पहले आध्यात्मिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को ही धर्म के नाम से संबोधित किया जाता था| किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है| धर्म के नाम पर कुछ क्रिया-कलाप होने लगे है| तथा इन्हीं क्रिया कलापों को धर्म कहा जाता है| कौन किस प्रकार से जीवन बिताता है,इसको झगड़े व विवाद का विषय बना लिया गया है| व् इसी विषय पर साधारण झगड़े ही नहीं महायुद्धों तक की रचना हुई है|
वर्ण व जातियां भी किसी प्रकार से धर्म का अंग नहीं है| चार युगों में से सतयुग व कलियुग में वर्ण नहीं होती| कलियुग में वह नष्ट हो जाती है और सतयुग में उसकी आवश्यकता ही नहीं रहती| त्रेता के आरम्भ में जब समाज पत्नोमुखी होने लगा, उसकी रोकथाम के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया जाता है| जो कलियुग के आरम्भ होते होते पूरी तरह से विफल हो,नष्ट हो जाती है| इस प्रकार से चार योगों के कार्यकाल को जोड़ा जाय तो आधे भाग में सतयुग व कलियुग होता है, जिसमे वर्णव्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता| फिर भी यदि लोग वर्ण व जाति व्यवस्था को धर्म का आधार बताने की चेष्टा करे तो इसे दुस्साहस ही कहा जायेगा|
आज व्यावसयिक बुद्धि के लोग धर्म व जाति के नाम पर अनेक प्रकार के संगठनों का निर्माण, न केवल सुविधा पूर्वक जीवन बीता रहे है, बल्कि वे समाज के शोषण के हेतु बने हुए है| ऐसे लोग जातिय व धार्मिक कट्टरता फैलाकर समाज को शेष मानवता से अलग-थलग कर देने के लिए दोषी समझे जाने चाहिए|
जातिय व धार्मिक संगठनों कि यदि वास्तव में कोई उपयोगिता है तो वह यही हो सकती है कि अपने पूर्व पुरुषों द्वारा आध्यात्मिक विकास में जो मार्ग खोजे गए थे, उनका अन्वेषण कर, उस पाठ पर चल कर स्वयं का, समाज का व मानवता का कल्याण किया जाए| लेकिन यह करू अत्यंत कठिन है| इसके लिए व्यक्ति को कठोर साधना का आश्रय लेकर अपने तथाकथित भौतिक सुख साधनों का उत्सर्ग करना पड़ता है| इस लिए लोगों ने पूर्वजों के नाम पर,गौरव गाथाओं का बखान कर संगठन बनाने की पद्धति अपना ली है, ताकि समाज व पूर्वजों के नाम पर स्वयं हित का साधन कर सके व लोगों को गुमराह कर, उनके साधनों व शक्तियों का अपने हित में उपयोग कर सकें|
यह निश्चित तथ्य है कि वर्तमान युग में जिस प्रकार से जितने धर्म व जातियां चल रही है उनका अस्तित्व अधिक समय तक चलने वाला नहीं है| अत: जातिय संगठनों को वास्तविकता स्वीकार कर लोगों को स्वयं का विकास करने के लिए परम्परागत आध्यात्मिक प्रणालियों का आश्रय लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए| जो धार्मिक व सामाजिक संगठन यह कार्य नहीं कर सकेंगे, वे कालांतर में स्वयं समाज व धर्म का विनाश करने के लिए दोषी ठहराए जायेंगे|
आज से एक हजार वर्ष पूर्व जब मौखिक विज्ञान अपने विकास को द्रुतगति दे रहा था| उस समय अन्धकार में डूबे हुए लोग अपनी यश गाथाएँ सुनने, भोग विलास करने, व धार्मिक मदान्धता में लिप्त हुए अपने आपको अद्भुत प्राणी समझ रहे थे| लेकिन विज्ञान के चमत्कार ने उनकी सारी बुद्धिमानियों को मूर्खता साबित कर दिया| पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान जिस गति से आगे बढ़ा है, उसने समस्त भौतिक मूल्यों को ही बदल दिया है| पालकियों, रथ, हाथी, घोड़ों व चरसों को किसी ने नष्ट नहीं किया, वे बदले हुए काल चक्र के प्रभाव से अपने आप ही समाज द्वारा भुला दिए गए व स्वत: ही नष्ट हो गए|
