Dec 26, 2012

स्तुति जमवाय माता



 जमवाय माता

म्हारी माता ए जमवाय, थारो मोटोड़ो दरबार !
म्हारो हेलो सुणो !!

दोसा सू आया दुल्हराय, हारोड़ी फोजा ने जिताय!
बुढ़िया को भेष बनाय, राणी को चुडलो अमर करयो !
म्हारो हेलो सुणो !!

कामधेनु बण दोड़, माता सिंघ पीठ ने छोड़ !
रण मे इमरत दियो निचोड़ , थणा सूं दूध झरयो !
म्हारो हेलो सुणो !!

तूँ कछवाहा कुल की जोत, तू अरियाँ द्लरी मोंत!
"काकिल" हिवडे करयो उघोत, थापी गादी आमेर की!
म्हारो हेलो सुणो !!

बेठी डूगर- घाटी बीच मायड कोट गोखड़ा खीच!
बेठ्या सेवक आख्याँ मीचं धाम 'बुढवाय' थप्यो !
म्हारो हेलो सुणो !!

मांची को बणायो रामगढ़, माता सिंघ पर चढ़ !
सारा असिदल दाब्या खड़ 'बुढवाय' सूं जमवाया बणी!
म्हारो हेलो सुणो !!

थारे दाल भात रो भोग, बणावे सगळा लोग!
कट्जा काया का भी रोग, चढ़ाता चिटकी चूरमो!
म्हारो हेलो सुणो !!

जात जडूला बेसुमार ल्यावे सारा ही परिवार !
गोरडूयाँ करसोला सिंगर बाधावा गावे मात का!
म्हारो हेलो सुणो !!


कीरत रो काई बखाण (माँ) भगतां रा मना ने जाण!
लीना चरणां मे सुवान भगती रो बरदान दियो !
म्हारो हेलो सुणो !!

तू छे शरड्णाइ साधार, अब तो भव सागर सुं तार!
लेवो डूबतडी ऊबार, नेया म्हारी मझधार सुं! 
म्हारो हेलो सुणो !!

सेवक ऊभा थारे द्वार , गावे विनती बारम्बार !
तू तो भगतां की आधार, सुहगया की गोद भरे! 
म्हारो हेलो सुणो !!



कुछ दिनों पहले रतन सिंह ने "कुलदेवी कछवाहा राजपूत " और  कछवाहा राजपूतो के बारे मे जानकारी दी थी, मुझे जब तक जानकारी है की सभी राजपूतो की कुलदेवी होती है और सभी राजपूतो को सबसे पहले अपनी कुल देवी की आराधना करनी चाहिए!  

Dec 23, 2012

पर्दा छोड़ राजनीति व सामाजिक स्तर पर भूमिका निभाए क्षत्राणीयां

जयपुर : पूर्व केन्द्रीय मंत्री कल्याण सिंह कालवी की जयंती पर शहर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ| मुख्य आयोजन श्री राजपूत करणी सेना की और से रविन्द्र मंच के ओपन थियेटर पर क्षत्रिय जान प्रतिनिधि गौरव सम्मान समारोह हुआ| कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि केंद्रीय कला व सांस्कृतिक मंत्री चंद्रेश कुमारी ने कहा कि क्षत्राणीयां जान-प्रतिनिधि के रूप में तो सामने आ रही है अब पर्दा छोड़कर राजनीति व सामाजिक स्तर पर भी सक्रीय पर भी भूमिका निभाये, ताकि समाज का स्तर ऊँचा हो| पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि कल्याण सिंह कालवी युवाओं को सक्रीय राजनीति में लेकर आये|
करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी व राजपूत समाज की विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारियों ने १३ जनवरी को अमरूदों के बाग़ में होने वाले राजपूत स्वाभिमान सम्मलेन में राजनैतिक विचारधारा व पार्टी स्तर को भूलकर शक्ति प्रदर्शन के लिए एकजुट होने का आव्हान किया|
इस मौके पर श्री राजपूत करणी सेना की वेब साईट का भी लोकार्पण किया गया| सम्मलेन में प्रदेशभर के जान-प्रतिनिधियों के तौर पर राजपूत जिला प्रमुख, प्रधान, सरपंच, जिला परिषद् व पंचायत समिति सदस्य व विभिन्न महाविद्यालयों के छात्र संघ पदाधिकारियों को गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया|

