Apr 20, 2010

बीच युद्ध से लौटे राजा को रानी की फटकार


बात जोधपुर की चल रही है तो यहाँ के अनेक राजाओं में एक और यशस्वी राजा जसवंत सिंह जी और उनकी हाड़ी रानी जसवंत दे की भी चर्चा करली जाए | महाराज जसवन्त सिंह जी ने दिल्ली की और से बादशाह शाहजहाँ और औरंगजेब की और से कई सफल सैनिक अभियानों का नेतृत्व किया था तथा जब तक वे जीवित रहे तब तक औरंगजेब को कभी हिन्दू धर्म विरोधी कार्य नही करने दिया चाहे वह मन्दिर तोड़ना हो या हिन्दुओं पर जजिया कर लगना हो , जसवंत सिंह जी के जीते जी औरंगजेब इन कार्यों में कभी सफल नही हो सका | २८ नवम्बर १६७८ को काबुल में जसवंत सिंह के निधन का समाचार जब औरंगजेब ने सुना तब उसने कहा " आज धर्म विरोध का द्वार टूट गया है " |
ये वही जसवंत सिंह थे जिन्होंने एक वीर व निडर बालक द्वारा जोधपुर सेना के ऊँटों की व उन्हें चराने वालों की गर्दन काटने पर सजा के बदले उस वीर बालक की स्पष्टवादिता,वीरता और निडरता देख उसे सम्मान के साथ अपना अंगरक्षक बनाया और बाद में अपना सेनापति भी | यह वीर बालक कोई और नही इतिहास में वीरता के साथ स्वामिभक्ति के रूप में प्रसिद्ध वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ था |
महाराज जसवंत सिंह जिस तरह से वीर पुरूष थे ठीक उसी तरह उनकी हाड़ी रानी जो बूंदी के शासक शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी भी अपनी आन-बाण की पक्की थी | १६५७ ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों ने दिल्ली की बादशाहत के लिए विद्रोह कर दिया अतः उनमे एक पुत्र औरंगजेब का विद्रोह दबाने हेतु शाजहाँ ने जसवंत सिंह को मुग़ल सेनापति कासिम खां सहित भेजा | उज्जेन से १५ मील दूर धनपत के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ लेकिन धूर्त और कूटनीति में माहिर औरंगजेब की कूटनीति के चलते मुग़ल सेना के सेनापति कासिम खां सहित १५ अन्य मुग़ल अमीर भी औरंगजेब से मिल गए | अतः राजपूत सरदारों ने शाही सेना के मुस्लिम अफसरों के औरंगजेब से मिलने व मराठा सैनिको के भी भाग जाने के मध्य नजर युद्ध की भयंकरता व परिस्थितियों को देखकर ज्यादा घायल हो चुके महाराज जसवंत सिंह जी को न चाहते हुए भी जबरजस्ती घोडे पर बिठा ६०० राजपूत सैनिकों के साथ जोधपुर रवाना कर दिया और उनके स्थान पर रतलाम नरेश रतन सिंह को अपना नायक नियुक्त कर औरंगजेब के साथ युद्ध कर सभी ने वीर गति प्राप्त की |इस युद्ध में औरग्जेब की विजय हुयी |
महाराजा जसवंत सिंह जी के जोधपुर पहुँचने की ख़बर जब किलेदारों ने महारानी जसवंत दे को दे महाराज के स्वागत की तैयारियों का अनुरोध किया लेकिन महारानी ने किलेदारों को किले के दरवाजे बंद करने के आदेश दे जसवंत सिंह को कहला भेजा कि युद्ध से हारकर जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह नही होती साथ अपनी सास राजमाता से कहा कि आपके पुत्र ने यदि युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया होता तो मुझे गर्व होता और में अपने आप को धन्य समझती | लेकिन आपके पुत्र ने तो पुरे राठौड़ वंश के साथ-साथ मेरे हाड़ा वंश को भी कलंकित कर दिया | आख़िर महाराजा द्वारा रानी को विश्वास दिलाने के बाद कि मै युद्ध से कायर की तरह भाग कर नही आया बल्कि मै तो सेन्य-संसाधन जुटाने आया हूँ तब रानी ने किले के दरवाजे खुलवाये | लेकिन तब भी रानी ने महाराजा को चाँदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा और महाराजा द्वारा कारण पूछने पर बताया कि कही बर्तनों के टकराने की आवाज को आप तलवारों की खनखनाहट समझ डर न जाए इसलिए आपको लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा गया है | रानी के आन-बान युक्त व्यंग्य बाण रूपी शब्द सुनकर महाराज को अपनी रानी पर बड़ा गर्व हुआ |
ज्ञात रहे इसी हाड़ी रानी की भतीजी जो सलुम्बर के रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी ने युद्ध में जाते अपने पति द्वारा निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर निशानी के तौर पर भेज दिया था | इस रानी के कृतित्व पर विस्तार से चर्चा फ़िर कभी


ज्ञान दर्पण पर इतिहास के लेख

एक राजा का साधारण औरत द्वारा मार्गदर्शन

गांवों में अक्सर एक साधारण सा आदमी जिसने न तो पढ़ाई लिखाई की हो और न ही कहीं बाहर घुमा हो, किसी बड़े मुद्दे पर एक छोटी सी बात बोलकर इतनी बड़ी सलाह दे जाता है कि सम्बंधित विषय के बड़े-बड़े जानकार भी सुन कर चकित हो जाते है, उसकी छोटी सी चुटीली बात में भी बहुत बड़ा सार छुपा होता है | मै यहाँ एक ऐसी ही छोटी सी बात का जिक्र कर रहा हूँ जिस बात ने अपने खोये पैत्रिक राज्य को पाने के लिए संघर्ष कर रहे एक राजा का इतना बड़ा मार्गदर्शन कर दिया कि वह इस छोटी बात से सबक लेकर अपनी गलती सुधार अपना पैत्रिक राज्य पाने में सफल हुआ |
मै यहाँ जोधपुर के संस्थापक राजा राव जोधा की बात कर रहा हूँ | यह बात उस समय की जब राव जोधा के पिता और मारवाड़ मंडोर के राजा राव रिड़मल की चित्तोड़ में एक षड़यंत्र के तहत हत्या कर मेवाड़ी सेना द्वारा मंडोर पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया गया | मंडोर उस समय मारवाड़ की राजधानी हुआ करती थी | राव जोधा ने अपने भाईयों के साथ मिलकर अपने पिता के खोये राज्य को पाने के लिए कई बार मंडोर पर हमले किए लेकिन हर बार असफल रहा |
उसी समय राव जोधा मेवाड़ की सेना से बचने हेतु एक साधारण किसान का वेश धारण कर जगह-जगह घूम कर सेन्ये-संसाधन इक्कठा कर रहे थे | एक दिन कई दूर चलते-चलते घुमते हुए भूखे प्यासे हताश होकर राव जोधा एक जाट की ढाणी पहुंचे, उस वक्त उस किसान जाट की पत्नी बाजरे का खिचड़ा बना रही थी,चूल्हे पर पकते खिचडे की सुगंध ने राव जोधा की भूख को और प्रचंड कर दिया | जाटणी ने कांसे की थाली में राव जोधा को खाने के लिए बाजरे का गरमा -गर्म खिचड़ा परोसा | चूँकि जोधा को बड़ी जोरों की भूख लगी थी सो वे खिचडे को ठंडा होने का इंतजार नही कर सके और खिचड़ा खाने के लिए बीच थाली में हाथ डाल दिया, खिचड़ा गर्म होने की वजह से राव जोधा की अंगुलियाँ जलनी ही थी सो जल गई | उनकी यह हरकत देख उस ढाणी में रहने वाली भोली-भाली जाटणी को हँसी आ गई और उसने हँसते हुए बड़े सहज भाव से राव जोधा से कहा -
" अरे भाई क्या तुम भी राव जोधा की तरह महामूर्ख हो " ?
राव जोधा ने उस स्त्री के मुंह से अपने बारे में ही महामूर्ख शब्द सुन कर पूछा - " राव जोधा ने ऐसा क्या किया ? और मैंने ऐसा क्या किया जो हम दोनों को आप महामूर्ख कह रही है "?
तब खेतों के बीच उस छोटी सी ढाणी में रहने वाली उस साधारण सी स्त्री ने फ़िर बड़े सहज भाव से कहा-- " जिस प्रकार राव जोधा बिना आस-पास का क्षेत्र जीते सीधे मंडोर पर आक्रमण कर देता है और इसी कारण उसे हर बार हार का मुंह देखना पड़ता है, ठीक उसी तरह मेरे भाई तुमने भी थाली में किनारे ठंडा पड़ा खिचड़ा छोड़कर बीच थाली में हाथ डाल दिया, जो जलना ही था |इस तरह मेरे भाई तुमने भी राव जोधा की तरह उतावलेपन का फल हाथ जलाकर भुक्ता |
उस साधारण सी खेती-बाड़ी करने वाली स्त्री की बात जो न तो राजनीती जानती थी न कूटनीति और न युद्ध नीति ने राव जोधा जैसे वीर पुरूष को भी अपनी गलती का अहसास करा इतना बड़ा मार्गदर्शन कर दिया कि राव जोधा ने उसकी पर अमल करते हुए पहले मंडोर के आस-पास के क्षेत्रों पर हमले कर विजय प्राप्त की और अंत में अपनी स्थिति मजबूत कर मंडोर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त कर अपना खोया पैत्रिक राज्य हासिल किया, बाद में मंडोर किले को असुरक्षित समझ कर राव जोधा ने मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव डाल अपने नाम पर जोधपुर शहर बसाया |
बात बाजरे के खिचडे की चली है तो अब लगते हाथ बाजरे के खिचडे पर राजस्थानी लोक गीत भी सुन लीजिये|
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ज्ञान दर्पण पर इतिहास के लेख

