Grab the widget  IWeb Gator

क्षत्रिय और मानव"

कुँवरानी निशा कँवर नरुका
आजकल प्राय: यह देखने में आ रहा कि लोग क्षत्रिय होने को मनुष्य होने में एक रोड़ा मानने लगे है |ऐसा केवल वे ही लोग सोचते या मानते हो जो कि क्षत्रिय नहीं है ,तब तक तो स्थिति फिर भी ठीक हो ,किन्तु अबतो यह भी देखने में आरहा है कि कुछ अपने आपको राजपूत कहने वाले व्यक्ति भी किसी हीन भावना को महशुश कर रहे है कि वो क्षत्रिय है |इनमे बहुतायत उनलोगों कि है जो कि अपने आपको प्रगतिशील कहलवाने के प्रति बुरी तरह से न केवल लालायित ही है, बल्कि अनाचार की किसी भी सीमा रेखा तो तोड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति का भरपूर दुरूपयोग कर रहे है |
मै सधारण भाषा में समझाने का प्रयास करती हूँ कि यदि कोई व्यक्ति अपने आपको राजस्थान का होना बताये तो क्या वो भारतीय नहीं है,?? या यो कहे कि भारतीय होने के लिए उसे अपना राजस्थानी होने की पहिचान छोडनी पड़ेगी | यह एक हास्यास्पद बात है क्योंकि वह राजस्थानी है ,केवल इसी बात मात्र से वह भारतीय अपने आप सिद्ध हो जाता है |वैसे भी भारत के इतिहास में राजस्थान का अपूर्णीय योगदान भी है |अब समझदार लोग तो सिर्फ इसी बात से समझ गए होंगे कि क्षत्रिय होने से व्यक्ति न केवल मनुष्य अपने आप सिद्ध होजाता है बल्कि मानवता के लिए क्षत्रिय का अपूर्णीय योगदान भी अपने आप स्मरण होआता है | इसी प्रकार अभी कुछ एक असामाजिक संघठन बन गए है जो आर्य और अनार्य को एक जाति (race ) सिद्ध करने में लगे है, जैसे विदेशी इतिहासकार कुछ ऐसा ही जहर घोल कर अपने दीर्धकालिक उद्देश्यों की पूर्ति करने का काफी हद तक सफल प्रयास कर गए है |जबकि आर्य कोई जाति नहीं बल्कि सभ्य एवं सुसंस्कृत लोगो को कहा जाता है, और इसका शाब्दिक अर्थ भी अच्छे आचरण वाला होता है,,,वैसे ही अनार्य का अर्थ बुरे आचरण वाला होता है |
किन्तु देखिये BAMCEF का साहित्य क्या जहर उगल रखा है |और विरोधाभाष उनके अपने साहित्य में है किन्तु चूँकि शुद्रत्व का तो अर्थ ही शीघ्र प्रभावित होना है ,इसलिए उनके ऊपर BAMCEF के इस कुत्सहित्य का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है |रावणके पूर्वज ब्रह्मण और रावण दलित ,दिति ब्रहामिनी और ब्रह्मण ऋषि कश्यप के वंशज जिन्हें दैत्य कहा जाता कैसे दलित हो गये?? यह पूंछने की बुद्धि तो एक शुद्र में हो नहीं सकती इसलिए इनकी चल रही है दुकानदारी ,जिस दिन शुद्र भगवान बुद्ध के उपदेशो पर अमल कर अपनी बुद्धि को स्वतंत्र सोचने के लिए के लिए अपने विवेक को जागृत कर लेंगे उसी दिन बामसेफ के बुद्धिजीवी अपना सर छुपाने के लिए जगह ढूंढेंगे |हम अपने वास्तविक विषय पर आते है कि "क्या मनुष्य या मानव धर्मं का क्षत्रिय होने या क्षात्र-धर्मं से विरोध है या मानवता के लिए हमे यह भूलना चाहिए कि हम एक क्षत्रिय है ???