Dec 17, 2012

क्षत्रिय जनप्रतिनिधि गौरव सम्मान समारोह का आयोजन 22 दिसंबर को

श्री राजपूत करणी सेना द्वारा २२ दिसम्बर २०१२ को दोपहर दो बजे जयपुर के रविन्द्र रंगमंच, रामनिवास बाग़ में क्षत्रिय जनप्रतिनिधि गौरव सम्मान समारोह का आयोजन किया जायेगा| जिसमें राजस्थान के प्रदेश भर के राजपूत जिला प्रमुख, जिला परिषद् सदस्य, प्रधान पंचायत समिति सदस्य,सरपंच, पार्षद व छात्रसंघ प्रतिनिधियों को सम्मानित किया जायेगा|

श्री राजपूत करणी सेना के प्रदेश संयोजक श्याम प्रताप सिंह राठौड़ ने इस आयोजन में भाग लेने के लिए सभी क्षत्रिय बंधुओं से अपील की है कि -
"लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाली पंचायत राज व्यवस्था में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाले राजपूत जनप्रतिनिधि - जिला प्रमुख , जिला परिषद् सदस्य , प्रधान , पंचायत समिति सदस्य , सरपंच , पार्षद व छात्रसंघ में विजेता छात्र नेताओ को इस सम्मान से नवाजा जायेगा !!आप से अनुरोध है की अगर आप भी उपरोक्त श्रेणी में आते है या आपके संपर्क में ये जनप्रतिनिधि है तो आप उनके नाम , गावं का नाम व फोन न . यहाँ प्रदान करे , ताकि उनसे संपर्क कर उन्हें आमंत्रित किया जा सके ! आप सभी इस एतिहासिक सम्मान समारोह में सादर आमंत्रित है साथ ही संपर्क के सभी जनप्रतिनिधियों को भी सूचित करावे !!"

संपर्क करे - 9214059696 -9982987236

मूल्यांकन के मापदण्ड ............



व्यक्ति का सही मूल्यांकन कर पाना बहुत कठिन है ! अक्सर उपरी दिखावे के जाल में फंसकर हम गलत दिशा पकड़ लेते है और व्यक्ति की वास्तविकता तक नहीं पहुँच पाते ! वेश भूषा, खानपान आदि से भले लगने वाले लोग फरेबी और क्रूर निकल सकते है, तो दिखने में बुरे लगने वाले लोगों में भी पवित्रता के दर्शन हो जाते है ! अक्सर लोग आर्थिक पक्ष की सबलता को देख कर मान एवं सम्मान प्रदर्शित करते है, जबकि अर्थ अपने आपमे कोई सम्मान देने योग्य वस्तु ही नहीं है ! आवश्यकता से अधिक अर्थ का होना दुर्गुणों के मार्ग खोलने की प्रबल सम्भावनाये अपने आप में समाहित किये हुए होता है ! साधारण बोल चाल के शिष्ठाचार से किसी के जीवन मूल्यों को पहचानना भी अंधेरों में भटकने जैसा ही है ! पवित्रता हो तो कडवी बात भी मधुरता प्रदान करती है और उपरी शिष्ठाचार के निचे इर्ष्या और डाह की अग्नि छुप कर बेठी हो तो वह शिष्ठाचार का पर्दा वह गर्मी रोकने में असक्षम होगा ! बड़ी बड़ी राशियाँ लोग चंदे एवं दान में दे देते है, जितनी बड़ी रकम होती है लोग उसे उतना ही बड़ा दानी बना देते है, लेकिन वह दान जो बदले में सम्मान चाहता हो, किसी भवन पर अपना नाम लिखवाना चाहता हो अथवा प्रशस्ति पत्र की चाह रखता हो, वह तो दान की श्रेणी में ही नहीं आता ! वह तो मात्र सौदा ही हो सकता है ! नौकरी में घूसखोरी नहीं करने वाले को हम इमानदार कहते है, यह उसकी विशेषता अवश्य है की वह गलत तरीकों से धनार्जन नहीं कर रहा है ! परन्तु क्या ईमानदारी का क्षेत्र यही तक सिमित हो गया है ! वयव्हार में कितनी पवित्रता है, कितनी निर्मलता है इसी से सच्चा मूल्यांकन हो सकता है ! ईमानदारी को आर्थिक पहलु पर ही क्यों लटकाकर छोड़ दिया जाये ! ईमानदारी हमारे जीवन के सिद्धांतो के प्रति क्यों नहीं ! इमानदारी पूर्वक हम हमारे उत्तरदायित्वों का निर्वहन क्यों नहीं करे !

