Aug 9, 2013

( ** राजपूतों के इतिहास की चोरी ** )


लेख थोड़ा लंबा हो सकता है लेकिन इस संदर्भ मे आपके विचार जानना जरूरी है । क्षत्रियों का इतिहास सदियों से स्वर्णिम रहा है इसमे दो राय नहीं , लेकिन क्या आप जानते हैं आज उसी इतिहास को जाटों ने अपना इतिहास बताना शुरू कर दिया है ? जी हाँ ! क्योंकि आपका इतिहास कुछ एक इतिहास की किताबों मे सिमटा धूल फांक रहा है और उसी की हूबहू नकल आज इंटरनेट पे धड़ले से जाटों का इतिहास बताकर परोसा जा रहा है। हम शुरू से किसी भी प्रकार के जातिवाद संबन्धित लांछन से बचना चाहते हैं मगर अब बात अपने अस्तित्व पे आकर टिक गई गई।
जिस अस्तित्व को बचाने की लड़ाई मे पुरखों ने जौहर और शाका को गले लगा लिया था ,आज कुछ लोग उसे मिटाने पे तुले हैं। ये कहने भर से अब काम नहीं चलता  की राजपूतों की नकल करने से कोई राजपूत नहीं बन जाता, क्योंकि लोग वो ही सच समझते और मानते हैं, जो उन्हे पढ़ने या सुनने को मिलता है, और आज के दौरे मे लोग जितना ज्यादा इंटरनेट पे पढ़ते है उतना सायद किताबों मे भी नहीं पढ़ते।

इंटरनेट पे हमारे इतिहास को दरकिनार करने की जोरदार कोशिश की जा रही है। इसका कुछ उदाहरण आप नीचे दिये गए वैबसाइट लिंक मे देख सकते हैं।


( इसमे एक जगह लिखा है ,” जाट संघ में भारत वर्ष के अधिकाधिक क्षत्रिय शामिल हो गए थे. जाट का अर्थ भी यही है कि जिस जाति में बहुत सी ताकतें एकजाई हों यानि शामिल हों, एक चित हों, ऐसे ही समूह को जाट कहते हैं. जाट संघ के पश्चात् अन्य अलग-अलग संगठन बने. जैसे अहीर, गूजर, मराठा तथा राजपूत. ये सभी इसी प्रकार के संघ थे जैसा जाट संघ था. राजपूत जाति का संगठन बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए ही पौराणिक ब्राहमणों ने तैयार किया था. बौद्धधर्म से पहले राजपूत नामका कोई वर्ग या समाज न था. [17] पौराणिक ब्राहमणों ने जिन नये चार नवक्षत्रियों को तैयार किया उनमें थे: 1.सोलंकी, 2. प्रतिहार, 3. चौहान और 4. परमार. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये चारों वर्ग जाट गोत्रों में पहले से भी थे और अब भी विद्यमान हैं”


( इसमे लिखा है , राजस्थान में बिश्नोई जाटों को मिलाकर जाटों की कुल संख्या राजपूतों से दोगुनी है। इसलिए राजस्थान को राजपूताना कहना अनुचित है। इसे जाटिस्तान या जटवाड़ा कहना चाहिए। इसी प्रकार झुंझनू को शेखावाटी क्षेत्र कहना अनुचित है इसे जटवाटी क्षेत्र कहना चाहिए।राजस्थान में बिश्नोई जाटों को मिलाकर जाटों की कुल संख्या राजपूतों से दोगुनी है। इसलिए राजस्थान को राजपूताना कहना अनुचित है। इसे जाटिस्तान या जटवाड़ा कहना चाहिए। इसी प्रकार झुंझनू को शेखावाटी क्षेत्र कहना अनुचित है इसे जटवाटी क्षेत्र कहना चाहिए।J

अब इस से ज्यादा  लिखने से फायदा भी नहीं और किसी के पास इतना समय भी नहीं रहता , इसलिए आखिर मे इस बारे मे आपसे विचार व्यक्त करने की आशा करता हूँ और चाहता हूँ की इसके समाधान हेतु कुछ सुझाव दें। उपरोक्त साइटों पे जाकर गाली-गलौज करने वाला समाधान न सुझाए बल्कि अपने इतिहास को सहेजने का कोई उपाय बताएं ताकि इस धरोहर को बचाया जा सके। हमें भी अपने इतिहास की अंतरजाल (इंटरनेट) मे मौजूदगी दर्ज करवानी होगी वरना आने वाली पीढ़ियाँ वही मानेंगी जो इंटरनेट पे पढ़ेंगी क्योंकि कुछ सालों बात किताबों का अस्तित्व वैसे ही खतम हो जाएगा, जो कुछ होगा वो e-Books मे ही होगा।

( समस्त क्षत्रिय समाज की तरफ से )

/AK Rajput

 

26 comments:

Praveen Singh said...

