो मालदेव को सहन नहीं हुआ और उसने अपने पराकर्मी सेनापति जैता और कुंपा के नेतृत्व में विशाल सेना भेज कर मेड़ता और अजमेर पर हमला कर विरमदेव को हरा खदेड़ दिया लेकिन साहसी विरमदेव ने डीडवाना पर अधिकार जा जमाया | किन्तु मालदेव की विशाल सेना ने वहां भी विरमदेव को जा घेरा जहाँ विरमदेव ने मालदेव की सेना से युद्ध में जमकर तलवार बजायी | उनकी वीरता से प्रभावित होकर सेनापति जैता ने विरमदेव की वीरता की प्रशंसा करते हुए कहा कि आप जैसे वीर से यदि मालदेव का मेल हो जाये तो मालदेव पुरे हिन्दुस्थान पर विजय पा सकतें है | डीडवाना भी हाथ से निकलने के बाद विरमदेव अमरसर राव रायमल जी के पास आ गए जहाँ वे एक वर्ष तक रहे और आखिर वे शेरशाह सूरी के पास जा पहुंचे | मालदेव कि विरमदेव के साथ अनबन का फायदा शेरशाह ने उठाया,चूँकि मालदेव की हुमायूँ को शरण देने की कोशिश ने शेरशाह को क्रोधित कर दिया था जिसके चलते शेरशाह ने अपनी सेना मालदेव की महत्त्वाकांक्षा के मारे राव विरमदेव व बीकानेर के कल्याणमल के साथ भेजकर जोधपुर पर चढाई कर दी |
मालदेव भी अपनी सेना सहित सामना करने हेतु आ डटे लेकिन युद्ध की शुरुआत से पहले ही विरमदेव की वजह से अपने सामंतों की स्वामिभक्ति से आशंकित हो मालदेव युद्ध क्षेत्र से खिसक लिए | इस सुमैलगिरी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध युद्ध में शेरशाह की फौज से मालदेव के सेनापति जैता और कुंपा ने भयंकर युद्ध कर भारी नुकसान पहुँचाया, विजय के बाद अपनी सेना के भारी नुकसान को देखकर शेरशाह ने कहा " मुट्ठी भर बाजरे की खातिर मै दिल्ली की सल्तनत खो बैठता | " इस युद्ध विजय के बाद शेरशाह ने विरमदेव व कल्याणमल के साथ सेना भेजकर जोधपुर पर अधिकार करने के बाद मेड़ता पर विरमदेव का पुनः अधिकार कराया | इस प्रकार छह वर्ष तक कष्ट सहन करने के बाद विरमदेव मेड़ता पर अधिकार करने में कामयाब हुए लेकिन इसके बाद वे ज्यादा दिन जीवित नहीं रह सके और फरवरी 1544 में 66 वर्ष की अवस्था में उनका स्वर्गवास हो गया |
»»  read more

राव जयमल,मेड़ता



"मरण नै मेडतिया अर राज करण नै जौधा "
"मरण नै दुदा अर जान(बारात) में उदा "
उपरोक्त कहावतों में मेडतिया राठोडों को आत्मोत्सर्ग में अग्रगण्य तथा युद्ध कौशल में प्रवीण मानते हुए मृत्यु को वरण करने के लिए आतुर कहा गया है मेडतिया राठोडों ने शौर्य और बलिदान के एक से एक कीर्तिमान स्थापित किए है और इनमे राव जयमल का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है | कर्नल जेम्स टोड की राजस्थान के प्रत्येक राज्य में "थर्मोपल्ली" जैसे युद्ध और "लियोनिदास" जैसे योधा होनी की बात स्वीकार करते हुए इन सब में श्रेष्ठ दिखलाई पड़ता है | जिस जोधपुर के मालदेव से जयमल को लगभग २२ युद्ध लड़ने पड़े वह सैनिक शक्ति में जयमल से १० गुना अधिक था और उसका दूसरा विरोधी अकबर एशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति था |अबुल फजल,हर्बर्ट,सर टामस रो, के पादरी तथा बर्नियर जैसे प्रसिद्ध लेखकों ने जयमल के कृतित्व की अत्यन्त ही प्रसंशा की है | जर्मन विद्वान काउंटनोआर ने अकबर पर जो पुस्तक लिखी उसमे जयमल को "Lion of Chittor" कहा |