शेखावाटी


आपने नरेश सिंह जी का ब्लॉग मेरी शेखावाटी जरुर देखा होगा, मेरे भी कई लेखों में शेखावाटी नाम का जिक्र भी कभी पढ़ा होगा | और राजस्थान के संपर्क नहीं आये लोगों में इस नाम के प्रति जिज्ञसा जरुर हुई होगी कि आखिर ये शेखावाटी है क्या ?
तो आइए आज शेखावाटी के परिचय और इसके इतिहास पर कुछ चर्चा करली जाये |
राजस्थान के वर्तमान सीकर और झुंझुनू जिले शेखावाटी के नाम से जाने जाते है इस क्षेत्र पर आजादी से पहले शेखावत क्षत्रियों का शासन होने के कारण इस क्षेत्र का नाम शेखावाटी प्रचलन में आया |
देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर-शाहपुरा,खंडेला,सीकर,खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ,नवलगढ़,मंडावा, मुकन्दगढ़,दांता,खुड,खाचरियाबास,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ आदि बड़े-बड़े प्रभावशाली संस्थान शेखा जी के वंशधरों के अधिकार में थे | आज शेखावाटी क्षेत्र पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र में तेजी से उभर रहा है यहाँ पिलानी और लछमन गढ़ के भारत प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र है वही नवलगढ़,फतेहपुर,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ , मंडावा आदि जगहों पर बनी प्राचीन बड़ी-बड़ी हवेलियाँ अपनी विशालता और भित्ति चित्रकारी के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिन्हें देखने देशी-विदेशी पर्यटकों का ताँता लगा रहता है | पहाडों में सुरम्य जगहों बने जीणमाता मंदिर,शाकम्बरीदेवी का मन्दिर,लोहार्ल्गल के अलावा खाटू में बाबा श्याम का (बर्बरीक) का मन्दिर,सालासर में हनुमान जी का मन्दिरआदि स्थान धार्मिक आस्था के ऐसे केंद्र है जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शनार्थ आते है | इस शेखावाटी प्रदेश ने जहाँ देश के लिए अपने प्राणों को बलिदान करने वाले देशप्रेमी दिए वहीँ उद्योगों व व्यापार को बढ़ाने वाले सैकडो उद्योगपति व व्यापारी दिए जिन्होंने अपने उद्योगों से लाखों लोगों को रोजगार देकर देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दिया | भारतीय सेना को सबसे ज्यादा सैनिक देने वाला झुंझुनू जिला शेखावाटी का ही भाग है | शेखावाटी क्षेत्र व उसके इतिहास के बारे में प्रस्तुत है कुछ देसी-विदेशी विद्वानों व इतिहासकारों द्वारा दी गई जानकारी --

राजस्थान का मरुभूमि वाला पुर्वोतरी एवं पश्चिमोतरी विशाल भूभाग वैदिक सभ्यता के उदय का उषा काल माना जाता है | हजारों वर्ष पूर्व भू-गर्भ में विलुप्त वैदिक नदी सरस्वती यहीं पर प्रवाह मान थी ,जिसके तटों पर तपस्यालीन आर्य ऋषियों ने वेदों के सूत्रों की सरंचना की थी | सिन्धुघाटी सभ्यता के अवशेषों एवं विभिन्न संस्कृतियों के परस्पर मिलन,विकास उत्थान और पतन की रोचक एवं गौरव गाथाओं को अपने विशाल आँचल में छिपाए यह मरुभूमि भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय की श्र्ष्ठा और द्रष्टा रही है | जनपदीय गणराज्यों की जन्म स्थली और क्रीडा स्थली बने रहने का श्रेय इसी मरुभूमि को रहा है | इस मरुभूमि ने ऐसे विशिष्ठ पुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कार्यकलापों से भारतीय इतिहास को प्रभावित किया है |
इसी मरुभूमि का एक भाग प्रमुख भाग शेखावाटी प्रदेश है जो विशालकाय मरुस्थल के पुर्वोतरी अंचल में फैला हुआ है | इसका शेखावाटी नाम विगतकालीन पॉँच शताब्दियों में इस भू-भाग पर शासन करने वाले शेखावत क्षत्रियों के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है | उससे से पूर्व अनेक प्रांतीय नामो से इस प्रदेश की प्रसिद्दि रही है | इसी भांति अनेक शासक कुलों ने समय-समय पर यहाँ राज्य किया है |
सुरजन सिंह शेखावत
(प्रसिद्ध इतिहासकार )


वीर भूमि शेखावाटी प्रदेश की स्थापना महाराव शेखा जी एवं उनके वंशजों के बल,विक्रम,शोर्य और राज्याधिकार प्राप्त करने की अद्वितीय प्रतिभा का प्रतिफल है यहाँ के दानी-मानी लक्ष्मी पुत्रों,सरस्वती के अमर साधकों तथा शक्ति के त्यागी-बलिदानी सिंह सपूतों की अनोखी गौरवमयी गाथाओं ने इसकी अलग पहचान बनाई और स्थाई रूप देने में अपनी त्याग व तपस्या की भावना को गतिशील बनाये रखा | यहाँ के प्रबल पराक्रमी,सबल साहसी,आन-बान और मर्यादा के सजग प्रहरी शूरवीरों के रक्त-बीज से शेखावाटी के रूप में यह वट वृक्ष अपनी अनेक शाखाओं प्रशाखाओं में लहराता,झूमता और प्रस्फुटित होता आज भी अपनी अमर गाथाओं को कह रहा है | शेखावाटी नाम लेने मात्र से ही आज भी शोर्य का संचार होता है,दान की दुन्दुभी कानों में गूंजती है और शिक्षा,साहित्य,संस्कृति तथा कला का भाव उर्मियाँ उद्वेलित होने लगती है | यहाँ भित्तिचित्रों ने तो शेखावाटी के नाम को सारे संसार में दूर-दूर तक उजागर किया है | यह धरा धन्य है | ऋषियों की तपोभूमि रही है तो कृषकों की कर्मभूमि | यह धर्मधरा राजस्थान की एक पुण्य स्थली है |
ऐतिहासिक द्रष्टि से इसमें अमरसरवाटी,झुंझुनू वाटी,उदयपुर वाटी, खंडेला वाटी, नरहड़ वाटी,सिंघाना वाटी,सीकर वाटी,फतेहपुर वाटी, आदि कई भाग परिणित होते रहे है | इनका सामूहिक नाम ही शेखावाटी प्रसिद्ध हुआ | जब शेखावाटी का अपना अलग राजनैतिक अस्तित्व था तब उसकी सीमाए इस प्रकार थी -- उत्तर पश्चिम में भूतपूर्व बीकानेर राज्य,उत्तरपूर्व में लोहारू और झज्जर,दक्षिण पूर्व में तंवरावाटी और भूतपूर्व जयपुर राज्य तथा दक्षिण पश्चिम में भूतपूर्व जोधपुर राज्य | परन्तु इसकी भौगोलिक सीमाएं सीकर और झुंझुनू दो जिलों तक ही सिमित मानी जाती रही है | वर्तमान शासन व्यवस्था में भी इन दो जिलो को ही शेखावाटी माना गया है | देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर-शाहपुरा,खंडेला,सीकर,खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ,नवलगढ़,मंडावा, मुकन्दगढ़, दांता, खुड, खाचरियाबास,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ आदि बड़े-बड़े प्रभावशाली संस्थान शेखा जी के वंशधरों के अधिकार में थे |
डा.उदयवीर शर्मा
शेखावत संघ ने,जो आमेर राजवंश से उदभूत है ,काल और परिस्थितियों के प्रभाव से अपने पैत्रिक राज्य आमेर के बराबर सम्मान और शक्ति संचय कर ली है |
यधपि इस संघ का न कोई लिखित कानून है और न इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कोई प्रधानाध्यक्ष है | किन्तु समान हित की भावना से प्रेरित यह संघ अपना अस्तित्व बनाये रखने में सदैव समर्थ रहा है | फिर भी यह नहीं मान लेना चाहिय कि इस संघ में कोई नीति-कर्म नहीं है | जब कभी एक छोटे से छोटे सामंत के स्वत्वधिकारों के हनन का प्रश्न उपस्थित हुआ तो छोटे-बड़े सभी शेखावत सामंत सरदारों ने उदयपुर नामक अपने प्रसिद्ध स्थान पर इक्कठे होकर स्वत्व-रक्षा का समाधान निकाला है |
( कर्नल जेम्स टोड )
जिस काल का हम वर्णन कर रहे है,शेखावाटी प्रदेश ठिकानों (छोटे उप राज्यों ) का एक समूह था,जिसके उत्तर पश्चिम में बीकानेर,उत्तर पूर्व में लोहारू और झज्जर ,दक्षिण पूर्व में जयपुर और पाटन तथा दक्षिण पश्चिम में जोधपुर राज्य था | थार्टन के अनुसार शेखावाटी का क्षेत्रफल ३८९० वर्ग मील है जो भारतीय जनगणना रिपोर्ट १९४१ के आंकडों के लगभग बराबर है भारतीय जनगणना रिपोर्ट १९४१ के अनुसार शेखावाटी का क्षेत्रफल ३५८० वर्ग मील है | कर्नल टोड ने शेखावाटी का क्षेत्रफल ५४०० वर्ग मील होने का अनुमान लगाया है जो अतिशयोक्तिपूर्ण एवं अविश्वसनीय है |
अपनी अन-उपजाऊ प्राकृतिक स्थिति के कारण शेखावाटी सदैव से योद्धाओं,साहसिकों और दुर्दांत डाकुओं की भूमि रही है | शेखावाटी जयपुर राज्य में सदैव तूफान का केंद्र बनी रही और समय-समय पर जयपुर के आंतरिक शासन में ब्रिटिश हस्तेक्षेप के लिए अवसर जुटाती रही |
(एच.सी.बत्रा, M.A. इतिहास )
जयपुर,मारवाड़ और मेवाड़ की भांति शेखावाटी राजनैतिक और भौगोलिक द्रष्टि से एक प्रथक प्रदेश है | शेखावाटी के चीफ लोग जयपुर राज्य की सहायक सैनिक जाति के है और वे नाम मात्र को जयपुर राज्य के अधीन है |
(हेमिल्टन का हिन्दुस्थान भाग -१ )
रसाले (घुड़सवार सेना ) की भर्ती के हेतु शेखावाटी के मुकाबले समस्त भारत में कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है |
(कर्नल जे.सी.ब्रुक )