जैसे कोई अपने माता-पिता की संतान हुए बगेर समाज या इस संसार में आ ही नहीं सकता ठीक उसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था कि लाख बुराई करने के बावजूद मनुष्य होने के लिए व्यक्ति को किसी न किसी वंश ,जाति और कुल में तो पैदा होना ही पड़ेगा और उसके उस कुल या वंश का होने से ही वो मनुष्य है वरन तो वो बिना शारीर ही हुआ होता ,,यदि वो क्षत्रिय नहीं हुआ होता तो वैश्य या शुद्र या फिर ब्रह्मण ,कुछ न कुछ तो होता ही ,अब आज तर्क यह भी है कि वो अनार्य भी तो होसकता है, हाँ होसकता है किन्तु अनार्य का अर्थ हम पहिले ही बता चुके है कि, जो सदाचरण और सभ्यता और संस्कृति कि ऊँचाईयों से दूर हो वो ही अनार्य है |और आज तो विज्ञानं इतनी प्रगति कर चूका है कि आप स्वयं जानले कि कौनसा धर्म वैज्ञानिक, वास्तविक,एवं प्राक्रतिक है ,और कौनसा अवैज्ञानिक, अप्राकृतिक और अवास्तविक है,शायद निकट रक्त सम्बन्धी से विवाह करना और अपने कुल गोत्राचार का विचार करने मात्र से ही समझ बैठ जायेगा कि मेरा इशारा क्या है |
यदि आप में सामाजिक चेतना की जाग्रति पैदा नहीं हुयी है,तो आप आर्य यानि सभ्य और शिष्ट नहीं हो सकते | तब आप उन अनपढो और गंवारो से भी गए बीते है जो विनम्र है |ऐसी स्थिति में आप आर्य नहीं अनार्य ही है |जो शिक्षा विनय नहीं सिखाती, वो शिक्षा नहीं कुशिक्षा है |विद्या मनुष्य को विनय सभ्यता और शीलता सिखाती है |यही अंतर आर्य और अनार्य में है |आर्य या सभ्य मनुष्य में दुसरो का हित देखने की बुद्धि होती है,जबकि अनार्य या असभ्य मनुष्य,या जंगली पशु में केवल अपने स्वार्थ को देखने की ही प्रेरणा मात्र होती है |इसी सामाजिक गुण का दूसरा नाम आर्यत्व है और आजकल परचित नाम मनुष्य है|जिस मनुष्य में यह नहीं वो आर्य नहीं होता वाही अनार्य है |अब आप आकलन करे की दुसरे के हित को देखने एवं समझने की बुद्धि जिसमे होती है वो आर्य तो है ही, किन्तु दुसरे के हित के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए दृढ़संकल्पितजो होता है वो अर्यो यानि सभ्य मनुष्यों में भी केवल और केवल क्षत्रिय ही होसकता है | अत: क्षत्रिय न केवल मानवता का पोषक बल्कि मनुष्यों में भी सभ्य और उनमे भी सर्वोत्कृष्ट सामाजिक चेतना और सभ्यता के धनी होते है "क्षत्रिय"इसलिए क्षत्रिय के रूप में पैदा होना हीनता का नहीं बल्कि गौरव की बात है |
"जय-क्षात्र धर्मं"
कुँवरानी निशा कँवर नरुका .
»»  read more