राव जयमल का जन्म आश्विन शुक्ला ११ वि.स.१५६४ १७ सितम्बर १५०७ शुक्रवार के दिन हुआ था | सन १५४४ में जयमल ३६ वर्ष की आयु अपने पिता राव विरमदेव की मृत्यु के बाद मेड़ता की गद्दी संभाली | पिता के साथ अनेक विपदाओं व युद्धों में सक्रीय भाग लेने के कारण जयमल में बड़ी-बड़ी सेनाओं का सामना करने की सूझ थी उसका व्यक्तित्व निखर चुका था और जयमल मेडतिया राठोडों में सर्वश्रेष्ठ योद्धा बना | मेड़ता के प्रति जोधपुर के शासक मालदेव के वैमनस्य को भांपते हुए जयमल ने अपने सीमित साधनों के अनुरूप सैन्य तैयारी कर ली | जोधपुर पर पुनः कब्जा करने के बाद राव मालदेव ने कुछ वर्ष अपना प्रशासन सुसंगठित करने बाद संवत १६१० में एक विशाल सेना के साथ मेड़ता पर हमला कर दिया | अपनी छोटीसी सेना से जयमल मालदेव को पराजित नही कर सकता था अतः उसने बीकानेर के राव कल्याणमल को सहायता के लिए ७००० सैनिकों के साथ बुला लिया | लेकिन फ़िर भी जयमल अपने सजातीय बंधुओं के साथ युद्ध कर और रक्त पात नही चाहता था इसलिय उसने राव मालदेव के साथ संधि की कोशिश भी की, लेकिन जिद्दी मालदेव ने एक ना सुनी और मेड़ता पर आक्रमण कर दिया | पूर्णतया सचेत वीर जयमल ने अपनी छोटी सी सेना के सहारे जोधपुर की विशाल सेना को भयंकर टक्कर देकर पीछे हटने को मजबूर कर दिया स्वयम मालदेव को युद्ध से खिसकना पड़ा | युद्ध समाप्ति के बाद जयमल ने मालदेव से छीने "निशान" मालदेव को राठौड़ वंश का सिरमौर मान उसकी प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए वापस लौटा दिए |
मालदेव पर विजय के बाद जयमल ने मेड़ता में अनेक सुंदर महलों का निर्माण कराया और क्षेत्र के विकास के कार्य किए | लेकिन इस विजय ने जोधपुर-मेड़ता के बीच विरोध की खायी को और गहरा दिया | और बदले की आग में झुलसते मालदेव ने मौका देख हमला कर २७ जनवरी १५५७ को मेड़ता पर अधिकार कर लिया उस समय जयमल की सेना हाजी खां के साथ युद्ध में क्षत-विक्षत थी और उसके खास-खास योधा बीकानेर,मेवाड़ और शेखावाटी की और गए हुए थे इसी गुप्त सुचना का फायदा मालदेव ने जयमल को परास्त करने में उठाया | मेड़ता पर अधिकार कर मालदेव ने मेड़ता के सभी महलों को तोड़ कर नष्ट कर दिए और वहां मूलों की खेती करवाई | आधा मेड़ता अपने पास रखते हुए आधा मेड़ता मालदेव ने जयमल के भाई जगमाल जो मालदेव के पक्ष में था को दे दिया | मेड़ता छूटने के बाद जयमल मेवाड़ चला गया जहाँ महाराणा उदय सिंह ने उसे बदनोर की जागीर प्रदान की | लेकिन वहां भी मालदेव ने अचानक हमला किया और जयमल द्वारा शोर्य पूर्वक सामना करने के बावजूद मालदेव की विशाल सेना निर्णायक हुयी और जयमल को बदनोर भी छोड़ना पड़ा | अनेक वर्षों तक अपनी छोटी सी सेना के साथ जोधपुर की विशाल सेना मुकाबला करते हुए जयमल समझ चुका था कि बिना किसी शक्तिशाली समर्थक के वह मालदेव से पीछा नही छुडा सकता | और इसी हेतु मजबूर होकर उसने अकबर से संपर्क किया जो अपने पिता हुमायूँ के साथ मालदेव द्वारा किए विश्वासघात कि वजह से खिन्न था और अकबर राजस्थान के उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक मालदेव को हराना भी जरुरी समझता था | जयमल ने अकबर की सेना सहायता से पुनः मेड़ता पर कब्जा कर लिया | वि.स.१६१९ में मालदेव के निधन के बाद जयमल को लगा की अब उसकी समस्याए समाप्त हो गई | लेकिन अकबर की सेना से बागी हुए सैफुद्दीन को जयमल द्वारा आश्रय देने के कारण जयमल की अकबर से फ़िर दुश्मनी हो गई | और अकबर ने एक विशाल सेना मेड़ता पर हमले के लिए रवाना कर दी | अनगिनत युद्धों में अनेक प्रकार की क्षति और अनगिनत घर उजड़ चुके थे और जयमल जनता जनता को और उजड़ देना नही चाहता था इसी बात को मध्यनजर रखते हुए जयमल ने अकबर के मनसबदार हुसैनकुली खां को मेड़ता शान्ति पूर्वक सौंप कर परिवार सहित बदनोर चला गया | और अकबर के मनसबदार हुसैनकुली खां ने अकबर की इच्छानुसार मेड़ता का राज्य जयमल के भाई जगमाल को सौंप दिया |
अकबर द्वारा चित्तोड़ पर आक्रमण का समाचार सुन जयमल चित्तोड़ पहुँच गया | २६ अक्टूबर १५६७ को अकबर चित्तोड़ के पास नगरी नामक गांव पहुँच गया | जिसकी सूचना महाराणा उदय सिंह को मिल चुकी थी और युद्ध परिषद् की राय के बाद चित्तोड़ के महाराणा उदय सिंह ने वीर जयमल को ८००० सैनिकों के साथ चित्तोड़ दुर्ग की रक्षा का जिम्मा दे स्वयम दक्षिणी पहाडों में चले गए | विकट योद्धों के अनुभवी जयमल ने खाद्य पदार्थो व शस्त्रों का संग्रह कर युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी | उधर अकबर ने चित्तोड़ की सामरिक महत्व की जानकारिया इक्कठा कर अपनी रणनीति तैयार कर चित्तोड़ दुर्ग को विशाल सेना के साथ घेर लिया और दुर्ग के पहाड़ में निचे सुरंगे खोदी जाने लगी ताकि उनमे बारूद भरकर विस्फोट कर दुर्ग के परकोटे उड़ाए जा सकें,दोनों और से भयंकर गोलाबारी शुरू हुई तोपों की मार और सुरंगे फटने से दुर्ग में पड़ती दरारों को जयमल रात्रि के समय फ़िर मरम्मत करा ठीक करा देते |
अनेक महीनों के भयंकर युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नही निकला | चित्तोड़ के रक्षकों ने मुग़ल सेना के इतने सैनिकों और सुरंगे खोदने वालो मजदूरों को मारा कि लाशों के अम्बार लग गए | बादशाह ने किले के निचे सुरंगे खोद कर मिट्टी निकालने वाले मजदूरों को एक-एक मिट्टी की टोकरी के बदले एक-एक स्वर्ण मुद्राए दी ताकि कार्य चालू रहे | अबुलफजल ने लिखा कि इस युद्ध में मिट्टी की कीमत भी स्वर्ण के सामान हो गई थी | बादशाह अकबर जयमल के पराकर्म से भयभीत व आशंकित भी थे सो उसने राजा टोडरमल के जरिय जयमल को संदेश भेजा कि आप राणा और चित्तोड़ के लिए क्यों अपने प्राण व्यर्थ गवां रहे हो,चित्तोड़ दुर्ग पर मेरा कब्जा करा दो मै तुम्हे तुम्हारा पैत्रिक राज्य मेड़ता और बहुत सारा प्रदेश भेंट कर दूंगा | लेकिन जयमल ने अकबर का प्रस्ताव साफ ठुकरा दिया कि मै राणा और चित्तोड़ के साथ विश्वासघात नही कर सकता और मेरे जीवित रहते आप किले में प्रवेश नही कर सकते |
जयमल ने टोडरमल के साथ जो संदेश भेजा जो कवित रूप में इस तरह प्रचलित है
है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फ़िर किम आण |
कुंच्यां जे चित्रकोट री दिधी मोहिं दीवाण ||
जयमल लिखे जबाब यूँ सुनिए अकबर शाह |
आण फिरै गढ़ उपरा पडियो धड पातशाह ||एक रात्रि को अकबर ने देखा कि किले कि दीवार पर हाथ में मशाल लिए जिरह वस्त्र पहने एक सामंत दीवार मरम्मत का कार्य देख रहा है और अकबर ने अपनी संग्राम नामक बन्दूक से गोली दाग दी जो उस सामंत के पैर में लगी वो सामंत कोई और नही ख़ुद जयमल मेडतिया ही था | थोडी ही देर में किले से अग्नि कि ज्वालाये दिखने लगी ये ज्वालाये जौहर की थी | जयमल की जांघ में गोली लगने से उसका चलना दूभर हो गया था उसके घायल होने से किले में हा हा कार मच गया अतः साथी सरदारों के सुझाव पर जौहर और शाका का निर्णय लिया गया ,जौहर क्रिया संपन्न होने के बाद घायल जयमल कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर चल पड़ा रणचंडी का आव्हान करने | जयमल के दोनों हाथो की तलवारों बिजली के सामान चमकते हुए शत्रुओं का संहार किया उसके शौर्य को देख कर अकबर भी आश्चर्यचकित था | इस प्रकार यह वीर चित्तोड़ की रक्षा करते हुए दुर्ग की हनुमान पोल व भैरव पोल के बीच लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुवा जहाँ उसकी याद में स्मारक बना हुआ है |
इस युद्ध में वीर जयमल और पत्ता सिसोदिया की वीरता ने अकबर के हृदय पर ऐसी अमित छाप छोड़ी कि अकबर ने दोनों वीरों की हाथी पर सवार पत्थर की विशाल मूर्तियाँ बनाई | जिनका कई विदेश पर्यटकों ने अपने लेखो में उल्लेख किया है | यह भी प्रसिद्ध है कि अकबर द्वारा स्थापित इन दोनों की मूर्तियों पर निम्न दोहा अंकित था |
जयमल बड़ता जीवणे, पत्तो बाएं पास |
हिंदू चढिया हथियाँ चढियो जस आकास ||
हिंदू,मुस्लमान,अंग्रेज,फ्रांसिस,जर्मन,पुर्तगाली आदि अनेक इतिहासकारों ने जयमल के अनुपम शौर्य का वर्णन किया है |
»»  read more

राजपुताना समाज की आम वार्षिक बैठक

राजपुताना समाज की आम वार्षिक बैठक निम्न कार्यक्रम अनुसार रखी गई है --
स्थान:- महाराणा प्रताप भवन
B-4 केशवपुरम,लाल साईं मन्दिर के पास,
लोरेंस रोड (नजदीक केशवपुरम मेट्रो स्टेशन )
नई दिल्ली -110035
दिनांक :- 28 दिसम्बर 2008
समय :- प्रात: 11 बजे
बैठक के कार्य बिन्दु निम्न प्रकार है -
1- स्वगत भाषण
2- नए चुने गए प्रतिनिधियों का अभिनन्दन
3- नई कार्यकारिणी का गठन (चुनाव द्वारा)
4- कार्य प्रगति एवं आर्थिक लेखे का ब्यौरा
5- भविष्य की योजनाओं पर विचार
6- अध्यक्ष की अनुमति से अन्य कार्य बिन्दु
इस बैठक में आप सभी की उपस्थिति परिवार व मित्रों सहित प्रार्थनीय है | बैठक के पश्चात श्री भारत सिंह राठौड़ के माध्यम से भोजन की व्यवस्था रखी गई है
जय सिंह राठौड़,अध्यक्ष