शेखावाटी के बारे में बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी अपने बदलते द्रश्य नामक पुस्तक में लिखते है |
मैंने मोकल के पुत्र राव शेखा को देखा जिसके बल विक्रम से नए राज्य की नीव लग रही थी | साथ ही मैंने बीस सवारों के साथ रायसल दरबारी को देखा जिसने अकथनीय पराक्रम से शत्रु सेनापति का सर काट डाला और मंत्री देवीदास के इस कथन की सिद्दि प्राप्त की कि " पिता की सम्पति पर अधिकार करने की अपेक्षा अपने ही बल पराक्रम से सौभाग्य का उपार्जन मनुष्य का कर्तव्य है -यही जगदीश्वर का अनुग्रह है " उसी जगदीश्वर का अनुग्रह मैंने रायसल के पुत्र द्वारकादास पर देखा जिसके सिंह से युद्ध के लिए उद्दत होने पर लड़ने की अपेक्षा वही शेर उनके तलवे चाटने लगा | मैंने भोजराज के वंशज नव-विवाहित सुजान सिंह को खंडेला के मंदिर की रक्षा करते देखा | उसे पुरे यौवन के अधूरे अरमानो के साथ अकेले ही सैकडो यवनों को मसलते देखा | धरा धर्म की मांग पर प्राणोत्सर्ग के कर्तव्य का इतिहास में अमूल्य प्रष्ठ जुड़ते देखा | वे माताएं होगी जिन्होंने इस प्रकार के नव-रत्नों को जन्म दिया है | मैंने केसरी सिंह को देखा जिसने सैयद अब्दुल्ला द्वारा भेजी गई शाही सेना का मुकाबला करने के लिए समस्त शेखावाटी को एक सूत्र में बांध दिया और जब वह सूत्र टूटने लगा तो युद्ध से भागने की सलाह को अस्वीकार करते कहा था कि ऐसा कलंक मै अपने ऊपर कभी नहीं लगाना चाहता जिसे मेरी आने वाली पीढियां भी नहीं धो सकती | उसी केसरी सिंह को अंत में मेदिनी माता को अपने ही रक्त मांस व मिटटी से पिंडदान करते देखा | मैंने अनेक बार खंडेला को उठते गिरते लडखडाते और लड़ते देखा | शार्दुल सिंह शेखावत जैसे जीवट के खिलाडियों को देखा,खेल के मैदानों को देखा,खेलों को देखा और छोटी-छोटी बातों में जीवन की महानताओं को गोते लगाते देखा और मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा वाह शेखावाटी ! वाह !!






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ज्ञान दर्पण पर इतिहास के लेख

शेखावाटी का अंग्रेज विरोधी आक्रोश

मराठो और पिंडरियों की लुट खसोट से तंग आकर सन १८१८ में राजस्थान के महाराजों ने अंग्रेजों के साथ संधियाँ कर ली थी जिससे इन संधियों के माध्यम से राजस्थान में अंग्रेजों के प्रवेश के साथ ही उनकी आंतरिक दखलंदाजी भी शुरू हो गई जो हमेशा स्वंतत्र रहने के आदि शेखावाटी के कतिपय शेखावत शासकों व जागीरदारों को पसंद नहीं आई |और उन्होंने अपनी अपनी क्षमतानुसार अंग्रेजों का विरोध शुरू कर दिया | इनमे श्याम सिंह बिसाऊ व ज्ञान सिंह मंडावा ने वि.स.१८६८ में अंग्रेजो के खिलाफ रणजीत सिंह (पंजाब) की सहायतार्थ अपनी सेनाये भेजी | बहल पर अंग्रेज शासन होने के बाद कान सिंह, ददरेवा के सूरजमल राठौड़ और श्याम सिंह बिसाऊ ने अंग्रेजो पर हमले कर संघर्ष जारी रखा | शेखावाटी के छोटे सामंत जिन्हें राजस्थान में अंग्रेजो का प्रवेश रास नहीं आ रहा था ने अपने आस पड़ोस अंग्रेज समर्थकों में लुट-पाट व हमले कर आतंकित कर दिया जिन्हें अंग्रेजो ने लुटेरे कह दबाने कर लिए मेजर फोरेस्टर के नेतृत्व में शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना की | इस ब्रिगेड ने शेखावाटी के कई सामंत क्रांतिकारियों के किले तोड़ दिए इससे पहले अंग्रेजो ने जयपुर महाराजा को इन शेखावाटी के सामन्तो की शिकायत कर उन्हें समझाने का आग्रह किया किन्तु ये सामंत जयपुर महाराजा के वश में भी नहीं थे | किले तोड़ने के बाद गुडा के क्रांतिकारी दुल्हे सिंह शेखावत का सिर काट कर मेजर फोरेस्टर ने क्रांतिकारियों को भयभीत करने लिए झुंझुनू में लटका दिया जिसे एक मीणा समुदाय का साहसी क्रांतिकारी रात्रि के समय उतार लाया | मेजर फोरेस्टर शेखावाटी के भोडकी गढ़ को तोड़ने भी सेना सहित पहुंचा लेकिन वहां मुकाबले के लिए राजपूत नारियों को हाथों में नंगी तलवारे लिए देख लौट आया |
शेखावाटी ही नहीं पुरे राजस्थान में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति का बीज बोने वालों में अग्रणी डुंगजी जवाहरजी (डूंगर सिंह शेखावत और जवाहर सिंह शेखावत) ने एक सशत्र क्रांति दल बनाया जिसमे सावंता मीणा व लोटिया जाट उनके प्रमुख सहयोगी थे | इस दल ने शेखावाटी ब्रिगेड पर हमला कर ऊंट,घोडे और हथियार लुट लिए साथ ही रामगढ शेखावाटी के अंग्रेज समर्थक सेठो को क्रांति के लिए धन नहीं देने की वजह से लुट लिया | शेखावाटी ब्रिगेड पर हमला और सेठो की शिकायत पर २४ फरवरी १८४६ को ससुराल में उनके साले द्वारा ही धोखे से डूंगर सिंह को अंग्रेजो ने पकड़ लिया और आगरा किले की कैद में डाल दिया | उन्हें छुडाने के लिए १ जून १८४७ को शेखावाटी के एक क्रांति दल जिसमे कुछ बीकानेर राज्य के भी कुछ क्रांतिकारी राजपूत शामिल थे ने आगरा किले में घुस कर डूंगर सिंह को जेल से छुडा लिया | इस घटना मे बख्तावर सिंह श्यामगढ,ऊजिण सिंह मींगणा,हणुवन्त सिंह मेह्डु आदि क्रान्तिकारी काम आये | इनके अलावा इस दल मे ठा,खुमाण सिंह लोढ्सर,ठा,कान सिंह मलसीसर,ठा,जोर सिह,रघुनाथ सिह भिमसर,हरि सिह बडा खारिया,लोटिया जाट,सांव्ता मीणा आदि सैकड़ौ लोग शामिल थे | डूंगर सिह को छुड़ाने के बाद इस दल ने अंग्रेजो को शिकायत करने वाले सेठो को फ़िर लुटा और शेखावाटी ब्रिगेड पर हमले तेज कर दिये | 18 जून 1848 को इस दल ने अजमेर के पास नसिराबाद स्थित अंग्रेज सेना की छावनी पर आक्र्मण कर शस्त्रो के साथ खजाना भी लूट लिया | लोक गीतो के अनुसार ये सारा धन यह दल गरीबो मे बांटता आगे बढता रहा | आखिर इस क्रान्ति दल के पिछे अंग्रेजो के साथ जयपुर,जोधपुर,बीकानेर राज्यो की सेनाए लग गई | और कई खुनी झड़पो के बाद 17 मार्च 1848 को डूंगर सिह और जवाहर सिह के पकड़े जाने के बाद यह सघंर्ष खत्म हो गया | 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मे भी मंडावा के ठाकुर आनन्द सिह ने अपनी सेना अंग्रेजो के खिलाफ़ आलणियावास भेजी थी | तांत्या टोपे को भी सीकर आने का निमंत्रण भी आनन्द सिह जी ने ही दिया था | 1903 मे लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ हिन्दू कुल सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना भी इन क्रान्तिकारियो को अच्छा नही लग रहा था इसलिय उन्हे रोकने के लिये शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूर सिह ने ठाकुर करण सिह जोबनेर व राव गोपाल सिह खरवा के साथ मिल कर महाराणा फ़तह सिह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी केशरी सिह बारहट को दी | केसरी सिह बारहट ने "चेतावनी रा चुंग्ट्या " नामक सौरठे रचे जिन्हे पढकर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुये और दिल्ली दरबार मे न जाने का निश्चय किया | गांधी जी की दांडी यात्रा मे भी शेखावाटी के आजादी के दीवाने सुल्तान सिह शेखावत खिरोड ने भाग लिया था | इस तरह राजस्थान मे अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ़ लड़ने और विरोधी वातावरण तैयार करने मे शेखावाटी के सामन्तो व जागीरदारो ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | हालांकि शेखावाटी पर सीधे तौर पर अंग्रेजो का शासन कभी नही रहा |



