Jul 29, 2013

आह्वान

घणा दिन सोलियों रे...अब तो जाग राजपूत भायला
तू जाग ही जणा म्हारों सुत्योड़ों समाज जाग जवलों

कुभकर्ण की सी नींद मे सुत्या हो
परभाते अब तो जागो भायला

नुवो जमानों आज आवियों
देख निजर पसार भायला

सो सू आँग चाल्बा वाला
आज थे चालो सबसु लार

होड़ा होड़ी मे थे करलियों घर को नाश
थोड़ी तो मन मे बात विचारो भायला

पूरखा की थे रींता भुलग्या
थोड़ी तो लाज शर्म करो भायला

टिको टमको ओर डायजो थाने भायला
गरीबी की नाड़ी मे दुबाया छोड़ो लो

दारू छोड़ो ओर छोड़ो थे बन्नागिरि
माँ बेणा की कदर करो ओर करो खूब पढ़ाई भायला

जाग राजपूत भायला तू सिंघ रो सपूत मात थारी सिघनी
आज ना जागयों तो फेर कदे ही ना जाग्लों

"गजेन्द्र सिंह रायधना"
http://www.raydhana.in/

  
राजपूती ठाट !! ???

इस राजपूती ठाट ने ही तो हमे ठगा है ।
बरबाद हो गये हम जब से दारु का चस्का हमे लगा है॥

लाख टके का आदमी पी के एक टके का बन जाता है।
क्योकी पी दारु बेटा बाप के सामने ही तन जाता है॥

पीते ही दारु घूम जाती है यारो अपनी बुद्धि।
सँकल्प लो क्षत्रिय वीरो करनी होगी हमे समाज की शुद्धी॥

क्षत्रियो के लिये बने इस कलँक को अब छोङना होगा।
राजपूत तो शराबी होते है दुनिया के इस भ्रम को तोङना होगा॥

जिसने क्षत्रियोँ को छेङा उसे क्षत्रियो ने साबूत नही छोङा है।
फिर कैसे बच गई ये दारु जिसने क्षत्रियो की कमर को पुरी तरह से तोङा है॥

या तो क्षत्रिय कमजोर और कायर हो गये या दारु महान है।
वरना हम कैसे भूल गये की हम मर्यादापुरुषोतम राम की सन्तान है॥

सँकल्प लो क्षत्रियो शराब है खराब इसे हम छोङ देँगे।
अपनायेँगे मर्यादा को और दुनिया को राम राज्य की और मोङ देँगे॥

जय क्षात्र धर्म॥
जय क्षत्रिय॥
हरिनारायण सिँह राठौङ

Jul 22, 2013

उम्मेद सिंह करीरी श्री राजपूत युवा परिषद् ,राजस्थान के अध्यक्ष मनोनीत

उम्मेद सिंह करीरी
श्री राजपूत युवा परिषद् राजस्थान के संस्थापक सदस्यों की एक बैठक दिनांक २१-७-२०१३ को झोटवाड़ा जयपुर स्थित कार्यालय पर आयोजित की गयी जिसमें महावीर स्सिंह राठौड़, अजय सिंह नाथावत, मूल सिंह शेखावत, सुरेश सिंह राठौड़, उमराव सिंह कीनिया एवं अन्य सम्मानित सदस्य उपस्थित थे|
बैठक में परिषद् के भविष्य के संदर्भ में चर्चा करते हुए संगठित कर नया रूप देने पर विचार विमर्श करते हुए परिषद् की सामाजिक सक्रियता बढ़ाने तय किया गया| साथ संगठन के उद्देश्य क्षत्रिय समाज में प्रसारित कर निस्वार्थ भाव सामाजिक कार्य करने हेतु सभी सदस्यों से अनुरोध किया गया|

बैठक में संगठन की सामाजिक कार्यों में सक्रियता बढाने हेतु बेबाक वक्ता और सामाजिक कार्यों में हर वक्त अग्रणी रहने वाले झुझारू सामाजिक कर्ता उम्मेद सिंह करीरी को सर्व सम्मति से संगठन का प्रदेश का अध्यक्ष मनोनीत किया गया तथा अन्य पदों हेतु आगामी तीन माह में निर्वाचन द्वारा चयन किया जाना प्रस्तावित किया गया| साथ ही सदस्यता अभियान चलाकर ज्यादा से ज्यादा सदस्य बना संगठन का विस्तार करने का निर्णय लिया गया|



Jul 21, 2013

साइबर युद्धों का आगाज़

आज अपने एक फेसबूक फ्रेंड श्री बिक्रम सिंह जी से एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दे पे लगभग एक घंटे से भी ज्यादा समय  तक फोन पे बातचीत हुई । मुद्दा था जाटलेंड  वैबसाइट का, जिसमे  जाटों का ऐसा इतिहास लिखा गया है । उसके अनुसार  इतिहास मे  सिर्फ "जाट" ही थे "राजपूत" नामक समुदाय तो कहीं दूर दूर तक था ही नहीं । इस लेख के अंत मे आपको उस तथाकथित वेबसाइट का लिंक मुहैया करवाया जाएगा। हम मानते हैं की ऐसे उल्टा सीधा लिखने वाले हमारे आदिकाल से चले आ रहे अस्तित्व को नहीं मिटा पाएंगे लेकिन चिंता का विषय ये था की कल को आने वाली पीढ़ियाँ वही पढ़ेगी जो इंटरनेट पे उपलब्ध होगा , क्योकि उस वक़्त किताबों का अस्तितव भी  टेलीग्राम की तरह विलुप्त हो चुका होगा। आज जिस तरह चारों तरफ से इतिहास से  राजपूत शब्द को खुरचा जा रहा है उस से  इस शब्द का अस्तित्व  बहुत ही सीमित जान पड़ता है । जाटलेंड पे लिखे गए लेखों के आगे "जोधा-अकबर" का मुद्दा बौना लगता हैं।

 

उस वैबसाइट  के अनुसार तो राजपूतों की उत्पत्ति ही संदेहास्पद है। लेकिन जो भी हो जितनी चालाकी से और पूरे हास्यास्पद उदाहरण देकर जो लिखा गया है वो बहुत कुछ सोचने पे मजबूर करता है । आज तलवारों  से लड़े जाने वाले युद्धों का वक़्त गुजर चुका ये "साइबर युद्धों" का युग है ,इसलिए इसमे  भी हमे अपना अस्तित्व बनाए रखना होगा ,वरना  विलुप्तता बाहें फैलाएँ खड़ी है।  राजपूतों पे अक्सर "जातिवाद" का आरोप लगता रहा है लेकिन इतिहास गवाह है राजपूतों ने सदा गरीबों और मज़लूमों का साथ  दिया है। लेकिन आज जिस तरह राजपूतों के गौरवमयी इतिहास को दूषित करके उनको दुराचारी बताने की कोशिश की जा रही है  उससे निकट  भविष्य मे  परिणाम घातक हो सकते हैं ।

 

कथित वैबसाइट पे जारी लेखो से साफ विदित होता है की हमारे इतिहास से छेड़छाड़ करके उसे अपना बताकर रंगे सियार की कहानी को दोहराने की कोशिश की गई है।  लेकिन हमे अब इनको जवाब देना होगा और वो भी इन्ही के तरीके से। वैसे सब जानते है  राजपूत एक ऐसा समुदाय है जिसने बहुत बरसों तक राज किया, उनके महल किले आज भी देश के लगभग हर शहर मे मिल जाएंगे इसलिए हमे कोई सबूत देने की जरूरत नहीं , मगर आज के दौर मे बिना सबूत तो इंसान अपने आप को जिंदा भी नहीं बता सकता,सके लिए भी सबूत देना पड़ता है। इसलिए मजबूरीवश हमे जौहर और शाका साइबर के मैदान मे भी दोहराने होंगे और इन जातिवाद फैलाने वालों को उनकी औकात बतानी होगी।

 
-विक्रम
 

 

 

 

अखिल भारतीय राजपूत एकता मिशन द्वारा सेमीनार आयोजित

अखिल भारतीय राजपूत एकता मिशन फरीदाबाद द्वारा आज हरियाणा टूरिज्म के होटल मैगपाई में "क्षत्रिय इतिहास तथा वर्तमान परिपेक्ष में क्षत्रियों की आर्थिक,सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति" पर चर्चाहेतु सेमीनार का आयोजन किया गया| सेमीनार की अध्यक्षता मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित और देश विदेश में वाटरमेन के नाम से प्रसिद्ध राजेंद्र सिंह जी ने की|
सेमीनार में अध्यक्ष राजेंद्र सिंह जी के अलावा पूर्व आई.ए.एस हुक्म सिंह राणा, पूर्व पार्षद नीरा तोमर, इतिहासविद डा. भगवान सिंह, शिक्षाविद ड़ा. नागेन्द्र पी.डी. सिंह, प्रोफ़ेसर आर.एन सिंह, रेडियंस मीडिया के सीईओ अजीत कुमार, ड़ा. मेजर हिमांशु सिंह, क्षत्रिय युवक संघ के अलवर से आये बजरंग सिंह द्वारा इस संबंध में विचार रखने के अलावा युवा वक्ता आनंद सिंह ने अपने जोशीले शब्दों से संबोधित किया|
इस अवसर पर एकता मिशन संगठन के अध्यक्ष एस.के. सिंह ने संस्था के उद्देश्यों व कार्यों पर बोलते हुए स्लाइड शो के साथ विस्तृत रूप से प्रकाश डाला|
सेमीनार में आये विशिष्ठ अतिथियों को सामाजिक कार्यकर्त्ता रतन सिंह शेखावत ने राजपूत समाज के लिए गीता माने जाने वाली स्व.आयुवान सिंह शेखावत द्वारा लिखित पुस्तक राजपूत और भविष्य भेंट की गई|
 
वाटरमेन राजेंद्र सिंह अपने विचार रखते हुए


Jul 17, 2013

वीर मुकंद दास खींची पर डाक टिकट जारी करने व जोधपुर में प्रतिमा लगाने की मांग

जोधपुर। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि क्षत्रिय समाज को भविष्य की सोच के साथ आगे बढऩा होगा। जो समाज भविष्य के बारे में नहीं सोचते, वे समाप्त हो जाते हैं। वे मंगलवार को बीजेडएस स्कूल प्रांगण में वीर शिरोमणि मुकनदास खीची की 381वीं जयंती समारोह में बोल रहे थे। स
सिंह ने कहा कि पहले शौर्य, वीरता व ताकत के बल पर राज कायम किया जाता था, आज जमाना विद्या एवं कलम का है, सद्व्यवहार व छत्तीस कौम को साथ लेकर आगे बढऩे का जमाना है। इतिहास में क्षत्रिय राजाओं की न्यायप्रियता के अनेक उदाहरण हैं। सभी लोगों को साथ लिया, यह राजपूत चरित्र का स्पष्ट उदाहरण है। मारवाड़ में जोधपुर राजपरिवार व मारवाड़ के लोगों ने शिक्षा पर ध्यान देकर चौपासनी शिक्षण संस्थान जैसी संस्थाओं को आगे बढ़ाया। राजपूत का चरित्र है, हमारा शौर्य, साहस व एकाग्रता बुरे दिनों में सामने आते हैं। नौजवान पीढ़ी ने इस बात को समझा, आज समाज के युवा हर क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं। मारोह में जोधपुर शहर व मारवाड़ के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से सैकड़ों लोगों सहित कई राजनेताओं ने भागीदारी निभाकर वीर मुकनदास खींची को श्रद्धांजलि अर्पित की।
समारोह अध्यक्ष पूर्व नरेश गजसिंह ने कहा कि महाराजा अजीतसिंह के समय वीर दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में औरंगजेब से युद्ध लड़ा गया।
वीर मुकनदास खीची उनके प्रमुख सहयोगी रहे। उनमें स्वामीभक्ति व वफादारी कूट-कूट कर भरी थी। उन वीरों के कारण ही मारवाड़ की पहचान जीवित रही। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय समाज को समय के साथ चलना है। समारोह की विशिष्ट अतिथि केंद्रीय संस्कृति मंत्री चंद्रेश कुमारी कहा कि उनके मंत्रालय के प्रयासों से प्रदेश के गागरोन सहित छह किलों को विश्व धरोहर के रूप में मान्यता मिली, यह प्रयास आगे भी जारी रखेंगे ताकि प्रदेश के अन्य किले भी इस सूची में शामिल हो सकें।
वोट डालने का संकल्प दिलवाया 
समारोह संयोजक करणसिंह उचियारड़ा ने जोधपुर में वीर मुकनदास खीची की मूर्ति लगवाने व उन पर डाक टिकट जारी करने का आग्रह किया। उचियारड़ा ने चुनावों में अधिकाधिक मतदान करने का भी आह्वान किया। इस पर समाज के लोगों ने दोनों हाथ खड़े कर वोट डालने का संकल्प लिया।
राष्ट्रीय अधिवेशन अगले साल जोधपुर में 
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि क्षत्रिय समाज को जोडऩे के लिए ऑल इंडिया क्षत्रिय फेडरेशन का गठन किया है। करीब 70 सामाजिक संस्थाएं इससे जुड़ी हैं। फेडरेशन का अधिवेशन अगले साल फरवरी में जोधपुर में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
वक्ताओं ने कहा- राजपूत समाज उपेक्षित 
कांग्रेस सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं : वीपी सिंह 
राज्यसभा में भाजपा के सांसद वीपी सिंह ने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से मुखातिब होते हुए कहा, ‘हमारी (भाजपा) सरकारों में राजपूत समाज का प्रतिनिधित्व ज्यादा होता था। अब प्रदेश सरकार मेें मात्र दो-तीन मंत्री हैं। उनमें भी एक को पीडब्ल्यूडी पकड़ा दिया। सांसद चंद्रेश कुमारी को मंत्री बनाया, लेकिन विभाग दे दिया संस्कृति, जिसका कोई मतलब नहीं है। अब सरकारों में पूरा प्रतिनिधितव नहीं मिले तो अपना दुखड़ा समाज मंच पर ही कहेंगे।’ उन्होंने यहां तक कहा कि राजपूत समाज प्रदेश की सभी दो सौ विधानसभा सीटों पर चुनौती पेश करने की स्थिति में हैं।
फिर भी हमें टिकट नहीं मिलता : करणसिंह 
कांग्रेस नेता करणसिंह उचियारड़ा ने कहा कि जिस सीट पर राजपूत मतदाताओं की संख्या तीस हजार है लेकिन राजपूतों को टिकट नहीं मिलता, जबकि 15 हजार मतदाताओं वाली जाति के लोगों को टिकट मिल जाता है क्योंकि राजपूत समाज वोट नहीं डालता। इसलिए समाज के लोगों को ज्यादा से ज्यादा वोट डालना चाहिए।
इन्होंने भी किया संबोधित 
विशिष्ट अतिथि राज्यसभा में भाजपा सांसद वीपी सिंह बदनोर ने शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देने पर जोर दिया। राजसमंद से कांग्रेस सांसद गोपालसिंह ईडवा ने कहा कि सभी का सम्मान करना लोकतंत्र की भावना है। पूर्व मंत्री व विधायक कोलायत देवीसिंह भाटी ने कहा कि पूर्वजों की कमाई को व्यर्थ नहीं जाने दें। जेएनयूवी के कुलपति प्रो.भंवरसिंह राजपुरोहित ने कहा कि वीर दुर्गादास राठौड़ व उनके साथी वीर मुकनदास खीची ने मारवाड़ की आजादी की रक्षा के लिए सदैव संघर्ष किया, अपनी पूरी ताकत लगा दी। समारोह को वीर मुकनदास खीची जयंती समारोह समिति के अध्यक्ष मोहनसिंह उचियारड़ा ने आभार व्यक्त किया। प्रारंभ में अतिथियों ने वीर मुकनदास खीची के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित किया।
प्रमुख लोग रहे उपस्थित 
समारोह में प्रदेश कांग्रेस महासचिव सुनीता भाटी, पाली जिला प्रमुख खुशवीर सिंह जोजावर व मारवाड़ राजपूत सभा के अध्यक्ष हनुमान सिंह खांगटा, कांग्रेस नेता मानवेंद्रसिंह रोहिट, पूर्व कुलपति लोकेश शेखावत, नाथू सिंह इंद्रोका करवड़, भीम सिंह, कुंभसिंह पातावत, जसवंत सिंह कच्छवाह, जसवंत सिंह इंदा, हनवंतसिंह खीची, गोपालसिंह भलासरिया सहित प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।
 