पिछले आठ सौ वर्षों से आध्यात्मिक जगत में विलक्षण चमत्कार हो रहे है| संसार की सभी कौमों में व संसार के सभी धर्मों में धार्मिक कट्टरता, मदान्धता व धार्मिक पंडावाद के खिलाफ विद्रोह करने वाले श्रेष्ठ पुरुष पैदा हुए है| उनकी आवाज को बुद्धिमान लोगों ने सुना व ह्रदय गम किया है| व समाज को नए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया है| लेकिन धर्म व जातिगत भावनाओं से लोग अंधे हो गए है, उन्हें यह सब कुछ दिखाई नहीं देता है| वे आज भी बैल गाड़ियों से चंद्रलोक तक पहुँचने की कल्पना लेकर समाज को मुर्ख बनाने की चेष्टा कर रहे है|
आगे आने वाले दो सौ वर्ष संसार में आध्यात्मिक विकास के लिए उतने ही मत्वपूर्ण होंगे जितने महत्वपूर्ण पिछले दो सौ वर्ष भौतिक विज्ञान के विकास के लिए रहे है| मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, मठ व चर्चों की दीवारों में जो लोग धर्म को बाँध कर रखना चाहते है उनके हौसलें इस तरह से पस्त होंगे, जिनकी आज लोग कल्पना भी नहीं कर पा रहे है| इन धर्म के नाम पर ठगी के अखाड़ों को किसी को नष्ट करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी| समाज द्वारा इन्हें सभी प्रकार से परित्यक्त कर दिया जावेगा| जिस प्रकार रथ,हाथी व घोड़े समाज द्वारा छोड़ दिए गए है|
धर्म व जाती के नाम पर चलने वाले अखाड़ों के भीतर घुसकर यदि हम देखने की चेष्टा करें तो न वहां हमें जीवन दिखाई देगा और न ही सौंदर्य| जीवन से विहीन, विशाल भवनों व किलों की दुर्गति आज हम देख रहे है वही गति इन धर्म के नाम पर चलाये जाने वाले संगठनों की होगी| वे स्वत: ही खंडहर बनकर लोगों के द्वारा छोड़ दिए जायेंगे| जिन लोगों में जीवन जीवन है, उन्हें चाहिए कि सम्यक रूप से स्वयं पर व समाज व सामाजिक संगठनों पर दृष्टि डाले| इन खंडहरों को का जो स्वरूप है, उसे बचाया नहीं जा सकता| इस तथ्य को स्वीकार कर लेने के बाद ही नव निर्माण का सूत्रपात होगा|
नव निर्माण का प्रयोजन केवल एक ही हो सकता है| अपनी परम्परागत साधना व आराधना पद्धतियों कि खोज तथा उनका अनुसरण कर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण| जो भी व्यक्ति, समाज या धर्म इस कार्य को कर लेगा, वही आने वाले समय में जीवित रहेगा,विकसित रहेगा व संसार पर छा जायेगा| वह समय दूर नहीं है, जब आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न लोग उसी तरह से छा जायेंगे, जिस प्रकार आज भौतिकवादी छाये हुए है|
लेखक : श्री देवीसिंह महार
हमारी भूलें : जातिगत व धर्मगत भावनाओं में डूबे रहना
Ratan singh shekhawat, Dec 27, 2011
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कोई सा भी धर्म देख लो, राजनीती घुसी बैठी है, हर जगह , और जहां भी ये घुसी इसने सत्यानाश ही किया उसका !
हां, जातियों के आधार पर वर्गीकरण ने शोषण को जन्म दिया और समाज को बांटकर रख दिया। बंटा हुआ कमज़ोर समाज विदेश आए मुठ्ठीभर सैनिकों से हार गए और तब उनके अंदर आत्मविश्लेषण का दौर शुरू हुआ। इसीलिए पिछले आठ सौ साल से चमत्कार होने लगा। जातियों की जो जकड़बंदी कभी नहीं टूटती थी वह टूटने लगी। ब्राह्मण और दलित-वंचित को भी समान कहा जाने लगा और वे एक ही होटल पर और एक ही नल पर खाने पीने भी लगे।
मुस्लिम सूफ़ियों के प्रभाव से एक अजन्मे ईश्वर की उपासना पर बल देने वाले पंथ वुजूद में आए और धीरे धीरे लोग बदलते चले गए। लोग यहां तक बदल गए कि अब चोटी और जनेऊ नज़र आने ही बंद हो गए और त्रिकाल संध्या-वंदन-हवन अब गुज़रे हुए ज़माने की बात हो गई है। इसके बावजूद लोग अब भी लगातार बदलते चले जा रहे हैं।
देखते हैं कि परिवर्तन की परिणति किस रूप में होती है ?
