Jan 31, 2013

"आज का क्षत्रिय"


कब तक दिल में सोले लिए फिरते रहोगे बेगाने से,
अब तो कहीं आग लगाओ तो कोई बात बने।

बिगड़े हालात समाज के भला कैसे यूँ सुधरेंगे यहाँ,
ऐसा कुछ हो कि ज़िंदगी के इरादे हों अटूट । 

सब्र के बाँध का कब तक  इम्तेहान दोगे,
अब दुआ करो कि हर गम की खुशियों से ठने।


छोड़ दो देखना अब सुनहरे कल का सपना खुली आखो से, 
आँख खोल के देख यहाँ कानून बनाने वाले सब बिके मिलेगे।

हे वीर तू फिर से अपना कानून बना और अपनी सता 
आज तू इज़्ज़त को बचा और ज़िन्दगी को भूल जा।

आज फिर रूहों को मसलकर वो सियासत निभा रहे,
हे क्षत्रिय तुम ही इस फटी-सी सियासत को सीलो।

आज वो हिन्दुवा सूरज कहीं छुप गया शायद,
अब तू निकल आ... जहाँ तेरे तेज का प्यासा है।





"गजेन्द्र सिंह रायधना" 



Jan 28, 2013

"खम्मा घणी "

आजकल राजपूत समाज में अभिवादन का एक स्वरुप बहुत प्रचलित हो रहा है,"खम्मा घणी" जबकि हमारे समाज में ये अभिवादन कभी नहीं था| हमारे समाज के अभिजात्य वर्ग,यथा राजा,व जागीरदारों ने आम राजपूत से अपने आप को प्रथक प्रदर्शित करने के प्रयोजन से गुलामी के इस शब्द को अपना लिया, जिसका शाब्दिक अर्थ स्वयं उनको ज्ञात नहीं है।

खम्मा घणी का शाब्दिक तात्पर्य निम्नानुसार है,,,,खम्मा = क्षमा, घणी = बहुत अधिक। हमारी क्षत्रिय संस्कृति में प्रारम्भ से ही बड़ो के सामने बोलने से पूर्व अनुमति लेने का रिवाज रहा है, इसी कड़ी में जब राजाओं महाराजाओं के समक्ष उनकी सेवक जाति के प्रतिनिधि जब कुछ निवेदन करना चाहते थे तो वे बोलने से पहले क्षमा का निवेदन सम्मान के स्वरुप में करते थे, क्षमा का अपभ्रंश ही खम्मा है| जैसे ब्रिटिश शासन में लार्ड साहब को लाट साहब कहा जाने लगा था।

हमारे पूर्वज अपने अभिवादन में अपने कुल देवी देवताओ का स्मरण करते थे, जैसे - जय चार भुजा की, जय माता जी की, जय गोपी नाथ जी की, जय एक लिंग जी की इत्यादि। इन अभिवादनो से क्षत्रियो का इष्ट प्रबल होता था। आज इनको त्यागने से हमारा इष्ट हमसे रुष्ट है, यही हमारे विनाश का प्रमुख कारण है।

आयुवान सिंह हुडील स्मृति संस्थान के कार्य कर्ता इस अभिवादन का प्रयोग नहीं करते। श्रधये देवी सिंह जी महार, व सवाई सिंह जी धमोरा इस अभिवादन का प्रबल विरोध करते है। आज हमारा किताबी ज्ञान इतना सतही है कि हम विजातीय तत्वों के प्रभाव में आ कर आपने बुजुर्गो की बात को दरकिनार कर देते है। जबकि हमारी जड़े बहुत मजबूत है पर हम स्वयं उन्हें काट रहे है।

Jan 26, 2013

गणतंत्र दिवस पर भी गूंजा मेट्रो रेल द्वारा विस्थापित महाराणा प्रताप प्रतिमा मुद्दा

फरीदाबाद : राजकुल सांस्कृतिक समाज द्वारा गणतंत्र दिवस के मौके पर सेक्टर आठ स्थित महाराणा प्रताप भवन में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया| कार्यक्रम की शुरुआत समारोह के मुख्य अतिथि पीपुल्स फॉर एनिमल्स के नेता और फरीदाबाद के प्रतिष्ठित समाजसेवी मनधीर सिंह मान द्वारा झंडा रोहण करने के बाद नन्हें मुन्ने स्कूली छात्रों द्वारा राष्ट्रगान के साथ किया गया|