Dec 16, 2012

सारंगखेडा अश्वमेला : चेतक और कृष्णा के नाम से दिए जायेंगे पुरस्कार ......


गुजरात की सीमा से महज 100 कि .मी . के दुरी पर शहादा --धुले रोड पर महाराष्ट्र में सुर्यकन्या तापी नदी के किनारे बसा सारंगखेडा गाव जो कभी रावल परिवार की जागीर का स्थल था , अपने शानदार अश्व-मेला की वजह से विश्व-प्रसिद्ध है। प्राचीन समय से यहाँ भगवन एकमुखी दत्त जी का मंदिर है। श्री दत्त जयंती के पावन अवसर पर यहाँ बहुत ही सुंदर मेले का आयोजन होता आया है। विभिन्न नस्लों के घोड़ों के लिए यह मेला दुनिया भर में मशहूर है। प्राचीन समय से भारत वर्ष के राजा-महाराजा; रथी -महारथी यहाँ अपने मन-पसंद घोड़ों की खरीद के लिए आते-जाते रहे है। आज भी देश के विभिन्न प्रान्तों से घोड़ों के व्यापारी यहाँ आते है। आनेवाली 27 दिसम्बर के दिन यात्रारंभ होगा। हर रोज लाखो श्रद्धालु भगवान दत्त जी के मंदिर में दर्शन करते है और यात्रा का आनंद भी लेते है। विभिन्न राजनेता, उद्योजक, फ़िल्मी हस्तिया यहाँ घोड़े खरीदने आते-जाते रहते है। इस साल भी अभिनेता शक्ति कपूर , लावणी सम्राज्ञी सुरेखा पुणेकर, ईशा और अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी यहाँ महोत्सव में उपस्थिति दर्ज करने पधार रहे है। इस मेले में कृषि प्रदर्शनी; कृषि मेला; बैल-बाजार; लोककला महोत्सव; लावणी महोत्सव तथा अश्व स्पर्धा आदि का आयोजन होता है।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी का घोडा "चेतक" तथा छत्रपति शिवाजी महाराज जी घोड़ी "कृष्णा" इतिहास में प्रसिद्ध है। महाराणा प्रतापसिंह जी के जीवन में चेतक घोड़े का साथ महत्वपूर्ण रहा था। कृष्णा घोड़ी ने भी छत्रपति शिवाजी महाराज के संघर्ष के काल में अभूतपूर्व योगदान दिया था। चेतक और कृष्णा के नाम से इस साल सारंगखेडा मेले में पुरस्कार दिए जायेंगे। दौड़ में सर्वप्रथम आनेवाले अश्व को चेतक पुरस्कार--11000 रु की नगद राशी .- चेतक स्मृति चिन्ह और रोबीले पण में सर्वप्रथम आनेवाले अश्व को कृष्णा पुरस्कार--11000 रु . की नगद राशी --कृष्णा स्मृतिचिन्ह प्रदान किया जायेगा। इस मेले में दोंडाईचा संस्थान के कुंवर विक्रांत सिंह जी रावल जी के अश्व -विकास केंद्र के घोड़े भी मौजूद रहते है। जिनमे फैला-बेला नाम की सिर्फ 2.5 फिट ऊँची घोड़ों की प्रजाति ख़ास आकर्षण का केंद्र रहेगी। सारंगखेडा के भूतपूर्व संस्थानिक तथा वर्तमान उपाध्यक्ष (जि .प .नंदुरबार) श्री जयपालसिंह रावल साहब तथा सरपंच श्री चंद्रपालसिंह रावल के मार्गदर्शन में इस मेले की सफलता के लिए स्थानीय पदाधिकारीगन प्रयत्नरत है।