श्री राजपूत करणी सेना के शीर्ष सस्‍थांपक व कांग्रेसी नेता लोकेन्‍द्र सिंह कालवी ने निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीता

श्री राजपूत करणी सेना के शीर्ष सस्‍थांपक व कांग्रेसी नेता लोकेन्‍द्र सिंह कालवी ने भोपाल में आयोजित जी, वी , मावलंकर राष्‍टीय शाट गन निशानेबाजी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए राजस्‍थान के लिए सीनियर वर्ग स्‍कीट र्स्‍पद्वा में स्‍वर्ण पदक जीता। 56 वर्षीय कालवी ने गोरागांव की नवनिर्मित शूटिंग रेंज पर गजब के निशाने लगाए और कूल 50 में से 45 अंक हासिल किए जो कि राष्‍टीय रिकार्ड है । इसके साथ ही कालवी ने राष्‍टीय निशानेबाजी प्रतियोगिता के लिए क्‍वालीफाई भी कर लिया है । उनके बेटे प्रताप सिंह कालवी ने भी राष्‍टीय निशानेबाजी प्रतियोगिता के लिए क्‍वालीफाई किया ।
--
Shyam Prarap Singh Etawa
Pradesh Sanyojak
Shri Rajput Karni Sena
9887380511

राजपूत वर्ल्ड परिवार की और से कालवी साहब व सेना को घणी घणी बधाईयाँ और शुभकामनाएँ |



ये भी पढ़ें -
उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे |
मेरी शेखावाटी
»»  read more

हठीलो राजस्थान-60

तीरथ न्हाया नह कदै,
नायो नह शिव-माथ |
छिनेक जुंझ कमावियो,
सारो पुन इक साथ ||३५८||

इस धरती के लोगों ने न कभी तीर्थ-स्थान किया है और न शिव के आगे मस्तक झुकाया है | इन्होने तो क्षण भर रण-भूमि में जूझ कर ही सारा पुण्य एक साथ कमा लिया है |

सुर - धर जावण इण धरा ,
मारग फंटे अनेक |
सूधौ मारग जस भरयौ,
धारा तीरथ एक ||३५९||

इस धरती से स्वर्ग गमन के कई मार्ग जाते है | लेकिन इन मार्गों में एक ऐसा मार्ग है जो सीधा भी है व यश से परिपूर्ण भी | यह मार्ग तलवार की धार रूपी तीर्थ में स्नान करके स्वर्ग जाने का है | अर्थात रण-भूमि में शौर्य प्रदर्शित करते हुए जो शहीद होते है वे सीधे स्वर्ग गमन करते है |

नह जोगां नह तिथ मुरत,
नह अडिक, अध सेस |
धारा तीरथ न्हावतां,
सूधो सुरग प्रवेस ||३६०||

न तो किसी प्रकार के योग की आवश्यकता है और न ही किसी तिथि, मुहूर्त का इन्तजार करना पड़ता है ,अपितु तलवार की धार रूपी तीर्थ में जो स्नान करता है उसे सीधे स्वर्ग में प्रवेश मिलता है क्योंकि उसके कोई भी पाप शेष नहीं रहते अर्थात पाप भी तलवार की धार से (शहादत से) कट जाते है |

समाप्त

ये भी पढ़े -
ज्ञान दर्पण, मेरी शेखावाटी, हरियाणवी ताऊनामा
»»  read more

हठीलो राजस्थान -59

आंधी जठे उतावली,
पाणी कोसां दूर |
उण धर सांठा नीपजै,
जल जीवां भरपूर ||३५२||

जिस मरू-प्रदेश में प्रचंड आंधियां आती है तथा पानी भी कोसों दूर मिलता है , वहां की धरती पर गन्ने भी उत्पन्न होते है तथा जल-जीवों की भी कमी नहीं है | अर्थात यह धरती ऊसर ही नहीं, उर्वरा भी है |

डरता माणस जावता ,
चोरां रो नित बास |
वो धर आज बसावणो,
पास पास रहवास ||३५३||

जहाँ कभी चोरों की बस्ती थी उस क्षेत्र में लोग जाने से भी डरते थे, वहीँ पर अब घनी आबादी हो गयी है |

विधन बणाई जिण धरा,
रेतीली जल हीन |
काया बदली काम सूं,
माणस हाथ प्रवीण ||३५४||

विधाता णे जिस धरती को रेतीली व बिना जल वाली बनाया, उसे ही मनुष्य णे अपने परिश्रम से उर्वर बनाकर उसकी काया पलट कर दी |