ज्ञान दर्पण पर इतिहास के लेख

स्वतंत्रता समर के योद्धा : राव गोपाल सिंह खरवा

राजस्थान के राजाओं द्वारा अंग्रेजों से संधियाँ करने के बाद धीरे धीरे राजस्थान में अंग्रेजों का दखल बढ़ता गया | अंग्रेजों का राजस्थान के शासन में बढ़ता हस्तक्षेप राजस्थान के स्वातन्त्र्य चेता कई राजपूत शासको व जागीरदारों को रास नहीं आया और वे अपने अपने तरीके ,सामर्थ्य और सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष कर स्वतंत्रता का बिगुल बजाते रहे | इन्ही स्वतंत्रता प्रयासी नेताओं में अजमेर के पास स्थित खरवा के शासक राव गोपाल सिंह (1872-1939)अग्रणी नेता थे | उन दिनों राजस्थान में तलवार के बल पर अंग्रेजों की दासता से भारत भूमि को स्वतंत्र करने वाले स्वातन्त्र्य प्रयासी योद्धाओं का केंद्र स्थल अजमेर था | अजमेर स्थित वैदिक मंत्रालय का कार्यालय उनका मंत्रणा कक्ष और उसके संचालक मनीषी समर्थदान चारण (सीकर ) क्रांतिकारियों के संपर्क सूत्र और राव गोपाल सिंह खरवा और ठाकुर केसरी सिंह बारहट , अर्जुन लाल सेठी प्रभृति उनके अग्रणी नेता थे | श्री भूप सिंह गुजर जो बाद में विजय सिंह पथिक के नाम से प्रसिद्ध हुए वे राव गोपाल सिंह , खरवा के वैतनिक सचिव थे | आजादी की क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन और आर्थिक सहयोग का सारा भार खरवा के शासक राव गोपाल सिंह वहन करते थे | राव गोपाल सिंह खरवा के नाम आगत पत्र व्यवहार संग्रह के अवलोकन से स्वाधीनता की इस लड़ाई पर वस्तु परक प्रकाश पड़ता है और वास्तविक तथ्यों का का उदघाटन होता है |
मथुरा के स्वनाम धन्य राजा महेंद्रप्रताप सिंह जाट भी अंग्रेजों के प्रबल विरोधी और महान क्रांतिकारी थे | उन्हें भारतीय क्रांतिकारियों का सन्देश लेकर अफगानिस्तान और रूस भेजने में भी राव गोपाल सिंह खरवा का प्रमुख हाथ था |
कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में राव गोपाल सिंह खरवा रण-मृत्यु का संकल्प ले केसरिया वस्त्र धारण कर गए थे (केसरिया वस्त्र रण-मृत्यु संकल्प का प्रतीक है) परन्तु अंग्रेज सरकार ने उनका सामना नहीं किया जिससे वे रण-मृत्यु से वंचित रह गए | लाहौर में हिन्दू,जैन और सिक्ख समाज के एक विशाल समारोह में राव गोपाल सिंह सभापति बनाये गए थे | उक्त प्रसंग पर एक कवि भूरदान बारहट ने यह सौरठा रचा -
लेबा जस लाहौर , गुमर भरया पर गाढरा
देबा जस रो दौर , हिक गोपाल तन सुं हुवे ||

1903 मे लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ हिन्दू कुल सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना भी इन क्रान्तिकारियो को अच्छा नही लग रहा था इसलिय उन्हे रोकने के लिये राव गोपाल सिह खरवा ने शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूर सिह ने ठाकुर करण सिह जोबनेर के साथ मिल कर महाराणा फ़तह सिह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी केशरी सिह बारहट को दी | केसरी सिह बारहट ने "चेतावनी रा चुंग्ट्या " नामक सौरठे रचे जिन्हे पढकर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुये और दिल्ली दरबार मे न जाने का निश्चय किया |
राव गोपाल सिंह देशभक्त ,क्रांतिकारी ,समाज सुधारक , गुण ग्राहक और अंग्रेजों के प्रबल विरोधी ही नहीं , अंग्रेजों की नीति के समर्थक सहयोगी राजा ,नबाब और रईसों के भी कटु आलोचक थे | ईडर के महाराजा प्रताप सिंह के प्रति उनकी स्वरचित कविता में यह तथ्य स्पष्ट होता है - " जेतै तेरे तकमे है ते तै सब पाप के पयोद है " आदि |
महाराणा फतह सिंह द्वारा स्वाभिमान -रक्षा और दिल्ली दरबार में सम्मिलित न होने पर राव गोपाल सिंह जी ने उन्हें ये दोहे नजर किये -
होता हिन्दू हतास , नमतो जे राणा न्रपत |
सबल फता साबास , आरज लज राखी अजां ||
करजन कुटिल किरात , सकस न्रपत गहिया सकल |
हुवो न तुंहिक हात , सिंघ रूप फतमल सबल ||