समाचार साभार : News4Rajasthan.com

Jul 16, 2013

दिग्विजय सिंह के राजनैतिक आचरण से आहत ना हो राजपूत युवा

कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह अपने विवादित बयानों के लिए अक्सर लोगों के निशाने पर रहते है| सोशियल साइट्स पर यदि किसी नेता का विरोध देखा जाय तो सबसे ज्यादा विरोध दिग्विजय सिंह के खिलाफ ही दिखाई देगा| सोशियल साइट्स पर इनके विरोध में भाजपा समर्थकों के तीखे व्यंग्य बाण व इनकी फोटो से छेड़छाड़ कर बनाये गए उलजुलूल चित्र अपलोड किये अक्सर देखे जा सकतें है| खैर...ये भाजपा समर्थक उनके राजनैतिक विरोधी है अत: राजनैतिक तौर पर किया जाने वाला उनका विरोध समझ आता है|

सोशियल साइट्स पर कई राजपूत युवकों को दिग्विजय सिंह के बयानों की भाजपा समर्थकों द्वारा मजाक उड़ाने जाने से प्रभावित हो आहत होते हुए भी अक्सर देखा जा सकता है| बहुत से राजपूत युवा भाजपा समर्थकों के प्रचार से इतने अधिक प्रभावित हो चुकें है कि वे दिग्विजय सिंह को राजपूत समाज के लिए काला धब्बा मानने लगे है जिसकी अभिव्यक्ति वे अक्सर सोशियल साइट्स पर करते देखे जा सकते है| दिग्विजय सिंह के बयानों से राजपूत युवाओं का आहत होने का सबसे बड़ा कारण यह भी है कि कम से कम राजस्थान के राजपूत पारम्परिक तौर पर कांग्रेस विरोधी व भाजपा समर्थक है अत: दिग्विजय सिंह का भाजपा विरोधी कोई भी बयान इन युवाओं को आहत करने के लिए काफी होता है, रही सही कसर भाजपा की सोशियल साइट्स पर कार्य कर रही ब्रिगेड पूरी कर देती है| इस ब्रिगेड द्वारा किये जाने प्रचार से प्रभावित हो कई राजपूत युवा दिग्विजय सिंह को राजपूत समाज पर कलंक मानने लगे है जिसे वे अक्सर दिग्विजय सिंह को समाज से बहिष्कृत करने की मांग करते हुए अभिव्यक्त भी करते है|

पर ऐसा करते हुए क्या कभी राजपूत युवाओं ने सोचा है कि- दिग्विजय सिंह के बयानों से राजपूत समाज का क्या लेना देना ?

दिग्विजय सिंह एक राजनेता होने के नाते अपनी पार्टी के हित में कोई कैसा भी बयान देते है तो यह उनका राजनैतिक मामला है, वे ऐसे विवादित बयान एक राजनेता होने के नाते देते है राजपूत समाज के नेता होने के नाते नहीं| फिर भला उनके बयानों से समाज के युवा सामाजिक तौर पर अपनी भावनाएं आहत क्यों करें ?

दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, आज वे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता है यह सब उपलब्धि उनकी स्वयं की व्यक्तिगत है इसमें राजपूत समाज का कोई योगदान नहीं| फिर समाज के युवा उनसे क्यों उम्मीद करे कि वे राजपूत नेता की तरह व्यवहार व आचरण करें ?

जब राजपूत समाज जातिय आधार पर वोट नहीं देता और जातिय आधार पर चुनाव नतीजों को प्रभावित नहीं कर सकता तो दिग्विजय सिंह ही क्यों किसी भी नेता से सामाजिक आधार पर कैसी उम्मीद ? और क्यों ?

दिग्विजय सिंह का आचरण एक राजनेता का आचरण है अत: उनके किसी भी तरह के आचरण से समाज के युवा अपनी सामाजिक भावनाएं आहत नहीं करनी चाहिये|

दिग्विजय सिंह के आचरण से यदि समाज के किसी युवा को कोई भी व्यक्ति जातिय आधार पर नीचा दिखाने की कोशिश भी करे तो उसे साफ कह देना चाहिये कि इसके लिए समाज जिम्मेदार नहीं, वे हमारे सामाजिक नेता नहीं जो समाज उनके आचरण की जिम्मेदारी ले|
दिग्विजय सिंह के बयानों से जो राजपूत युवा सहमत नहीं वे उनका विरोध जरुर करें पर सिर्फ राजनैतिक आधार पर, जातिय या सामाजिक आधार पर नहीं|

संक्षेप में मेरी राजपूत युवाओं से यही अपील है कि – “वे किसी भी राजपूत नेता को समाज का नेता नहीं सिर्फ राजनैतिक नेता समझे और उनके आचरण की तुलना राजपूत समाज व राजपूत संस्कृति के आचरण के अनुरूप ना करें, दिग्विजय सिंह पूर्व राजघराने से है और मैं आपको यह साफ बता देना चाहता हूँ कि इस देश के कुछ (सिर्फ दो-चार) पूर्व राजघरानों के लोगों को छोड़कर लगभग राजघरानों के लोग राजपूत समाज के बीच सिर्फ दिखावे के लिए चुनावों व अन्य मौकों पर हमारी जातिय भावनाओं का दोहन करने के लिए आते है बाकि समय इनके पास समाज के आम व्यक्ति से मिलने का न तो वक्त होता ना ये मिलना चाहते| क्योंकि वे आम राजपूत को आज भी बराबर का जातिय भाई नहीं “छूट भाई” रूपी गुलाम ही समझते है| अत: ऐसे राजपरिवार के लोगों को समझकर इनका समर्थन करे जातिय आधार पर कदापि नहीं|

इन पूर्व राजघरानों का आचरण व रहन सहन भी दोहरा है जब वे हमारे बीच आते है तो पारम्परिक बनकर आयेंगे जबकि सब जानते है कि ये लोग पाश्चात्य जिन्दगी जीने के आदि है, राजपूत संस्कृति इन्होने सिर्फ दिखावे के लिए व इसका अपने होटल और पर्यटन व्यवसाय में दोहन करने मात्र के लिए अपना रखी है जबकि इन्हें राजपूत संस्कृति से कोई लेना देना नहीं| अत: इन नेताओं व पूर्व राजपरिवार के सदस्यों से राजपूत संस्कृति के अनुरूप किसी भी तरह के आचरण की उम्मीद ना करें तो ही ठीक है|”

जिन लोगों को समाज से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं ऐसे लोगों को ठीक उसी तरह समझ व्यवहार करें जैसे अन्य राजनैतिक नेताओं से व्यवहार करते है| ऐसे राजनेताओं के किसी राजनैतिक षड्यंत्र में फंसने पर भी उनका जातिय आधार पर कतई साथ ना दें क्योंकि आज तक देखा गया है ऐसे नेताओं को फंसने के बाद समाज याद आता है और वे समाज की ताकत का अपने राजनैतिक पुनर्वास में फायदा उठाने में रहते है पिछले दिनों राजस्थान में भाजपा नेता राजेंद्र सिंह राठौड़ व पूर्व सपा नेता अमर सिंह के मामले आप देख ही चुकें है|

जातिय व सामाजिक आधार पर उसी व्यक्ति का राजनीति में समर्थन करें जो आपके बीच रहकर आपके क्षेत्र का विकास करता हो, जनहित के मामले में हर तरह के संघर्ष के लिए तैयार रहता हो और हमारे समाज के साथ साथ अन्य समुदायों में भी स्वीकार्य हो|

Jul 13, 2013

एक सफ़र अतीत की गोद में (भाग -१ )





कुछ ही दिन पहले मैं उत्तर प्रदेश के एक जिले चंदौली में गया वहां अपने साथियों के साथ घूमते वक़्त मैंने कई गाँवों का भ्रमण किया और मुझे अनेक व्यक्तियों की कहानियां सुनाने को मिली जिन्होंने देह -त्याग कर भी लोगों के बीच अपने विचारों के बल पे आज भी स्थान बना रखा है | उन में से ही एक हैं स्व. ठाकुर विश्वनाथ प्रताप सिंह जी ,जिनके बारे में मैंने उनके घर और गाँव के लोगों के साथ-२ आस-पास के लोगों से काफी कुछ सुना और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ | मुझे उनके बारे में सुन कर अपने देश की माती पे और भी गर्व हुआ की इस देश के कोने -२ में ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने कर्म के निर्वहन के बल पर समकालीन और आने वाले लोगों के मस्तिष्क और ह्रदय में स्थान पाया | आज हमारा समाज जिन परेशानियों से गुजर रहा है शायद उसका मूल कारण अपने स्वधर्म और कर्म को भूल विलासिता और अर्थ और भौतिकतावाद की तरफ भागना ही है |

स्व. ठाकुर विश्वनाथ प्रताप सिंह जी ने शारीरिक-रूप से तो इस संसार को छोड़ दिया लेकिन लोगों की स्मृति-पटल में उनकी छवि आज भी, उनकी नई पीढ़ी में उन्हें तलाशने को मजबूर कर रही है | शायद उनकी स्मृति की छवि से ये नई पीढ़ी मेल नही खा रही |आखिर क्या कारण हो सकता है की ये नई पीढ़ी अपने पूर्वज की छवि से ही आंकी जा रही  है ?समाज आखिर क्यूँ आज भी उन्हें उनके जैसा ही देखना चाहता है ?

स्व. ठाकुर  विश्वनाथ प्रताप सिंह जी पराधीन भारत के समय से ही स्कूल के हेडमास्टर पद पे न्युक्त हो कर समाज को स्वतंत्रता के मोल और पराधीनता नामक दंड का अर्थ समझाते रहे | उन्होंने निश्चित रूप से उन्होंने निश्वार्थ रूप से अपने दायित्वों की पूर्ति करते रहे और श्रेष्ठ रूप से अंजाम देते रहे तभी आज जिन लोगों की आँखों से देखने की छमता धुंध हो गयी है लेकिन उनकी स्मृति में आज भी उनकी छवि ज्यों की त्यों बनी हुई है |
 स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह जी को बहुत बड़ा शिव भक्त माना जाता था ,लेकिन उनकी भक्ति किसी विशेष पूजा पध्धति या नियमों की गुलाम नही थी |वे भक्ति से सर नवाना पसंद करते थे न की धर्म-भीरु बन कर |
गाँव के बुजुर्ग ,जो ठीक से देख नही पाते आज जिनके शरीर में खुद के दैनिक कार्यों को कर सकने की ताकत नही दिखती वे भी उनकी बातें बताते हुए खुद को अजीब सी ताकत से पूर्ण समझने लगते हैं |गाँव के बुजुर्गों के कहे अनुसार सुबह अपने कुँवें से स्नान करके उठते ही ईश्वर को याद करना शुरू कर देते  थे और स्नान के बाद घर के सामने से निकलने वाले हर व्यक्ति को रोक लेते ,वो व्यक्ति अब उनके साथ भोजन ग्रहण करने के बाद ही कहीं जा सकते थे | खाने के थाल तक पहुँचते -२ उनकी पूजा ख़तम हो जाती थी |  शिवरात्रि को छोड़ किसी और दिन विरले ही किसीने उन्हें शिवालय पे भी देखा होगा |

आज के भक्ति व्यवस्था और ब्राह्मण जानो द्वारा बताई हुई भक्ति से उनकी भक्ति निश्चित रूप से अलग थी,उस में कहीं भी भगवान से मिलने के लिए किसी विशेष-स्थान का चुनाव आवश्यक नही था | कर्म ही श्रेष्ठ पूजा थी और उसका श्रेष्ठ तरीके से निर्वहन ही ईश्वर की सच्ची सेवा थी |स्व. ठाकुर विश्वनाथ प्रताप सिंह जी का कहना था ."आखिर उन्ही का दिया ये जीवन है ,उन्ही की इच्छा से हम कुछ करते है,ये संसार उन्ही परमशक्ति का है ,संसार में हमें मिला हर कार्य उन्ही की इच्छा से मिला है  ,हम में जो शक्ति जो उर्जा है वो उन्ही की दी हुई है ,फिर क्यूँ न हम इस सम्पूर्ण उर्जा का इस्तेमाल अपने कर्तव्यों के पूर्ण निर्वहन में लगा अन्त्समय में उनके श्री चरणों की धूलि बनने का गौरव प्राप्त कर सके "|
उन्होंने अपना पूर्ण जीवन जाती -पाती के भेद को भूल कर समाज के हर तबके को शिक्षित करने में लगा दिया |यही उनकी पूजा थी यही उनका धर्म था ,निष्पक्ष ,निश्वार्थ रूप से सभी को ज्ञान दीप की रौशनी से कर्तव्यों और स्वकर्म का बोध करना |

स्व . ठाकुर साहब के अनुसार समाज के पिछड़े वर्ग को समाज के साथ चलने योग्य बनाना अतिआवस्यक है अगर हम देश की तरक्की चाहते हैं | आखिर वो इसी देश का हिस्सा हैं उनके पीछे छोड़ देश आगे कैसे बढ़ सकता है | समय और समाज के जिन भी परिस्थिवास वे हार कर पिछड़ गये हों उन्हें वहां से बहार निकल सभी को एक साथ ले कर चलना आवश्यक |

उनके अनुसार क्षत्रिय एक उपाधि है जिसे योग्यता से पाया जाता है ,ना की मात्र एक क्षत्रियकुल में जन्म ले दान में पाया जा सकता है |क्षत्रिय का धर्म समाज में न्याय को बनाये रखना है ,सभी के हितों का ध्यान रखना है ,ईश्वर ने सबही को जन्म दिया है फिर सिर्फ जाती से किसी का समाज में मानवीय मूलभूत आवश्यकताओं से हक़ कैसे ख़तम हो सकता है |

उनके अनुसार समाज के जिस पिछड़ा वर्ग को ले कर राजनैतिक मंच भविष्य को देख तैयार किया जा रहा है ,उस से इनका कोई भला नही होने वाला |शिक्षा ही एक मात्र वो हथियार है जो इस वर्ग को समानता का अधिकार दिला सकती है|

उनके इन्ही प्रयासों का नतीजा है की उनके अनेक छात्र विभिन्न उच्च-पदों पे आसीन हुए और उनकी दी हुई शिक्षा के बल पर समाज में प्रतिष्ठा पाई और आज तक वे अपने मनन से उनकी उस निस्वार्थ, अटल ,छवि को अपने मन से निकल नही पा रहे हैं |

Jul 10, 2013

अमृत कूप या नवलदेह का कुआं

भारत भूमि विविध चमत्कारों का भण्डार है। यहा गर्म एवं शीतल जल के स्रोत साथ-साथ हैं तो एक ही कुएं में खारा और मीठा जल एक साथ प्राप्त होता है। किसी क्षेत्र का पानी स्नान के योग्य तक नहीं तो कहीं अमृत के समान स्वादिष्ट कहीं का वातावरण राजयक्ष्मा को ठीक करता है तो कहीं का जल कुष्ठ जैसे भयानक चर्म रोगों को। ऐसा ही एक कुआं परीक्षितगढ़ में है जिसे नवलदेह का कुआं कहा जाता है। इसके नियम पूर्वक स्नान से आज भी कुष्ठ रोग ठीक होता है इसीलिए इसका प्राचीन नाम अमृत कूप था। फिर इसका नाम नवलदेह का कुआं कैसे प्रसिद्ध हुआ?

