Dec 30, 2008

दानवीर महाराज रघु

उदयपुर से भूपेंद्र सिंह चुण्डावत

महाराज रघु अयोध्या के सम्राट थे। वे भगवान श्रीराम के प्रपितामह थे। उनके नाम से ही उनके वंश के क्षत्रिय रघुवंशी कहे जाते हैं। एक बार महाराज रघु ने एक बडा भारी यज्ञ किया। जब यज्ञ पूरा हो गया, तब महाराज ने ब्राह्मणों तथा दीन-दुखियों को अपना सारा धन दान कर दिया। महाराज इतने बडे दानी थे कि उन्होंने अपने आभूषण, सुंदर वस्त्र और सारे बर्तन तक दान कर दिए। महाराज के पास साधारण वस्त्र ही रह गए। वे मिट्टी के बर्तनों से काम चलाने लगे। यज्ञ में जब महाराज रघु सर्वस्व दान कर चुके, तब उनके पास ऋषि कौत्सनाम के एक ब्राह्मण कुमार आए। महाराज ने उनको प्रणाम किया, आसन पर बैठाया और मिट्टी के पात्र वाले जल से उनके पैर धोए। स्वागत-सत्कार हो जाने पर महाराज ने पूछा- आप मेरे पास कैसे पधारे? मैं क्या सेवा करूं?

कौत्सने कहा-महाराज मैं आया तो किसी काम से ही था, किंतु आपने तो पहले ही सर्वस्व दान कर दिया है। मैं आप जैसे महादानी उदार पुरुष को संकोच में नहीं डालूंगा। महाराज रघु ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की, आप अपने आने का उद्देश्य जरूर बता दें। कौत्सने बताया कि उनका अध्ययन पूरा हो गया है। अपने गुरुदेव के आश्रम से घर जाने से पहले गुरुदेव से उन्होंने गुरु दक्षिणा मांगने की प्रार्थना की। गुरुदेव बडे स्नेह से कहा- बेटा तूने यहां रहकर जो मेरी सेवा की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरी गुरु दक्षिणा तो हो गई। तू संकोच मत कर। प्रसन्नता से घर जा। लेकिन कौत्सने जब गुरु दक्षिणा देने का हठ कर लिया, तब गुरुदेव को थोडा क्रोध आ गया। वे बोले-तूने मुझसे चौदह विद्याएं पढी हैं, अतःप्रत्येक विद्या के लिए एक करोड सोने की मोहरें लाकर दे। गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड सोने की मोहरें लेने के लिए ही कौत्सअयोध्या आए थे।

महाराज ने कौत्सकी बात सुनकर कहा- जैसे आपने यहां तक आने की कृपा की है, वैसे ही मुझ पर थोडी-सी कृपा और करें। तीन दिन तक आप मेरी अग्निशालामें ठहरें। रघु के यहां से एक ब्राह्मण कुमार निराश लौट जाए, यह तो बडे दुःख एवं कलंक की बात होगी! मैं तीन दिन में आपकी गुरु दक्षिणा का कोई-न-कोई प्रबंध अवश्य कर दूंगा। कौत्सने अयोध्या में रुकना स्वीकार कर लिया। महाराज ने अपने मंत्री को बुलाकर कहा-यज्ञ में सभी सामंत नरेश कर दे चुके हैं। उनसे दुबारा कर लेना न्याय नहीं है। लेकिन कुबेरजीने मुझे कभी कर नहीं दिया। वे देवता हैं, तो क्या हुआ? कैलाश पर्वत पर रहते हैं, इसलिए पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को उन्हें कर देना चाहिए। मेरे सब अस्त्र-शस्त्र मेरे रथ में रखवा दो। मैं कल सबेरे कुबेर पर चढाई करूंगा। आज रात मैं उस रथ पर ही सोऊंगा। जब तक ब्राह्मण कुमार को दक्षिणा न मिले, राजमहल में पैर नहीं रख सकता। उस रात महाराज रघु रथ में ही सोए। लेकिन बडे सवेरे उनका कोषाध्यक्ष उनके पास दौडा आया और कहने लगा-महाराज खजाने का घर सोने की मोहरों से ऊपर तक भरा पडा है। रात में उसमें मोहरों की वर्षा हुई है। महाराज समझ गए कि कुबेरजीने यह मोहरों की वर्षा की है। महाराज ने सब मोहरों का ढेर लगवा दिया और कौत्ससे बोले-आप इस धन को ले जाएं। कौत्सने कहा, मुझे तो गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड मोहरें चाहिए। उससे अधिक एक मोहर भी मैं नहीं लूंगा। महाराज ने कहा, लेकिन यह धन आफ लिए ही आया है। ब्राह्मण का धन हम अपने यहां नहीं रख सकते। आपको ही यह सब लेना पडेगा। कौत्सने बडी दृढता से कहा-महाराज मैं एक ब्राह्मण हूं। धन का मुझे करना क्या है! आप इसका चाहे जो करें। मैं तो एक भी मोहर अधिक नहीं लूंगा। कौत्सचौदह करोड मोहरें लेकर चले गए। शेष मोहरें महाराज रघु ने दूसरे ब्राह्मणों को दान कर दिया।