बादल भेजै बरसवा,
नभ-मारग गिर राज |
नहरां आतां इण धरा,
सीधो मारग आज ||३५५||

गिरिराज हिमालय आकाश मार्ग से बादल जल बरसाने हेतु भेजता है | परन्तु नहरें आने से इस धरती पर (जल प्रवाह से) सीधा मार्ग बन गया है |

अन्न धन होसी मोकलो,
चुल्हां बलसी आग |
बंध बणतां जागियौ,
सदियाँ सोयो भाग ||३५६||

इस धरती पर अब प्रचुर अन्न धन्न पैदा होगा | जिससे हर घर में चूल्हे जलने लगेंगे | बाँध बनने के साथ मानो इस मरुधरा का सदियों से सोया भाग्य जाग उठा है | अर्थात अब यहाँ सुख-समृधि विलसने लगेगी |

बंधा नहरां बीजल्यां,
घर घर विद्या-दान |
इण विध आगे आवियो,
नूतन राजस्थान ||३५७||

बाँध,नहरें,विद्युत तथा शिक्षा का आगमन हो गया है | इस तरह से अब एक नया ही राजस्थान हमारे सामने आ गया है |



ये भी पढ़ें -
ज्ञान दर्पण , मेरी शेखावाटी ,हरियाणवी ताऊनामा
»»  read more

हठीलो राजस्थान-58

नगर नगर सैली नई,
चित्र अनोखो चाव |
विवधा सैली सरसतां,
विधनां विवध सुझाव ||३४९||

यहाँ नगर-नगर की रचना में नई नई शैलियाँ है तथा चित्रकारी का अनूठा चाव है | एसा लगता है कि इनकी रचना करते हुए विधाता ने अपनी सारी ही कला सृष्टि को इन शैलियों में ढाल दिया है |

रंग रूप आकर रो,
चित्रण करे सवाय |
इण धर एक विसेसता,
अण रूपी चित्राय ||३५०||

रंग रूप व आकर को देखकर तो सभी चित्रण करने वाले सौन्दर्ययुक्त चित्रण करते है किन्तु इस प्रदेश की यह विशेषता है कि यहाँ पर बिना देखि घटना को भी लोग चित्रित कर देते है जिसके अनुसार शौर्य प्रदर्शित कर लोग उस चित्रण को सही सिद्ध कर देते है |

रजपूती सैली अमर,
उण में भेद अनेक |
जाणे माणस बाग़ में,
नानां फूल विवेक ||३५१||

चित्रों की शैलियों में राजपूती शैली अमर है और उसमे भी अनेक भेद है ,मानो हृदय रूपी उद्यान में भावना के नाना फूल खिलें है |


ये भी पढ़ें-
एलोवेरा (गवार पाठा) की सब्जी |
मेरी शेखावाटी
ताऊ पत्रिका
»»  read more

हटीलो राजस्थान -57

धनी खगां, वचना धनी,
धनी रूप सिणगार |
अख खजानों इण धरा,
धनी साहित संसार ||३४३||

इस धरती पर तलवार के धनियों का (शूरवीरों का) ,व वचनों के धनियों का (दृढ प्रतिज्ञों का) व सुन्दरता व श्रृंगार के धनियों का अक्षय भंडार है | इसीलिए इनका वर्णन करने हेतु रचा गया यहाँ का साहित्य भी समृद्ध है |

रतन जड़ित भीतां छतां,
झीणी कोरण झांख |
सोधावै इतिहास गल,
मोदावै मन-आँख ||३४४||

यहाँ की इमारतों की दीवारों व छतों पर रत्न जड़े दिखाई देते है किन्तु पैनी दृष्टि से देखने पर इनके अन्दर इतिहास की बाते दिखाई देती है जिससे आँखे व मन आनंद से मुदित हो जाता है |