बात आज से लगभग 5100 वर्ष पूर्व की है। कुन्ती नन्दन अर्जुन एवं पाताल के नाग राजा वासुकि आपस में गहरे दोस्त थे। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नि उत्तरा एवं वासुकि की पत्नि नर्मदा दोनों ही गर्भवती थीं। दीर्घावधि के पश्चात् एक दिन अर्जुन एवं वासुकि की भेंट हुई तो दोनों ने बहुत दिनों से न मिलने के गिले-शिकवे किये तथा एक दूसरे पर न मिलने का दोषारोपण करते हुए उलाहने भी दिये। दोनों ने विचार किया कि ऐसा कौन सा उपाय हो सकता है कि जल्दी-जल्दी मिलना होता रहे। चूंकि अर्जुन धरती पर और वासुकि पाताल में रहता था, इसीलिए शीघ्र मिलना नहीं हो पाता था।

अर्जुन ने प्रस्ताव रखा कि यदि आपस में रिश्तेदारी-सम्बन्ध हो जायें तो किसी न किसी बहाने से मिलना होता रहेगा। लेकिन यह कैसे सम्भव हो? वार्तालाप में दोनों जान गये कि अर्जुन की पुत्रवधु उत्तरा एवं वासुकि की पत्नि नर्मदा गर्भवती हैं। सोच-विचार कर प्रस्ताव रखा गया कि यदि दोनों के विपरीत लिंगी संतानें पैदा हुईं तो उनका आपस में विवाह करके हम रिश्तेदार बन जायेंगे। दोनों वचनबद्ध हो गए। समय व्यतीत होता रहा और उचित समय पर उत्तरा के गर्भ से परीक्षित रूपी लड़के का और वासुकि की पत्नि नर्मदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ। कन्या अत्यधिक सुन्दर, स्वर्णिम शरीर एवं अत्यधिक मनमोहक स्वरूप वाली थी इसलिए उसका नाम नवलदेह (स्वर्णिम शरीर वाली सुन्दर कन्या) रखा गया। नागवंशी अपने को कुरू वंश से श्रेष्ठ तथा कुरू वंश को निम्न वंशज या निम्न जातीय समझते थे इसीलिए वासुकि को चिन्ता हो गई।

वास्तव में वासुकि के मन में यह था कि उसको लड़का और अभिमन्यु को लड़की प्राप्त होगी ऐसी स्थिति में विवाह करने में कोई अपमान नहीं है। लेकिन हुआ विपरीत। वासुकि कुरूवंश में अपनी कन्या नहीं देना चाहता था इसीलिए उसे चिन्ता होना स्वाभाविक था। इसीलिए वासुकि ने उसे लालन-पालन के लिए किसी अति गुप्त स्थान (हमारे अनुमानानुसार तक्षशिला में नागराज तक्षक के पास) भेज दिया और प्रचारित यह करा दिया कि कन्या जन्मते ही मर गई। यह समाचार जब अर्जुन को मिला तो वह भी इसको समय के साथ भूल गया। दूसरी ओर कन्या नवलदेह वृद्धि को प्राप्त होकर युवा एवं अत्यधिक सुन्दर भी हो गई। तभी वासुकि को भयानक गलित कुष्ठ रोग हो गया। राजज्योतिषियों ने शोध कर बताया कि यह कुष्ठ रोग अर्जुन के साथ विश्वासघात, झूठा एवं कपटपूर्ण व्यवहार तथा वचन भंग के दोष के कारण हुआ है, इसीलिए यदि कन्या नवलदेह कुरू राज्य स्थित अमृतकूप से स्वयं जल लाकर वासुकि को स्नान कराये तो उसका कुष्ठ रोग दूर हो सकता है अन्यथा नहीं। इसी बीच नवलदेह को अपनी सखियों द्वारा अर्जुन एवं वासुकि के वचन का ज्ञान हुआ। वह अपनी सखियों के संग गुप्त रूप से नवलदेह अमृत स्रोत से जल लेने आई।

परीक्षित को अपने गुप्तचरों द्वारा समस्त घटना का पता चल गया तो परीक्षित ने नवलदेह को मार्ग में रोक कर उसे अपनी मंगेतर बताकर उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। नवलदेह भी अपने पिता के वचनानुसार एवं स्वयं भी मोहित होकर परीक्षित से विवाह का मन बना चुकी थी। इसीलिए उसने कहा कि पहले वह स्नान करा कर पिता का कुष्ठ रोग ठीक कर दे बाद में पुनः आकर विवाह करेगी। दोनों वचनबद्ध हो गये। नवलदेह जल लेकर चली गई। नवलदेह ने इस जल को जब पिता वासुकि के ऊपर डाला तो उसने पिता के पैर का अंगूठा अपने पैर से दबा लिया जिस कारण वहां तक कुएं का जल नहीं पहुंच सका और वहां पर कुष्ठ शेष रह गया। नवल देह ने अपना दोष स्वीकारते एवं दुखी होते हुए पुनः जल लाने का प्रस्ताव रखा लेकिन वासुकि ने मना किया। वासुकि के लाख मना करने पर भी नवल देह पुनः जल लेने आई और परीक्षित से विवाह किया। आगे श्रुति-स्मृति सब मौन है।

यहां पर घटना क्रम सन्देह उत्पन्न करता है, क्योंकि पाताल से आकर दो बार जल ले जाना सम्भव नहीं था। अतः ऐसा आभास होता है कि वासुकि धरती पर ही कहीं आ गया था। चूंकि उस समय नागवंश अति प्रबल हो गया था। तक्षशिला उसकी राजधानी तो तक्षक नागवंश का प्रतापी राजा था। तक्षक का साम्राज्य तक्षशिला से कन्या कुमारी तक विस्तृत हो गया था। इसीलिए वासुकि भी यहीं-कहीं आ गया होगा और राजज्योतिषियों के कथनानुसार नवलदेह को जल लेने भेजा। संभवतः इस घटना को लेकर कुरूवंश एवं नाग वंश में बैर बढ़ गया और इसी बैर का आश्रय लेकर श्रृंग ऋषि ने परीक्षित को तक्षक द्वारा मारा जाने का श्राप दिया। तक्षक ने परीक्षित को डसा (मारा) और परीक्षित पुत्र जन्मेजय ने बदला लेने के लिए नागवंश का संहार किया जिसे काव्यात्मक भाषा में सर्पयज्ञ का नाम दिया गया। पूर्व में यहां कोई प्राकृतिक अमृतमय जल स्रोत था उसके सिकुड़ने पर यहां कूप का निर्माण बाद में कराया गया और नवलदेह के नाम पर इसका नाम नवलदेह का कुआं प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है कि इस जल में अमृत का प्रभाव था इसीलिए इसे अमृत स्रोत एवं बाद में अमृत कूप कहा जाता था।