http://www.testmanojiofs.com/2011/12/2.html
स्वार्थी धर्माभासी लोग भोगवाद और हिसा को धर्म बताना चाहते है ताकि वे इस धर्म की आड में अपने उल्लु सीधे कर सके। त्याग संयम और अहिंसा वाला दर्शन इन्हें रास नहीं आता। आपनें सही कहा, धर्म से अध्यात्म लुप्त है। परम्पराएं रूढियाँ कुरितियाँ बाहरी परिधान ही धर्म कहलाने लगा है। ऐसी संकुचित सोच वाले लोग,पतनोमुखी है। वे चाहते है सभी उस हिंसक, भोगवाद, और प्रतिशोध को ही असली धर्म मानने लगे और पतीत बनकर सभी पतीतों के समकक्ष खड़े हो जाय।
आपने सही कहा……
"किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है| धर्म के नाम पर कुछ क्रिया-कलाप होने लगे है| तथा इन्हीं क्रिया कलापों को धर्म कहा जाता है| कौन किस प्रकार से जीवन बिताता है,इसको झगड़े व विवाद का विषय बना लिया गया है|"
"इसके लिए व्यक्ति को कठोर साधना का आश्रय लेकर अपने तथाकथित भौतिक सुख साधनों का उत्सर्ग करना पड़ता है| इस लिए लोगों ने पूर्वजों के नाम पर,गौरव गाथाओं का बखान कर संगठन बनाने की पद्धति अपना ली है, ताकि समाज व पूर्वजों के नाम पर स्वयं हित का साधन कर सके व लोगों को गुमराह कर, उनके साधनों व शक्तियों का अपने हित में उपयोग कर सकें|"
बहुत ही यथार्थ विवेचन, आभार
पहले आध्यात्मिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को ही धर्म के नाम से संबोधित किया जाता था| किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है .
राजनीती घुसी बैठी है, हर जगह .
धर्म और जातीगत के बारे मे देवीसिंहजी आपने सही लिखा है अगर धर्म या जाति कि बात नहीं की तो यह पैसा अपनाने के कामयाब नहीं होते और लोग को आपस मे विरोध पे ऊतर आते है अगर ये लेख पढ़ने से लोग मिल जुल के रहे तो भी अच्छी बात है
श्री रतनसिंह जी "जय माताजी" लालसिंह भाटी जैसलमेर
बेहतरीन विश्लेषण और गहन तथ्यपरख आलेख के लिए आपको साधुवाद
श्री रतनसिंह जी "जय माताजी " रतनसिंह जी नया साल आ रहा कल इसलिए आज ही आपको और आपके सपरिवार को माँ भगवती के आशीर्वाद से
" हार्दिक शुभकामनाएँ "दे देता हूँ आपको माँ भगवती वरदान दे कि समाज और भारत का नाम रोशन करे और आपको सफलता मिले माँ भगवती आपकी मनोकामनाएँ पुरण करें & =
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Tamaam sabuto or gawaho ko maddhe nazar rakhte huye adalat esi niteeje par pahunchi hai ki-msg "padhne wale aur all family "ko 31/12/2011 ke tehat...1 din pehale ":;;:::happy new years" kehte huye zindgi bhar khush rehne ki kamna sunayi jaati hai.... Happy new years .......,,,,,,,,,,,,,, गलती है तो माफ करना सा ......श्रीरतनसिंह जी.
भँवर-लालसिंह भाटी जैसलमेर
जो भी व्यक्ति, समाज या धर्म इस कार्य को कर लेगा, वही आने वाले समय में जीवित रहेगा,विकसित रहेगा व संसार पर छा जायेगा|
बिलकूल सही है, जातिगत भेदभाव और धर्म के नाम पे चलने वाली दुकाने ज्यादा दिन नहीं का सकती , बुराई ज्यादा समय तक नहीं चल सकती
आपको तथा आपके परिवार को नववर्ष के ढेरों शुभकामनाये .
बहुत ही अच्छी और क्रांतिकारी पोस्ट है आपकी !