डा.लक्ष्मण सिंह राठौड़ ,महामंत्री

गिरधारी सिंह शेखावत,खजांची

भवदीय

श्रवण सिंह शेखावत

ph-9313501171
»»  read more

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ

राजस्थान के पांच पीर हुये है । जिनका नाम पाबूजी,हङबू जी,रामदेवजी,मंगलिया जी और मेहा जी है पाबूजी वीर थे उन्होनें गायों की रक्षार्थ अपने प्राणो की आहुती दी । यह वीडियो इस श्रंखला की शुरुआत है ।

video
»»  read more

वीर राव अमरसिंह राठौड़ और बल्लू चाम्पावत

'राजस्थान की इस धरती पर वीर तो अनेक हुये है - प्रथ्वीराज,महाराणा सांगा,महाराणा प्रताप,दुर्गादास राठौड़, जयमल मेडतिया आदि पर अमर सिंह राठौड़ की वीरता एक विशिष्ट थी,उसमे शोर्य,पराक्रम की पराकाष्ठा के साथ रोमांच के तत्व विधमान थे | उसने अपनी आन-बान के लिए ३१ वर्ष की आयु में ही अपनी इहलीला समाप्त कर ली | आत्म-सम्मान की रक्षार्थ मरने की इस घटना को जन-जन का समर्थन मिला | सभी ने अमर सिंह के शोर्य की सराहना की | साहित्यकारों को एक खजाना मिल गया | रचनाधारियों के अलावा कलाकारों ने एक ओर जहाँ कटपुतली का मंचन कर अमर सिंह की जीवन गाथा को जन-जन प्रदर्शित करने का उलेखनीय कार्य किया,वहीं दूसरी ओर ख्याल खेलने वालों ने अमर सिंह के जीवन-मूल्यों का अभिनय बड़ी खूबी से किया |रचनाधर्मियों और कलाकारों के संयुक्त प्रयासों से अमरसिंह जन-जन का हृदय सम्राट बन गया |"
- डा.हुकमसिंह भाटी, वीर शिरोमणि अमरसिंह राठौड़, पृ. १०

अमर सिंह राठौड़ की वीरता सर्वविदित है ये जोधपुर के महाराजा गज सिंह के जेष्ठ पुत्र थे जिनका जन्म रानी मनसुख दे की कोख से वि.स.१६७० , १२ दिसम्बर १९१६ को हुआ था | अमर सिंह बचपन से ही बड़े उद्दंड,चंचल,उग्रस्वभाव व अभिमानी थे जिस कारण महाराजा ने इन्हे देश निकाला की आज्ञा दे जोधपुर राज्य के उत्तराधिकार से वंचित कर दिया | उनकी शिक्षा राजसी वातावरण में होने के फलस्वरूप उनमे उच्चस्तरीय खानदान के सारे गुण विद्यमान थे और उनकी वीरता की कीर्ति चारों और फ़ैल चुकी थी | १९ वर्ष की आयु में ही वे राजस्थान के कई रजा-महाराजाओं की पुत्रियों के साथ विवाह बंधन में बाँध चुके थे |
लाहोर में रहते हुए उनके पिता महाराजा गज सिंह जी ने अमर सिंह को शाही सेना में प्रविष्ट होने के लिए अपने पास बुला लिया अतः वे अपने वीर साथियों के साथ सेना सुसज्जित कर लाहोर पहुंचे | बादशाह शाहजहाँ ने अमर सिंह को ढाई हजारी जात व डेढ़ हजार सवार का मनसब प्रदान किया | अमर सिंह ने शाजहाँ के खिलाफ कई उपद्रवों का सफलता पूर्वक दमन कर कई युधों के अलावा कंधार के सैनिक अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | बादशाह शाहजहाँ अमर सिंह की वीरता से बेहद प्रभावित था |
६ मई १९३८ को अमर सिंह के पिता महाराजा गज सिंह का निधन हो गया उनकी इच्छानुसार उनके छोटे पुत्र जसवंत सिंह को को जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठाया गया | वहीं अमर सिंह को शाहजहाँ ने राव का खिताब देकर नागौर परगने का राज्य प्रदान किया |
हाथी की चराई पर बादशाह की और से कर लगता था जो अमर सिंह ने देने से साफ मना कर दिया था | सलावतखां द्वारा जब इसका तकाजा किया गया और इसी सिलसिले में सलावतखां ने अमर सिंह को कुछ उपशब्द बोलने पर स्वाभिमानी अमर सिंह ने बादशाह शाहजहाँ के सामने ही सलावतखां का वध कर दिया और ख़ुद भी मुग़ल सैनिकों के हाथो लड़ता हुआ आगरे के किले में मारा गया | राव अमर सिंह राठौड़ का पार्थिव शव लाने के उद्येश्य से उनका सहयोगी बल्लू चांपावत ने बादशाह से मिलने की इच्छा प्रकट की,कूटनितिग्य बादशाह ने मिलने की अनुमति दे दी,आगरा किले के दरवाजे एक-एक कर खुले और बल्लू चांपावत के प्रवेश के बाद पुनः बंद होते गए | अन्तिम दरवाजे पर स्वयम बादशाह बल्लू के सामने आया और आदर सत्कार पूर्वक बल्लू से मिला | बल्लू चांपावत ने बादशाह से कहा " बादशाह सलामत जो होना था वो हो गया मै तो अपने स्वामी के अन्तिम दर्शन मात्र कर लेना चाहता हूँ और बादशाह में उसे अनुमति दे दी | इधर राव अमर सिंह के पार्थिव शव को खुले प्रांगण में एक लकड़ी के तख्त पर सैनिक सम्मान के साथ रखकर मुग़ल सैनिक करीब २०-२५ गज की दुरी पर शस्त्र झुकाए खड़े थे | दुर्ग की ऊँची बुर्ज पर शोक सूचक शहनाई बज रही थी | बल्लू चांपावत शोक पूर्ण मुद्रा में धीरे से झुका और पलक झपकते ही अमर सिंह के शव को उठा कर घोडे पर सवार हो ऐड लगा दी और दुर्ग के पट्ठे पर जा चढा और दुसरे क्षण वहां से निचे की और छलांग मार गया मुग़ल सैनिक ये सब देख भौचंके रह गए |दुर्ग के बाहर प्रतीक्षा में खड़ी ५०० राजपूत योद्धाओं की टुकडी को अमर सिंह का पार्थिव शव सोंप कर बल्लू दुसरे घोडे पर सवार हो दुर्ग के मुख्य द्वार की तरफ रवाना हुआ जहाँ से मुग़ल अस्वारोही अमर सिंह का शव पुनः छिनने के लिए दुर्ग से निकलने वाले थे,बल्लू मुग़ल सैनिकों को रोकने हेतु उनसे बड़ी वीरता के साथ युद्ध करता हुआ मारा गया लेकिन वो मुग़ल सैनिको को रोकने में सफल रहा |
संदर्भ-ठा.केसरी सिंह बारहट द्वारा लिखित पुस्तक "अमरसिंह राठौड़ "
»»  read more