महलां, दुरगां मंदिरां,
लाग्या हाथ प्रवीन |
बरस सैकड़ा बीत गया,
दीसै आज नवीन ||३४५||

दक्ष हाथों से निर्मित यहाँ के दुर्ग,महल व मंदिर जिनका निर्माण हुए सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो गए आज भी नवीन दिखाई देते है |

अमर नाम राखण इला,
पग पग खड़ा निवास |
अजै समेटयां आप में,
फुटराई इतिहास ||३४६||

इस धरती पर अमर नाम रखने के लिए यहाँ जगह जगह ऐसी इमारते खड़ी हुई है जो अब तक भी अपने में उत्कृष्ट सौन्दर्य और इतिहास समेटे हुए है |

देखो आंख्यां एक टक,
मंदिर मूरत साथ |
सुन्दरता अर स्याम नै,
नम नम नावो माथ ||३४७||

अपनी आँखों से अपलक यहाँ के मंदिरों और मूर्तियों को देखो तथा मंदिरों के इस अदभुत सौन्दर्य व मूर्ति में स्थित प्रभु के दर्शन कर इन्हें बारम्बार अपना मस्तक नवाओ |

विधना रचिया जतन सूं,
घोटक सुभट सु-नार |
चित्र बणातां इण धरा,
कीधो घणो सुधार ||३४८||

विधाता ने बहुत यत्न से यहाँ के घोड़ों,वीरों और श्रेष्ठ नारियों की सृष्टि की है | इस धरती पर इनकी रचना करते हुए विधाता ने भी अपनी रचना कला में अदभुत सुधार किया है |




ये भी पढ़े -

इतिहास की एक चर्चित दासी "भारमली"
मेरी शेखावाटी
ताऊ पहेली
»»  read more

हठीलो राजस्थान-56

सबल साहित इण धरां,
सबल सुभट निवास |
इक इक दूहा उपरै,
नित नूतन इतिहास ||३३७||

इस धरती का साहित्य समृद्ध है यहाँ बलवान योद्धा निवास करते है | दूसरी जगह तो वीरों की गाथाओं का वर्णन करने के लिए कविताओं की रचना की जाती है लेकिन यह राजस्थान ऐसा प्रदेश है कि कवि अपनी कल्पना से जैसे पराक्रम का वर्णन करता है उसी प्रकार का पराक्रम शूरवीर युद्ध में दिखाता है |

सत पूरण साहित में,
पूरी निज अनुभूत |
कवियां रचियो ओ नहीं,
रचियो रण-अवधूत ||३३८||

यहाँ के साहित्य में अपनी सम्पूर्ण अनुभूति व पूर्ण सत्य छिपा हुआ है क्योंकि इस साहित्य की रचना शूरवीरों ने की है न कि कवियों ने | अर्थात कथानक के रचनाकार स्वयं शूरवीर थे ,कवि ने उसे केवल भाषा प्रदान की है |

ज्यूँ बादल में बिजली,
म्यान बिचै ज्यूँ नेज |
सूरा रस साहित्य में ,
अगनी में ज्यूँ तेज ||३३९||

जिस प्रकार बादल में बिजली है ,म्यान में तलवार है तथा अग्नि में तेज है, वैसे ही साहित्य में अन्य रसों में वीर-रस है |

जिण धर साहित वीर रस,
साहित उण सिणगार |
साथै दोनूं रस सदा ,
किसो विरोधाचार ||३४०||

जिस भूमि के साहित्य में वीर रस का बाहुल्य है वहां के साहित्य में श्रृंगार रस का भी बाहुल्य देखा गया है | यह दोनों रस हमेशा साथ रहते है | यह कैसा विरोधाभास है ? सामान्य दृष्टि से श्रृंगार व वीरत्व विरोधी आचरण है किन्तु क्षात्र-धर्म की परम्परा में सुख भोग व कातर की पुकार पर सर्वस्व न्योछावर कर देने की परम्परा अक्षुण है |