स्वतंत्रता संग्राम के इस महान मनस्वी योद्धा के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व के मूल्याङ्कन के अभाव और उपेक्षा के चलते में स्वातंत्र्य आन्दोलन का इतिहास सर्वथा अपूर्ण ही है |
राजस्थानी भाषा और राजपूत इतिहास के शीर्ष विद्वान् ठाकुर सोभाग्य सिंह शेखावत जी के अनुसार -
महात्मा गांधी के कांग्रेस में प्रवेश के बाद स्वाधीनता संघर्ष ने नया मोड़ ले लिया और उसका स्वरूप अहिंसक आन्दोलन के रूप में परिवर्तित हो गया | क्रांतिकारियों के वर्चस्व को प्रभावहीन बनाने के लिए अजमेर में रामनारायण चौधरी ,प. हरिभाऊ उपाध्याय , दुर्गा प्रसाद चौधरी आदि को महात्मा गांधी ने दिशा सूत्र दिए और अजमेर से त्याग भूमि नाम से मासिक पत्रिका का प्रकाशन तथा कुछ अन्य प्रचारात्मक योजनाए प्रारम्भ की गई | इस नविन प्रयास से स्वाधीनता के क्रांतिकारी योद्धाओं का प्रभाव तो धीरे धीरे कम होता गया और अहिंसा तथा सत्याग्रह -मार्गियों का वर्चस्व बढ़ता गया जो स्वंत्रता के पश्चात शासन संचालन के पदों पर आरूढ़ होकर फलित हुआ |
राजस्थान के स्वतंत्रता प्रयासी योद्धाओं के पिता और पितामहों के कृतित्व और संघर्षों पर आजादी के आन्दोलन के इतिहासकारों ने अंग्रेजों की नीतियों का अनुसरण कर संकट भरे दिनों में विहंगम उड़ान भरते हुए प्रजापरिषदों और प्रजामंडलीय आन्दोलनों के आवृत में बंधित कर दिया | समर्थदान चारण ,अर्जुनलाल सेठी और राव गोपाल सिंह के साहस कार्यों का सही मूल्याङ्कन नहीं किया और इन योद्धाओं के कृतित्व को विस्मृति में फेंक दिया गया | परन्तु देशभक्तों के प्रति देश तथा राजस्थान के शिक्षित और जागृत समाज में कितना मान-सम्मान और श्रद्धा भाव था , वह तात्कालिक अप्रकाशित पत्रों और राजस्थानी साहित्य में बिखरा पड़ा है |जिनमे राव गोपाल सिंह खारवा के सशस्त्र आन्दोलन का महत्त्व समझा जा सकता है |



खरवा फोर्ट





ज्ञान दर्पण पर इतिहास के लेख

स्वतंत्रता समर के योद्धा : महाराज पृथ्वी सिंह कोटा

स्वदेश की स्वंत्रता के लिए आत्मोसर्ग करने में महाराज पृथ्वी सिंह हाडा का भी उर्जस्वी स्थान है | पृथ्वी सिंह कोटा के महाराव उम्मेद सिंह का लघु पुत्र और महाराव किशोर सिंह द्वितीय का लघु भ्राता था | ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में समस्त भारतवर्ष पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में अब पंजाब और राजस्थान ही शेष बच रहे थे | राजस्थान में अंग्रेजों का कोटा क्षेत्र में तब नानता का स्वामी और तदन्तर झालावाड राज्य वालों का पूर्वज महाराज राणा जालम सिंह झाला प्रमुख सहयोगी था | वह भी अंग्रेजों के माध्यम से कोटा पर अपना राजनैतिक प्रभुत्व जमाये रखना चाहता था | महाराज पृथ्वी सिंह अंग्रेजों तथा जालिम सिंह की राजनैतिक कूटनीतियों के दूरगामी परिणामों को समझता था | जालिम सिंह ने महाराव किशोर सिंह कोटा , कोयला के स्वामी राज सिंह हाडा , गैता के कुमार बलभद्र सिंह व् सलामत सिंह तथा उसके चाचा दयानाथ हाडा ,अनुज दुर्जनशाल , राजगढ़ के देव सिंह प्र्भ्रती हाडा व चन्द्रावत वीरों को अंग्रेजों के पारतंत्र्य से मातृभूमि को मुक्त करने के लिए उद्दत किया |
स्वातंत्र्य संघर्षियों के विरुद्ध काली सिन्ध नदी पर अंग्रेज अधिकारी कर्नल जेम्स टाड, लेफ्टीनेंट कर्नल जैरिज.लेफ्टीनेंट कलार्क , लेफ्टीनेंट रीड के सेनानायाक्त्व में दस पलटन और पच्चासों तोपों के साथ आक्रमण किया | उधर स्वंत्रता के रक्षक महाराज पृथ्वी सिंह के आव्हान पर आठ हजार हाडा वीर अपनी ढालें ,पुराणी देशी बंदूकें ,भाले,तीर -कमान ,तलवारें और बरछे लिए सामने आ डटे | दोनों और से झुझाऊ वाध्यों के स्वर वीरों को प्रोत्साहित करने लगे | घोड़ों की हिनहिनाहटों ,वीरों की ललकारों ,अपने अपने अराध्य देवों के जयकारों से धरा आकाश में तुमुलनाद फ़ैल गया | युद्ध के वीर यात्री ,स्वतंत्रता स्नेह के नाती ,यमराज के भ्राता से दृढ हाडा वीर अंगद के समान ,अपने पैरों को रणभूमि में स्थिर कर लोह लाट की तरह जम गए | अंग्रेजों के धधकते अंगारे बरसाते तोपखानों पर पतंगवत अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले वीर बाँकुरे हाडा टूट पड़े | शत्रुओं की रक्षा पंक्तियों को क्षण मात्र में छिन्न-विछिन्न कर ठाकुर देवी सिंह राजगढ़ ने लेफ्टिनेंट क्लार्क और कुमार बलभद्र सिंह गैंता ने लेफ्टिनेंट रीड को मारकर मैदान साफ़ कर दिया | लेफ्टिनेंट जैरिज युद्ध क्षेत्र में घावों से आपूर्ण होकर गिर पड़ा | पृथ्वी सिंह की विजय का घोष चारों ओर गूंजने लगा | किन्तु तब भी महाराज पृथ्वी सिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ | वह ठाकुर देवी सिंह राजगढ़ सहित अपने चुने हुए पच्चीस हाडा वीरों के साथ महाराज राणा जालिम सिंह की सेना पर टूट पड़े | युद्ध की भयानकता से जालिम सिंह की सेन्य पंक्ति में कोहराम मच गया | सैकड़ों प्रतिभटों के मस्तक रण स्थल पर लुढ़कने लगे | मुंड विहीन धड़ भंभाभोली खाकर (चक्राकार , घूमकर ) पृथ्वी पर गिरने लगे |
अंत में महाराज पृथ्वी सिंह और ठाकुर देवी सिंह राजगढ़ भी तिल-तिल घावों से छक कर रणभूमि पर सो गए | कर्नल टाड ने उन्हें पालखी में उठवाकर चिकित्सार्थ शिविर में पहुँचाया , जहाँ वे दुसरे दिन वीरगति को प्राप्त हुए | संवत 1871 वि . को मांगारोल स्थान के उस युद्ध में स्वातन्त्र्य समर के उर्जस्वी योद्धा महाराज पृथ्वी सिंह ने यों आजादी के समर यज्ञ में अपने प्राणों की समिधा डालकर उसे प्रज्ज्वलित किया |
यद्दपि भारतीय इतिहासकारों ने ब्रिटिश सत्ता के प्रकोप से उक्त वीरों को अपने इतिहासों में महत्व नहीं दिया है | ब्रिटिश दासता की विगत सवा शताब्दी में उस वीर के बलिदान के प्रति सभी ओर से उपेक्षा बरती गयी तथापि सम-सामयिक राजस्थानी कवियों ने अपने कवि धर्म का पालन किया | महाराज पृथ्वी सिंह द्वारा अंग्रेजों की आधुनिक युद्ध सज्जा से युक्त एवं रण कला से प्रशिक्षित शत्रु सेना से घमासान युद्ध कर वीरगति प्राप्त करने का जो वर्णन किया है वह स्वातन्त्र्य स्वर के उद्बोधक कविवर जसदान आढ़ा ने महाराज पृथ्वी सिंह की रण क्रीडा को होली के पर्व पर रमी जाने वाली फाग क्रीडा से तुलना करते हुए कहा है -
बौली चसम्मा मजीठ नखंगी घूप रै बागां
पैना तीर गोळी सांग लागा आर पार |
होळी फागां जेम खागां उनंगी पीथलै हाडै,
हिलोळी फिरंगा सेना पैंतीस हजार ||

वीरवर पृथ्वी सिंह , तीक्षण -बाणों , गोलियों ओर भालों के प्रहार से क्षत विक्षत हो जाने पर और क्रुद्ध होकर तलवार से प्रहार करने लगा | होलिकोत्सव की फाग क्रीडा के समान नग्न तलवारों के आघात कर उसने अंग्रेजो की पैतीस हजार सेना को आंदोलित कर दिया |
लेखक : ठाकुर सोभाग्य सिंह शेखावत