Dec 25, 2008

परमवीर मेजर पीरु सिंह शेखावत

6 राजपुताना रायफल्स के हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत झुंझुनू के पास बेरी गांव के लाल सिंह शेखावत के पुत्र थे जिनका जन्म 20 मई 1918 को हुआ था | जम्मू कश्मीर में तिथवाल के दक्षिण में इन्हे शत्रु के पहाड़ी मोर्चे को विजय करने का आदेश मिला | दुश्मन ने यहाँ काफी मजबूत मोर्चा बंदी कर रखी थी ज्योही ही ये मोर्चे की और अग्रसर हुए दोनों और से शत्रु की और भयंकर फायरिंग हुयी व भारी मात्रा में इन पर बम भी फेंके गए | पीरु सिंह आगे वाली कंपनी के साथ थे और भारी संख्या में इनके साथी मारे गए और कई घायल हो गए ये अपने साथियों को जोश दिलाते हुए युद्ध घोष के साथ शत्रु के एम एम जी मोर्चे पर टूट पड़े और बुरी तरह घायल होने बावजूद अपनी स्टेनगन और संगीन से पोस्ट पर मौजूद दुश्मनों को खत्म कर एम एम जी की फायरिंग को खामोश कर दिया लेकिन तब तक उनकी कम्पनी के सारे साथी सैनिक मारे जा चुके थे वे एक मात्र जिन्दा लेकिन बुरी तरह घायल अवस्था में बचे थे चेहरे पर भी बम लगने के कारण खून बह रहा था लेकिन जोश और मातृभूमि के लिए बलिदान की कामना लिए वे शत्रु के दुसरे मोर्चे पर हथगोले फेंकते हुए घुस गए दुसरे मोर्चे को भी नेस्तनाबूत कर वे अपने क्षत-विक्षत शरीर के साथ दुश्मन के तीसरे मोर्चे पर टूट पड़े ,रास्ते में सिर में गोली लगने पर ये १९ जुलाई १९४८ को वीर गति को प्राप्त हुए |
भारत सरकार ने इन्हे मरणोपरांत इनकी इस महान और अदम्य वीरता के लिए वीरता के सबसे उच्च पदक परमवीर चक्र से सम्मानित किया |

गणतंत्र दिवस परेड समारोह में रणथम्भौर के दुर्ग के रूप में सजेगी राजस्थान की झांकी

जयपुर।(भूपेंद्र सिंह चुण्डावत) नई दिल्ली के राजपथ पर 26 जनवरी, 2009 को आयोजित होने वाले गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य समारोह में इस वर्ष राजस्थान की झांकी को रणथम्भौर के दुर्ग के रूप मे सजाया जाएगा। राजस्थानी लोक कला, गौरवशाली इतिहास और समृद्घ संस्कृति को समेटे राजस्थान की यह झांकी गणतंत्र दिवस परेड में लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र रहेगी। इस शानदार झांकी की डिजाईन राजस्थान ललित कला अकादमी के श्री हर शिव शर्मा द्वारा तैयार की गई है।