@A K Rajput ji,

Jato se to ham bad me nipat lenge per un sawambhu vidwan rajputo ka kya kare ko, Jat, Gujjer,ahir ,Kuarmi sabki kshatriy hone ka certificat bate hai..... Or usnke likhe ko sahi bata te hai.. Hai hamare samaj me kuch aise hi blogger....

Praveen Singh said...

ham bhi kcuh aisee hi Web Protal ki jaroort hai jahaa hamare itihat sanjo ker rakha ja kase or ye protal kiss rajput orgenization ke under hona chahiye jiase kisee Kshtriya Mahasaba or etc.

Praveen Singh said...

us site per hamae samaj ke vidwan apni ressearch upload ker sake..

Jai durga ji ki
Praven Singh

gajendra singh said...

दादा आप ओर रतन सिंह जी एक कमेटी बनाओ ओर भी वयक्ति जो वेब होस्टिंग की जानकारी रखता है वो एक साइट बनाओ ओर मेरे जेसे लोगो से आपको जानकारी दी जाएगी काम कठिन है पर असंभव नहीं है यह काम गाँव स्तर पर किया जा सकता है बहुत से युवा राजपूत इस काम मे सहयोग दे सकते है

Dr. K L Meena said...

Jooth ke pair nahi hotey...

Ek baar ki baaat hai, Mere ek priya Jaat dost ek baar boley ki "Jhunjhunu Sahar Jujhar Singh Nehra ne basaya tha..Unkey naam par hi Jhunjhunu naam pada"

Maine puchha.."Chaudhary Sahab, fir Raja Sardul Singh Shekhawat ke raaj se pehle Jhunjhunu sahar ka naam kya tha?" toh wah chup ho gaye..aur thodi der me boley ki yaar yeh new generation jaaton ke dimag ki upaj hai.

Itihaas likhne se nahi banta, karmo se banta hai..Aur Rajasthan ka itihas Rajputon ke bina ek blank page ki tarah hai. Aur mujhe Rajasthani honey ke naatey iss baat ka bada fakar hai.

Jai Meenesh.

rajendra prajapat said...
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kunwarji's said...

जिसने भी ये भ्रमित करने वाली जानकारी फैलाई है क्या उसे सूरजमल का पता है..... कौन जानता था सूरजमल से पहले जाटो को.... और उसके बाद भी क्या पहचान रही है इनकी सब जानते है!सभी जानते है कुजात क्या होते है(जिनकी कोई भी जाती नहीं होती) और अंग्रेजो को कुजात कहने में दिक्कत होती थी तो वो कुजाट कह पाते थे और फिर जाट ही रह गया!
सही में हमारा समाज अँधा और अयोग्य हो गया है राजपूत कहलवाने के लिए! अब से कुछ समय पूर्व तक भी राजस्थान और उसके पास के क्षेत्र में राजपूतो के अलावा और कोई भी अपने नाम के साथ "सिंह" का भी प्रयोग नहीं कर सकते थे और आज ये कुजात खुद को सूर्यवंशी और चंद्रवंशी बता रहे है!
इसे पढ़ कर आज खून खौल रहा है......
कुँवर जी,

kunwarji's said...

aur kehne ko to bahut kuchh hai par dikkat ye hai kmi hindu pehle hi ek nahi hai aur kuchh ko ye mudda bhi mil jaayega...

kunwar ji

प्रवीण कुमार गुप्ता-PRAVEEN KUMAR GUPTA said...

श्रीमान जी, आप का कहना बिल्कुल सही हैं. ज़ाटो ने अपने इतिहास मे सिवाय गप्प के कुच्छ नही डाला हैं. उन्होने तो शिव जी, हनुमान जी, रामचंद्र जी, कृष्ण जी, चंद्रगुप्त मौर्या, अशोक, गुप्त वंश के सम्राट, हर्षवर्धन, राजा रंजीत सिंग,सभी को जाट बता रखा हैं. और तो और राजपूत, यादव, गुर्जर आदि सभी की उत्पत्ति भी जातो से बता रखी हैं.