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें
1-राजस्थान रा पिछोला - पिछोला को अंग्रेजी में Elegy कहते है और उर्दू में मरसिया | मर्त्यु के उपरांत मृतात्मा के प्रति उमड़ते हुए करूँ उदगारों के काव्य रूप को ही पिछोला कहतें है | पिछोले म्रत्यु की ओट में गए प्रेमी की मधुर स्मृति पर श्रद्धा व प्रेम के भाव-प्रसून है |इस पुस्तक से करुण रस का रसास्वादन करके हम राजस्थानी साहित्य की सम्पन्नता प्रमाणित करने में समर्थ हो सकतें है |
2- समाज चरित्र - समाज जागरण के निमित केवल आन्दोलन ही उचित मार्ग नही है | आन्दोलन तो संगठन शक्ति का प्रदर्शन मात्र है | वह जनमत की अभिव्यक्ति है | किंतु स्वयम जनमत का निर्माण करना एक कठिन काम है | अनेक सामाजिक संस्थाएं सामाजिक शक्ति को उभारने का कार्य करती है,किंतु निर्बल की नैसर्गिक शक्ति बार -बार उभर कर अपने विनाश का कारण ही बनती है जब तक की शक्ति को उभारने वाले स्वयम शक्ति के उत्पादक न बन जाय | संस्थाएं स्वयम अपने और अपने उदेश्य के प्रति स्पष्ट नही होती तब तक सामाजिक चरित्र गोण ही बना रहता है |
इसी कमी को पुरा करने के लिए एक व्यवसायिक शिक्षण और मार्ग दर्शन की आवश्यकता महसूस करके यह पुस्तक लिखी गई | जो साधना की प्रारम्भिक अवस्था में साधकों का मार्ग दर्शन करने में उपयोगी सिद्ध हो रही है |
3-बदलते द्रश्य- इतिहास के इतिव्रतात्मक सत्य के अन्दर साहित्य के भावात्मक और सूक्ष्म सत्य के प्रतिस्ठापन की चेष्ठा ही समाज में चेतना ला सकती है | समाज में आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावनाओं का सर्जन करना इस पुस्तक का लक्ष्य है |
4- होनहार के खेल -पु.तनसिंहजी के पॉँच रोचक हिन्दी निबंदों से सृजित होनहार के खेल राजस्थान की संस्कृति,योधा समाज के जीवन दर्शन,और जीवन मूल्यों से ओत-प्रोत है इसमे राजपूत इतिहास और राजपूत सस्कृति मुखरित है | क्षत्रिय समाज के सतत संघर्ष,अद्वितीय उत्सर्ग,और महान द्रष्टि का शाश्वत सत्य गुंजित है | पु.तनसिंहजी की पीडा,तड़पन,उत्सर्ग की महत्ता और उत्थान की लालसा पुस्तक के प्रत्येक शब्द में संस्पदित है | हमारे लिए एतिहासिक आधार भूमि को ग्रहण कर एक जीवन संदेश है |
5-साधक की समस्याएं- साध्य प्राप्ति के लिए साधक के पथ में क्या समस्याएं व कठिनाईयां क्या है ? और कब-कब सामने किस रूप में बाधक बन कर आती है तथा उन्हें कैसे पहचाना जाय और उनका किस प्रकार सामना किया जाय इन सब पहलुओं का विस्तार से इस पुस्तक समाधान किया गया है |
6-शिक्षक की समस्याएं- सच्ची शिक्षा का अभिप्राय अपने भीतर श्रेष्ठ को प्रकट करना है | साधना के शिक्षक को प्राय: यह भ्रम हो जाता है कि वह किसी का निर्माण कर रहा है | सही बात तो यह है कि जो हम पहले कभी नही थे,वह आज नही बन सकते | हमारा निर्माण,किसी नवीनता की सृष्टी नही है,बल्कि उन प्रच्छन शक्तियों का प्रारम्भ है जिनसे हमारे जीवन और व्यक्तित्व का ताना बना बनता है | साधना पथ में स्वयम शिक्षक एक स्थान पर शिक्षक है और उसी स्थान पर शिक्षार्थी भी है | इसलिय शिक्षण कार्य में आने वाली समस्याएं शिक्षक की समस्याएं होती है | वे समस्याएं क्या है और किस रूप में सामने आती है,उनका समाधान क्या है ? यही इस पुस्तक का विषय है |
7- जेल जीवन के संस्मरण- भू-स्वामी आन्दोलन समय श्री तनसिंह जी को गिरफ्त्तार कर टोंक जेल में रखा गया था | जेल में जेलर और सरकार का उनके साथ व्यवहार व जेल में रहकर जो घटा और जो अनुभव किए उनके उन्ही संस्मरणों का उल्लेख इस पुस्तक में है |
8- लापरवाह के संस्मरण- इस पुस्तक में पु.तनसिंह जी के अपने अनुभव है तो उनके संघ मार्ग पर चलते उनके अनुगामियों का चित्रण भी है जिसे रोचक और मनोरंजक भाषा में पिरोकर पुस्तक का रूप दिया गया है |
9-पंछी की राम कहानी- संघ कार्य की आलोचना समय-समय पर होती रही है | तन सिंह जी की आलोचना और विरोध भी कई बार विविध रूपों में होता रहा है | विरोध के दृष्टीकोण से ही देखकर संघ के बारे में जिस प्रकार की आलोचना की गई या की जा सकती है उसे ही मनोविनोद का रूप देकर पु.तनसिंह जी ने एक लेखमाला का रूप दिया,जो इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है |
10-एक भिखारी की आत्मकथा- श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित एक भिखारी की आत्मकथा बहु-आयामी संघर्षों के धनी जीवन का लेखा-जोखा है और यह लेखा-जोखा स्वयम श्री तनसिंह जी के ही जीवन का लेखा-जोखा है |वास्तव में आत्मकथा श्री तनसिंह जी की अपनी ही है |
11-गीता और समाज सेवा - गीता श्री तनसिंह जी का प्रिय और मार्गदर्शक रही है | गीता ज्ञान के आधार पर ही उन्होंने श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना की थी | धेय्य निष्ठां और अनन्यता का मन्त्र भी उन्होंने गीता से ही पाया | क्षात्रशक्ति और संघ की आवश्यकता और महत्व भी उन्होंने गीता पढ़कर ही महसूस की |गीता का व्यवहारिक ज्ञान जिसमे कर्म,ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है, को संघ में उतारने का बोध भी उन्हें गीता से ही हुआ-इसी से प्रेरणा मिली | एक सच्चे समाज सेवक के लिए गीता का क्या आदेश है और किस प्रकार सहज भाव से किया जा सकता है और क्या करना आवश्यक है,इन्ही महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख "गीता और समाज सेवा " पुस्तक में किया गया है |
12- साधना पथ- गीता के आध्यात्मवाद के आन्दोलन पथ पर बढ़ते योगेश्वर श्री कृष्ण ने योग का जो मार्ग सुझाया है उसी लक्ष्य को सम्यक रूप से आत्मसात करने तक हर साधना को गतिमय होना चाहिय | सर्वांगीण साधना वही है जिसमे व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को जागृत कर सके स्वधर्म पालन एक महान कार्य है |महान कार्यों की पूर्ति के लिए ईश्वर से एकता स्थापित करना परमाव्यस्क है, किसी अनुष्ठात्मक भक्ति से ईश्वर को छला नही जा सकता |
श्री तन सिंह जी ने सम्पूर्ण योग योग मार्ग के आठ सूत्र सुझाएँ है वे हैं -
1- बलिदान का सिद्धांत 2- समष्टि योग 3- श्रद्धा 4- अभिप्षा 5- शरणागति 6- आत्मोदघाटन 7- समर्पण भाव
8- योग
14- झनकार- श्री तनसिंहजी द्वारा लिखे गए 166 गीतों,कविताओं आदि के संकलन को "झनकार" नाम देकर पुस्तक का रूप दिया गया है झनकार के एक-एक गीत एक-एक पंक्ति अपने आप में एक काव्य है |
उपरोक्त पुस्तकें " श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास A / 8, तारा नगर झोटवाडा, जयपुर -302012 से प्राप्त की जा सकती है |
संदर्भ - श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास द्वारा प्रकाशित " पूज्य श्री तनसिंहजी-एक परिचय " पुस्तक से
»»  read more

स्व.पु.श्री तनसिंह जी: एक अद्भभुत व्यक्तित्व का परिचय

मैंने स्व.श्री तनसिंहजी के लिखे कई लेख इस चिट्ठे पर प्रस्तुत किए है आज मै श्री तनसिंहजी का संक्षिप्त परिचय आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ हालाँकि उनके अद्भुत व्यक्तित्व पर एक पुरी पुस्तक ही लिखी जा सकती है फ़िर भी मै अपने इस छोटे से लेख के माध्यम से स्व.पु.तनसिंहजी का परिचय कराने की कोशिश कर रहा हूँ |