संस्थान के अध्यक्ष श्रीराम रावत ने अपने उद्बोधन में समारोह में आये अतिथियों का स्वागत करते हुए गणतंत्र दिवस पर सभी को शुभकामनाएँ प्रेषित की| निगम पार्षद कुलदीप तेवतिया ने महाराणा प्रताप भवन के पास मुख्य मार्ग का नामकरण निगम द्वारा महाराणा प्रताप के नाम करवाने का वादा करने के साथ ही समाज के लोगों से कहा कि आप चाहे तो अभी से इस मार्ग पर महाराणा प्रताप के नाम का नामपट्ट लगवा सकते है वे निगम की अगली बैठक में मार्ग का नामकरण व फरीदाबाद में महाराणा की प्रतिमा लगवाने का प्रस्ताव पास करवा देंगे|

पार्षद जगन डागर ने भी अपने उद्बोधन में महाराणा के व्यक्तित्व को चमत्कारी बताते हुए उनसे प्रेरणा लेने पर बल दिया साथ ही कहा कि महाराणा प्रताप के नाम पर बनने वाले किसी भी भवन व स्मारक में वे दिल खोलकर आर्थिक व अन्य मदद करेंगे| इस अवसर पर प्रदीप राणा व हुकुम सिंह भाटी ने भी अपने संबोधन में सभी आगुन्तकों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ दी|

समारोह के मुख्य अतिथि मनधीर सिंह मान ने अपने उद्बोधन में कहा कि वे आज ऐसे समाज के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गौरव महसूस कर रहे है जिस समाज ने समाज की छतीस बिरादरियों का वर्षों तक सफल नेतृत्व किया और आज भी इसमें सबल है| श्री मान ने फरीदाबाद के राजपूत समुदाय के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने व समुदाय के किसी भी कार्य के लिए हर वक्त तत्पर रहने का वादा किया|

संस्थान के पदाधिकारी व मंच संचालक श्याम सिंह तंवर ने कार्यक्रम में दिल्ली मेट्रो रेल द्वारा कश्मीरी गेट स्थित महाराणा प्रताप की प्रतिमा हटाने का मुद्दा उठाते हुए मेट्रो द्वारा किये गए गैरजिम्मेदाना पूर्ण कार्य के प्रति रोष जताया| साथ ही मेट्रो रेल प्रशासन से महाराणा की प्रतिमा जल्द से जल्द पुन:स्थापित करने की मांग की|

समारोह में रंगारंग नृत्य व संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले छात्रों को संस्थान व मुख्य अतिथि द्वारा पारितोषिक वितरण भी किया गया|

आखिर में महाराणा प्रताप भवन के अधूरे पड़े निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए मुख्य अतिथि मनधीर सिंह मान के साथ ही पार्षद जगन डागर व समाजसेवी प्रदीप राणा ने एक एक लाख रूपये की आर्थिक सहायता दी|

समारोह की खास बात यह रही कि राजपूत समाज व राजपूत संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वाले श्री मान के अलावा मुख्य वक्ता पार्षद जगन डागर व पार्षद कुलदीप तेवतिया जाट समुदाय से थे अत: यह समारोह सामाजिक समरसता का एक शानदार व अनूठा उदाहरण रहा| अन्य जातिय संगठनों को भी इस तरह के सामाजिक समरसता वाले आयोजन करने की इस समारोह से प्रेरणा लेनी चाहिए|

Jan 25, 2013

दलित उत्थान के पोषक रहे है राजपूत.