प्रवीण कुमार गुप्ता-PRAVEEN KUMAR GUPTA said...

असली क्षत्रिया जाति आज केवल राजपूत हैं. बाकी ने तो परशुराम जी की समय मे वैश्य वर्ण अपना लिया था.

Rajput said...

@Praveen Singh
हम भी यही चाहते है , ना की किसी से कोई मतभेद। हमे भी अपने इतिहास
पे दावा करने का हक़ है । हमे भी तैयारी करनी है अपने इतिहास को वेब पोर्टल
पे पब्लिश करने की ताकि आने वाले लोग जान सके ।

Rajput said...

@Dr. K L Meena

इसी बात का तो रोना है । हमे किसी प्रकार के जातिगत भेदभाव मे
नहीं पड़ना चाहते सभी जाति का सम्मान करते हैं लेकिन जब बात ऐसे मुद्दो
पे आ जाती है जहां आपके अस्तित्व को ललकारा जाए तो विरोध लाज़मी है

NAVAL JANNI said...
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ब्लॉग - चिठ्ठा said...

आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर "ब्लॉग - चिठ्ठा" के सार्वजानिक और सामूहिक चिठ्ठे में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

Anonymous said...

@NAVAL JANNI
Please correct your knowladge. Bhagwan Persuram ne 21 kbar kiska vinas kiya tha ye bharm hai or App ke jaise vidwano ka failaya hua hai...

ek logic ki bat hai jo mai unpadh nahi samjh pa raha hu sayad aap ke jaise vidwan log jayada samjh sake mai ek aadmi ko sirf ek bar hai jan se mar sakata hu do Bar nahi. theek waise hi ager aap ki bat mani jaye ager bhawan persuram ne saree kshtriya ko 1st time hi khatam ker diya tha to dusree bar 3,4,5 bar kaise khatma kiya or kisko kiya kyo ki 2nd time to kshtriya honge hi nahi ye gayan bhari bat to bas aap ke jaise vidwan hi samjh sakte hai... ye to thee logical bat ab mai aap ke grantho ki bat bata hu...
1)bhagwan ram ko Ischwaku vansi the ye hm nahi granth bolte hai krishan chandara wanshi the ye ham ahi granth blte hai or in grantho ka rakh rakhao hamara kam nahi barhmano ka hai

waise aap ke jaise kisi vidwan ki uatpatti hi jaliya jeevo se ho kati hai doubt ho to pata ker lena

Anonymous said...

@NAVAL JANNI
ha ha ha brahm gayni to bas jat hi huye hai ha ha ha he he he he

Praveen Singh said...

@Rajput
Kuch sayam pahle tak hamare pass ek site thee nam the http://www.rajputworld.com/ per hamare sakaj ke kcuh gyahi logo ne utapat ke chalte wo site band hogai ya kerni padi. is blog per likh ne wale mujh se behtare ya jante honge ki wo site kyo band hui per ab jaroorat aisee hi kisi site ko phir se suru ker ne ki hai

Jai Duraga Ji Ki
Praveen

kunwarji's said...

@naval janni- भगवान् परशुराम ने क्षत्रियो का संहार केवल युद्ध में ही किया है और आप तो स्वयं ज्ञानी लग रहे है... आपकी जानकारी में तो होगा ही कि युद्ध में नारी,वृद्ध और बच्चे नहीं जाते थे तो समूल विनाश जैसा आप कहना चाह रहे है वह वैसे संभव ही नहीं! और आप जैसो के संशय को ख़त्म करने के लिए दो प्रसंग जो हमारे ग्रंथो में है उनको कभी थोडा समय देना!
एक प्रसंग तो आता है रामायण में, लक्ष्मण-परशुराम प्रसंग जो धनुष भंग होने के समय का है, और एक आता है महाभारत में भीष्म-परसुराम प्रसंग जो कि भीष्म के अम्बा आदि कन्याओ के अपहरण के बाद आता है!यहाँ तो भगवान् परशुराम अपने जीवन की एकमात्र पराजय भी झेलते है एक क्षत्रिय के ही हाथो! आप संभव हो सकते इन प्रसंगों को थोडा समय देना फिर चर्चा करते है.....

कुँवर जी,

Kirti aahuja said...

