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सीहा जी पर लगे मिथ्या आरोप

Posted by नरेश सिह राठौङ Jun 5, 2009

पिछले लेख में मोहम्मद गौरी का नाम शहाबुद्धीन लिख देने से काफी पाठको ने इस बात को समझाने में परेशानी अनुभव की | मोहम्मद गौरी का पूरा नाम मोहम्मद शहाबुद्धीन गोरी था | अब बात करते है सीहा जी की |
सीहा ,कनौज के प्रमुख राजा जयचन्द राठौड के पौत्र थे राजस्थान मे राठौड वंश की स्थापना इनके कनौज से राजस्थान आगमन से ही हुई है इन पर आरोप लगाया गया था कि पल्लीवाल ब्राहम्णो को धोखे से मार कर पाली पर अधिकार किया था इस लेख मे हम इस आरोप की सच्चाई की पड़ताल करेंगे
कर्नल टोड के " राजस्थान के इतिहास ' में लिखा है कि:- सीहाजी ने गुहिलो को भगा कर लुनी के रेतीले भाग मे बसे खेड पर अपना राठौडी झण्डा खड़ा किया
उस समय पाली, और उसके आस पास का प्रदेश पल्लीवाल ब्राहम्णो के अधीन था ,और उस पाली नामक नगर के कारणः ही वे पल्लीवाल कहाते थे परंतु आस पास की मीणा मेर नामक जंगली लूटेरी कोमो से तंग आकर उन्होने सीहाजीसे सहायता मांगी इस पर सीहा जी ने सहायता देना स्वीकार किया और शीघ्र ही लूटेरो को दबाकर ब्राहम्णो का संकट दूर कर कर दिया ।यह देख पल्लीवालो ने, भविष्य मे होने वाले लूटेरो के उपद्रव से बचने के लिये,सीहाजी से कुछ भूमि लेकर वही बस जाने की प्रार्थना की, जिसे उन्होने भी स्वीकार कर लिया परंतु कुछ समय बाद सीहाजी ने ,पल्लीवाल ब्राहम्णो के मुखिया को धोखे से मार कर, पाली को अपने जीते हुये प्रदेश मे मिला लिया
इस लेख से प्रकट होता है कि ,पल्लीवालो को सहायता देने से पूर्व ही महेवा और खेड राव सीहा जी के अधिकार मे चुके थे ।ऐसी हालत मे सीहाजी का उन प्रदेशों को छोड़ कर पल्लीवाल ब्राहम्णो की दी हुई साधारण सी भूमि के लिये पाली मे आकर बसना कैसे सम्भव समझा जा सकता है ? इसके अलावा उस समय उनके पास इतनी सेना भी नही थी कि, वह महेवा और खेड दोनों का प्रबन्ध करने के साथ पाली पर आक्रमण करने वाले लूटेरो पर भी आतंक बनाये रखते
इसके अतिरिक्त पुरानी ख्यातो मे पल्लीवाल ब्राहम्णो को केवल वैभवशाली व्यापारी ही लिखा है पाली के शासन का उनके हाथ मे होना ,या सीहाजी का उन्हें मार कर पाली पर अधिकार करना उसमे कही भी नही लिखा है वि.. 1262 से वि.. 1306 के बीच समय के कुछ लेख भीनमाल से मिले है जिससे ज्ञात होता है कि ये प्रदेश पहले सोलंकीयो के हाथ मे था बाद मे चौहाणो के हाथ मे गया उस समय की भौगोलिक अव राजनीति स्थितियों को समझने पर ज्ञात होता है कि पाली भी पल्लीवाल ब्राहम्णोकेअधीन होकर सोलंकीयो या चौहानो के अधिकार मे रहा होगा एसी अवस्था मे निर्बल,शरणागत, और व्यापार करने वाले पल्लीवाल ब्राहम्णो को मारने की कौनसी आवश्यकता थी ? इसके अतिरिक्त टोड के लेख से यह भी सिद्ध हो जाता है कि पल्लीवाल ब्राहम्णो ने स्वय ही उन्हें बुलाया था अपने रक्षार्थ इस हिसाब से देखा जाये तो सीहाजी वैसे ही वहा के शासक तो हो ही चुके थे और व्यापारी पल्लीवाल ब्राहम्णो को उजाड़ कर उन्हें क्या मिलता उन्हे तो बसाने से फायदा हो रहा था क्यों कि आपने राज्य मे व्यापार का बढ़ावा ही मिल ता इस लिये पल्लीवाल ब्राहम्णो को उजाडने मे तो उन्हीं का नुकसान था