वीर तेजाजी की कथा. साभार - भागीरथ सिंह नैन

तेजाजी  मुख्यत: राजस्थान के लेकिन उतने ही , मध्यप्रदेश, गुजरात और कुछ हद तक पंजाब के भी लोक-नायक हैं। अवश्य ही इन प्रदेशों की जनभाषाओं के लोक साहित्य में उनके आख्यान की अभिव्यक्ति के अनेक रूप भी मौजूद हैं। राजस्थानी का ‘तेजा’ लोक-गीत तो इनमें शामिल है ही। वे इन प्रदेशों के सभी समुदायों के आराध्य हैं। लोग तेजाजी के मन्दिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और दूसरी मन्नतों के साथ-साथ सर्प-दंश से होने वाली मृत्यु के प्रति अभय भी प्राप्त करते हैं। स्वयं तेजाजी की मृत्यु, जैसा कि उनके आख्यान से विदित होता है, सर्प- दंश से ही हुई थी। बचनबद्धता का पालन करने के लिए तेजाजी ने स्वयं को एक सर्प के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया था। वे युद्ध भूमि से आए थे और उनके शरीर का कोई भी हिस्सा हथियार की मार से अक्षत् नहीं था। घावों से भरे शरीर पर अपना दंश रखन को सर्प को ठौर नजर नहीं आई, तो उसने काटने से इन्कार कर दिया। वचन-भंग होता देख घायल तेजाजी ने अपना मुँह खोल कर जीभ सर्प के सामने फैला दी थी और सर्प ने उसी पर अपना दंश रख कर उनके प्राण हर लिए थे। लोक-नायक की जीवन-यात्रा एक नितान्त साधारण मनुष्य के रूप में शुरू होती है और वह किसी-न- किसी तरह के असाधारण घटनाक्रम में पड़ कर एक असाधारण मनुष्य में रूपान्तरित हो जाता है। उसकी कथा को कहने और सुनने वाला लोक ही उसे एक ऐसे मिथकीय अनुपात में ढाल देता है कि इतिहास के तथ्यप्रेमी चिमटे से तो वह पकड़ा ही नहीं जा सकता। मसलन तेजाजी जिस सर्प से अपनी जीभ पर दंश झेल कर अपनी वचनबद्धता निभाते हुए नायकत्व हासिल करते हैं, इतिहास में उसका तथ्यात्मक खुलासा कुछ यह कह कर दिया गया हैः जब तेजाजी पनेर से अपनी पत्नी के साथ लौट रहे थे उस समय उन पर मीना सरदारों ने हमला किया क्योंकि वे पहले इस नागवंशी राजा द्वारा हरा दिए गए थे. लोकाख्यान का नाग इतिहास की चपेट में आकर नागवंशी मुखिया की गति को प्राप्त हो जाता है। लोक-नायकों का एक वर्ग ऐसा भी होता है, जिसमें वे जन-साधारण के परित्राता अथवा परित्राणकर्त्ता बन कर अपनी छवि का अर्जन करते हैं। वे जन-साधारण के पक्ष में, स्थापित शक्ति-तन्त्र के दमन और दुराचार से लोहा लेते हैं। इस वर्ग के लोक- नायक अक्सर, हमेशा नहीं, कुछ हद तक संस्थापित कानून की हदों से बाहर निकले हुए होते हैं। तेजाजी के बलिदान की मूल कथा संक्षेप में इस प्रकार है. तेजाजी का जन्म तेजाजी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में खरनाल गाँव में माघ शुक्ला, चौदस वार गुरुार संवत ग्यारह सौ तीस, तदनुसार २९ जनवरी, १०७४ , को जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता चौधरी ताहरजी (थिरराज) राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गाँव के मुखिया थे। तेजाजी के नाना का नाम दुलन सोढी था. उनकी माता का नाम रामकुंवरी है. तेजाजी का ननिहाल त्यौद गाँव (किशनगढ़) में था. तेजाजी के माता-पिता शंकर भगवान के उपासक थे. शंकर भगवान के वरदान से तेजाजी की प्राप्ति हुई. कलयुग में तेजाजी को शिव का अवतार माना गया है. तेजा जब पैदा हुए तब उनके चेहरे पर विलक्षण तेज था जिसके कारण इनका नाम रखा गया तेजा. उनके जन्म के समय तेजा की माता को एक आवाज सुनाई दी -"कुंवर तेजा ईश्वर का अवतार है, तुम्हारे साथ अधिक समय तक नहीं रहेगा."तेजाजी के जन्म के बारे में जन मानस के बीच प्रचलित एक राजस्थानी कविता के आधार पर मनसुख रणवा का मत है- जाट वीर धौलिया वंश गांव खरनाल के मांय। आज दिन सुभस भंसे बस्ती फूलां छाय।। शुभ दिन चौदस वार गुरु, शुक्ल माघ पहचान। सहस्र एक सौ तीस में प्रकटे अवतारी ज्ञान।। अर्थात - अवतारी तेजाजी का जन्म विक्रम संवत ११३० में माघ शुक्ल चतुर्दशी, बृहस्पतिवर को नागौर परगना के खरनाल गाँव में धौलिया जाट सरदार के घर हुआ. तेजाजी का हळसौतिया ज्येष्ठ मास लग चुका है। ज्येष्ठ मास में ही ऋतु की प्रथम वर्षा हो चुकी है। ज्येष्ठ मास की वर्षा अत्यन्त शुभ है। गाँव के मुखिया को ‘हालोतिया’या हळसौतिया करके बुवाई की शुरुआत करनी है। मुखिया मौजूद नहीं है। उनका बड़ा पुत्र भी गाँव में नहीं है। उस काल में परंपरा थी की वर्षात होने पर गण या कबीले के गणपति सर्वप्रथम खेत में हल जोतने की शुरुआत करता था, तत्पश्चात किसान हल जोतते थे. मुखिया की पत्नी अपने छोटे पुत्र को, जिसका नाम तेजा है, खेतों में जाकर हळसौतिया का शगुन करने के लिए कहती है। तेजा माँ की आज्ञानुसार खेतों में पहुँच कर हल चलाने लगा है। दिन चढ़ आया है। तेजा को जोरों की भूख लग आई है। उसकी भाभी उसके लिए ‘छाक’ यानी भोजन लेकर आएगी। मगर कब? कितनी देर लगाएगी? सचमुच, भाभी बड़ी देर लगाने के बाद ‘छाक’ लेकर पहुँची है। तेजा का गुस्सा सातवें आसमान पर है। वह भाभी को खरी-खोटी सुनाने लगा है। तेजाजी ने कहा कि बैल रात से ही भूके हैं मैंने भी कुछ नहीं खाया है, भाभी इतनी देर कैसे लगादी. भाभी भी भाभी है। तेजाजी के गुस्से को झेल नहीं पाई और काम से भी पीड़ित थी सो पलट कर जवाब देती है, एक मन पीसना पीसने के पश्चात उसकी रोटियां बनाई, घोड़ी की खातिर दाना डाला, फिर बैलों के लिए चारा लाई और तेजाजी के लिए छाक लाई परन्तु छोटे बच्चे को झूले में रोता छोड़ कर आई, फिर भी तेजा को गुस्सा आये तो तुम्हारी जोरू जो पीहर में बैठी है. कुछ शर्म-लाज है, तो लिवा क्यों नहीं लाते? तेजा को भाभी की बात तीर- सी लगती है। वह रास पिराणी फैंकते हैं और ससुराल जाने की कसम खाते हैं. वह तत्क्षण अपनी पत्नी पेमल को लिवाने अपनी ससुराल जाने को तैयार होता है। तेजा खेत से सीधे घर आते हैं और माँ से पूछते हैं कि मेरी शादी कहाँ और किसके साथ हुई. माँ को खरनाल और पनेर की दुश्मनी याद आई और बताती है कि शादी के कुछ ही समय बाद तुम्हारे पिता और पेमल के मामा में कहासुनी हो गयी और तलवार चल गई जिसमें पेमल के मामा की मौत हो गयी. माँ बताती है कि तेजा तुम्हारा ससुराल गढ़ पनेर में रायमल्जी के घर है और पत्नी का नाम पेमल है. सगाई ताउजी बख्शा राम जी ने पीला- पोतडा़ में ही करदी थी. तेजा ससुराल जाने से पहले विदाई देने के लिये भाभी से पूछते हैं. भाभी कहती है -"देवरजी आप दुश्मनी धरती पर मत जाओ. आपका विवाह मेरी छोटी बहिन से करवा दूंगी."तेजाजी ने दूसरे विवाह से इनकार कर दिया. बहिन के ससुराल में तेजाजी भाभी फिर कहती है कि पहली बार ससुराल को आने वाली अपनी दुल्हन पेमल का ‘बधावा’ यानी स्वागत करने वाली अपनी बहन राजल को तो पहले पीहर लेकर आओ। तेजाजी का ब्याह बचपन में ही पुष्कर में पनेर गाँव के मुखिया रायमल की बेटी पेमल के साथ हो चुका था। विवाह के कुछ समय बाद दोनों परिवारों में खून- खराबा हुआ था। तेजाजी को पता ही नहीं था कि बचपन में उनका विवाह हो चुका था। भाभी की तानाकशी से हकीकत सामने आई है। जब तेजाजी अपनी बहन राजल को लिवाने उसकी ससुराल के गाँव तबीजी के रास्ते में थे, तो एक मीणा सरदार ने उन पर हमला किया। जोरदार लड़ाई हुई। तेजाजी जीत गए। तेजाजी द्वारा गाडा गया भाला जमीन में से कोई नहीं निकाल पाया और सभी दुश्मन भाग गए. तबीजी पहुँचे और अपने बहनोई जोगाजी सियाग के घर का पता पनिहारियों से पूछा. उनके घर पधार कर उनकी अनुमति से राजल को खरनाल ले आए। तेजाजी का पनेर प्रस्थान तेजाजी अपनी माँ से ससुराल पनेर जाने की अनुमति माँगते हैं. माँ को अनहोनी दिखती है और तेजा को ससुराल जाने से मना करती है. भाभी कहती है कि पंडित से मुहूर्त निकलवालो. पंडित तेजा के घर आकर पतड़ा देख कर बताता है कि उसको सफ़ेद देवली दिखाई दे रही है जो सहादत की प्रतीक है. सावन व भादवा माह अशुभ हैं. पंडित ने तेजा को दो माह रुकने की सलाह दी. तेजा ने कहा कि तीज से पहले मुझे पनेर जाना है चाहे धन-दान ब्रह्मण को देना पड़े. वे कहते हैं कि जंगल के शेर को कहीं जाने के लिए मुहूर्त निकलवाने की जरुरत नहीं है. तेजा ने जाने का निर्णय लिया और माँ-भाभी से विदाई ली. अगली सुबह वे अपनी लीलण नामक घोड़ी पर सवार हुए और अपनी पत्नी पेमल को लिवाने निकल पड़े। जोग-संयोगों के मुताबिक तेजा को लकडियों से भरा गाड़ा मिला, कुंवारी कन्या रोती मिली, छाणा चुगती लुगाई ने छींक मारी, बिलाई रास्ता काट गई, कोचरी दाहिने बोली, मोर कुर्लाने लगे. तेजा अन्धविसवासी नहीं थे. सो चलते रहे. बरसात का मौसम था. कितने ही उफान खाते नदी-नाले पार किये. सांय काल होते-होते वर्षात ने जोर पकडा. रस्ते में बनास नदी उफान पर थी. ज्यों ही उतार हुआ तेजाजी ने लीलण को नदी पार करने को कहा जो तैर कर दूसरे किनारे लग गई. तेजाजी बारह कोस अर्थात ३६ किमी का चक्कर लगा कर अपनी ससुराल पनेर आ पहुँचे। तेजाजी का पनेर आगमन शाम का वक्त था। पनेर गढ़ के दरवाजे बंद हो चुके थे. कुंवर तेजाजी जब पनेर के कांकड़ पहुंचे तो एक सुन्दर सा बाग़ दिखाई दिया. तेजाजी भीगे हुए थे. बाग़ के दरवाजे पर माली से दरवाजा खोलने का निवेदन किया. माली ने कहा बाग़ की चाबी पेमल के पास है, मैं उनकी अनुमति बिना दरवाजा नहीं खोल सकता. कुंवर तेजा ने माली को कुछ रुपये दिए तो झट ताला खोल दिया. रातभर तेजा ने बाग़ में विश्राम किया और लीलन ने बाग़ में घूम-घूम कर पेड़-पौधों को तोड़ डाला. बाग़ के माली ने पेमल को परदेशी के बारे में और घोडी द्वारा किये नुकशान के बारे में बताया. पेमल की भाभी बाग़ में आकर पूछती है कि परदेशी कौन है, कहाँ से आया है और कहाँ जायेगा. तेजा ने परिचय दिया कि वह खरनाल का जाट है और रायमल जी के घर जाना है. पेमल की भाभी माफ़ी मांगती है और बताती है कि वह उनकी छोटी सालेली है. सालेली (साले की पत्नि) ने पनेर पहुँच कर पेमल को खबर दी. कुंवर तेजाजी पनेर पहुंचे. पनिहारियाँ सुन्दर घोडी पर सुन्दर जवाई को देखकर हर्षित हुई. तेजा ने रायमल्जी का घर पूछा. सूर्यास्त होने वाला था. उनकी सास गाएँ दूह रही थी। तेजाजी का घोड़ा उनको लेकर धड़धड़ाते हुए पिरोल में आ घुसा। सास ने उन्हें पहचाना नहीं। वह अपनी गायों के डर जाने से उन पर इतनी क्रोधित हुई कि सीधा शाप ही दे डाला, ‘जा, तुझे काला साँप खाए!’ तेजाजी उसके शाप से इतने क्षुब्ध हुए कि बिना पेमल को साथ लिए ही लौट पड़े। तेजाजी ने कहा यह नुगरों की धरती है, यहाँ एक पल भी रहना पाप है. तेजाजी का पेमल से मिलन अपने पति को वापस मुड़ते देख पेमल को झटका लगा. पेमल ने पिता और भाइयों से इशारा किया की वे तेजाजी को रोकें. श्वसुर और सेल तेजाजी को रोकते हैं पर वे मानते नहीं हैं. वे घर से बहार निकल आते हैं. पेमल की सहेली थी लाछां गूजरी। उसने पेमल को तेजाजी से मिलवाने का यत्न किया। वह ऊँटनी पर सवार हुई और रास्ते में मीणा सरदारों से लड़ती- जूझती तेजाजी तक जा पहुँची। उन्हें पेमल का सन्देश दिया। अगर उसे छोड़ कर गए, तो वह जहर खा कर मर जाएगी। उसके मां-बाप उसकी शादी किसी और के साथ तय कर चुके हैं। लाछां बताती है, पेमल तो मरने ही वाली थी, वही उसे तेजाजी से मिलाने का वचन दे कर रोक आई है। लाछन के समझाने पर भी तेजा पर कोई असर नहीं हुआ. पेमल अपनी माँ को खरी खोटी सुनाती है. पेमल कलपती हुई आई और लिलन के सामने कड़ी हो गई. पेमल ने कहा - आपके इंतजार में मैंने इतने वर्ष निकले. मेरे साथ घर वालों ने कैसा वर्ताव किया यह मैं ही जानती हूँ. आज आप चले गए तो मेरा क्या होगा. मुझे भी अपने साथ ले चलो. मैं आपके चरणों में अपना जीवन न्यौछावर कर दूँगी. पेमल की व्यथा देखकर तेजाजी पोल में रुके. सभी ने पेमल के पति को सराहा. शाम के समय सालों के साथ तेजाजी ने भोजन किया. देर रात तक औरतों ने जंवाई गीत गए. पेमल की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. तेजाजी पेमल से मिले। अत्यन्त रूपवती थी पेमल। दोनों बतरस में डूबे थे कि लाछां की आहट सुनाई दी। लाछां गुजरी की तेजाजी से गुहार लाछां गुजरी ने तेजाजी को बताया कि मीणा चोर उसकी गायों को चुरा कर ले गए हैं…. अब उनके सिवाय उसका कोई मददगार नहीं। लाछां गुजारी ने तेजाजी से कहा कि आप मेरी सहायता कर अपने क्षत्रिय धर्म की रक्षा करो अन्यथा गायों के बछडे भूखे मर जायेंगे. तेजा ने कहा राजा व भौमिया को शिकायत करो. लाछां ने कहा राजा कहीं गया हुआ है और भौमिया से दश्मनी है. तेजाजी ने कहा कि पनेर में एक भी मर्द नहीं है जो लड़ाई के लिए चढाई करे. तुम्हारी गायें मैं लाऊंगा. तेजाजी फिर अपनी लीलण घोड़ी पर सवार हुए। पंचों हथियार साथ लिए. पेमल ने घोडी कि लगाम पकड़ कर कहा कि मैं साथ चलूंगी. लड़ाई में घोडी थम लूंगी. तेजा ने कहा पेमल जिद मत करो. मैं क्षत्रिय धर्म का पालक हूँ. मैं अकेला ही मीणों को हराकर गायें वापिस ले आऊंगा. तेजाजी के आदेश के सामने पेमल चुप हो गई. पेमल अन्दर ही अन्दर कंप भी रही थी और बद्बदाने लगी - डूंगर पर डांडी नहीं, मेहां अँधेरी रात पग-पग कालो नाग, मति सिधारो नाथ अर्थात पहाडों पर रास्ता नहीं है, वर्षात की अँधेरी रात है और पग- पग पर काला नाग दुश्मन है ऐसी स्थिति में मत जाओ. तेजाजी धर्म के पक्के थे सो पेमल की बात नहीं मानी और पेमल से विदाई ली. पेमल ने तेजाजी को भाला सौंपा. वर्तमान सुरसुरा नामक स्थान पर उस समय घना जंगल था. वहां पर बालू नाग , जिसे लोक संगीत में बासक नाग बताया गया है, घात लगा कर बैठे थे. रात्रि को जब तेजाजी मीणों से गायें छुड़ाने जा रहे थे कि षड़यंत्र के तहत बालू नाग ने रास्ता रोका. बालू नाग बोला कि आप हमें मार कर ही जा सकते हो. तेजाजी ने विश्वास दिलाया कि मैं धर्म से बंधा हूँ. गायें लाने के पश्चात् वापस आऊंगा. मेरा वचन पूरा नहीं करुँ तो समझना मैंने मेरी माँ का दूध नहीं पिया है. वहां से तेजाजी ने भाला, धनुष, तीर लेकर लीलन पर चढ़ उन्होंने चोरों का पीछा किया. सुरसुरा से १५-१६ किमी दूर मंडावारियों की पहाडियों में मीणा दिखाई दिए. तेजाजी ने मीणों को ललकारा. तेजाजी ने बाणों से हमला किया. मीने ढेर हो गए, कुछ भाग गए और कुछ मीणों ने आत्मसमर्पण कर दिया. तेजा का पूरा शारीर घायल हो गया और तेजा सारी गायों को लेकर पनेर पहुंचे और लाछां गूजरी को सौंप दी . लाछां गूजरी को सारी गायें दिखाई दी पर गायों के समूह के मालिक काणां केरडा नहीं दिखा तो वह उदास हो गई और तेजा को वापिस जाकर लाने के लिए बोला. तेजाजी वापस गए. पहाड़ी में छुपे मीणों पर हमला बोल दिया व बछड़े को ले आये. इस लड़ाई में तेजाजी का शारीर छलनी हो गया. बताते हैं कि लड़ाई में १५० मीणा लोग मारे गए जिनकी देवली मंदावारिया की पहाड़ी में बनी हैं. सबको मार कर तेजाजी विजयी रहे एवं वापस पनेर पधारे. तेजाजी की वचन बद्धता लाछां गूजरी को काणां केरडा सौंप कर लीलण घोडी से बोले कि तुम वापस उस जगह चलो जहाँ मैं वचन देकर आया हूँ. तेजाजी सीधे बालू नाग के इन्तजार स्थल पर आते हैं. बालू नाग से बोलते हैं की मैं मेरा वचन पूरा करके आया हूँ तुम अब अपना वचन पूरा करो. बालू नाग का ह्रदय काँप उठा. वह बोला -"मैं तुम्हारी इमानदारी और बहादुरी पर प्रसन्न हूँ. मैंने पीढी पीढी का बैर चुकता कर लिया. अब तुम जाओ मैं तुम्हें जीवन दान देता हूँ. तुम अपने कुल के एक मात्र देवता कहलाओगे. यह मेरा वरदान है."तेजाजी ने कहा कि मैं अपने वचनों से पीछे नहीं हटता वह अपने प्राण को हर हाल में पूरा करेगा. बालू नाग ने अपना प्रण पूरा करने के लिए तेजाजी की जीभ पर हमला किया. तेजाजी लीलन से नीचे गिरे और वीर गति को प्राप्त हो गए. वे कलयुग के अवतारी बन गए. लोक परम्परा में तेजाजी को काले नाग द्वारा डसना बताया गया है. कहते हैं की लाछां गूजरी जब तेजाजी के पास आयी और गायों को ले जाने का समाचार सुनाया तब रास्ते में वे जब चोरों का पीछा कर रहे थे, उसी दौरान उन्हें एक काला नाग आग में घिरा नजर आया। उन्होंने नाग को आग से बाहर निकाला। बासग नाग ने उन्हें वरदान की बजाय यह कह कर शाप दिया कि वे उसकी नाग की योनी से मुक्ति में बाधक बने। बासग नाग ने फटकार कर कहा - मेरा बुढापा बड़ा दुखदाई होता है. मुझे मरने से बचाने पर तुम्हें क्या मिला. तेजाजी ने कहा - मरते, डूबते व जलते को बचाना मानव का धर्म है. मैंने तुम्हारा जीवन बचाया है, कोई बुरा काम नहीं किया. भलाई का बदला बुराई से क्यों लेना चाहते हो. नागराज लीलन के पैरों से दूर खिसक जाओ वरना कुचले जाओगे. नाग ने प्रायश्चित स्वरूप उन्हें डसने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने नाग को वचन दिया कि लाछां गूजरी की गायें चोरों से छुड़ा कर उसके सुपुर्द करने के बाद नाग के पास लौट आएँगे। तेजाजी ने पाया कि लाछां की गायें ले जाने वाले उसी मीणा सरदार के आदमी थे, जिसे उन्होंने पराजित करके खदेड़ भगाया था। उनसे लड़ते हुए तेजाजी बुरी तरह लहुलूहान हो गए। गायें छुड़ा कर लौटते हुए अपना वचन निभाने वे नाग के सामने प्रस्तुत हो गए। नागराज ने कहा - तेजा नागराज कुंवारी जगह बिना नहीं डसता. तुम्हारे रोम- रोम से खून टपक रहा है. मैं कहाँ डसूं? तेजाजी ने कहा अपने वचन को पूरा करो. मेरे हाथ की हथेली व जीभ कुंवारी हैं, मुझे डसलो. नागराज ने कहा -"तेजा तुम शूरवीर हो. मैं प्रसन्न होकर तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम तुम्हारे कुल के देवता के रूप में पूजे जावोगे. आज के बाद काला सर्प का काटा हुआ कोई व्यक्ति यदि तुम्हारे नाम की तांती बांध लेगा तो उसका पान उतर जायेगा. किसान खेत में हलोतिया करने से पहले तुम्हारे नाम की पूजा करेगा और तुम कलयुग के अवतारी माने जावोगे. यही मेरा अमर आशीष है."नाग को उनके क्षत्-विक्षत् शरीर पर दंश रखने भर को भी जगह नजर नहीं आई और अन्तत: तेजाजी ने अपनी जीभ पर सर्प-दंश झेल कर और प्राण दे कर अपने वचन की रक्षा की। तेजाजी ने नजदीक ही ऊँट चराते रैबारी आसू देवासी को बुलाया और कहा,"भाई आसू देवासी ! मुसीबत में काम आने वाला ही घर का होता है, तू मेरा एक काम पूरा करना. मेरी इहलीला समाप्त होने के पश्चात् मेरा रुमाल व एक समाचार रायमल्जी मेहता के घर लेजाना और मेरे सास ससुर को पांवा धोक कहना. पेमल को मेरे प्यार का रुमाल दे देना, सारे गाँव वालों को मेरा राम-राम कहना और जो कुछ यहाँ देख रहे हो पेमल को बतादेना और कहना कि तेजाजी कुछ पल के मेहमान हैं."लीलन घोडी की आँखों से आंसू टपकते देख तेजाजी ने कहा -"लीलन तू धन्य है. आज तक तूने सुख- दुःख में मेरा साथ निभाया. मैं आज हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारा साथ छोड़ रहा हूँ. तू खरनाल जाकर मेरे परिवार जनों को आँखों से समझा देना."आसू देवासी सीधे पनेर में रायमल्जी के घर गया और पेमल को कहा -"राम बुरी करी पेमल तुम्हारा सूरज छुप गया. तेजाजी बलिदान को प्राप्त हुए. मैं उनका मेमद मोलिया लेकर आया हूँ."तेजाजी के बलिदान का समाचार सुनकर पेमल के आँखों के आगे अँधेरा छा गया. उसने मां से सत का नारियल माँगा, सौलह श्रृंगार किये, परिवार जनों से विदाई ली और सुरसुरा जाकर तेजाजी के साथ सती हो गई. पेमल जब चिता पर बैठी है तो लिलन घोडी को सन्देश देती है कि सत्य समाचार खरनाल जाकर सबको बतला देना. कहते हैं कि अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो गई और पेमल सती हो गई. लोगों ने पूछा कि सती माता तुम्हारी पूजा कब करें तो पेमल ने बताया कि -"भादवा सुदी नवमी की रात्रि को तेजाजी धाम पर जागरण करना और दसमी को तेजाजी के धाम पर उनकी देवली को धौक लगाना, कच्चे दूध का भोग लगाना. इससे मनपसंद कार्य पूर्ण होंगे. यही मेरा अमर आशीष है"लीलन घोड़ी सतीमाता के हवाले अपने मालिक को छोड़ अंतिम दर्शन पाकर सीधी खरनाल की तरफ रवाना हुई. परबतसर के खारिया तालाब पर कुछ देर रुकी और वहां से खरनाल पहुंची. खरनाल गाँव में खाली पीठ पहुंची तो तेजाजी की भाभी को अनहोनी की शंका हुई. लीलन की शक्ल देख पता लग गया की तेजाजी संसार छोड़ चुके हैं. तेजाजी की बहिन राजल बेहोश होकर गिर पड़ी, फिर खड़ी हुई और माता-पिता, भाई-भोजाई से अनुमति लेकर माँ से सत का नारियल लिया और खरनाल के पास ही पूर्वी जोहड़ में चिता चिन्वाकर भाई की मौत पर सती हो गई. भाई के पीछे सती होने का यह अनूठा उदहारण है. राजल बाई को बाघल बाई भी कहते हैं राजल बाई का मंदिर खरनाल में गाँव के पूर्वी जोहड़ में हैं. तेजाजी की प्रिय घोड़ी लीलण भी दुःख नहीं झेल सकी और अपना शारीर छोड़ दिया. लीलण घोड़ी का मंदिर आज भी खरनाल के तालाब के किनारे पर बना है. इतिहासकारों ने तेजाजी के निधन की तिथि दर्ज की: २८ अगस्त, ११०३ ईस्वी। तेजाजी की चमत्कारी शक्तियां आज के विज्ञान के इस युग में चमत्कारों की बात करना पिछड़ापन माना जाता है और विज्ञान चमत्कारों को स्वीकार नहीं करता. परन्तु तेजाजी के साथ कुछ चमत्कारों की घटनाएँ जुडी हुई हैं जिन पर नास्तिक व्यक्तियों को भी बरबस विस्वास करना पड़ता है |