इस अभूतपूर्व अश्व मेले के बारे में अधिक जानकारी के लिए क्लिक करे:



करणी सेना संयोजक श्याम प्रताप सिंह राठौड़ का दिल्ली दौरा

13 जनवरी 2013 को जयपुर के अमरूदों के बाग़ में श्री राजपूत करणी सेना द्वारा आयोजित राजपूत स्वाभिमान सम्मलेन को सफल बनाने के लिए व अन्य सामाजिक मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए करणी सेना के संयोजक श्याम प्रताप सिंह ने कल दिल्ली का दौरा किया| दिल्ली में उन्होंने विभिन्न राजनैतिक दलों के राजपूत नेताओं से मुलाक़ात की|
श्याम प्रताप सिंह राठौड़ के अनुसार -

दिल्ली की यात्रा बेहद सकारात्मक रही , भा ज पा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह जी से उनके लोकसभा क्षेत्र गाज़ियाबाद में मुलाकात हुई . समाज के विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई तथा करणी सेना की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा की युवा वर्ग को सामाजिक भावना के साथ जोड़ने का बहुत अच्छा काम करणी सेना कर रही है . साथ ही करणी सेना के आगामी कार्यक्रम में पधारने की बात भी कही , भाजपा युवा नेता राजेंद्र सिंह जी सुरपुरा ने राजनीति में युवाओ के मार्गदर्शन की बात उनके सामने रखी | देश के पूर्व प्रधानमंत्री व युग पुरुष कल्याण सिंह जी कालवी के घनिष्ठ श्री चंद्रशेखर जी के पुत्र श्री नीरज शेखर (सांसद) से भी मिलना हुआ | स्व. कालवी से जुडी अनेक यादो को ताजा करते हुए उन्होंने राजस्थान में राजपूतो की वर्तमान स्थिति पर भी चर्चा की तथा करणी सेना की कार्यशेली व कार्यक्षेत्र की जानकारी प्राप्त की !

जोधपुर की बेटी व देश की कला व संस्क्रती मंत्री श्रीमती चंद्रेश कुमारी जी के निवास पर उनके पुत्र श्री ऐश्वर्य सिंह से भेंट हुई , बेहद ही अपनत्व से मिलते हुए उन्होंने अनके विषयों पर बात की , उन्होंने कहा की समाज में एक जागरूकता आन्दोलन की आवश्यकता है , जिसमे समाज व मुख्य रूप से क्षत्राणियो को लोकतंत्र में वोट के महत्व को समझाते हुए वोट कास्ट के लिए प्रेरित करे|

निज़ाम बदलने के लिए युवाओ को आना होगा आगे ...


हर तरफ यही हंगामा चलो चलो चलो .... कहा चले कब तक चलते रहे यूँही बिना वजह ????


पिछले 10 वर्षो में जगह जगह आयोजित सामाजिक कार्यकर्मो में 10 लाख से अधिक की तादात में राजपूत कौम कई तथाकथित ठेकेदारों के सानिध्य में एकत्रित हो चुकी है ! मेरे हिसाब से हर राजपूत का
इन सामाजिक समारोहों में शामिल होने पर एवरेज 500/- (प्रति राजपूत) का खर्चा तो हुआ ही है !
इस हिसाब से 10,00,000 X 500 = 50,00,00000 /- ( पचास करोड़ रु ) इन भव्य आयोजनों पर उड़ाकर इन ठेकेदारों ने समाज को क्या दिया ? उन्नति या अवनति यह आकलन करने का समय है ! क्या यह रुपया समाज को मिलने वाले किसी सरकारी आर्थिक पैकेज से कमतर था ?? क्या इन आयोजनों ने किसी आम राजपूत का हित साधने का किंचित मात्र भी प्रयास किया है ? या अपनी राजनैतिक दुकाने बचाने में आम राजपूत की उर्जा का महज इस्तेमाल करना ही ऐसे आयोजनों का मंतव्य रहा है ? समझ से परे है !!!
 मै आप सभी समाज बंधुओं से जरुर जानना चाहता हूँ की क्या ऐसे ही किसी राजनैतिक कम सामाजिक कार्यकर्मो का आयोजन समाज का भला कर देंगे ? क्या हम किसी भी संघटन के यह कहने मात्र से कही भी चले जायेंगे की """ यह प्रजातंत्र है, सर गिनवाने है, कटवाने की जरुरत नहीं है""