वि.सं.१९८० में बाड़मेर जिले के गांव रामदेरिया के ठाकुर बलवंत सिंह जी महेचा की धर्म पत्नी मोतिकंवरजी के गर्भ से तनसिंह जी का जन्म अपने मामा के घर बैरसियाला गांव में हुआ था वे अभी शैशवावस्था में अपने घर के आँगन में चलना ही सीख रहे थे कि उनके पिता मालाणी के ठाकुर बलवंत सिंघजी का निधन हो गया और चार वर्ष से भी कम आयु का बालक तनैराज अपने सिर पर सफ़ेद पाग बाँध कर ठाकुर तनैराज हो गया | मात्र ९०रु वार्षिक आय का ठाकुर | भाग्य ने उनको पैदा करके पालन-पोषण के लिए कठिनाईयों के हाथों सौप दिया |
घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद भी श्री तनसिंह जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बाड़मेर से पुरी कर सन १९४२ में चौपासनी स्कूल जोधपुर से अच्छे अंकों के साथ मेट्रिक परीक्षा पास कर सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त किया,और उच्च शिक्षा के लिए पिलानी चले आए जहाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद नागपुर से उन्होंने वकालत की परीक्षा पास कर सन १९४९ में बाड़मेर आकर वकालत का पेशा अपनाया,पर यह पेशा उन्हें रास नही आया | 25 वर्ष की आयु में बाड़मेर नगर वासियों ने उन्हें बाड़मेर नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया और 1952 के विधानसभा चुनावों में वे पहली बार बाड़मेर से विधायक चुन कर राजस्थान विधानसभा पहुंचे और 1957 में दुबारा बाड़मेर से विधायक चुने गए | 1962 व 1977 में आप बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए | 1962 में तन सिंघजी ने दुनिया के सबसे बड़े और विशाल बाड़मेर जैसलमेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव मात्र एक जीप,कुछ साथी,सहयोगी स्वयम सेवक,कार्यकर्त्ता,किंतु अपार जन समूह के प्यार और समर्थन से मात्र 9000 रु. खर्च कर सांसद बने |
1979 में मध्यावधि चुनावों का फॉर्म भरने से पूर्व अपनी माताश्री से आशीर्वाद लेते समय 7 दिसम्बर 1979 को श्री तनसिंह जी ने अपनी माता की गोद में ही अन्तिम साँस ली |
पिलानी के राजपूत छात्रावास में रहते हुए ही श्री तनसिंह जी ने अपने भविष्य के ताने-बाने बुने | यहीं उनका अजीबो-गरीब अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ और समाज की बिखरी हुयी ईंटों से एक भव्य-भवन बनाने का सपना देखा | केवल 22 वर्ष की आयु में ही उनके हृदय में समायी समाज के प्रति व्यथा पिघली जो " श्री क्षत्रिय युवक संघ" के रूप में निश्चित आकार धारण कर एक धारा के रूप में बह निकली |
लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह फॉर्म भरना,सदस्यता लेना,फीस जमा करना,प्रस्ताव पारित करना,भाषण,चुनाव,नारेबाजी,सभाएं आदि करना श्री तन सिंह जी को निरर्थक लगी और 22 दिसम्बर 1946 को जयपुर के मलसीसर हाउस में नवीन कार्य प्रणाली के साथ "श्री क्षत्रिय युवक संघ " की विधिवत स्थापना की और उसी दिन से संघ में वर्तमान संस्कारमयी मनोवैज्ञानिक कार्य प्रणाली का सूत्रपात हुवा | इस प्रकार क्षत्रिय समाज को श्री तनसिंह जी की अमूल्य देन "श्री क्षत्रिय युवक संघ " अपनी नई प्रणाली लेकर अस्तित्व में आया |
राजनीती में रहकर भी उन्होंने राजनीती को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया | क्षत्रिय युवक संघ के कार्यों में राजनीती भी उनकी सहायक ही बनी रही | सन 1955-56 में विवश होकर राजपूत समाज को राजस्थान में दो बड़े आन्दोलन करने पड़े जो भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से विख्यात हुए,दोनों ही आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में क्षत्रिय युवक संघ की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी |
स्व.श्री तनसिंह जी की ख्याति एक समाज-संघठक,कर्मठ कार्यकर्त्ता,सुलझे हुए राजनीतीज्ञ,आद्यात्म प्रेमी,गंभीर विचारक और दृढ निश्चयी व्यक्ति के रूप में अधिक रही है किंतु इस प्रशिधि के अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है जिसे विस्मृत नही किया जा सकता | यह एक तथ्य है कि एक कुशल प्रशासक,पटु विधिविज्ञ,सजग पत्रकार और राजस्थानी तथा हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के लेखक भी थे | पत्र लेखन में तो उनका कोई जबाब ही नही था अपने मित्रों,सहयोगियों,और सहकर्मियों को उन्होंने हजारों पत्र लिखे जिनमे देश,प्रान्त,समाज और राजपूत जाति के अतीत,वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है | अनेक सामाजिक,राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने साहित्य,संस्कृति और धार्मिक विषयों पर लिखने के लिए समय निकला |
श्री क्षत्रिय युवक संघ के पथ पर चलने वालों पथिकों और आने वाली देश की नई पीढियों की प्रेरणा स्वरूप स्व.श्री तनसिंह जी एक प्रेरणादायक सबल साहित्य का सर्जन कर गए | उन्होंने अनेक पुस्तके लिखी जो जो पथ-प्रेरक के रूप में आज भी हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए पर्याप्त है |
1-राजस्थान रा पिछोला
2-समाज चरित्र
3- बदलते द्रश्य
4- होनहार के खेल
5- साधक की समस्याएं
6- शिक्षक की समस्याएं
7- जेल जीवन के संस्मरण
8- लापरवाह के संस्मरण
9-पंछी की राम कहानी
10- एक भिखारी की आत्मकथा
11- गीता और समाज सेवा
12- साधना पथ
13- झनकार( तनसिंहजी द्वारा रचित 166 गीतों का संग्रह)
श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकों पर पुरा विवरण अगले लेख में |
कैसा लगा स्व.तनसिंह जी का व्यक्तित्व अपनी राय जरुर दे |
»»  read more