मैं भी आप सभी के विचारों से सहमत हूँ, मैं तो बस यही कहना चाहूँगा की जो सही है, उसे कोई नहीं बदल नहीं सकता, अब चाहे जाट जाति स्वयं को बड़ी माने या राजपूत। इतिहास गवाह है की राजपूतों और जाट दोनों जतियों ने जब जब भी मौका मिला है, तब तब अपने आप को साबित किया है। ज्यादा जानकारी के लिए आप Rajasthan gk के बारे मे पढ़ सकते है।

Dr.NISHA MAHARANA said...

waise itihas ko palta jaaye to pata chalta hai ki pahle karm ke aadhar par jaatiyon ka wargikaran hua jo ki kalantar men washnugat ho gaya ..is par jyaada ulajhna bekar hai ,,,

Anonymous said...

Hukum me aapse ek question ka answer janna chahta hu. Ye kshatriya se Rajput name kab hua please give me answer

USB said...

Abhi bhi chaloo apne atit ko auro se mahaan batane ka competition. saap chala gaya lakir pit rhe hai log..

ब्लॉग - चिठ्ठा said...

आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ ( 6 अगस्त से 10 अगस्त, 2013 तक) में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

suryaprakash sharma said...

@ब्लॉग - चिठ्ठा

V S Beniwal said...

@NAVAL JANNI

जटाओं में जूं व ढेरे पाए जाते हैं, जाट नहीं। जाट इतिहास को पढो फिर कुछ लिखो .... हम किसान के बेटे हैं और हमे इस बात का गर्व है. हमारे काफी गोत राजपूत भाईओं से मेल खाते है , और हरिद्वार की वंशावलियो एवं ब्रिटिश राज में बनी जाती गत इतिहास में यह साफ़ प्रमाणित होता है की किसी समय हम एक ही थे , जिन्होंने युद्ध का काम छोड़ कर कृषि कार्य अपना लिया वह जात हो गये.

ब्राह्मणवाद ने राजपूत जाति को ही वास्तविक क्षत्रिय माना है और यही ब्राह्मणवाद कहता है कि उन्होंने 21 बार क्षत्रियों का विनाश किया अर्थात् जिसको अपना समझा उसी का सर्वनाश किया। यदि क्षत्रियों का विनाश किया तो इसमें गौरव की कौन सी बात है और फिर उन्हें 21 बार फिर से पैदा करने की क्या आवश्यकता थी? फिर यह भी कहा जाता है उन्होंने अग्नि से क्षत्रिय पैदा कर दिये जबकि अग्नि से कोई चींटी भी पैदा नहीं कर सकता। अग्नि से केवल राख पैदा हो सकती है। ब्राह्मणवाद ने एक बार जाटों को भी खुश करने के लिए लिख दिया था कि जाट शिव की जटाओं से उत्पन्न हुए हैं। जबकि जट्टाओं से केवल जुएं या ढेरे पैदा हो सकते हैं।

यह प्रचार किया जाता है कि परशुराम भगवान थे तो फिर लड़ाई में भीष्म से क्यों हारे? उन्होंने अपनी मां की हत्या क्यों की थी? फिर उन्हें किस आधार पर अवतार कहा जा रहा है?

NITESH KUMAR said...

भाई लोगो,जातिवाद और इतिहास दो अलग-अलग बात हैं|मैं इतिहासकार हूँ और केवल ये कहना चाहता हूँ की जातियों की उत्पत्ति बोद्ध धर्म के बाद हुई है,और प्राचीन क्षत्रियो से आज की जातियों को जोड़ने का कोई सबूत नहीं है,ब्राह्मण स्रोतों के अनुसार तो मौर्य वंश[अशोक आदि]भी क्षत्रिय नहीं माने गए.फिर विदेशी आये,फिर गुप्त वंश जिसे वैश्य या जाट साबित किया गया,फिर हर्षवर्धन [वैश्य],उसके बाद राजपूत,जिनकी वंशावली ब्राह्मण,भट्ट,चारण,आदि ने तैयार की और महाकाव्यों के राम,कृष्ण, से वंश जोड़े|उसके बाद अगर जाट,मराठा अपने को क्षत्रिय साबित करते हैं,तो राजपूतो को क्या परेशानी है,ज्यादातर ruling class अपने को क्षत्रिय ही कहती रही है|हालाँकि चौहान और गहलोत वंश की उत्पत्ति ब्राह्मण से बताई गयी है|