छोटानागपुर के नागवंशी (इतिहास में सबसे लम्बे समय तक राज करने के लिए इन्हें अवस्य याद किया जायेगा ),साभार-डॉ. सुधा सिन्हा (रीडर, रांची कॉलेज, रांची विश्वविद्यालय) की किताब "छोटानागपुर के नागवंशी"

नागवंशी ईसाई युग की शुरुआत के बाद से छोटानागपुर के शासक थे| पहले नागवंशी शासक फणी मुकुट राय का 64 ई. में जन्म हुआ| उन्हें सुताम्बे  के पार्थ राजा  मद्रा मुंडा, ने गोद लिया था| फणी मुकुट राय को एक शरोवर किनारे  एक नवजात शिशु के रूप में पाया गया था| उस वक़्त एक फन्धारी  कोबरा  (नाग) उनकी रक्षा कर रहा था कहा जाता है. कि शायद यह ही वो वजेह है की वह और उनके उत्तराधिकारियों नागवंशी  कहा जाता था |फणी मुकुट राय 83AD से 162 ई. तक शासन किया. अब तक चार नाग्वंशावालियाँ मौजूद  है जो इस बात  की पुष्टि करती है की 1 शताब्दी से 1951(ज़मींदारी प्रथा के खात्मे तक )तक करीब दो हजार साल के लिए भारत में छोटानागपुर पठार पर नागवंशियों का शासन रहा है (यह छोटानागपुर नागवंश को विश्व में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वालों की सूचि में ले जाने का पर्याप्त सबूत है जिस सूचि में  बुल्गारिया के  दुलो  कबीले, इम्पीरियल जापान की सभा और कोरिया के होंग बैंग राजवंश में शामिल हैं)|

अकबर के शासनकाल तक छोटानागपुर मुगलों का आधिपत्य के तहत नहीं आया था और नागवंशी शासकों ने  स्वतंत्र शासक के रूप में इस क्षेत्र पर शासन किया गया था. अकबर को सूचित किया गया की एक विद्रोही अफगान सरदार जुनैद कररानी , छोटानागपुर में शरण ले जा है , इसके अलावा, सम्राट भी इस क्षेत्र में पाए जाने के हीरे की जानकारी मिलने से भी आश्चर्य-चकित था की आखिर  इस राजवंश में ऐसा क्या है की इतना खजाना और प्राकृतिक सौंदर्य के होने के वजेह से जब भी किसी राजवंश ने इन्हें अपने अधिकार में लेने के लिए आक्रमण किया  है उसे हार का मूह देखना पड़ा है | नतीजतन, अकबर ने अपने विश्वस्त  शाहबाज खान तुरबानी को कोखरा (छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं की तत्कालीन राजधानी ) पर हमला करने के  आदेश दिया| उस समय राजा मधु सिंह , 42 वीं नागवंशी राजा के रूप में कोखरा  पर कर रहे थे |दोंनो पक्षों से लम्बे समय तक संघर्ष जरी रहा और अंत में नागवंशियों ने जान और माल की भारी नुक्सान के कारन प्रजाहित देखते हुए ,सुलह कर ली और  छह हजार रुपए की राशि मुगलों को वार्षिक राजस्व के  रूप में देय तय की गई थी |इतिहास का में पहली बार ऐसे साक्ष्य मिले की नागवंशी राजाओं को छोटानागपुर पे राज करते वक़्त किसी के अधीन रहना पड़ा |

जहाँगीर के शासनकाल के आगमन से, नागवंशी राजा दुर्जन साल छोटानागपुर में सत्ता में आए थे| उन्होंने सम्राट अकबर द्वारा तय किराए का भुगतान करने से इनकार कर दिया | जहांगीर ने कोखरा पर  हमला करने के लिए इब्राहिम खान (बिहार के राज्यपाल) का आदेश दिया |इस आक्रमण का विवरण तुजुक  -इ -जहाँगीरी , जहांगीर के संस्मरण में उल्लेख मिलता  हैं | आक्रमण के पीछे एक और कारण भी था. इस क्षेत्र में  संख नदी के बिस्तर में पाया जाने वाले ( जिसे अकबर राज्य को अपने अधीन करने के बाद भी नही पा सका था )हीरे का अधिग्रहण की कोशिश था | हीरे की अत्यधिक मात्र में राज में प्राकृतिक उपलब्धता और  हीरे की एक विशेषज्ञ होने की वजह से राजा दुर्जन  साल को "हीरा राजा "के नाम से जाना जाता था| इस प्रकार छोटानागपुर के राजा को वश में करने और मूल्यवान हीरे प्राप्त करने के लिए, जहांगीर ने छोटानागपुर पर आक्रमण करने का फैसला किया|

बादशाह के आदेश से इब्राहिम खान ने 1615 ई. में कोखरा  के खिलाफ मार्च किया, वह अपने गुप्तचरों  की मदद से आसानी से नागवंशी प्रदेशों में प्रवेश करता गया | राजा दुर्जन साल को और पुरे राजपरिवार को जंगलों पहाड़ियों  में किसी गुफा में राज्य के सामंतो  ने सुरक्षित पहुंचा दिया |युद्ध ख़तम होने से पहले किसी ने ये सूचना मुग़ल सैनिकों को दे दी ,इस गद्दार स्वरुप रजा दुर्जन साल को युद्ध ख़तम होने से पहले गिरफ्तार कर लिया गया और नागवंशी सामंतो का विरोध इसके तुरंत बाद कमजोर हो गया | राजा  दुर्जन  साल के राज्य में जितने भी हीरे थी सब इब्राहिम खान द्वारा कब्जा कर लिया गया | चौबीस हाथियों भी इब्राहिम खान ने बादशाह दरबार के लिए ले ली |इस के बाद, कोखरा के  हीरे इंपीरियल दरबार भेज गया |पहले  इंपीरियल कारागृह  और बाद में ग्वालियर के किले में राजा दुर्जन साल को कैद कर लिया गया |

कर्नल डाल्टन के अनुसार, राजा दुर्जन साल के कारावास बारह साल तक चला |नागवंशी सामंतो ने राजा के बंदी बनाये जाने पे फिर से सैन्य बल एकत्रित किया और विद्रोह कर दिया | अंततः राजा दुर्जन  साल का दुर्भाग्य का कारण बना हीरा ही उसकी रिहाई और पूर्व समृद्धि हासिल होने का कारन बना | दो बहुत बड़े हीरे सम्राट जहांगीर के दरबार में लाया गया है |जहाँगीर को संदेह हुआ की इन् में से एक हीरा नकली है |  उसके अदालत में कोई भी उसके इस शक की पुष्टि करने  के लिए सक्षम नहीं था | हीरा राजा अपनी क़ैद से बादशाह में लाया गया | दो हीरे उनके सामने र्काहे गये उन्होंने बिना देर किया नकली की पहचान कर ली और दरबार में साबित करने के लिए  तो भेड़ों के सर पर हीरा बाँध दिया गया ,उनके अपास में लड़ने से नकली हीरा टूट गया और असली पर खरोंच तक नही आई |जहाँगीर ने सरत के अनुसार उसका साम्राज्य और अभिकार वापस किया और कोखरा के सामंतो ने भी राजा का स्वागत कर मुग़ल शासन के विरुद्ध अपना विरोध शांत किया |

दुबारा कोखरा की गद्दी मिलने पे दुर्जन साल को "महाराजा " की उपाधि दी गयी और उन्होंने अपने उपनाम में "शाह " जोड़ लिया | इसके बाद के लगभग सभी कोखरा के नागवंशी राजाओं के उपनाम में शाह मिलता है | जूदेव ,सिंघ्देव और शाहदेव नागपुर और छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं के उपनाम में जुड़ गया | इन्ही शाहदेव राजाओं ने नेपाल पे भी राज किया |


Jul 8, 2013

नागवंश के गढ़ सुअरमार में अब मिला अद्भुत शिवलिंग!