वैरागी चित्तौड़ -3

वैरागी चित्तौड़-1
वैरागी चित्तौड़ -2 का शेष (अन्तिम)
विस्मृति बता रही है- यह तो रानी पद्मावती का महल है | इतिहास की बालू रेत पर किसी के पदचिन्ह उभरते हुए दिखाई दे रहे है | समय की झीनी खेह के पीछे दूर से कही आत्म-बलिदान का,उत्सर्ग की महान परम्परा का कोई कारवां आ रहा है | उस कारवां के आगे चंडी नाच रही है | तलवारों की खनखनाहट और वीरों की हुंकारे ताल दे रही है | विकराल रोद्र रूप धारण कर भी वह कितनी सुंदर है | कैसी अद्वितीय रणचंडी है | पुरातन सत्य बढ़ा आ रहा है | कितना मंगलमय है | कितना सुंदर है | कितना भव्य है |
हाँ ! यह रानी पद्मावती के महल है-चारों और जल से घिरे हुए पत्थरों ने रो-रो कर आंसुओ के सरोवर में गाथाओ को घेर लिया है |
दुःख दर्द और वेदना पिघल-पिघल कर पानी हो गई थी अब सुख-सुख कर फ़िर पत्थर हो रही है | जल के बिच खड़े हुए यह महल ऐसे लग रहें है,जैसे वियोगी मुमुक्ष बनकर जल समाधी के लिए तत्पर हो रहे रहे हों,अथवा सृष्टि के दर्पण में अपने सोंदर्य के पानी को मिला कर योगाभ्यास कर रहें हों |
यह रानी पद्मिनी के महल है | अतिथि-सत्कार की परम्परा को निभाने की साकार कीमतें ब्याज का तकाजा कर रही है; जिसके वर्णन से काव्य आदि काल से सरस होता रहा है,जिसके सोंदर्य के आगे देवलोक की सात्विकता बेहोश हो जाया करती थी;जिसकी खुशबू चुराकर फूल आज भी संसार में प्रसन्ता की सौरभ बरसाते है उसे भी कर्तव्य पालन की कीमत चुकानी पड़ी ? सब राख़ का ढेर हो गई केवल खुशबु भटक रही है-पारखियों की टोह में | क्षत्रिय होने का इतना दंड शायद ही किसी ने चुकाया हो | भोग और विलास जब सोंदर्य के परिधानों को पहन कर,मंगल कलशों को आम्र-पल्लवों से सुशोभित कर रानी पद्मिनी के महलों में आए थे,तब सती ने उन्हें लात मारकर जौहर व्रत का अनुष्ठान किया था | अपने छोटे भाई बादल को रण के लिए विदा देते हुए रानी ने पूछा था,- " मेरे छोटे सेनापति ! क्या तुम जा रहे हो ?" तब सोंदर्य के वे गर्वीले परिधान चिथड़े बनकर अपनी ही लज्जा छिपाने लगे; मंगल कलशों के आम्र पल्लव सूखी पत्तियां बन कर अपने ही विचारों की आंधी में उड़ गए;भोग और विलास लात खाकर धुल चाटने लगे | एक और उनकी दर्दभरी कराह थी और दूसरी और धू-धू करती जौहर यज्ञ की लपटों से सोलह हजार वीरांगनाओं के शरीर की समाधियाँ जल रही थी |
कर्तव्य की नित्यता धूम्र बनकर वातावरण को पवित्र और पुलकित कर रही थी और संसार की अनित्यता जल-जल कर राख़ का ढेर हो रही थी |
शत्रु-सेना प्रश्न करती है -
" यह धुआं कैसा उठ रहा है ?"
दुर्ग ने उत्तर दिया -" मूर्खो ! बल के मद से इतरा कर जिस भौतिक वैभव के लिए तुम्हारी कामनाएं है,वाही धूम्र-मय यह संसार है,जो अनित्य है | पीड़ित मिट गए पर सबल से सबल आततायी भी शेष रह पायें है ? जिनके सुख,स्वतंत्रता और स्वाधीनता के साथ आज तुम खिलवाड़ करना चाहते हो,अमरलोक में इन्ही के खेल तुम्हारी बर्बरता पर व्यंग्य से मुस्करायेंगे |"
इतने में ही केसरिया बाना पहने,दुर्ग से ढलते वीरों को भ्रमपूर्ण द्रष्टि देखकर शत्रु सेना फ़िर दुर्ग से पूछती है,- " और यह अंगारे कैसे है ?"
दुर्ग उत्तर देता है- 'मूर्खो ! यह कर्तव्य की आग है,जो नित्य जला करती है,और इसी में जला करती है जुल्मों की कहानियाँ; इसी में आततायियों के इतिहास जला करते है और इसी में जलते है - स्वातन्त्र्य प्रेमी प्रणवीरों के प्राण !"
घमासान युद्ध ! लाशों के ढेर ! खून के कल-कल करते हुए नाले !धरती की लाज छिपाने के लिए क्षत्रियों ने उस पर मानव-वस्त्र डाल दिया | उनकी पराजय शत्रु-सेना की विजय पर व्यंग्य से मुस्कराने लगी | वर्षों का वैमनस्य का निर्णय दो ही घंटों में हो गया |
शत्रु दुर्ग में घुसे | निर्जनता उनके स्वागत के लिए खड़ी थी,क्योंकि वह जीवित और शेष थी | सोंदर्य जलकर राख हो चुका था | राज्य सत्ता आहत हुयी कराह रही थी; अपनी अन्तिम घड़ी की प्रतीक्षा में अधीर हो रही थी |
अल्लाउदीन का प्रस्तर हृदय भी रो उठा | राख को अपने मस्तक के लगाया | दुर्ग को पूछा-"यह भीषण नर-संहार,यह विकराल रक्त-पात और यह यज्ञानल में सर्वस्व-अर्पण केवल तेरी रक्षा के लिए हुआ और तू पाषण-हृदयी,कितना जड़ और ढीठ है,जो मूक खड़ा है किंतु पिघल नही जाता !"
दुर्ग ने शांत भाव से उत्तर दिया-" मेरी रक्षा ही इनका लक्ष्य होता तो ये मुझे अरक्षित छोड़कर अभी न मरते,न जलते | इनकी एक आन है,एक स्वाभिमानी परम्परा है और उसकी रक्षा मर मिटकर ही की जा सकती है | मै तुम्हारे अधीन हो गया,पर वे लक्ष्य-भ्रष्ट नही हुए | अलाउद्दीन ! तुम इन भावनाओं को नही समझ सकते,इन्हें मै जानता हूँ क्योंकि,मेरी छाती पर सदैव ऐसे ही खेल खेले गए है | मै इन अद्वितीय खिलाड़ियों के अचिन्त्य खेलों का सदैव साक्षी रहा रहा हूँ,तुमसे पहले और तुम्हारे बाद कई मुझ पर चढ़ कर आए है और आयेंगे,पर जब तक मरने की यह परम्परा चलती रहेगी,तब तक मै अधीन होकर भी गौरव को स्वाधीनता का पाठ पढाते हुए इनकी अनोखी कहानियाँ सुनाता रहूँगा |इसलिय,मै व्यथा और शोक में पिघलता नही,बल्कि यहाँ के वातावरण और प्रत्येक निवासी को यही शिक्षा देता हूँ कि क्षुद्र देहाध्यास से ऊपर उठकर कर्तव्य को पहचानों |"
अलाउद्दीन ने अपनी फौज को कूच करने का हुक्म देते हुए कहा,-" यहाँ के तो पत्थर भी मनुष्य है और मनुष्य पत्थर है; यह दुर्ग वैरागी है,वियोगी नही |"
"वीतराग वैरागी चित्तोड़ ! तेरे पावन चरणों में मेरा तुच्छ शीश अनुराग से नत है | श्रधा से शत-शत नमन ! तेरा उन्नत मस्तक आज तक किसी के समक्ष नही झुका और इसलिए तुमने हमारा मस्तक सदा के लिए ऊँचा कर दिया | आज वही न झुकने वाला मै,तेरे ही सामने कृतज्ञता से नत मस्तक हूँ; प्रणाम ! शत-शत प्रणाम ! क्या हमें भी कोई शिक्षा दे सकते हो ? तुम पत्थर होकर भी जाग रहे हो और हम इन्सान होकर भी सो रहे है |"
तुम्हें क्या शिक्षा दी जावे, पथिक ! तुम्हारे पूर्वजों के खून ने तुम्हे कोई शिक्षा ही नही दी,तुम्हारी माताओ और बहिनों के बलिदान तुम्हें कुछ नही सिखाया,तुम्हारे जाज्वल्यमान इतिहास से भी तुम कुछ नही सीख सके तो मै क्या शिक्षा दे सकता हूँ, जो उस जीवित इतिहास का एक जड़ और मूक स्मारक हूँ ; पर हाँ मेरी भी मर्यादाएं है | जिनका मस्तक झुक गया,उन्हें जाकर कहना -मेरे सामने आकर अपना मस्तक न झुकाए | जिन्होंने एक जीवित जाति और जीवित इतिहास का स्मारक बना दिया है,उन्हें कह देना-कि मै उन्हें देखना भी नही चाहता | वे कदम कभी इधर न आए,जो हार कर शत्रु के टुकडों पर जीवित रहने के लिए चल पड़े हों |"
वैरागी चित्तोड़ ! विदा ! मै उस समाज के जीवित अंश की खोज में जा रहा हूँ, जो कर्तव्य के मार्ग में परिणामो की चिंता नही करता |उस संजीवनी की खोज में जा रहा हूँ,जिसका आस्वादन कर यह समाज समय-समय पर इतिहास बन सका है | वह त्याग कहाँ है,जिसकी पावन चेतन धारा आज जड़ और मूक बन गई है | वह आकाश कौनसा है,जिसमे मेरे बलिदान का प्रखर सूर्य अस्त हो गया है | मै ढूंढ़ निकालूँगा उन्हें | तेरी प्रेरणा का मुझ पर नशा छा गया है,जिसे जीवन का नशा कहा जाता है,इसी नशे में एक दिन धुत होकर आवूंगा और तुझे बताऊंगा,कि मेरे पूर्वजों के खून ने मुझे क्या शिक्षा दी थी | सिद्ध कर दूंगा,कि मेरे जाज्वल्यमान इतिहास में अब भी शोले दहक रहे है और यह भी सिद्ध कर दूंगा , कि तुम मेरे इतिहास के जड़ और मूक स्मारक नही, एक प्रेरणा के पुंजीभूत हो |
स्व.श्री तन सिंह जी,बाड़मेर


आशियाने | ज्ञान दर्पण
»»  read more

वैरागी चित्तौड़ -2

वैरागी चित्तौड़ ....का शेष भाग

यह दुर्ग का अन्तिम द्वार है,जहाँ प्राणों की बाजी लग जाया करती थी; जवानी म्रत्यु को धराशायी कर दिया करती थी;कर्तव्य यहाँ यौवन की कलाईयां पकड कर मरोड़ दिया करता था;उमंगे यहाँ तलवार की धार पर नाचने लग जाया करती थी;विलास वैभव और सुख यहाँ उदासीन होकर धक्के खाया करते थे |
यह वही द्वार है !
वही द्वार है,जहाँ मस्ती मस्त हो जाया करती थी | अब सिर्फ़ यादगार पड़ी हुयी सिसक रही है | समय ने उसका सुहाग छीन लिया है |
वही द्वार है,जहाँ जिन्दगी उन्मत हो उठ जाया करती थी |आज तो सिर्फ़ मौत तडफ रही है | अलबेलों की छाती का सारा रक्त पी लिया है |
वही द्वार है,जहाँ बनते और बिगड़ते हुए सैकडों इतिहासों ने राज्य लक्ष्मियों के भाग्य पोंछ डाले;पर इस समय कुछ उपेक्षित-सी भूलें अपना अन्तिम दम तोड़ रही है |
द्वार में प्रविष्ट होते ही- यह पत्ता का स्मारक है | कल की निर्दयी शमां पर चढा हुवा मासूम परवाना,कर्तव्य की आँख का टपका हुवा दर्दीला आंसू,सृष्टि की सुखभरी नींद का प्रभात-कालीन अधुरा स्वप्न,मानवता की टहनी पर खिलने से पहले मुरझाया हुवा एक निर्दोष पुष्प,विधाता की निष्पाप भूल का अभागा परिणाम,स्मारक की फटी-पुरानी लज्जा में सिकुड़-सिमट कर सो रहा है-अनंत निंद्रा में| मत जगाओ ! कुचले हुए भाग्य के अधूरे अरमानों की फ़िर कहीं होली न खेल जाए | बहता हुवा आंसू कहीं आग का शोला न बन जाए | किसी महान संकल्प का कोई अभागा परिणाम भाग्य से बदला लेने के लिए दहक न उठे |
शत्रु का जिसने खुली छाती मुकाबला किया,उसी की वेदना सो रही है | जरा चुप ! वहकहीं अंगडाई लेकर उठ खड़ी न हो जाय | संसार के इस उपेक्षित एकांत में स्मृति आँख मिचोली खेल रही है | सदियों पहले यहाँ एक छोटा-सा बालक शत्रु से लड़ता हुवा अनंत निंद्रा में सो सो गया था | हाथियों से टकराता हुवा,तीखी तलवारों से खेल खेलता हुवा,खून से लथपथ होकर भी जब मेवाड़ की स्वतंत्रता को नही बचा सका,तब मौत ने क्षत्रिय जाति को उस दिन उलाहना दिया था-"लोग मुझे क्रूर कहते है,पर ये मेरा दुर्भाग्य है,पर हे क्षत्रिय जाति ! तू मुझसे भी कितनी क्रूर है,जो ऐसे सपूतों से अपनी कोख खली कर मुझे सोंपती रही है ! मुझे निर्दयी कहा जाता है,पर मेरी गोद में जो भी आता है,मै उसे थपथपा कर अनंत निंद्रा में सुला देती हूँ | और दूसरी और तू है,जो उदारता की जननी कहलाती है,पर तेरी गोद में जो आता है,उसे ही तू आग में झोंक देती है !" पर क्षत्रिय जाति ने म्रत्यु के उलाहने का कोई उत्तर नही दिया | उसे उत्तर देने का अवकाश ही नही | उसका अस्तित्व ही उसका उत्तर है | तब मौत ने उदास होकर होनहार से प्राथना की थी,"मत भूलना होनहार ! स्वतंत्रता के अमर पुजारियों में इस छोटे बालक का नाम लिखना न भूलना !"
मौत कहती गई,जाति की कोख खाली होती गई.होनहार की कलम चलती गई,तीनों में होड़ चल रही थी | कोई नही थका,कोई नही थका | थका केवल इतिहास,जो उपेक्षा की गोद में पड़ा हुवा अपनी ही छाती के घावों पर कराह रहा है | हाँ,इसी जगह,जहाँ इतिहास कराह रहा है,किसी दिन मृत्यु और कर्तव्य का पाणीग्रहण हुवा था | यज्ञ कुण्ड में होनहार की अन्तिम आहुति अग्नि के साथ अभी तक फड़क रही है | हथलेवा की मेहँदी अपमानित हुयी सी विवाह मंडप में बिखरी पड़ी हुयी है | चलो आगे बढो |


कुम्भा के महलों के भग्नावशेष और यह पास में खड़ा हुवा विजय स्तम्भ ! एक ही चेहरे की दो आँखे है जिसमे एक में आंसू और दूसरी में मुस्कराहट सो रही है | एक ही भाग्य विधाता की दो कृतियाँ है-एक आकाश चूम रहा है और दूसरा प्रथ्वी पर छितरा गया है | एक ही कवि की दो पंक्तियाँ है,जिसमे एक जन-जन के होठों पर चढ़कर उसकी कीर्ति प्रशस्त कर रही है और दूसरी रसगुण से ओत-प्रोत होकर भी जंगल के फूल की तरह बिना किसी को आकृष्ट किए अपनी ही खुशबु में खोकर विस्मृत हो गई है | एक ही जीवन के दो पहलु-एक स्मृति की अट्टालिका और दूसरी विस्मृति की उपमा बनकर बीते हुए वैभव पर आंसू बहा रही है |
पास ही पन्ना दाई के महलों में ममता सिसकियाँ भर रही है,कर्तव्य हंस रहा है और जमाना ढांढस बंधा रहा है | निर्जनता शान्ति की खोज में भटकती हुयी यही आकर बस गई है | जीवन में भावों की उथल-पुथल चल रही है,यधपि जीवन समाप्त हो गया है | राख अभी तक गर्म है,यधपि आग बहुत पहले ही बुझ चुकी है |मौत का सिर यही कटा था,किंतु जिन्दगी का धड़ छटपटा रहा है |अपने लाडले की बलि चढाकर माताओं ने कर्तव्य पालन किया,मौत का जहर पीकर जिन्होंने जिन्दगी के लिए अमृत उपहार दिया | अपने ही शरीर की खल खिंचवा कर मालिक के लिए जिन्होंने आभूषण बनाये |
ओह ! कैसी परम्पराएँ थी !
यह परम्परा तो जन हथेली पर लेकर चलने की नही,उससे से भी बढ़कर थी | जान को कहती थी - "तुम चलो,हम आती है !"
इज्जत बचाने के लिए प्रलय-दृश्य विकराल अग्नि में कूद पड़ने को यहाँ लोग जौहर कहा करते थे | और यह जौहर स्थान है,जहाँ सतियाँ....|
जमीन में अब भी जैसे ज्वालायें दहक रही है | लपटों में अग्नि स्नान हो रहा है | मिटटी से बने शरीर को मिटटी में मिला दिया | अग्नि की परिक्रमा देकर संसार के बंधन में बंधी और उसी में कूद कर बंधनों से मुक्त हो गई | व्योम की अज्ञात गहराईयों से आई और उसी की अनंत गहराईयों में समा गई |शत्रु आते थे,रूप और सोंदर्य के पिपासु बनकर परन्तु उन्हें मिलती थी-अनंत सोंदर्य से भरी हुयी ढेरियाँ | इस जीवटभरी कहानी पर सिर हिलाकर उसी राख को मस्तक से लगाकर वे भी दो आंसू बहा दिया करते थे | विजय-स्तम्भ ने यह सब द्रश्य देखे होंगे;चलो,उसी से पूछे,उन भूली हुयी दर्दनाक कहानियो का उलझा हुवा इतिहास | देखें उसे क्या कहना है ?
" मै ऊँचा हो-हो होकर दुनिया को देखने का प्रयास कर रहा हूँ,कि सारे संसार में ऐसे कर्तव्य और मौत के परवाने और भी कही है ? पर खेद ! मुझे तो कुछ भी दिखाई नही देता |"
वह पूछता है- " तुमतो दुनिया में बहुत घूम चुके हो,क्या ऐसे दीवाने और भी कही है ?"
"नही !"
तब गर्व से सीना फुलाकर और सिर ऊँचा उठा कर स्वर्ग कि और देखता है | वहां से भी प्रतिध्वनी आती है |
"नही!"
नीवें बोझ से दबी हुयी बताती है,"तेरे गर्भ में ?" तब पाताल लोक भी गूंजता है -
"नही!'
फ़िर भी उसे संतोष नही होता,इसलिए प्रत्येक आगन्तुक से पूछता है,पाषाण-हृदय जो ठहरा ! पर मनुष्य का कोमल हृदय रो देता है और वह हर एक को रुलाये बिना मानता ही नही |

यह गोरा और बादल की गुमटियां है | यहाँ मस्तानों की होली रंग लाया करती थी | यहाँ परवानों की शमां अपना हृदय खा कर जला करती थी | यहाँ दीवानों की जिंदगी दीवानी बना करती थी | यहाँ मतवालों की कहानियाँ श्रोताओं की खोज में स्वयम खो जाया करती थी | मिल कर जीने और मिलकर मरने के अरमान बाहें डालकर चला करते थे | यहाँ सोभाग्य और दुर्भाग्य की आँख मिचौनी में साम्राज्यों के भविष्य डूबते और उतराते थे | यहाँ सुख विधाता की भूल और भोग उस भूल का कोढ़ माना जाता था | यहाँ पराजयों की छाती रोंद कर विजयोत्सव मनाये जाते थे | भाग्य उपेक्षित होकर ठोकरे खाया करता था | यहाँ देश धर्म और कर्तव्य की बलि-वेदी पर शहीदों के मेले लगा करते थे | ऐसे ही मेलों के दो बाँके सपूत "गोरा और बादल" के कुछ मूक भाव अब भी किसी बीते हुए युग की याद में पत्थरों से टकराया करते है,इसलिए पत्थर भी अब बिखरते जा रहे है | चारों और का शांत व गंभीर वातावरण खड़ा-खड़ा भगवान की लीला पर हतप्रभ-सा हो रहा है,- " क्या जमाना और दुनिया इतनी बदल सकती है ?"
कहाँ वे दिन,जब रणभेरी के साथ नगारों पर चोट पड़ते ही जीवन का समुद्र मर्यादाएं तोड़ कर प्रलयंकारी विप्लव खड़ा कर देता था | हृदय की धडकनों से वैभव और विलास के अरमान आत्महत्या कर लेते थे और म्यानों में पड़ी हुयी तलवारें नए इतिहासों का निर्माण करने के लिए खिंच जाने को तडफ उठती थी और कहाँ आज का यह दिन,जब उन्ही के वंशज समय की रणभेरी और कर्तव्य के नगारों की चोट नही सुन पा रहे है | हृदय और मस्तिष्क का प्रकाश बुझ गया | कर्तव्य ज्ञान की आँखे पथरा कर निस्तेज हो गई | विस्मृति के अंधकार में जीवन-सूर्य का नजारा खो गया | आज तो आँखों में आंसू भी नही बचे, जो उनकी याद में बहाए जा सके |
स्व.श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित पुस्तक होनहार के खेल से साभार क्रमश:
आशियाने | ज्ञान दर्पण
»»  read more