हम आम लोग कब ये बताने का साहस जुटा पायेंगे की हमने लाखो की तादात में सर गिनवाए है विगत 10 वर्षो में, तो फिर सर गिनवाने से होने वाला फायदा कोन खा गया ? या फायदे के नाम पर हमें अब तक क्यों बेवकूफ बनाया जा रहा है ? अरे हम आम लोग है हमारा फ़ायदा नहीं कर सकते तो कम से कम मत करो लेकिन हमारे ''' बच्चो का भविष्य बेचकर ''' आपके बच्चो का भविष्य निर्माण ''' तो किसी कीमत पर नहीं होने देंगे !!

Dec 6, 2012

‘‘हिन्दुस्थान री बडी मरजाद राखी‘‘ (रावल कान्हड़देव चैहान)

 अलाउद्दीन ने सभी हिन्दु राज्यों को समाप्त करने की नीति बनाई थी तथा वह हिन्दुओं को गुलामों के समान कर देना चाहता था। 1298 ई. में उसने सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने के लिए गुजरात पर चढ़ाई की और वहाँ मन्दिर तोड़कर, सोना लूटकर हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाकर अपने साथ दिल्ली ले जाने लगा। मार्ग में जालौर राज्य की सीमा में जालौर से 18 मील दूर सकराना गाँव तक उसकी सेना आ पहुँची । सेना के साथ उलूग खाँ सेनापति था। यह देख रावल कान्हड़देव ने अपने मुख्य सामन्त जैत्र देवड़ा को उसके पास भेजा और कहलाया कि तुमने इतनी बड़ी संख्या में हिन्दुओं की हत्या करके मेरे राज्य में आकर ठीक नही किया है, क्या मुझे तुमने राजपूत नही जाना ? इस संदेष के बहाने जैत्र देवड़ा ने मुसलमानों के पडाव की जानकारी ली और पाया कि गुजरात लूट को प्राप्त करने के लिए बहुत से नव मुसलमानों में असंतोष है। जैत्र देवड़ा ने उनमें मुख्य मुहम्मदशाह को अपनी ओर आने का संकेत कर दिया और जालौर लौटा। जालौर से हिन्दुत्व की रक्षार्थ एक जबरदस्त राजपूत सेना ने जैत्र देवड़ा के नेतृत्व में मुसलमानों पर धावा बोला। घमासान यु़द्ध हुआ और शत्रु का कमाण्डर मलिक आईजुद्दीन मारा गया। इसके साथ-साथ अलाउद्दीन खिलजी का भतीजा भी इस युद्ध में मारा गया। हिन्दू वीरों का प्रहार ऐसा तीव्र था कि मुस्लिम सेनापति उलूग खां बाल-बाल बचा। इस प्रकार इन भारतीय सपूतों ने हजारों हिन्दुओं को मुक्त कराया और भगवान सोमनाथ की मूर्ति को छुड़ाकर जालौर ले आए। भारी संख्या में मुसलमान काम आए। इस अप्रत्याषित घटना से मुसलमान भाग निकले और अगले 5 वर्ष तक उन्होंने इधर देखा तक नही। 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाणा के दुर्ग को जा घेरा। वहाँ के रावल शीतल देव जालोर के रावल कर्णदेव के भतीजे थे। इस घेरे में मुसलमानों के दो कमाण्डर जिनमें एक का नाम नाहर मलिक था काम आया। अन्त में 1310 ई. में अलाउद्दीन स्वयं विषाल सेना के साथ सिवाणा के घेरे में शामिल हुआ और उसको सफला मिली।