प्राचीन सुअरमार क्षेत्र में नागवंशीय राजाओं के शासनकाल का प्रमाण मिला है। यहां मिले शिवलिंग से इस प्रमाण को पुख्ता माना जा रहा है कि 8वीं और 9वीं शताब्दी में नागवंशीय राजाओं सुअरमार गढ़ क्षेत्र को केंद्र बनाकर शासन किया है।


सुअरमार राज के ग्राम सिवनी में मिले शिवलिंग की विशाल शिलाखंड की ऊंचाई 1 फुट 8 इंच और तकरीबन 3 फुट 10 इंच का व्यास है। शिवलिंग के संबंध में बताया गया है कि कालांतर में भू-क्षरण की प्रक्रिया के चलते यह धरती के ऊपर आया होगा। शिवलिंग वाले स्थान पर पिछले काफी समय से यहां के ग्रामीण और सुअरमार के तात्कालीन गोंड राजाओं ने धारणी अर्थात गौरी के रूप में पूजा की शुरुआत कर रखी है। प्राचीन शिवलिंग का पता चल जाने के बाद इस स्थान पर अब शिव-गौरी मंदिर निर्माण की योजना ने मूर्तरूप लेना शुरू किया है।

कैसे प्रकाश में आया शिवलिंग

सुअरमारगढ़ की ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व की जानकारियों को एकत्र करने के द्वारा शिक्षक विजय शर्मा को शिवलिंग के संबंध में क्षेत्र के प्रबुद्धजनों ने बताया कि यह नागवंशीय कालीन है। लोगों की जानकारियों को पुख्ता करने के लिए श्री शर्मा ने सिनी राजाबाड़ा को केंद्र बनाकर शिवलिंग से जुड़े तथ्यों को खंगालने का काम शुरू किया तो पाया कि नागवंशीय समाज की परंपरा के अनुसार महल की पूर्व दिशा की ओर ही शिवलिंग की स्थापना की गई है। पास में ही मां गौरी की पूजा लोग वर्षो से करते आ रहे हैं। चरवाहों ने भी इस दिशा में काफी मदद किया।

नागवंशियों का गढ़ में इतिहास

शिक्षक विजय शर्मा की पड़ताल से एकत्र तथ्यों के अनुसार काफी लंबे समय तक सुअरमार के गढ़ क्षेत्र में नागवंशीय राजाओं ने शासन किया है। यहां उनकी राजधानी होने का भी प्रमाण बताया जाता है।

मानता की परंपरा से जुड़ी आस्था

शिवलिंग की प्रमाणिकता का एक और केंद्र यहां लोगों के द्वारा की जा जाने वाली मान्यता और उसके पूरे होने से भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीण विश्वास करते हैं कि शिवजी की मन्नत को पूरा करते हैं।

परंपराओं में सुअरमार के नागवंशीय

18वीं शताब्दी में सुअरमार में सूर्यवंशी राजा ठाकुर शोभराम सिंह ने यहां पर धारणी देवी के नाम से पूजा शुरू की और यह परंपरा आज र्पयत जारी है। स्थल निरीक्षण से इस बात का भी पता चला है कि लिंग क्षेत्र से एक गुप्त द्वार का निर्माण कराया गया था, जो राज्य के सीमा क्षेत्र को निकलता है। कालांतर में इस गुफा के धंस जाने के कारण इसके करीब के सभी पेड़ अभी भी तिरछे हैं। पेड़ों की जड़ें भी सीधी नहीं हैं।

इससे इस बात के ठोस प्रमाण हासिल किए गए कि भू-क्षरण के पहले नागवंशीय काल के सभी अवशेष मौजूद रहे हैं और खुदाई के दौरान यह सब बाहर आ रहे हैं। सुअरमार गढ़ को छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के नक्शे में शामिल कर लिए जाने के बाद से इस क्षेत्र के लोगों में काफी उत्सुकता है। ग्रामीणों का कहना है कि पर्यटन मंडल के इस सुकृत्य से क्षेत्र को एकबार फिर नई पहचान मिलने जा रही है। जिले के पर्यटन कारीडोर को भी बढ़ावा मिला है।

गुमला का प्राचीन दुर्गा मंदिर


झारखंड प्रदेश के अंतिम छोर पर बसे गुमला जिला जंगल, पहाड़, नदी व नालों से घिरा हैं। यहां शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा पूजा का इतिहास काफी प्राचीन है। नागवंशी राजाओं ने जिले के पालकोट प्रखंड में सर्वप्रथम दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर व मूर्ति आज भी साक्षात पालकोट में है। नागवंशी महाराजा यदुनाथ शाह ने 1765 में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। यदुनाथ शाह के बाद उनके वंशज विश्वनाथ शाह, उदयनाथ शाह, श्यामसुंदर शाह, बेलीराम शाह, मुनीनाथ शाह, धृतनाथ शाहदेव, देवनाथ शाहदेव, गोविंद शाहदेव व जगरनाथ शाहदेव ने इस परंपरा को बरकरार रखा।

उस समय मां दशभुजी मंदिर के समीप भैंस की बलि देने की प्रथा थी। लेकिन जब कंदर्पनाथ शाहदेव राजा बने, तो उन्होंने बली प्रथा समाप्त कर दी। यहां दुर्गा पूजा 246 वर्ष पुराना है। पर, आज भी पालकोट के दशभुजी मंदिर विश्व विख्यात है। यहां दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं। मां दशभुजी से दिल से मांगी गई मुराद पूरी होती है। गोविंदनाथ शाहदेव व दामोदरनाथ शाहदेव आज भी अपनी वंशजों की परंपरा को बरकरार रखे हैं।

(नागवंशी राजकुमारी का जौहर )वीरांगना चमेली बावी: एक अविस्मरणीय समर गाथा

रात बहुत हो चुकी थी लेकिन अन्नमदेव अभी सोये नहीं थे। उनकी आँखों के आगे रह रह कर उस वीरांगना की छवि उभर रही थी जिसनें आज के युद्ध का स्वयं नेतृत्व किया। नीले रंग का उत्तरीयांचल पहने हुए वह वीरांगना शरीर पर सभी युद्ध-आभूषण कसे हुए थी जिसमें भारी भरकम कवच एवं वह लौह मुकुट भी सम्मिलित था जिसमें शत्रु के तलवारों के प्रहार से बचने के लिये लोहे की ही अनेकों कडिया कंधे तक झूल रही थीं। वीरांगना नें अपने केश खुले छोड दिये थे तथा उसकी प्रत्येक हुंकार दर्शा रही थी जैसे साक्षात महाकाली ही युद्ध के मैदान में आज उपस्थित हुई हैं। अन्नमदेव हतप्रभ थे; वे तो आज ही अपनी विजय तय मान कर चल रहे थे फिर यह कैसा सुन्दर व्यवधान? उन्हें बताया गया था कि यह राजकन्या चमेली बावी है जो नाग राजा हरीश्चंद देव की पुत्री है। अन्नमदेव पुन: उस दृश्य को आँखों के आगे सजीव करने लगे जब युद्धक्षेत्र में राजकुमारी चमेली बावी अपनी दो अन्य सहयोगिनियों झालरमती नायकीन तथा घोघिया नायिका के साथ काकतीय सेना पर टूट पडी थीं। इतना सुव्यवस्थित युद्ध संचालन कि अपनी विजय को तय मान चुकी सेना घंटे भर के संघर्ष में ही तितर-बितर हो गयी और स्वयं अन्नमदेव पराजित तथा सैनिक सहायता के लिये प्रतीक्षारत तम्बू में ठहरे हुए यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब बारसूर और किलेपाल से उनके सरदार अपनी अपनी सैन्य टुकडियों के साथ पहुँचे और पुन: एक जबरदस्त हमला चक्रकोटय के अंतिम नाग दुर्ग पर किया जा सके।

अगले दिन की सुबह का समय और विचित्र स्थिति थी। आक्रांता सेना अपने तम्बुओं में सिमटी हुई थी जबकि वीरांगना चमेली बावी अपने शस्त्र चमकाते हुए अपनी सेना के साथ आर या पार के संघर्ष के लिये आतुर दिख रही थी। वह अन्नमदेव जिसने अब तक गोदावरी से महानदी तक का अधिकांश भाग जीत लिया था एक वृक्ष की आड से मंत्रमुग्ध इस राजकन्या को देख रहा था। चक्रकोट्य में आश्चर्य की स्थिति निर्मित हो गयी चूंकि इस तरह काकतीय पलायन कर जायेगे सोचा नहीं जा सकता था। तभी एक घुडसवार सफेद ध्वज बुलंद किये तेजी से आता दिखाई दिया। उसे किले के मुख्यद्वार पर ही रोक लिया गया। यह दूत था जो कि अन्नमदेव के एक पत्र के साथ राजा हरिश्चन्द देव से मिलना चाहता था। राजा घायल थे अत: दूत को उनके विश्रामकक्ष में ही उपस्थित किया गया। चूंकि सेना का नेतृत्व स्वयं चमेली बावी कर रही थी अत: वे भी अपनी सहायिकाओं के साथ महल के भीतर आ गयी।

बाहर अन्नमदेव के दिन की धड़कने बढी हुई थीं। वे प्रेम-पाश में बँध गये थे। सारी रात हाँथ में तलवार चमकाती हुई चमेली बावी का वह आक्रामक-मोहक स्वरूप सामने आता रहा और वे बेचैन हो उठते। यह युवति ही उनकी नायिका होने के योग्य है....। केवल रूप ही क्यों वीरता एसी अप्रतिम कि जिस ओर तलवार लिये उनका अश्व बढ जाता मानो रक्त की होली खेली जा रही होती। राजकुमारी चमेली नें कई बार अन्नमदेव की ओर बढने का प्रयास भी किया था किंतु काकतीय सरदारों नें इसे विफल बना दिया। तथापि एक अवसर पर वे अन्नमदेव के अत्यधिक निकट पहुँच गयी थी। अन्नमदेव नें तलवार का वार रोकते हुए वीरांगना की आँखों में प्रसंशा भाव से क्या देखा कि बस उसी के हो कर रह गये। काजल लगी हुई जो बडी-बडी आखें आग्नेय हो गयी थीं वे अब बहुत देर तक अपलक ही रह गये अन्नमदेव की आखों का स्वप्न बन गयी थी।

महाराज! दूत आने की आज्ञा चाहता है।द्वारपाल नें तेलुगू में तेज स्वर से उद्घोषणा की। अन्नमदेव के शिविर से दूत को भीतर भेजने का ध्वनि संकेत दिया गया। अन्नमदेव आश्वस्त थे कि वे जो चाहते हैं वही होगा। हरिश्चंददेव के अधिकार मे केवल गढिया, धाराउर, करेकोट और गढचन्देला के इलाके ही रह गये थे; यह अवश्य था कि भ्रामरकोट मण्डल के जिनमें मरदापाल, मंधोता, राजपुर, मांदला, मुण्डागढ, बोदरापाल, केशरपाल, कोटगढ, राजगढ, भेजरीपदर आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं; से कई पराजित नाग सरदार अपनी शेष सन्य क्षमताओं के साथ हरीश्चंद देव से मिल गये थे तथापि अब बराबरी की क्षमताओं का युद्ध नहीं रह गया था।

क्यों मौन हो पत्रवाहक?” अन्नमदेव नें बेचैनी से कहा। वे अपने मन का उत्तर सुनना चाहते थे आखिर प्रस्ताव ही मनमोहक बना कर भेजा गया था। हरिश्चंददेव से संधि की आकांक्षा के साथ अन्नमदेव नें कहलवाया था कि बस्तर राज्य की सीमा चक्रकोट से पहले ही समाप्त हो जायेगी तथा आपको काकतीय शासकों की ओर से हमेशा अभय प्राप्त होगा। चक्रकोट पर हुए किसी भी आक्रमण की स्थिति में भी आपको बस्तर राज्य से सहायता प्रदान की जायेगी.....राजा हरिश्चंददेव के साथ संधि की केवल एक शर्त है कि वे अपनी पुत्री राजकुमारी चमेली बावी का विवाह हमारे साथ करने के लिये सहमत हो जायें

क्या कहा राजा हरिश्चंद नें?” अन्नमदेव नें इस बार स्वर को उँचा कर बेचैन होते हुए पूछा।
जी राजा नें कहा कि अपनी बेटी के बदले उन्हें किसी राज्य की या जीवन की कामना नहीं है। पत्रवाहक नें दबे स्वर में कहा।

और कोई विशेष बात?” अन्नमदेव आवाक थे।

जी राजकुमारी नें अभद्रता का व्यवहार किया।

क्या कहा उन्होंने?”

“.....उन्होंने कहा कि स्त्री को संधि की वस्तु समझने वाले अन्नमदेव का विवाह प्रस्ताव मैं ठुकराती हूँ

ओहअन्नमदेव के केवल इतना ही कहा और मौन हो गये। यह तो एक कपोत का बाज को ललकारने भरा स्वर था; नागराजा का इतना दुस्साहस कि जली हुई रस्सी के बल पर अकड रहा है? “....और यह राजकुमारी स्वयं को आखिर क्या समझती हैं? अब आक्रमण होगा। विजय के चिन्ह स्वरूप बलात हरण किया जायेगा और मैं उस मृगनयनी-खड़्गधारिणी से विवाह करूंगा। अन्नमदेव की भँवे तनने लगीं थी।

सुबह होते ही युद्ध की दुंदुभि बजने लगी। दोनों ओर की सेनायें सुसजित खडी थीं। हरिश्चंददेव घायल होने के बाद भी अपने हाथी पर बैठ कर धनुष थामे अपने साथियों सैनिको का उत्साह बढा रहे थे। चमेली बावी नें सीधे उस सैन्यदल पर धावा बोलने का निश्चिय किया था किस ओर आक्रांता अन्नमदेव होंगे। यद्यपि आक्रांताओं नें भी भीषण तैयारी कर रखी थी। हरिश्चंद देव की कुल सैन्य क्षमता से कई गुना अधिक सैनिकों नें बारसूर, किलापाल और करंजकोट की ओर से चक्रकोट्य को चेर लिया था। भीषण संग्राम हुआ; नाग आहूतियाँ देते रहे और अन्नमदेव बेचैनी के साथ युद्ध के परिणाम तक पहुँचने की प्रतीक्षा करता रहा। आज कई बार आमने सामने के युद्ध में चमेली बावी नें उसे अपने तलवार चालन कौशल का परिचय दिया था। एसी प्रत्येक घटना अन्नमदेव के भीतर राजकुमारी चमेली के प्रति उसकी आसक्ति को बलवति करती जा रही थी। नहीं; अब युद्ध अधिक नहीं खीचा जाना चाहिये....अन्नमदेव अचूक धनुर्धर थे। धनुष मँगवाया गया तथा अब उन्होंने हरिश्चंददेव को निशाना बनाना आरंभ कर दिया। वाणों के आदान-प्रदान का दौर कुछ देर चला। तभी एक प्राणघातक वाण हरिश्चंद देव की छाती में आ धँसा। अन्नमदेव नें अब कि उस महावत को भी निशाना बनाया जो हरिश्चंद देव का हाथी युद्ध भूमि से लौटाने की कोशिश कर रहा था। नाग सेनाओं में हताशा और भगदड मच गयी। राजकुमारी नें स्थिति का अवलोकन किया और उन्हें पीछे हट कर नयी रणनीति बनाने के लिये बाध्य होना पड़ा। आनन फानन में राजकुमारी चमेली का तिलक कर उन्हें चक्रकोटय जी शासिका घोषित कर दिया गया यद्यपि इस समय केवल गिनती के सैनिक ही जयघोष करने के लिये शेष रह गये थे। बाहर युद्ध जारी था तथा अनेको वीर नाग सरदार अपनी नयी रानी तक अन्नमदेव की पहुँच को असंभव किये हुए थे। अपनी मनोकामना की पूर्ति में इस विलम्ब से कुपित अन्नमदेव नाग नें नाग सरदारो के पीछे अपने सैनिकों के कई कई जत्थे छोड़ दिये। भगदड मच गयी और अनेक सरदार व नाग सैनिक अबूझमाड़ की ओर खदेड दिये गये।

अब अन्नमदेव की विजयश्री का क्षण था। पत्थर निर्मित किले की पहले ही ढहा दी गयी दीवार से भीतर वे सज-धज कर तथा हाथी में बैठ कर प्रविष्ठ हुए। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। नगरवासी मौन आँखों से अपने नये शासक को देख रहे थे। सैनिक तेजी से आगे बढते हुए एक एक भवन और प्रतिष्ठान पर कब्जा करते जा रहे थे। राजकुमारी को गिरफ्तार कर प्रस्तुत करने के लिये एक दल को आगे भेजा गया था। अन्नमदेव चाहते थे कि राजकन्या का दर्पदमन किया जाये और तब वे उसके साथ सबके सम्मुख इसी समय विवाह करें।

क्या हुआ सामंत शाह, लौट आये?...कहाँ हैं राजकुमारी चमेली?”