ज्ञान दर्पण पर इतिहास के लेख

स्वतंत्रता समर के योद्धा : श्याम सिंह ,चौहटन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जूझने वाले राजस्थानी योद्धाओं में ठाकुर श्याम सिंह राठौड़ का बलिदान विस्मृत नहीं किया जा सकता | 1857 के देशव्यापी अंग्रेज सत्ता विरोधी सशस्त्र संघर्ष के पूर्व राजस्थान में ऐसे अनेक स्वातन्त्र्यचेता सपूत हो चुके है जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता के वरदहस्त को विषैला वरदान समझा था | शेखावाटी , बिदावाटी, हाडौती , मेड़ता पट्टी ,खारी पट्टी , मेवाड़ और मालानी के अनेक शासक अंग्रेजों की कैतवत नीति से परिचित थे | मालानी प्रदेश के चौहटन स्थान का ठाकुर श्याम सिंह राठौड़ों की बाहड़मेरा खांप का व्यक्ति था | बाहड़मेर (बाड़मेर) का प्रान्त जो प्रसिद्ध शासक रावल मल्लिनाथ के नाम से मालानी कहलाता है अपनी स्वतंत्रता ,स्वाभिमान और वीर छक के लिए विख्यात रहा है | मल्लिनाथ की राजधानी महेवा नगर थी | वह राव सलखा का पुत्र था |
मल्लिनाथ के अनुज जैत्रमल्ल और विरमदेव थे | राव विरमदेव के पुत्र राव चूंडा की संतति में जोधपुर ,बीकानेर,किशनगढ़ ,रतलाम आदि के राजा थे और मल्लिनाथ के महेचा अथवा बाहड़मेरा राठौड़ है | इस प्रकार जोधपुर ,बीकानेर,नारेशादी तथा अन्य राठौड़ ठिकानेदारों में महेचा टिकाई (बड़े)है और राजस्थान में अंग्रेजों के प्रभाव के बाद तक भी वे अपनी स्वतंत्रता का उपभोग करते रहे है | जोधपुर के महाराजा मान सिंह के समय उनके नाथ सम्प्रदाय गुरु भीमनाथ ,लाडूनाथ , महाराज कुमार छत्र सिंह आदि की उत्पथगामिता के कारण मारवाड़ में राजनैतिक धडाबंदी बंद गई थी | इस अवसर का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने महाराजा को संधि कर अंग्रेजों का शासन मनवाने के लिए बाध्य किया और वि.स.१८९१ में कर्नल सदरलैंड ने अपने प्रतिनिधि स्वरूप मि.लाडलो को जोधपुर में रख दिया |
मि.लडलो ने नाथों के उपद्रव और महाराजा तथा उनके सामंतो के विग्रह विरोध को शांत तथा दमित कर अंग्रेज सत्ता का प्रभाव जमाने का प्रयत्न किया | बाड़मेर में महेचा राठौड़ सदा से ही अपनी स्वतंत्र सत्ता का उपभोग करते रहे थे वे कभी जोधपुर राज्य से दब जाते और फिर अवसर आने पर स्वतंत्र हो जाते | अंग्रेजों का मारवाड़ राज्य पर प्रभाव बढ़ता देखकर स्वतंत्रता प्रेमी मालानी के योद्धा उत्तेजित हो उठे और अंग्रेजों के विरुद्ध दावे मारने लगे | अंग्रेजों ने संवत १८९१ वि.में मालानी पर सैनिक चढाई बोल दी | बाहड़मेरों ने भी ठाकुर श्याम सिंह चौहटन के नेतृत्व में युद्ध की रणभेरी बजाई | अपनी ढालें , भाले , सांगे और तलवारों की धारें तीक्षण की | कवि कहता है -
गढ़ भरुजां तिलंग रचै जंग गोरा, चुरै गिर गढ़ तोप चलाय |
माहव किण पातक सूं मेली , बाड़मेर पर इसी बलाय ||

दुर्गों की बुर्जों पर तोपों के प्रहार हो रहे है और पार्वत्य दुर्ग की दीवारें टूट -टूट कर गिर रही है | यह किस पाप का फल जो बाड़मेर पर ऐसी आपत्ति आई |
बाड़मेर के दुर्ग पर आधिपत्य कर ब्रिटिश सेना ने चौहटन पर प्रयाण किया | ब्रिटिश अश्वारोही आक-फोग सभी के क्षूपों को रोंद्ती , पृथ्वी को मच्कोले खवाती , कुप वापिकाओं के जल स्रोतों को सुखाती , चौहटन पहुंची | ठाकुर श्याम सिंह रण मद की छक में छका हुआ अपने शत्रुओं को दक्षिण दिशा के दिग्पाल की पुरी का पाहुना बनाने के समान उद्दत था | अंग्रेज सेनानायक ने श्याम सिंह से युद्ध न कर आत्मसमर्पण करने के लिए सन्देश भेजा , पर श्याम सिंह तो देश के शत्रु ,राष्ट्रीयता के अपहरणकर्ता और स्वतंत्रता के विरोधी अंग्रेजों से रणभूमि में दो दो हाथ करने के लिए अवसर ही खोजता फिर रहा था | राष्ट्रीय कवि बाँकीदास आशिया के काव्य में व्यक्त अंग्रेज सेनानायक और ठाकुर श्याम सिंह का शोर्यपूर्ण प्रश्न उत्तर सुनिए -
अंग्रेज बोलियौ तेज उफ़नै,सिर नम झोड़ में रौपै सिरदार |
हिन्दू आवध छोड़ हमै साहब नख ,सुणियो विण कहे बिना विचार ||
धरा न झलै लड़वां धारवां , स्याम कहै किम नांखुं सांग |
पूंजूँ खाग घनै परमेसर , उठै जाग खाग मझ आग ||
कळहण फाटा बाक कायरां , वीर हाक बज चहुँ वलाँ ||
छळ दळ कराबीण कै छूटी, कै पिस्तोला पथर कलाँ ||

अंग्रेज सेनापति ने आक्रोश में उत्तेजित होकर कहा- अरे सरदार ! युद्ध मत ठान | आत्मसमर्पण कर अपने जीवन की रक्षा कर | हे हिन्दू योद्धा ,अपने आयुध साहब के सामने रख दे | तू सुन तो सही ,आगे पीछे भले बुरे , हानि -लाभ का बिना विचार किये व्यर्थ मरने के लिए हठ ठान रहा है |
वीरवर श्याम सिंह ने मृत्यु की उपेक्षा करते हुए कहा - यदि मरण भय से आत्मसमपर्ण करूँ तो यह क्षमाशील पृथ्वी भार झेलना त्याग देगी ,तब फिर मै शस्त्र सुपुर्द कैसे करूँ | तलवार और परमेश्वर का मैं समान रूप से आराधक हूँ | अत: शस्त्र त्याग जीवन की भिक्षा याचना के लिए तो मैंने शस्त्र उठाये ही नहीं | बैरियों के सिरछेदन के लिए मैं अपने हाथ में तलवार रखता हूँ |
कायरों के मुंह फटे से रह गए | चारों और से मारो काटो की आवाजें गूंजने लगी | कराबीने पत्थर कलाये और पिस्तोलों से गोले गोलियां गूंजने लगी | कायरों के कलेजे कांप गए | वीर नाद से धरा आकाश में कोहराम मच गया | क्षण मात्र में देखते देखते ही नर मुंडों के पुंज (ढेर) लग गए | मरुस्थली में रक्त की सरिता उमड़ने लगी |
मालानी प्रदेश को कीर्ति रूपी जल से सींचने वाला वीर श्याम सिंह अपने देश की स्वंत्रता के लिए जूझने लगा | अपने प्रतापी पूर्वज रावल मल्लिनाथ ,रावल जगमाल ,रावल हापा की कीर्तिगाथा को स्मरण कर अंग्रेज सेना पर टूट पड़ा | उसके पदाति साथियों ने जय मल्लिनाथ ,जय दुर्गे के विजय घोषों से शत्रु सेना को विचलित कर दिया | इस पर कवि बाँकीदास ने कहा -
हठवादी नाहर होफरिया , सादी जिसडा साथ सिपाह |
मेर वही मंड बाहड़मेरे , गोरां सूं रचियौ गजशाह ||
केवी मार उजलौ किधौ ,अनड़ चौहटण आड़े आंक |
घण रीझवण पलटणदार घेरिया , सेरावत न मानी सांक ||
सोमा जिम तलवार संमाहे , जोस घनै बाहै कर जंग |
मरण हरख रजवट मजबुतां , राजपूतां त्यां दीजै रंग ||
अणियां भंमर रोप पग उंडा , रचियो समहर अमर हुओ |
आंट निभाह उतन आपानै , मालाणे जळ चाढ़ मुओ ||