सिवाणा के पराभव के पष्चात भी जालोर के रावल कान्हड़देव ने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार नही की। उस परम भट्टारक हिन्दू नरेष के ऐसे साहस और गौरव को देख सुल्तान अलाउद्दीन ने जालोर विजय करने का निष्चय किया और सेना को निर्देष देकर दिल्ली चला गया। अब मुस्लिम सेना ने बाड़मेर पर आक्रमण किया और भगवान महावीर स्वामी के सुन्दर और भव्य मन्दिर को तोडा। वहाँ से मुसलमानों ने भीनमाल को आग लगा दी। भीनमाल चैहान राजपूतों की ब्रह्मपुरी थी। जहाँ 45 हजार बाह्ममण श्रीमाली वेद पाठन का महान् राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा करते थे। हजारों ब्राह्मणों को बन्दी बनाया और उन्हे मारवाड़ से ले जाया जाने लगा। यह सब मुसलमानों ने रावल कान्हड़देव के हिन्दू गौरव को तोड़ने के लिए घृणित काम किया। राजपूतों ने राष्ट्रीय पराभाव के इन दिनों में अपना कर्तव्य निभाया और ब्राह्मणों को मुक्त करने के लिए निकल पडे़। रावल कान्हड़देव ने 36 कुलों के राजपूतों को इस देष रक्षा के लिए बुलाया था। वे क्षत्रिय गौ-रक्षा ब्राह्मण प्रतिपाल थे अर्थात् राष्ट्र के धन और विद्धानों की रक्षा और पालना के लिए उत्तरदायी थे। रावल के बुलावे पर सोंलकी, राठौड़, परमार, चावड़ा, डोडिया, यादव और गोहिल आदि सभी आए। इन सभी ने गाँव खुडाला पर जबरदस्त धावा करके बाह्मणों को मुक्त कराया और तत्काल लौट गए। उस दिन अमावस्या थी इस कारण साल्हा, सोभित लाखण और अजयसिंह 4000 सेना के साथ तालाब पर स्नान करने रूके और उस समय अचानक मुसलमानों ने उन पर दूसरा आक्रमण किया। ये लोग 4000 थे अतः सभी वहाँ काम आए।

लाखण ने जो शोर्य और पराक्रम किया उसके कारण मरने पर मुसलमानों ने उनके शव की वन्दना की। इस घटना के बाद दिल्ली से और सेना आई और मुसलमानों ने जालौर दुर्ग को घेरा। रावल कान्हड़देव ने अब राजकुमार वीरम और अपने भाई मालदेव को जालौर बुला लिया। उन्होनें अपनी सेना के 8 भाग लिए और युवराज वीरम और मालदेव तथा सामान्त अणत सिसौदिया, जैन, बाघेला, जैत देवड़ा लूणकरण, माल्हण, सोभित देवड़ा और सहजपाल को कमाण्ड़र बनाया और मुस्लिम सेना दुर्ग पर चढ़ने या आक्रमण करने में असफल रही। अतः उसने दुर्ग से एक प्रबल धावा किया गया जिससे मुस्लिम चैकी उदलपुर जो जालौर के पास थी को समाप्त कर दिया गया। दुर्ग में अन्न और जल की कमी होने लगी। तभी बरसात हुई और दुर्ग में पानी पूरा हो गया। महाजनों ने अपने अन्न भण्डार खोल दिये। यह रावल के प्रति जनता का प्रेम था परन्तु शत्रु किसी प्रकार से भी कुछ देषद्रोही खोज ही निकालता है। बीका दहिया ऐसा ही देषद्रोही था उसने रात को मुसलमानों को एक गुप्त से दुर्ग में प्रवेष करा दिया। उसे जालौर दुर्ग प्राप्त होने का प्रलोभन दिया गया था। परन्तु उस देषद्रोही को तत्काल दण्ड दिया उसी की देष भक्त धर्म पत्नी वीरांगना हीरा देवी ने बीका की तत्काल हत्या की दी और रावल को जाकस सूचना कर दी। अब दुर्ग की रक्षा कठिन थी अतः महारानी ने जौहर की तैयारी की।