जय चार भुजा की सा,
राजपूत जाति के गौरवशाली अतीत पर प्रत्येक राजपूत को गर्व होना चाहिये, जैसा की मुझे भी है पर दुर्भाग्यवश हम हमारी मूल संस्कृति में अनेक विकृतियों का समावेश कर उसे बिगाड़ रहे है. भारत व राजपूत विरोधी कुछ षडयंत्रकारी इतिहासकारों द्वारा रचे गए षडयन्त्रो में फंस कर हम भी ऐसे भटके है कि हमें सही व गलत का भी ज्ञान नहीं रहा है पर इसका सारा दोष हम दूसरो पर ही नहीं मंढ सकते क्योंकि कमी हम में भी है, जो हम हर किसी के पिछलग्गू बन कर अपनी मौलिकता गवां रहे है.हमने अद्ययन करना तो बिलकुल त्याग रखा है,वरना इतनी भयानक स्थितियां उत्तपन्न नहीं होती. संघर्ष करने की क्षमता और विचार अध्ययन और मनन से ही पैदा होते है.आज धीरे-धीरे राजपूत अपने मूल साहित्य व संस्कृति से कोसों दूर हो रहा है. हमने अपने चारो और "रोयल्टी" का एक ऐसा बनावटी आवरण तैयार कर लिया है कि प्रजातंत्र में आम जन हमसे कटा-कटा सा रहने लगा है|

इसी का राजनीतिक दुष्परिणाम हमें भुगतना पड रहा है. मेरा दृढ विश्वास है कि जिस भी किसी राजपूत ने एक मात्र यदि राजपूत समाज की गीता श्री आयुवान सिंह हुडील द्वारा लिखी "राजपूत और भविष्य" को भी पढ़ा हो, तो वह आपके क्षत्रिय संस्कार,विचार व सभ्यता से विमुख नहीं हो सकता. ज्ञात रहे की हम भ्रम वश जिस बनावटी राजपूती गौरव की नक़ल कर रहे है,वह हमारी संस्कृति नहीं बल्कि राजाओं और जागीरदारों द्वारा अंग्रेजो की दासता में अपनाई गयी गलत चीजे है. आज से ५-७ साल पहले तक जय माता जी की, जय गोपीनाथ जी की, जय एक लिंग जी की कर अपने ईष्ट को याद करने वाला आम राजपूत आज कल दासता का परिचायक "खम्मा घणी" करने लगा है, यह संबोधन हमारे पूर्वज कभी नहीं किया करते थे.अंग्रेजो द्वारा पोलो खेलते समय पहने जाने वाली पतलून "बिर्जेश" व पोलो जैसे खेल कब से हमारी सभ्यता का अंग बन गए ? आश्चर्य जनक है !

हमारे पूर्वज तो जनता के दास हुवा करते थे जब से हम सिहं बने है,तब से निरंतर पतन की और अग्रसर है.अज्ञानी राजपूतों को पता होना चाहिए कि श्री राम ने शबरी के जूठे बैर क्यों खाए थे ? व बन्दर भालुओ की तरह जीवन व्यतीत करने वाले दलितों को क्यों साथ लिया था?, गौत्तम बुद्ध,महावीर स्वामी,बाबा रामदेव,जम्भो जी आदी ने दलितों को गले लगा कर ही समाज में क्षत्रियो की स्वकारीता को स्थापित किया था. वी. पी. सिंह.अर्जुन सिंह ने अपने पूर्वजो की महान परंपरा को ही आगे बढाया है और हमें उनपर गर्व होना चाहिये. प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप ने भी भीलो व गरासियो को साथ लिया था,यहाँ तक की मेवाड़ के राज चिन्ह में भी भीलो को स्थान दिया गया था.अतः स्पष्ट है की राजपूत ने सर्व समाज को साथ लेकर ही शासन किया था|

दलित उत्थान की बड़ी-बड़ी बात करने वालो को पता होना चाहिये कि राजपूतों से बढकर किसी कौम ने दलित उत्थान के सामूहिक प्रयास किये हो तो बताये.अंत में विनम्र निवेदन है की महान राजपूत इतिहास,सभ्यता और संस्कृति का मुझे भी गर्व है पर जिस विकृत संस्कृति के पीछे हम भाग रहे है,वह चिंताजनक है.मध्य काल के पश्चात् जिन राजाओ व जागीरदारों के अदुर्दर्शिता पूर्ण निर्णयों व कर्मो का परीणाम आम राजपूत भूगत रहा है वह जरूर आज चर्चा का विषय होना चाहिये |