सौजन्य से - (राठौङो का इतिहास लेखक विश्वनाथ रेवु )

6 comments

  1. फ़िर से अच्छी जानकारी दी आप ने, इतिहास को पढे सदिया हो गई सब कुछ भुल चुके है, लेकिन आप ने फ़िर से ग्याण दिया.
    ध्न्यवाद

     
  2. "आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है सिहा जी ने पाली के ब्राम्हणों पर आक्रमण नहीं किया उन्हें तो अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई थी शासन सत्ता स्थापित करने के लिए तो उन्होंने खेड़ पर आक्रमण किया था |
    द्वारका यात्रा दौरान पाली के पालीवाल ब्राह्मणों एवं उनके मुखिया यशोधर ने मेरों ,मीणों , ग्रासियों इत्यादि जाति के लुट पाट व भीनमाल के शासक के अत्याचारों से वहां की जनता ने मुक्ति दिलाने की विनती की | "
    चूँकि सिहां जी के साथ इस तीर्थ यात्रा के दौरान उनकी सेना भी साथ थी अतः उन्होंने उसी सेन्य बल के साथ पाली में शांति स्थापित की जिससे वहां की व्यापारिक उन्नति हुई | द्वारका यात्रा के बाद सिहां जी पाटन आये वहां के शासक जय सिंह सोलंकी ने अपनी पुत्री का विवाह सिहां जी के साथ किया | पाटन से सिहां जी पुनः मारवाड़ आए | और पाली में होने होने वाली लूटमार व अत्याचारों पर काबू पा शांति स्थापित की | इस उपकार के बदले और स्थाई शासन व्यवस्था के लिए वहां के नागरिकों ने सिहां को काफी धन दिया | उसके कुछ वर्षों बाद सिहां जी ने अपने राज्य विस्तार के लिए खेड पर आक्रमण कर वहां अपनी शासन सत्ता स्थापित की |
    दोहा-
    भीनमाल लीधी भडै, सीहे सेल बजाय |
    दत्त दीन्हौ सत संग्रह्यओ , औ जस कदे न जाय |

     
  3. इतिहास और धारणाओं को पुनर्जीवित करने का आपका यह प्रयास सराहनीय है.

    रामराम.

     
  4. पाली के पालीवाल ब्राह्मणों पर राव सीहा जी के आक्रमण के बारे में इतिहासकार एकमत नहीं हैं .

    बहुत सम्भव है पालीवाल सरदारों की हत्या कर पाली पर अधिपत्य जमा लेने की घटना के उत्तरदायी सीहाजी न हों, पर यह भी हो सकता है कि ऐसा ही हुआ हो . इस बारे में कोई पुष्ट प्रमाण अभी तक नहीं मिले है . आपका लेख भी अपुष्ट किस्म के लेखन का ही उदाहरण है. कुछ ख्यातों में ऐसा श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन)के दिन होना बताया गया है तो कुछ में इसे होली के दिन होना दर्ज किया गया है .

    स्वयं आपके निष्कर्ष आधे-अधूरे और अपुष्ट दिखाई देते हैं जो आपकी भाषा से भी प्रकट है .आपने लिखा है :
    "पल्लीवाल ब्राहम्णो ने स्वय ही उन्हें बुलाया था अपने रक्षार्थ । इस हिसाब से देखा जाये तो सीहाजी वैसे ही वहा के शासक तो हो ही चुके थे ।" राजस्थान में राजा इस तरह बनते हैं या बनाए जाते हैं ? अन्य कोई उदाहरण है ऐसा ?

    "पाली के शासन का उनके हाथ मे होना ,या सीहाजी का उन्हें मार कर पाली पर अधिकार करना उसमे कही भी नही लिखा है ।"

    पाली का शासन पालीवालों के हाथ में था इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है . हां!इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं कि पालीवालों पर आक्रमण सीहाजी ने किया या किसी अन्य ने .

    ब्लॉग-लेखकों से हालांकि बहुत निर्वैयक्तिक होने की उम्मीद नहीं की जाती तथापि इतिहास के बारे में कोई भी बात जातीय-पूर्वग्रहों को परे रखकर की जानी चाहिए .

     
  5. Hapi Says:
  6. hello... hapi blogging... have a nice day! just visiting here....

     
  7. अच्छी जानकारी जुटाई है | लेख के लिए धन्यवाद |

     

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