गढरी परधी घेर, बैरी रा घेरा पड़या।
सत्यां काली रात ने, जौहर सूं चनण करी।।


महारानी के साथ हजारों हिन्दू सती नारियों ने अपना जीवन अग्नि को सौप दिया। रावल कान्हड़देव की रानियां-उमादे कँवलदे, जैतल दे, भवलदे, ने अग्नि प्रवेष किया। इस प्रकार वैषाख शुक्ला पंचमी सम्वत् 1368 (1311 ई.) को उत्तरी भारत का सर्व शक्तिषाली हिन्दू-राज्य समाप्त हो गया। जनमानस में जो श्रद्धा और प्रेम तथा विष्वास रावल कान्हड़देव को प्राप्त था उसका अनुमान इसी से लगाया जाता है कि लोगों नें उन्हे अमर माना और यही कहा कि दुर्ग पतन के बाद अन्र्तध्यान हो गए थे। उनके बाद भी युवराज वीरम ने मुसलमानों से तीन दिन तक युद्ध किया और काम आये|

संसार के इतिहास में केवल भारत में ही जौहर की परम्परा रही है। यह पवित्रता ही वह गुण है जिसके कारण भारतीय नारी जग पूजित है। राजस्थान का इतिहास जौहर की घटनाओं से परिपूर्ण है। इस उत्सर्ग से भारत की गरिमा के बहुत वृद्धि हुई और यह सदा प्रेरणादायी रहेगा। जालौर के निष्चय हो जाने के पश्चात् वीर हिन्दू नारियाँ स्नान कर, पूजा करती थी और तुलसी दल की माला पहनती थी। वे पूरा श्रृंगार करती थी और महारानी की अगुआई में चिता में प्रवेष करती थी। ऐसी नारियों के बल पर ही भारत की रक्षा सम्भव हो सकी थी|

सौजन्य: अनिरूध सिंह सोहनगढ़

Dec 1, 2012

विधवा-विवाह और क्षत्राणी

कुँवरानी निशा कँवर
आजकल कुछ लोग हीन भावना से इतने ग्रषित है कि दुसरे वर्ग या वर्ण के समाजों के पैमाने से क्षत्रिय समाज की परम्पराओं ,मान्यताओं ,कर्त्यव निष्ठां ,धर्म पालन,यहाँ तक की क्षात्र धर्म की आधार शिला एवं क्षात्र धर्म की जननी परिवार एवं वैवाहिक संस्था तक को आधुनिकता,नारी के सामान अधिकारों के नाम पर विधवा हित चिन्तक बनकर क्षत्राणी को भी अबला,निस्सहाय,आदि शब्द देकर उसे अन्य समाजो के पैमानों पर कशने का दु :साहस कर रहे है,,,,,,, वे तथाकथित हित चिन्तक मुझे कुछ सावों का जवाब देने का कष्ट करें ,

1)सर्व प्रथम मुझे बताये कि किसी विधवा क्षत्राणी के पूर्ण अधिकार जिसकी वह है अधिकारिणी है नये पतिदेव प्रदान करेंगे ????? यानि अपने मृत पति का श्राद्ध कर्म करने का अधिकार उसे मिलेगा ?????

2)क्या वह क्षत्राणी अपने पूर्व सास श्वसुर की सेवा करने के लिए स्वतन्त्र होगी ??????

3) पुनर्विवाह किस उम्र तक की क्षत्राणी को करना चाहिए ??????

4)किस विधवा को पुनर्विवाह करने की छूट होगी ,,,,,????????मतलब आर्थिक रूप से कमजोर या संतानहीन या 1 बच्चे की माँ ,2बच्चे की माँ या फिर वृद्धावस्था में जब बच्चे भी ठुकरा दे ?????
v 5)यदि विधवा का विवाह केवल इस आधार पर करने की वकालत की जारही हो कि "सारी जवानी कैसे कटेगी ?" तो उनके बारे में क्या व्यवस्था की जारही जो जीवित रह कर भी सूर्यास्त होते ही मदिरा की गोद में चले जाते है उनकी पत्नियों को भी यह आजादी मिलेगी ????? या फिर वर्ष के 10 माह राष्ट्र की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात है क्या उनकी पत्नियों को भी अस्थायी विवाह करने यह आजादी मिलेगी ?????

6)अन्य समाजो के पैमाने लिए फिरने वालो ने इस बात पर गौर किया या नहीं कि विवाह के प्रारम्भ सभी को सामंजस्य में थोडा समय लगता है ,अतः जब अन्य समाजों में आये दिन पति को पत्निठुकरा रही है तब पुनर्विवाह चलन में होने पर यह बुराई हमारे समाज में भी एक भयावह रूप क्यों नहीं लेगी ??????