“.....”

सबको साँप क्यों सूंघ गया है?क्या हुआ?” अन्नमदेव नें अपने सरदार सामंत शाह और उसके साथी सैनिकों के चेहरे के मनोभावों को पढने की कोशिश करते हुए कहा। 

“...जौहर राजा साहब। राजकुमारी अपनी दोनो मुख्य सहेलियों झालरमती और घोगिया के साथ मेरे सामने ही आग में कूद पडी और अपने प्राण दे दिये

तो तुमने बचाने की कोशिश नहीं की.....।बेचैनी में शब्दों नें अन्नमदेव का साथ छोड दिया था।

“...राजकुमारी आग में प्रवेश करने से पहले शांत थी, वे मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने मुझे सम्बोधित किया और कहा कि मैं जा कर अपने राजा से कह दूं कि आक्रमणकारी बल से किसी की जमीन तो हथिया सकते हैं लेकिन मन और प्रेम हथियारों से हासिल नहीं होते....।

हाथी अब उस ओर मोड दिया गया जिस ओर से धुँआ उठ रहा था। राजा की नम आँखे कोई नहीं देख सका। एसी पराजय की कल्पना भी अन्नमदेव ने नहीं की थी।



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मड़वा महल

भोरमदेव मंदिर के पास एक और महत्वपूर्ण एतिहासिक स्मारक मड़वा महल दर्षनीय हैं। जो कि भोरमदेव से लगभग 1 किमी. की दूरी पर स्थित  हैं। मड़वा महल को नागवंशी राजा और हैहवंशी रानी के विवाह के स्मारक के रूप में जाना जाता हैं। स्थानीय बोली में मड़वा का अर्थ विवाह पंडाल होता हैं। वैसे तो मूल रूप से मड़वा महल एक शिव मंदिर था परंतु इसका आकार विवाह के शामियाना की तरह होने के कारण इसे मड़वा महल के रूप में जाना जाता हैं। इसे दुल्हा देव भी कहा जाता हैं। नागवंशी सम्राट रामचंद्र देव ने सन 1349 में यहां मंदिर का निर्माण कराया। जिसके गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित हैं और यह मंडप 16 स्तंभो पर टिकी हुर्इ हैं। इस मंदिर के बाहय दीवारो पर बेहद सुंदर ऐवम  कामोत्तेजक मूर्तियां बनार्इ गर्इ हैं। इन दीवारों पर चित्रित कामोक मूर्तियां विभिन्न 54 मुद्राओं में दर्शायी गयी हैं। यहां सारे आसन कामसूत्र से प्रेरित हैं। जो कि वास्तव में अनंत प्रेम और सुंदरता का प्रतिक हैं। यह सारे चित्रण कलात्मक दृषिट से भी महत्वपूर्ण हैं। तत्कालीन नागवंषी राजाओं का तंत्रपर अत्यधिक विश्वास करते थे। जैसा कि दिवारों पर बने हल्दी के निशानों से इसका संकेत मिलता हैं। कि विवाह और अन्य अनुष्ठानों के समय इनका प्रर्दशन  किया जाता रहा होगा।
भोरमदेव मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही अपनी वास्तुकला की पृष्ठ भूमि के लिए भी अद्वितीय हैं। यह मंदिर मुख्यत: दो भागों में बना हैं। इसके एक भाग में .   मंदिर बनाया गया एवं दूसरे भाग को पत्थरों पर नक्काशी के द्वारा निर्मित किया मुख्य भोरमदेव मंदिर सुरम्य एवं शांत झील के सामने बना हैं। इस मध्य युगीन मंदिर 5 फीट उंचे स्थान पर मंडप अंतराल और गर्भगृह के मिलाकर बनाया गया हैं। पूर्व मुखी मंदिर में  पश्चिम  को छोड़कर तीनों दिशाओं पर द्वार हैं। र्इंट निर्मित मंदिर भी गर्भगृह के समान हैं। परंतु यहां मंडप नहीं बना हैं। और खुली दिवार ही हैं जिसे .....कहा जाता हैं। इस मंदिर के उपर भी भोरमदेव मंदिर जैसा ही आकार बनाया गया हैं। परंतु इसकी चोटी का भाग मध्य में टूटा हुआ है। गर्भगृह के प्रवेश द्वारा पूरी तरह से पाषाण निर्मित हैं जिसका केंद्र स्तंभ आसपास के तीन स्तंभों से जुड़ा हुआ हैं। मुख्य मंदिर के बाहर शिवलिंग और उमा महेष्वर की मूर्तियां स्थापित हैं। उनके सामने राजा और रानी उपासना कर रहे हैं।

बुंदेलखंड के सोमनाथ : खंडहर में बसा इतिहास

 पुराने समय में शिवभक्त राजा या शासक  लोग अपने नाम के साथ ‘नाथ’  या ‘ईश्वर’ जोडकर शिवमंदिर का निर्माण कराया करते थे, किंतु सोमनाथ का नाम प्रायः गुजरात के प्रभासपत्तन नामक स्थान पर चालुक्य शासकों द्वारा बनवाए गए सोमनाथ मंदिर के लिए रूढ हो गया था। बुंदेलखंड क्षेत्र में पाठा की दुर्गम विंध्य श्रृंखलाओं के बीच सोमनाथ मंदिर, नाम सुनकर जितना आश्चर्य होता है उससे कहीं अधिक आश्चर्य मंदिर को देखकर होता है क्योंकि मंदिर का स्थापत्य मन को मोह लेने वाला है।
  यह क्षेत्र पुरातनकाल से ही धर्म, संस्कृति और मानव सभ्यता का बड़ा केंद्र रहा है। यहाँ कई राजवंश भी कायम रहे हैं जिनके प्रतीक गौरवपूर्ण अतीत के साक्ष्य के रूप में इस क्षेत्र में कायम हैं। पुरातन महत्त्व का ऐसा ही यह गुमनाम-सा प्रतीक चित्रकूट जनपद में कर्वी से मानिकपुर मार्ग पर स्थित चर गांव में है।
यह मंदिर वृत्ताकार पहाडी पर बना है। मंदिर तक पहुँचने के लिए बनी सीढियों के पास लाल बलुए पत्थर से बनी मुगदरधारी योद्धा, नृत्यगणेश मूर्तियों के साथ ही चित्रात्मक प्रस्तरों के भग्न खंड रखे हुए हैं। संभवतः इन प्रस्तरों को गांव के लोगों ने इस प्रकार रखा होगा। मंदिर में पडी हुई भावात्मक प्रस्तर कलाकृतियाँ, भग्न मूर्तियाँ इस बात को साबित करतीं हैं कि मंदिर बहुत पुराना होगा और इसका स्थापत्य भी अपने आप में बेजोड रहा होगा।
खंडहरनुमा मंदिर को देखने से पता चलता है कि इसमें अष्टकोणीय मण्डप रहा होगा, जिसकी छत गिर चुकी है। मण्डप के गुंबदों में अप्सराओं की सुंदर मूर्तियां हैं। मण्डप के पीछे गर्भगृह जैसा है, जहां शिवलिंग स्थापित है। यह गर्भगृह सुरक्षित लगता है, किंतु इसमें हुए नवनिर्माण को देखकर लगता है कि इसमें कुछ बदलाव हुआ है, यह किस कारण से हुआ, इसको कुछ कहा नहीं जा सकता। मण्डप के आगे की ओर बनी चारदीवारी से अनुमान लगता है कि यहाँ एक बड़ा मंदिर रहा होगा जो पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। गर्भगृह और मण्डप का पिछला हिस्सा भी एकदम ध्वस्त हो चुका है।
इस खंडहरनुमा गर्भगृह और मण्डप की प्रदक्षिणा के लिए एक रास्ता जैसा बनाया गया है, जिसमें रखे हुए विभिन्न आकार-प्रकारों के शिवलिंगों को देखकर ऐसा अनुमान होता है कि इसमें छोटे-छोटे कई शिव मंदिर रहे होंगे। इसी तरह मंदिर के प्रदक्षिणा-पथ के दोनों ओर टूटी-फूटी मूर्तियों, मण्डप के भग्नावशेषों और गुंबदों-प्रस्तरों को व्यवस्थित करके रखा गया है। इनमें से कई मूर्तियाँ दैनंदिन जीवन को व्याख्यायित करती हैं। इन मूर्तियों में से कुछ युद्ध की भी हैं, कुछ मातृ रूप प्रकट करती मूर्तियां हैं, कुछ मूर्तियों में दैवासुर संग्राम दर्शाया गया है और ऐसी ही एक विशालकाय प्रतिमा शेषशायी विष्णु की भी है। गुंबदों पर बनी विभिन्न मूर्तियों के साथ ही अन्य तमाम प्रस्तर मूर्तियों की अपनी एक विशेषता है कि उनके सिर के ऊपर गूमड़ जैसा बना हुआ है, जैसे कोई छोटा-सा शिवलिंग बना हो। यह गूमड़ या शिवलिंग भारशिवों के प्रतीक माने जाते हैं।
  इस क्षेत्र में नागवंशी भारशिवों का शासन था, जिनकी राजधानी नचना-कुठार (पन्ना, म.प्र.) में थी और उपराजधानी भारगढ़ (वर्तमान बरगढ़) थी। सोमनाथ मंदिर के निकट स्थित एक छोटे से गाँव बरकोठ या भारकोट का इतिहास भी ऐसे ही इनसे जुड़ा होगा। भारशिव शासक शैव मत के कट्टर अनुयायी थे और सिर पर शिवलिंग धारण किये हुए भारशिव प्रतिमाएं इनका प्रतीक होती थीं। गुप्त शासकों के शक्तिशाली होने पर नागवंशी शासकों ने उनसे रोटी-बेटी का संबंध स्थापित किया और इस तरह इस क्षेत्र के नागवंशी शासक गुप्त राजाओं के माण्डलिक बन गए तथा गुप्त शासकों का इस क्षेत्र में परोक्ष शासन स्थापित हुआ। सोमनाथ मंदिर में मिलने वाली भारशिव प्रतिमाएं और इनके साथ ही शेषशायी विष्णु की प्रतिमाएं इस बात को प्रमाणित करती हैं कि यह मंदिर गुप्तकाल की स्थापत्य कला की प्रेरणा लेकर, गुप्तकाल के स्थापत्य की तर्ज पर दूसरी से चौथी शताब्दी के मध्य भारशिवों द्वारा बनवाया गया होगा।
भारशिव (नागवंशी) शासकों की यह भी विशिष्टता रही है कि वे आदिवासी जीवन जीते हुए तथा शैव साधना करते हुए विधर्मी और परराष्ट्राक्रांताओं को पछाड़ते रहे हैं। यदि इतिहास को खंगाला जाय तो यह समझ में आता है कि गुप्त शासकों की सत्ता स्थापित करने और उनके शासन को समृद्ध, सफल बनाने में नागवंश के शासकों का अमूल्य योगदान रहा है। जब बुंदेलखंड में गुप्त शासकों की पकड़ धीमी पड़ने लगी तब बुंदेलखंड में गुप्त शासकों के मांडलिक वाकाटक शासकों का आधिपत्य कायम हुआ। वाकाटक शासकों के प्रतीक तो प्राप्त होते हैं, किंतु नागवंश के शासकों के प्रतीक बहुत कम ही मिलते हैं। इतिहास में दर्ज है कि नागवंशी शासक युद्ध आदि में व्यस्त रहे और इन्होने अपने शासन के प्रतीक स्थापित नहीं किये। इस कारण से भी यह मंदिर अनूठा, अद्वितीय, अतुलनीय और दुर्लभ सांस्कृतिक धरोहर की श्रेणी में आता है।
चर ग्राम के लोग बताते हैं कि चालीस वर्ष पहले तक यह मंदिर काफी हद तक ठीक स्थिति में था। बीहड़ में होने के कारण यह आक्रांताओं की नज़र में नहीं आया और शायद इसी कारण यह सुरक्षित भी रह सका। किंतु बाद में इस मंदिर की दुर्लभ मूर्तियां चोरी होती गईं। ग्रामवासियों से यह भी पता चला कि मंदिर में एक नागेश्वर शिवलिंग भी था जिसमें एक शिलालेख था। उस शिलालेख से मंदिर के इतिहास पर कुछ रोशनी पड़ सकती थी, किंतु उसकी चोरी हो चुकी है। लेकिन यह मंदिर नागशासकों का होगा इस तथ्य को नागेश्वर शिवलिंग के माध्यम से पुष्ट किया जा सकता है।
धार्मिक, पुरातात्त्विक विशिष्टता के साथ ही इस क्षेत्र का प्राकृतिक सौंदर्य भी गजब का है। चारों ओर हरियाली से भरी हुई विंध्य पर्वत श्रृंखला, मंदिर के पीछे की ओर बहती वाल्मीकि नदी और आगे चलकर वारुणी-वाल्मीकि नदियों का संगम ऐसे सुरम्य, मनोहारी प्राकृतिक दृश्य का सृजन करता है कि मन मुदित हो उठता है। बेशक, सोमनाथ मंदिर का भ्रमण धर्म, इतिहास, संस्कृति और प्रकृति के समवेत साहचर्य का अनूठा, अद्भुत आनंद देने वाला है।
यह गुप्तकालीन शिव मंदिर अपने अस्तित्व की आखिरी साँसें गिन रहा है। मंदिर के पूर्वोत्तर में बरकोठ गाँव, पूर्व की ओर लालापुर की पहाडी, देउरा-नेउरा की पहाडी और लहरी पुरवा है, यह सभी ऐतिहासिक महत्त्व के स्थल हैं और इन स्थलों पर ध्वंसावशेष आदि भी प्राप्त होते हैं, जो प्रायः नष्ट हो चुके हैं।
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पत्‍थरों में छलकता सौंदर्य भोरमदेव मंदिर समूह