वैरागी चित्तौड़-1



स्व.श्री तनसिंहजी की कलम से
यह चित्तौड़ है,जिसके नाम से एक त्वरा उठती है,एक हुक बरबस ह्रदय को मसोस डालती है;किंतु जिसने अपनी आंखों से देखा है उसकी द्रष्टि भावनाए बनकर लेखनी में उतर जाया करती है और फ़िर कागजों के कलेजे कांपने लग जाया करते है| इतिहास के इतने कागज रंगने पर भी क्या दुर्ग की दर्दनाक कहानी का किसी ने और-छोर भी पाया है ? क्या फुसलाने से भी कोई व्यथा मिट सकती है ? क्या सहलाने से भी दर्द समाप्त हो सकता ? चित्तौड़ स्वंम एक कहानी-एक दर्दभरी दास्ताँ है ;एक उपेक्षित किंतु महान कौम का महाकाव्य है,जो कागजों पर नही,इतिहास के भुलाये हुए महाकवियों द्वारा पत्थरों पर लिखा गया है| पत्थर की लकीरों की भांति ही है-वे कहानियाँ जो न समय की आंधी से अब तक मिट सकी है और न ही विस्मृति की वर्षा से धुल सकी है |
स्टेशन पर हमें छोड़ कर रेलगाडी विदा होते हुए कहती है-" जाओ पथिक ! जा कर देखो ! वहां वे बहादुर लोग सो रहे है,जिन्होंने तुम्हारे देश,धर्म के लिए,तुम्हारी संस्कृति और परम्परा के लिए,बड़े से बड़े त्याग को भी छोटा कर दिखाया है! उन देश भक्तों को मेरा प्रणाम कहना "|
इतिहास की क्रीडास्थली मेवाड़-भूमि के उबड-खाबड़ मगरों और ऊँची नीची पहाडियों के बीच आकाश को कुदेरता,गुमसुम हुवा,चित्तौड़ का यह गौरवशाली यह दुर्ग ऐसे खड़ा है,जैसे किसी अजेय शक्ति से पराजित होकर अपने गण और अनुचरों के बीच भगवान शिव किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े विजय की कामना में किसी विस्मृत सिद्धि की पुनः प्राप्ति के लिए अनुष्ठान कर रहे हों |इस दुर्ग के भी कभी सुनहले दिन थे,चांदनी रातें थी,वैभव-सम्पति की अठखेलियों की बहारें थी,मंगल गीत और उत्सवों की ऋतुएं थी | हाँ,मंगल-श्री ही थी,पर आज विदा ले चुकी है | एक आग थी जो राख होने जा रही है |एक वीरता थी,जो समर भूमि में रक्त से लथपथ हो अब जीवन की अन्तिम घडियां गिन रही है |
श्री विहीन अवस्था में भी वह बाहें पसार कर आपका स्वागत कर रहा है| दुर्दिन की निराशा में भी अतिथि-सत्कार की परम्परा को नही भुला है,काल और परिस्थितियों की विजय इसकी मुस्कराहट पर विजय प्राप्त नही कर सकी है |वह मुस्कराकर आपसे आग्रह कर रहा है -" आओ पथिक ! तुम्हारा स्वागत है | पत्थरों की कारीगरी और कला के पारखी हो तो भीतर जाकर परीक्षा करो-ये पत्थर बड़े कि उनके कारीगर ? जाओ और पहचानों इस कला और कलाकारों में कौन बड़ा है ?और यदि तुम मनुष्यों कि भावनाओं के जौहरी हो, तो आओ,मेरे ह्रदय की तड़पन को देखो,सम्पति और विप्पती का समन्वय देखो,जीवन और मृत्यु के संघर्ष में कचोटी हुयी भूमि को देखो,इतिहास पढो और यहाँ आकर देखो उसके क्षत-विक्षत भग्नावशेष देखो |
अभी तो उनके चरण चिन्ह भी नही मिटे है |भीतर आकर पहचानो,कही तुम्हारा भी कोई निशान है ? अभी-अभी वह आग भुझ कर राख हुयी है-ढुंढौ,तुम्हारी ही किसी माँ-बहिन की जली हुयी चूडियाँ इधर-उधर बिखरी हुयी न पड़ी हो | यह दीवारें कल तक बोलती थी,कहीं उस पर तुम्हारा ही कोई शब्द अटका हुवा नही पड़ा है ?"
द्वार के पास ही दो एक स्मारक खड़े है | दर्शक उनकी भाषा समझने की चेष्ठा में ठिठक कर खड़ा हो जाता है | पर रावत बाघसिंह की भाषा कौन सकता है ? कौन समझ पायेगा उस वीर पुरूष के अरमानों को,जो जिस दुर्ग से एक दिन निर्वासित हो गया था; आक्रान्ता से लड़ता हुवा,उसी दुर्ग के प्रथम द्वार पर अपना स्मारक बना सकने में सफल हुआ हो ! समझ भी कैसे सकता है,जब देश पर छाई हुयी विपत्ति के समय समाज के समक्ष व्यक्ति मानापमान को तिलांजली देना सिखाने वाले उस समाज-चरित्र की भाषा वर्षों से लुप्त हो गई है ! दर्शक की अबोध बेबसी पर दुर्ग की मूक वेदना कहती है,तनिक और आगे बढ कर देखो ! यहाँ का एक-एक पत्थर अवशेष है ? अभी से कैसी हिचक ?
यह जयमल और कल्ला जी की छतरियां है | कर्तव्य जैसे दुर्भाग्य से पछाड़ खाकर राह पर पड़ा कराह रहा हो | उस कराहते हुए दर्द पर शिल्पी ने छत्री को सोंदर्य देना चाहा है,किंतु वह कौनसी सुन्दरता है,जो जयमल की छत्री पर चढ़कर लज्जित नही होगी ? वह सोंदर्य तो क्षमा मांग रहा है-मुझे तो विवश बनाकर शिल्पी ने लगा दिया है | इस छत्री का सोंदर्य तो केवल जयमल और कल्ला जी ही है,और अब उनकी यादगार ही इस छत्री का सोंदर्य है |

यादगार !
देश-प्रेम के मतवाले जयमल मेडतिया की यादगार,जिसने घायल होकर भी अपने कर्तव्य को नही छोड़ा | उस युद्ध की यादगार ! जब वे घोड़े पर नही चढ़ सके तो कल्ला जी के कंधे पर चढ़कर युद्ध करने लगे थे | उस केसरिया बाने की यादगार,जिस पर बहता लाल रक्त जैसे शोर्य के घोड़े पर क्रोध सवार हो रहा हो |
हाँ !
यह वही स्थान है,जहाँ वीर जयमल मेडतिया ने महाकाल की पूजा में अपने जीवन-प्रसून को सदा के लिए चढा दिया |
आज भी दो एक फूल समाधी पर पड़े रो रहे है-बावले साधको ! यह देवता हमारे जैसे फूलों से प्रसन्न नही होता | यह तो स्वतंत्रता और मातृभूमि के लिए मिटा था | यदि तुम्हारे पास भी ऐसी ही कोई भावना हो तो वह चढावो |
छोडो !
यह सम्पति भी लुट चुकी |
आगे चलो !
स्व.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तक होनहार के खेल से साभार क्रमश :
आशियाने
»»  read more

समाचार

इतिहास

श्री तनसिंह जी की कलम से

राजपूत नारियां

 
hitcounter www.hamarivani.com
apna blog
 

Followers