7)विधवा को एक देवी और तपस्विनी की तरह सम्मान मिलने की स्थिति में पुनर्विवाह से अधिक सक्षम और समर्थ क्षत्राणी(राजमाता कुन्ती ) क्यों स्वीकार नहीं है आपको ??????

कुछ लोग फरमा रहे है कि हमने हर तर्क के लिए नोट बना रखे है ,आलेख लिख रखे है,,,,,,,,,,,,,,,उनके लिए रही बात नोटया आलेखों की, तो बना हुकुम,एक ही चीज को बार बार लिखने के बजाये ,,,,उसे लिख कर रख लिया जाये तो क्या ,,,,,,,,,,बुराई है ,,,,,,एक पत्निवृतियो से भी क्षत्रिय समाज भरा पड़ा ,,,,महाराज हरिचन्द्र जी स्वयं सर्वश्रेष्ट क्षत्रिय श्री राम ,राजर्षि मधुसुधन दास जी महाराज जैसे आज भी हजारो क्षत्रिय है ,,,,,,,,यहाँ फेस बुक के बजाये कोई शंका या वाद्विवाद है आमने सामने बैठकर होसकता है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मै क्षत्राणी और सिर्फ क्षत्राणी की ही बात ज्यादा कर सकती हूँ ,,,,,मै ऐसे किसी तर्क से सहमत नहीं जो क्षत्राणी को अबला,बेचारी,निस्सहाय ,या अकेले सतीत्व की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध करने का प्रयास करे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,यदि कोई यह कहता या सोचता हो कि केवल पति के कारण क्षत्राणी अपने सतीत्व की रक्षा कर सकती है तो यह उसका बहम है इसे वह आज और अभी अपने जेहन निकाल दे,क्योंकि संसार का कोई व्यक्ति युधिष्ठर ,भीम,अर्जुन,नकुल और सहदेव की सयुंक्त शक्ति से अधिक शक्तिशाली नहीं होसकता ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,फिरभी द्रौपदी की लाज बचाने में सफल नहीं होपाये ,द्रौपदी के सतीत्व की रक्षा उसके स्वयं के तेज़ ने की ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,श्री राम से बड़ा कोई योद्धा नहीं किन्तु फिरभी माता सीता के ऊपर रावण ने कुदृष्टि की ,,,,,,,,,,,,और माता सीता के तेज़ से ही उनके सतीत्व की रक्षा हुयी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,रही बात आजके युग की सोनिया गाँधी के पीहर और ससुराल दोनों कुलों में विधवा विवाह पर कोई रोकटोक नहीं फिर वह क्या इस बात का उदाहरन पर्याप्त नहीं कि नारी यदि सक्षम है तो उसे विधवा विवाह की कोई जरुरत नहीं

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,क्या क्षत्राणी इस सोनिया के बराबर भी सक्षम नहीं बन सकती ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,फिर धिक्कार है ऐसे क्षत्रित्व पर ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आज आवश्यकता है राजपूत कन्याओ को सक्षम,समर्थ बनाया जाये उन्हें इतना समर्थ और सक्षम बना दिया जाये की स्वयं धर्म् न्याय और समाज उसकी ओर ताके ,न कि क्षत्राणी किसी आसरे की खोज करती फिरे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,क्षत्राणी कोई गाय नहीं है कि उसे खूंटा उखड जाने पर दुसरे ,तीसरे पर बाँधते फिरे ,,,,,,,,,,,जिनमे क्षत्रित्व नहीं वे पति के मरने का भी क्यों इंतजार करे,,,,,,,,,नहीं पसंद आरहा तो क्या जरुरत है सामंजस्य की ,,,,,,,,,,,,,,,,,,उसके जीते जी करो दूसरा ,तीसरा ,,,,हम सिर्फ और सिर्फ क्षात्र धर्म पालकों की बात कर रहें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,जो सामाजिक,धार्मिक वर्जनाओ को नहीं मानना चाहते ,,,,उन्हें कोई नहीं रोक रहा ,,,,,,,,,,,,,,
"जय क्षात्र धर्म "
कुँवरानी निशा कँवर
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति