Jul 13, 2009

राजपूत संस्‍कृति के साथ छेड़छाड़

मैं आप लोगों को प्रतियोगिता दर्पण के अप्रेल 2009 के अंक में थारू जनजाति के संबंध में एक लेख छपा है उसका लिंक भेज रहा हूं उसमें किस तरह से राजपूती संस्‍कृति के बारे में कहां गया है उसको पढ़कर भी अगर हम कुछ नहीं कहेंगे तो लोग ऐसे ही हमारी संस्‍कृति के साथ खिलवाड़ करने की हिमाकत करते रहेंगे और हम कुछ नहीं कर पायेंगे और आने वाली पीढि़यां हम माफ नहीं करेंगी। पहले तो इस लेख में कोई सांमजस्‍य है ही नहीं क्‍योंकि कि चित्‍तौड़ और थार के मरूस्‍थल के बारे में वह लेखक कुछ जानता ही नहीं है क्‍योंकि कहां चित्‍तौड़ रहा और कहां थार का मरूस्‍थल। उसके बाद में वह लेखक को यह पता होना चाहिए कि चित्‍तौड़ में सारी राजपूती महिलाओं ने जौहर किया था न कि किसी के साथ उनको भेज दिया था।

मैंरे कहने के मतलब यही है कि हम सभी को अपने अपने तरीके से ऐसे लेखों और लिखने वालों का विरोध करना चाहिए। चाहे वो कितना भी बड़ा और ताकतवर क्‍यों न हो। आप सभी से निवेदन है कि आप अपने अपने तरीके से प्रतियोगिता दर्पण और ऐसे लेखकों को जरूर लताड़े।

आप अपनी प्रतिक्रियाएं भी मुझे जरूरी बताएं और जितना हो इसके लिए अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल करते हुए इसका विरोध करवाएं।

http://www.ezinemart.com/pratiyogitadarpan/01042009/Home.aspx?pgno=88&mode=2



Bhupendra Singh Chundawat
Udaipur
chundawat@yahoo.com

इस पत्रिका के लेखक व संपादक को info@pratiyogitadarpan.org ,delhi@pratiyogitadarpan.org पर मेल भेज कर अपना विरोध प्रकट करे |