उस हठीले वीर श्यामसिंह ने सादी जैसे साहसी साथियों को अपने संग लेकर सिंह की तरह दहाड़ते हुए आक्रमण किया और सुमेर गिरि शिखिर की भांति अडिग बाहड़मेरो ने गोरों से भयानक युद्ध छेड़ा | उस वीर श्रेष्ट शेरसिंह तनय श्यामसिंह ने अंग्रेजों की तोपों , तमंचो से सनद्ध सेना का तनिक भी भय नहीं माना | शत्रुओं का संहार कर उसने बाहड़मेरा राठौड़ खांप को कीर्तित किया तथा चौहटन वालों की वीरता का प्रतीक बन गया | अंग्रेजों की पलटनो को चारों तरफ से घेर कर अपने प्रतापी पूर्वज सोमा की भांति तलवार उठाकर अत्यंत ही उत्साह के साथ भयानक जंग लड़ा | मरणो उत्साही ऐसे क्षत्रिय सपूतों को रंग है जो मातृभूमि की गौरव रक्षा के लिए अपने प्राणों को तृण तुल्य मानते है |
सेना रूपी दुल्हिन का दूल्हा वह श्यामसिंह रणाराण में दृढ़ता पूर्वक अपने पैरों को स्थिर कर युद्ध करने लगा और अंत में अपने प्यारे वतन की आजादी की टेक का निर्वहन करता हुआ रण शय्या पर सो गया | उस वीर ने मालानी प्रदेश को यश प्रदान कर अमरों की नगरी के पथ का अनुगमन किया |
ठाकुर श्याम सिंह ने अपने पूर्वजों की स्वातंत्र्य भावना और आत्मसम्मान ,आत्म त्याग का पाठ पढ़ा था | इसलिए उस वीर ने जीते जी मालानी प्रदेश पर अंग्रेज सत्ता का आधिपत्य नहीं होने दिया | मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का बलिदान का देने वाले ऐसे ही सपूतों के बल पर ही देश स्वतंत्र रहते है और उनका त्याग प्रेरणा देता हुआ भावी पीढ़ियों के राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत रखता है |
" धरती म्हारी हूँ धणी , असुर फिरै किम आण " के आदर्शों का पालन करने वालों के जीवित रहते मातृभूमि को कैसे कोई शत्रु दलित कर सकता है | ठाकुर श्यामसिंह में आधुनिक साधनों-शस्त्रों से सज्जित बहु संख्यक अंग्रेज सेना का सामुख्य कर मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना जीवन न्योछावर किया और मालानी प्रदेश की स्वतंत्रता की रक्षा का पुनीत गौरवशाली पाठ पढ़ा कर सदा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गया | कवि ने इस पर मरसिया कहा है -
स्यामा जिसा सपूत , मातभोम नही मरद |
रजधारी रजपूत , विधना धडजै तूं वलै ||
`
ऐसे देश प्रेमी शूरवीरों के शोणित से सिंचित यह धरा वन्दनीय कहलाती है और उर्वरा बनती है | हरिराम आचार्य के शब्दों में -
उसके दीप्त मस्तक पर उठा था जाति का गौरव |
कि क्षत्रियता उसी के काव्य मद से मत्त होती थी ||
जहाँ भी त्याग का बलिदान का मोती नजर आता |
कलम उनकी उसी क्षण शब्द सूत्रों से पिरोती थी ||
लेखक : ठाकुर सोभाग्य सिंह शेखावत, भगतपुरा |

मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का बलिदान का देने वाले ऐसे ही सपूतों के बल पर ही देश स्वतंत्र रहते है और उनका त्याग प्रेरणा देता हुआ भावी पीढ़ियों के राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत रखता है |
पर अफ़सोस कि हमने मातृभूमि के लिए प्राणों की बलि देने वाले उन सपूतों को भुला दिया और उन लोगों की प्रतिमाओं पर मालाएँ चढ़ा रहे है जिन्होंने सिर्फ कुछ दिन अंग्रेजों की जेल में रहकर रोटियां तोड़ी | हमारी भावी पीढ़ी उन जेल भरने वाले सेनानियों से क्या प्रेरणा लेगी ?




आशियाने | ज्ञान दर्पण

स्वतंत्रता समर के योद्धा : महाराज बलवंत सिंह ,गोठड़ा

स्वतंत्रता प्रयासी योद्धाओं में हाडौती क्षेत्र के महाराज बलवंत सिंह हाड़ा गोठड़ा का अविस्मर्णीय योगदान रहा है | राजस्थान के हाडौती भू -भाग के दो राज्य कोटा और बूंदी ब्रिटिश प्रभाव की वारुणी का पान कर अभय स्वापन हो चुके थे | अंग्रेज सत्ता का स्वागत कर दोनों राज्य प्रसन्न थे | किन्तु उसी समय हाडौती क्षेत्र में गोठड़ा स्थान अंग्रेजों के लिए सिर दर्द बना हुआ था | बासुकी के बिल गोठड़ा के पास जाकर बलवंत सिंह का दमन करने का अंग्रेजों का साहस नहीं हो रहा था | महाराज बलवंत सिंह दोनों हाड़ा राज्यों और अंग्रेज सत्ता तीनों की सैन्य शक्तियों के विरुद्ध ध्वज फहरा रहे थे |
गोठड़ा बूंदी राज्य के महाराव राजा उम्मेद सिंह के द्वितीय पुत्र महाराज बहादुर सिंह को पैत्रिक भू-भाग के रूप में मिला था | महाराज बहादुर सिंह के बलवंत सिंह , शेर सिंह ,दलपत सिंह तीन पुत्र थे | क्षत्रिय शासन परम्परा के अनुसार बलवंत सिंह अपने पिता की मृत्यु के बाद गोठड़ा की गद्दी पर बैठा | वह बाल्यवस्था से ही बड़ा मानधनी , दृढ संकल्पी, निर्भीक ,स्वाभिमानी और स्वतंत्रता प्रेमी व्यक्ति था | महाराज बलवंत सिंह के समय में बूंदी के सिंहासन पर उनके बबेरे भाई महाराव राजा बिशन सिंह थे | बिशन सिंह का अंग्रेजों के परम मित्र महाराज राणा जालिम सिंह झाला (झालावाड) की राजकुमारी के साथ विवाह हुआ था | जालिम सिंह बड़ा दूरदर्शी ,कुटिल मति और नीतिनिपुण व्यक्ति था | वह अंग्रेज सत्ता को हाडौती क्षेत्र में पैर ज़माने में सहायता करता था | इस प्रकार उसकी अंग्रेज शासक समर्थक नीति के कारण महाराव राजा बिशन सिंह और महाराज बलवंत सिंह में भी परस्पर मनोमालिन्य उत्पन्न हो गया |
उधर जालिम सिंह झाला के द्वारा अंग्रेज सरकार स्वाधीन चेता बलवंत सिंह का दमन करवाने पर तुली हुई थी | अत: महाराज बलवंत सिंह ने बूंदी नरेश , माधव सिंह झाला और अंग्रेजों के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए सम्वत 1867 वि.में बूंदी के नैणवा नगर पर आक्रमण कर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और अंग्रेजों के दोनों समर्थक बिशन सिंह और जालिम सिंह का गर्व भंजन कर दिया | तदनन्तर जयपुर राज्य के अर्द्ध स्वतंत्र उणियारा राज्य के नरुका शासक पर आक्रमण कर उसकी सेना को पराजित कर सीमावर्तियों पर अपना आतंक जमा लिया | इन सब घटनाओं से रुष्ट होकर अंग्रेजों ने बलवंत सिंह का दमन करने के लिए योजना तैयार की और महाराज बलवंत सिंह के खिलाफ आक्रमण हेतु सेना सज्जित की |
यद्दपि अंग्रेज इतिहासकारों ने स्वतंत्रता के प्रयासी भारतीय वीरों के स्वातंत्र्य संघर्षों को अपनी निर्धारित ब्रिटिश सत्ता स्थापन नीति के अनुसार छ्द्दता पूर्वक अंकित किया है | उनके चरणानुयाई भारतीय इतिहास लेखकों ने भी ऐसे युद्धों और स्वातंत्र्य प्रयासों में अपने जीवन को महत्त्व ही नहीं दिया और कहीं कहीं जो थोडा बहुत उल्लेख किया है तो अंग्रेजों और उनके पक्षधर भारतीय शासकों की दुर्नीति के कलंक से बचाकर सामान्य मात्र कर दिया है | किन्तु उस समय कुछ ऐसे विद्वान् और कवि भी थे , जिन्होंने ऐसे देश भक्त वीरों के वीर कार्यों को अपने काव्यों में चित्रित किया है | महाराज बलवंत सिंह ,उनके भ्राताओं ,पुत्रों और उनके सहयोगियों पर रचित समसामयिक काव्यों में उनके बलिदान के ओजस्वी स्वर गुंजित है |

अंग्रेज सरकार ने महाराज बलवंत सिंह को बंदी बनाने के लिए अनेक प्रयत्न किये पर स्वतंत्रता का वह सजग प्रहरी जब उनके पंजे में फंसा नहीं, तो संवत 1818 वि. में एकाएक बूंदी के केशोरायपाटन स्थान पर बलवंत सिंह को जा घेरा | वह अपने अनुज शेर सिंह तथा दो पुत्र धौंकल सिंह और फतह सिंह सहित तीर्थ यात्रा के लिए केशोरायपाटन गया हुआ था | अंग्रेजों ने महाराज राणा माधव सिंह सहित अपनी अश्व , पदाति सेना और तोपखाना को लेकर केशोरायपाटन की नाके बंदी कर बलवंत सिंह को आत्म समर्पण करने के लिए जो सन्देश भेजा उसकी अभिव्यक्ति का स्वर एक वीर गीत की दो पंक्तियों में सुनिए-
भोळा अंगरेज अळी कांई भाखै, इम आखै बलवंत अभंग |
उतबंग लार लगाया आवध , आवध री लारा उतबंग ||