संतां अमृत वाणियाँ,
वेद वेदान्तां सार |
एक सरीसी बह रही,
सान्त तणी रस-धार ||३४१||

संतो की वाणियों से प्रवाहित होने वाला भक्ति का अमृत रस व ज्ञानियों के मुख से प्रकट होने वाला वेदान्त का उज्जवल सार यहाँ पर एक साथ बहता हुआ शांत रस की धारा सा प्रतीत होता है |

जलमै साहित जीवणों,
जुग जुग धरा जरुर |
भजन भाव भगवान् रा,
भगती रस भरपूर ||३४२||

इस धरती पर युग-युग तक जीवित रहने वाले शाश्वत साहित्य का सृजन हुआ है , जो भगवान् की आराधना और भक्ति-रस से पूरित है |



ये भी पढ़ें -
आभास | ज्ञान दर्पण
मेरी शेखावाटी
ताऊ पहेली
»»  read more

हठीलो राजस्थान -55

आभै उतरी, पीत पट,
लाल नैण तन हार |
सोई रूठी भाम ज्यूँ,
झालर री झणकार ||३३१||

अरुणारे नयनों वाली संध्या -सुन्दरी पीले वस्त्र पहन तथा तन पर तारक-हार धारण किए आकाश में अवतरित हुई | इसके साथ ही मंदिरों में आरती के समय झालर की झंकार बज उठी व इसके साथ ही रूठी हुई स्त्री समान संध्या सो गई व रात्री प्रकट हो गई |

दिन सूं आगी रात नित,
बोलै नीं मिल बैण |
दो दिल साथ मिलाविया,
सांझ सहेली रैण ||३३२||

दिन के बाद प्रतिदिन रात आती है परन्तु ये आपस में साथ रहकर बात भी नहीं कर सकते लेकिन संध्या रूपी सहेली ने आज इन दो दिलों को (दिन व रात्री को) आपस में मिला दिया है |

सुरां तणी आ सोमता,
चाँद तणी मुस्कान |
नभ- गढ़ उतरी चांनणी,
गोर रूप गुण खांन ||३३३||

देवताओं की सोम्यता और चंद्रमा की सी मुस्कान लेकर यह चांदनी जिसका गौरव पूर्ण है जो गुणों का खजाना है - आकाश रूपी गढ़ से उतरी है |

हंसती आ हंसागवण ,
मनां दाह मेटीह |
ठंडी गोरी हिम जिसी,
हिम-कर रो बेटीह ||३३४||

हंसो पर सवारी करने वाली हंसती हुई जब ये संध्या आई तो मन की अग्नि को ऐसे शांत करती हुई प्रतीत हुई मानों चंद्रमा की पुत्री ने आकर शीतलता प्रदान की हो |

नदियाँ नित सूखी रहै,
जद कद सजली धार |
साहित रस भागीरथी ,
इण धर सदा बहार ||३३५||

बहुत सी नदियाँ सूखी रहती है | वर्षा होने पर इनमे कभी-कभी जल प्रवाहित होता है पर साहित्य -रस रूपी भागीरथी (गंगा) इस धरती पर हमेशा बहती रहती है |

सूरा रस संसार रो ,
तोलो हेकण साथ |
भारी पलड़ो इण धरा,
भारी इण रो गाथ ||३३६||

सारे संसार के वीर रस व वहां की वीरता की कथाओं को एक पलड़े में रखा जाय व दुसरे पलड़े में राजस्थान के वीर रस व यहाँ की वीर गाथाओं को रखा जाय तो भारी पलड़ा इस राजस्थान की धरती का ही रहेगा |


ये भी पढ़े -
कवि की दो पंक्तियाँ और जोधपुर की रूठी रानी |
मेरी शेखावाटी
हरियाणवी ताऊनामा
»»  read more

समाचार

इतिहास

श्री तनसिंह जी की कलम से

राजपूत नारियां

 
hitcounter www.hamarivani.com
apna blog
 

Followers