छत्‍तीसगढ़ स्‍थापत्‍य कला के अनेक उदाहरण अपने आंचल में समेटे हुए हैं। यहां के प्राचीन मंदिरों का सौंदर्य किसी भी दृष्टि में खजुराहो और कोणार्क से कम नहीं है। यहां के मंदिरों का शिल्‍प जीवंत है। छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 116 किलोमीटर उत्‍तर दिशा की ओर सकरी नामक नदी के सुरम्‍य तट पर बसा कवर्धा नामक स्‍थल नैसर्गिक सुंदरता और प्राचीन सभ्‍यता को अपने भीतर समेटे हुए है। इस स्‍थान को कबीरधाम जिले का मुख्‍यालय होने का गौरव प्राप्‍त है। प्राचीन इतिहास की गौरवशाली परंपरा को प्रदर्शित करता हुआ कवर्धा रियासत का राजमहल आज भी अपनी भव्‍यता को संजोये हुए खड़ा है।
कवर्धा से 18 किलोमीटर की दूरी पर सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के पूर्व की ओर स्थित मैकल पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे सुरम्‍य वनों के मध्‍य स्थित भोरमदेव मंदिर समूह धार्मिक और पुरातत्‍वीय महत्‍व के पर्यटन स्‍थल के रूप में जाना जाता है। भोरमदेव का यह क्षेत्र फणी नागवंशी शासकों की राजधानी रही जिन्‍होंने यहां 9वीं शताब्‍दी ईस्‍वी से 14वीं सदी तक शासन किया। भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्‍दी में फणी नागवंशियों के छटे शासक गोपाल देव के शासन काल में लक्ष्‍मण देव नामक राजा ने करवाया था।
भोरमदेव मंदिर का निर्माण एक सुंदर और विशाल सरोवर के किनारे किया गया है, जिसके चारों और फैली पर्वत श्रृंखलाएं और हरी-भरी घाटियां पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। भोरमदेव मंदिर मूलत: एक शिव मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि शिव के ही एक अन्‍य रूप भोरमदेव गोंड समुदाय के उपास्‍य देव थे। जिसके नाम से यह स्‍थल प्रसिद्ध हुआ। नागवंशी शासकों के समक्ष यहां सभी धर्मों के समान महत्‍व प्राप्‍त था जिसका जीता जागता उदाहरण इस स्‍थल के समीप से प्राप्‍त शैव, वैष्‍णव, बौद्ध और जैन प्रतिमाएं हैं।
भोरमदेव मंदिर की स्‍थापत्‍य शैली चंदेल शैली की है और निर्माण योजना की विषय वस्‍तु खजुराहो और सूर्य मंदिर के समान है जिसके कारण इसे छत्‍तीसगढ़ का खजुराहो के नाम से भी जानते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन समानांतर क्रम में विभिन्‍न प्रतिमाओं को उकेरा गया है जिनमे से प्रमुख रूप से शिव की विविध लीलाओं का प्रदर्शन है। विष्‍णु के अवतारों व देवी देवताओं की विभिन्‍न प्रतिमाओं के साथ गोवर्धन पर्वत उठाए श्रीकृष्‍ण का अंकन है। जैन तीर्थकरों की भी अंकन है। तृतीय स्‍तर पर नायिकाओं, नर्तकों, वादकों, योद्धाओं मिथुनरत युगलों और काम कलाओं को प्रदर्शित करते नायक-नायिकाओं का भी अंकन बड़े कलात्‍मक ढंग से किया गया है, जिनके माध्‍यम से समाज में स्‍थापित गृहस्‍थ जीवन को अभिव्‍यक्‍त किया गया है। नृत्‍य करते हुए स्‍त्री पुरुषों को देखकर यह आभास होता है कि 11वीं-12वीं शताब्‍दी में भी इस क्षेत्र में नृत्‍यकला में लोग रुचि रखते थे। इनके अतिरिक्‍त पशुओं के भी कुछ अंकन देखने को मिलते हैं जिनमें प्रमुख रूप से गज और शार्दुल (सिंह) की प्रतिमाएं हैं। मंदिर के परिसर में विभिन्‍न देवी देवताओं की प्रतिमाएं, सती स्‍तंभ और शिलालेख संग्रहित किए गए हैं जो इस क्षेत्र की खुदाई से प्राप्‍त हुए थे। इसी के साथ मंदिरों के बाई ओर एक ईंटों से निर्मित प्राचीन शिव मंदिर भी स्थित है जो कि भग्‍नावस्‍था में है। उक्‍त मंदिर को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस काल में भी ईंटों से निर्मित मंदिरों की परंपरा थी।
भोरमदेव मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम के निकट एक अन्‍य शिव मंदिर स्थित है जिसे मड़वा महल या दूल्‍हादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। उक्‍त मंदिर का निर्माण 1349 ईसवी में फणीनागवंशी शासक रामचंद्र देव ने करवाया था। उक्‍त मंदिर का निर्माण उन्‍होंने अपने विवाह के उपलक्ष्‍य में करवाया था। हैहयवंशी राजकुमार अंबिका देवी उनका विवाह संपन्‍न हुआ था। मड़वा का अर्थ मंडप से होता है जो कि विवाह के उपलक्ष्‍य में बनाया जाता है। उस मंदिर को मड़वा या दुल्‍हादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर 54 मिथुन मूर्तियों का अंकन अत्‍यंत कलात्‍मकता से किया गया है जो कि आंतरिक प्रेम और सुंदरता को प्रदर्शित करती है। इसके माध्‍यम से समाज में स्‍थापित गृहस्‍थ जीवन की अंतरंगता को प्रदर्शित करने का प्रयत्‍न किया गया है।
भोरमदेव मंदिर के दक्षिण पश्चिम दिशा में एक किलोमीटर की दूरी पर एक अन्‍य शिव मंदिर स्थित है जिसे छेरकी महल के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण भी फणीनागवंशी शासनकाल में 14वीं शताब्‍दी में हुआ। ऐसा कहा जाता है कि उक्‍त मंदिर बकरी चराने वाल चरवाहों को समर्पित कर बनवाया गया था। स्‍थानीय बोली में बकरी को छेरी कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ईंटों के द्वारा हुआ है। मंदिर के द्वार को छोड़कर अन्‍य सभी दीवारें अलंकरण विहीन हैं। इस मंदिर के समीप बकरियों के शरीर से आने वाली गंध निरंतर आती रहती है। पुरातत्‍व विभाग द्वारा इस मंदिर को भी संरक्षित स्‍मारकों के रूप में घोषित किया गया है।
भोरमदेव छत्‍तीसगढ़ का महत्‍वपूर्ण पर्यटन स्‍थल है। जनजातीय संस्‍कृति, स्‍थापत्‍य कला और प्राकृतिक सुंदरता से युक्‍त भोरमदेव देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। प्रत्‍येक वर्ष यहां मार्च के महीने में राज्‍य सरकार द्वारा भोरमदेव उत्‍सव का आयोजन अत्‍यंत भव्‍य रूप से किया जाता है। जिसमें कला व संस्‍कृति के अद्भुत दर्शन होते हैं।

कैसे पहुंचे
सड़क मार्ग से भोरमदेव रायपुर से 134 किमी और बिलासपुर से 150 किमी, भिलाई से 150 किमी और जबलपुर से 150 किमी दूर है। यहां निजी वाहन, बस या टैक्‍सी द्वारा जाया जा सकता है।
निकटतम रेलवे स्‍टेशन - रायपुर 134 किमी, बिलासपुर 150 किमी और जबलपुर 150 किमी दूर।
निकटतम हवाई अड्डा- रायपुर 134 किमी जो दिल्‍ली मुंबई, नागपुर, भुवनेश्‍वर, कोलकाता, रांची, विशाखापट्टनम व चेन्‍नई से सीधी रेलसेवाओं से जुड़ा है।
कहां ठहरें कवर्धा में विश्रामगृह और निजी होटल है। भोरमदेव में भी पर्यटन मंडल का विश्रामगृह और निजी रिसार्ट हैं।


छत्तीसगढ़ के क्षेत्रिय राजवंश



छत्तीसगढ़ में क्षेत्रिय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। उसके बारे में यहाँ अलग से संक्षिप्त चर्चा निम्नलिखित है -
क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे :
बस्तर के नल और नाग वंश।
कांकेर के सोमवंशी।
और कवर्धा के फणि-नाग वंशी।
बस्तर के नल और नाग वंश
कुछ साल पहले अड़ेगा, जो जिला बस्तर में स्थित है, वहाँ से कुछ स्वर्ण-मुद्राएं मिली थीं। स्वर्ण-मुद्राओं से पता चलता है कि वराह राज, जो नलवंशी राजा थे, उनका शासन बस्तर के कोटापुर क्षेत्र में था। वराहराज का शासन काल ई. स. 440 में था। उसके बाद नल राजाओं जैसे भवदन्त वर्मा, अर्थपति, भट्टाटक का सम्बन्ध बस्तर के कोटापुर से रहा। ये प्राप्त लेखों से पता चलता है।
कुछ विद्वानों का कहना है कि व्याध्रराज नल-वंशी राजा थे। ऐसा कहते हैं कि व्याध्रराज के राज्य का नाम महाकान्तर था। और वह महाकान्तर आज के बस्तर का वन प्रदेश ही है। व्याध्रराज के शासन की अवधि थी सन् 350 ई.।
नल वंशी राजाओं में भवदन्त वर्मा को प्रतापी राजा माना जाता है। उनके शासन काल की अवधि सन् 440 से 465 ई. मानी जाती है।
अर्थपति भट्टारक, भवदन्त वर्मा के पुत्र ने महाराज की पदवी धारण कर सन् 465 से  475 ई. तक शासन किया।
अर्थपति के बाद राजा बने उसके भाई स्कन्द वर्मा जिन्होंने शत्रुओं से अपने राज्य को दुबारा हासिल किया था। ऐसा कहते हैं कि स्कन्द वर्मा ने बस्तर से दक्षिण - कौसल तक के क्षेत्र पर शासन किया था।
स्कन्द वर्मा के बाद राजा बने थे नन्दन राज। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वे किसके पुत्र थे।
नलवंश में एक और राजा के बारे में पता चलता है - उनका नाम था पृथ्वी राज। वे बहुत ही ज्ञानी थे। चिकित्सा शास्र में उनकी दखलंदाज़ी थी
उनके बाद राजा बने विरुपराज। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे बहुत ही सत्यवादी थे। उनकी तुलना राजा हरिश्चन्द्र के साथ ही जाती है।

उसके बाद उनका पुत्र विलासतुंग राजा बना। विलासतुंग पाण्डुवंशीय राजा बालार्जुन के समसामयिक थे। विलासतुंग ने ही राजिम में राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया। बालार्जुन की माँ ने सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर निर्माण करवाया था। उसी मन्दिर का अनुकरण करके राजिम में राजीव लोचन मन्दिर बनवाया गया था। विलासतुंग वैष्णव था।


विलास तुंग के बाद राजा बने थे भीमसेन, नरेन्द्र धवल व पृथ्वी-व्याध्र।
नल वंशियों के अस्तित्व के बारे में कहते हैं कि नवीं सदी तक वे महाकान्तार और उसके आसपास के भागों में थे।
दसवीं सदी की शुरुआत में कल्चुरि शासकों के आक्रमण के बाद पराजित नल वंशियों ने अपनी सत्ता खो दी। पर कुछ साल बाद बस्तर कोटापुर अंचल में हम फिर से नल वंशियों के उत्तराधिकारी को छिंदक-नागवंशिय के रुप में देखते हैं।
छिंदक नागवंश (बस्तर)
बस्तर के प्राचीन नाम के सम्बन्ध में अलग-अलग मत हैं। कई "चक्रकूट" तो कई उसेे "भ्रमरकूट" कहते हैं। नागवंशी राजा इसी "चक्रकूट" या "भ्रमरकूट" में राज्य करते थे।
सोमेश्वरदेव थे छिंदक नागों में सबसे जाने-माने राजा। वे अत्यन्त मेधावी थे। धनुष चलाने में अत्यन्त निपुण थे। उन्होंने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया। वे शासन करते रहे सन् 1 096 से सन् 1111 तक।
उनकी मृत्यु के बाद कन्दरदेव राजा बने और शायद सन् 111 1 से सन् 11 1 2 के बीच राज्य करते रहे।
उसके बाद जयसिंह देव का शासन काल आरम्भ हुआ। अनुमान है कि सन् 1122 से सन् 1147 तक उनका शासन रहा।
जयसिंह देव के बाद नरसिंह देव और उसके बाद कन्दर देव।
विद्वानों का यह मानना है कि इस वंश के अंतिम शासक का नाम था हरिश्चन्द्र देव। हरिश्चन्द्र को वारंगल के चालुक्य अन्नभेदव (जो काकतीय वंश के थे) ने हराया। इस काकतीय वंश का शासन सन् 1148 तक चलता रहा।
इस प्रकार चक्रकूट या भ्रमरकूट में छिंदक नाग वंशियों का शासन 400 सालों तक चला। वे दसवीं सदी के आरम्भ से सन् 1313 ई. तक राज्य करते रहे। विद्वानों का यह मानना है कि बस्तर में नागवंशी शासकों का शासन अच्छा था। लोगों में उनके प्रति आदरभाव था। अनेक विद्वान उनके दरबार में थे। उस समय की शिल्पकारी भी उच्चकोटि की थी।
एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि नाग वंशियों के शासन कार्य में महिलाओं का भी योगदान रहा करता था। ये महिलायें राजधराने की होती थीं। प्रशासन में प्रजा की भी सहयोगिता पूरी तरह रहती थी। पर नागयुग में सती प्रथा थी। इससे पता चलता है कि महिलाओं का जीवन कैसा था।
नाग युग में संस्कृत और तेलगु दोनों भाषाओं को राजभाषाओं की मान्यता मिली थी नल राजा संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि का इस्तमाल करते थे।
उस युग में राजा ही न्याय विभाग का प्रमुख होता था। मृत्युदण्ड राजा ही देता था और मृत्युदण्ड को क्षमा भी राजा ही करता था।
नल राजा शिव और विष्णु के उपासक थे। वे ब्राह्मणों की खूब कदर करते थे। वे ब्राह्मणोंे को ज़मीन देकर अपने राज्य में बसाते थे।
जब हम नाग युग के मूर्ति-शिल्प की ओर देखते हैं तो हमें यह पता चलता है कि उस समय राज्य में धार्मिक उदारता थी। मूर्ति - शिल्प में हमें उमा-महेश्वर, महिषासुर, विष्णु, हनुमान, गणेश, सरस्वती, चामुंडा, अंबिका आदि नाम की जैन प्रतिमाएं मिलती हैं।
बस्तर में नल नाग राजाओं का शासन करीब एक हज़ार वर्ष तक रहा।
कवर्धा के फणि नागवंश
कवर्धा रियासत जो बिलासपुर जिले के पास स्थित है, वहाँ चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल के नाम से जानते हैं। उस मंदिर में एक शिलालेख है जो सन् 1349 ई. मेंे लिखा गया था उस शिलालेख में नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।