महाराज बलवंत सिंह के अडिग व्रत को देखकर अंग्रेजों का साहस शिथिल पड़ गया | वे मुकाबले के लिए अपनी सेना तैयार कर सुदृढ़ मोर्चा लगाने लगे | युद्ध कोलाहल से धरा आकाश गूंजने लगे | उत्साही वीरों के भालों से आकाश ढक गया | अंग्रेज सेनानायक ने भयभीत स्वर में कहा -देखो सावधान ! नंगी तलवार उठाये वह आया बलवंत सिंह -
सघण थाट फ़ौजां बिखम कोह रचियो, समर छोह भालां डंमर गैण छायो |
करो गाढा जतन बेग साएब कहै , ऊ बढी तेग बळवंत आयो ||

अंत में महाराज बलवंत सिंह ने स्वतंत्रता का किसी भी मूल्य पर विक्रय करना स्वीकार नहीं किया और अंग्रेज सत्ता , उनके समर्थकों और उनकी संयुक्त सेना की तनिक भी परवाह न करते हुए स्पष्ट उत्तर भेजा -
सुण बचन चखां नींद असळाकतौ, अनड खैग हांकतौ जुध अधायौ |
चाव भुज बळां सौणित अजब चाखतौ , आखतौ खळां सिर गजब आयो ||

अंग्रेजों के दूत के मुख से आत्म समर्पण करने का वचन सुनते ही वह स्वतंत्रता -भिलाषी नर शार्दुल क्रुद्ध हो उठा और आलस्य जनित निंद्रा त्याग कर युद्धार्थ अधीर हुआ अपने अश्व को अंग्रेज सेना की दौड़ा चला | उत्कंठा पूर्वक और शोणित का स्वाद चखता हुआ शत्रु सेना पर झपट पड़ा | स्वतंत्रता के पुजारी बलवंत सिंह ने आत्म समर्पण तो अलग रहा पर अंग्रेजों से किसी प्रकार का संधि -समझौता तक स्वीकार नहीं किया | उसने उग्र शब्दों में घोषणा करते हुए कहा - जब तक मैं अपनी तीक्षण तलवार से अंग्रेजों के सिरों का छेदन नहीं करूँ तब तक मुझे जरा भी चैन नहीं पड़ेगा -
इम बोलै तोलै खग आचां , अण बोलै चहुआण अनै |
अंग्रेजां धड सीस उतारुं , मारु जद आळगै मनै ||

भारतीय स्वतंत्रता के अपहरण कर्ता अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम के होता महाराज बलवंत सिंह की दृढ प्रतिज्ञा जानकार आक्रमण कर दिया -
अंग्रेजां सुणतां खबर सज फ़ौज सस्सतर |
मिळिया झाला माधवेस छळिया मूंछां कर ||

उसी समय महाराज बलवंतसिंह ने अपने भाई शेरसिंह ,पुत्र धौंकलसिंह तथा फतहसिंह सहित अपने घोड़ों की बांगे उठाई | वे चारों योद्धा रिपु सेना पर यूँ चढ़े ज्यों सघन वन पार्वत्य , उपत्यका में ललकारने पर दहाड़ मार कर सिंह झपटता है -
कढो कढो इम बबकिया , धकिया क्रोधंगर |
जांण अझाड भाखरा दाकळिया दुच्छर ||
हाडा चहूं हकारिया गाढा धमगज्जर |
सुत धुंकळ , फ़तमाल , सेर- बांधव रोसावर ||

गोलों के प्रहारों की झड़ी लग गई , शत्रु सेना का साहस टूटने लगा | विपक्षी सैनिक प्राणों के भय से अपने इष्ट अल्लाह और पैगम्बर का स्मरण करने लगे | गोरांग सैनिकों के मारे जाने से सैन्य बल विचलित होने लगे | हिन्दू योद्धा हर-हर महादेव के घोष करने लगे | कितने ही शत्रु प्राण शून्य रणभूमि पर गिर पड़े और कतिपय घायल मरणासन्न तडफने लगे | अंग्रेज सेना की तत्कालीन कथित अवदशा श्रुत्य है -
सरडक गोळा सकसकै ,अकबक्करै अरिहरर ,
केक मुसल्ला ऊचरै अल्ला पैगम्बर |
फ़ौज हरै गोरा कटै हिन्दू रटै हर-हर ,
तडफ़ै केक तमोगुणी , हडफ़ें कर होफ़र ||

बलवंतसिंह ने बज्राग्नी तुल्य अपनी भयंकर तलवार के प्रहारों से अंग्रेजों को मारकर धराशायी कर दिया | वीर शेरसिंह का शिरस्त्राण कट कर वह भी अपने घोड़े सहित रणभूमि में अंनत नींद सो गया |
बाही खाग बळूंतसिन्घ ,बजराग बरोबर ,
केक मुसल्ला काटियां अंगरेज अथाहर |
कट असवार झिलम टोप घोडा पख्खर ,
जूटो सेरो जोरवर तिम तूटो बजर ||

शेरसिंह ने अपने जीवन की स्वातंत्र्य यज्ञ में आहुति देकर वीरलोक का पथ लिया | वह एकाकी हजारों योद्धाओं से घिर कर महावीर अभिमन्यु की भांति शौर्य प्रदर्शित कर जूझ मरा- इस संबंध में एक कवि का सौरठा-
सेरो जाणे सेर , थाहर सूं उठियो थको |
घण दळ दोयण घेर , साम्यां तैं बहादुर सुतन ||
सेरो सोह संसार , जननी सूर न जनमियो |
हेकण और हजार , हेकण कांनी हेकलो ||
घणचक लीधो घेर अणचक आयर ऊपरां |
सारां पहली सेर , धज्वडियो धारां चढ्यो ||

शेरसिंह के कट मरते ही वीर धौंकलसिंह और फतहसिंह ने अपने घोड़े अंग्रेज सेना की सुदृढ़ पंक्ति की और बढाए | तलवारों की तीक्षण धाराएं शत्रुओं की पैनी धाराओं से टकराने लगी | गर्व से उभय वीरों के मस्तक मानो आकाश तक जा लगे | बाणों की बौछारों की सनन सनन ध्वनी होने लगी | महादेव रण कौशल देखकर अट्टहास करने लगा -
सुत धूंकळ फ़तौ लडै सिर भिडै अधन्तर |
बाढ झडै बीजूजळां हड-बडै महेसर ||
लोथ-लोथ ऊपरां खड - खडै वडफ़्फ़र |
गाज त्रमाटां गड - गडै सड- सडै सर ||

रणभूमि रक्त प्लावित हो गयी | युद्ध स्थली में वीरों के शवों के अम्बार लग गए | तोपों के गोलों से भूमि छलनी हो गयी -
ललन्भी फ़ौजां हुई जम्मी रातम्बर |
नंद बहादुर नेतबंद , खळखंद खयंकर ||
पाड खळां पडियो पटेत भुज बळां भयंकर |
सह्तो बेटां बांधवां बरियाम बधोतर ||

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के राजस्थान में शुभारम्भ के लिए संवत 1881 वि.की कार्तिक पूर्णिमा का दिवस एक ऐतिहासिक तिथि है | वीर बलवंतसिंह ने उसी दिन एकाकी अपनी व्यक्तिक शक्ति से ब्रिटिश सत्ता को चुनैती देकर अपने प्राणों का बलिदान किया था -
संवत अठार इक्यासिये , मंड जुध कातिक मांय |
बलवंत हाडो वीसम्यौ , पून्यो रवि दिन पाय ||

इस प्रकार आजादी के लिए वीर महाराज बलवंतसिंह ने सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वाधीनता समर का बीज संवत 1881 वि. में वपन कर दिया था | अत: प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के योद्धाओं के स्मरण की पुनीत बेला में उस पथ को ससाहस प्रशस्त कर अग्रेसर करने वाले पूर्वर्ती वीरों का स्मरण कर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करना हमारा परम कर्तव्य है | सन 1857 की क्रांति का पौधा बलवंतसिंह जैसे स्वाधीनता प्रेमी वीरों के मज्जा ,मांस ,रक्त और अस्थियों का खाद ,जल पाकर पुष्ट हुआ था | उस अंकुर को उगाने वाले बलवंतसिंह को हमारा बार-बार अभिनन्दन |

लेखक: ठाकुर सोभाग्य सिंह शेखावत,भगतपुरा (राज.)




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