राजस्थान ललित कला अकादमी के प्रदर्शनी अधिकारी श्री विनय शर्मा ने बताया कि राजस्थान की झांकी के अग्रिम भाग में ग्यारहवीं शताब्दी के राव राजा हमीर सिंह की छतरी दिखाई गई है। झांकी के पश्च भाग को पहाडियों पर स्थित दुर्ग के रूप में सजाया गया है जहाँ टाईगर, हिरण, लंगूर व अन्य वन्य-प्राणियों को विचरण करते हुए दिखाया गया है। उन्होंने बताया कि झांकी के सबसे अग्र भाग में पच्चीस लोक नृत्य कलाकार प्रदेश के प्रसिद्घ ‘‘गैर-नृत्य’’ की जीवन्त प्रस्तुति देगें। उन्होंने बताया कि रक्षा मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी की हाल ही में दिल्ली में हुई बैठक में राजस्थान की उक्त झांकी के मॉडल को अनुमोदित कर दिया गया है।

श्री विनय शर्मा ने बताया कि ‘‘रणथम्भौर’’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’ इन दो शब्दों के मेल से हुई है। ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’ दो पहाडियां है। थम्भौर वह पहाडी है जिस पर रणथम्भौर का विश्व प्रसिद्घ किला स्थित है और ‘‘रण’’ उसके पास ही स्थित दूसरी पहाडी है। रणथम्भौर का किला लगभग सात किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जहां से रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क का विहंगावलोकन किया जा सकता है।

उन्होनें बताया कि रणथम्भौर दुर्ग भारत के सबसे पुराने किलों में से एक माना जाता है। इस किले का निर्माण सन् 944 ए.डी. में चौहान वंश के राजा ने करवाया था। इस दुर्ग पर अल्लाउदीन खिजली, कुतुबुद्दीन ऐबक, फिरोजशाह तुगलक और गुजरात के बहादुरशाह जैसे अनेक शासकों ने आक्रमण किये। यह मान्यता रही है कि लगभग 1000 महिलाओं ने इस किले में ‘जौहर’ किया था। ‘‘जौहर’’ (जिसके अंतर्गत किलों को अन्य शासक द्वारा जीत लेने पर वहां की निवासी राजपूत महिलाएं अपने ‘शील’ की रक्षा के लिए जलती आग में कूद कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लिया करती थी।)

उन्होंने तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि ग्यारहवीं शताब्दी में राजा हमीर ने और सन् 1558-59 में मुगल बादशाह अकबर ने इस दुर्ग पर अपना अधिकार जमाया था। अंततः यह दुर्ग जयपुर के राजाओं को लौटा दिया गया था, जिन्होंन दुर्ग के आस पास के जंगल को शिकार के लिए सुरक्षित रखा। जंगल के संरक्षण की यही प्रवृत्ति बाद में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के अभ्युदय का कारण बनी और आज देश-विदेश से सैलानी यहां बाघ और अन्य वन्य प्राणियों को देखने आते हैं।

उन्होंने प्रदेश के प्रसिद्घ गेर नृत्य के संबंध में बताया कि ‘‘गेर’’ का मूल अर्थ गोले या घेरे से है। चूंकि इस नृत्य का निष्पादन गोले में घूम कर किया जाता है इस लिए इसका नाम ‘‘गेर’’ नृत्य पडा। यद्यपि यह नृत्य सभी समुदायों द्वारा किया जाता है किन्तु मेवाड व मारवाड में यह ज्यादा प्रसिद्घ है। इसे गेर घालना, गेर रमना, गेर खेलना और गेर नाचना भी कहा जाता है।

श्री शर्मा ने बताया कि प्रदेश में सभी जगहों का गैर नृत्य एक जैसा नही होता बल्कि हर स्थान की अपनी अनोखी ताल, घेरा डालने की विशिष्ट शैली व अपनी विशिष्ट वेशभूषा होती है। इस नृत्य के दौरान नृत्यकार सीधी व उल्टी दोनों दिशाओं में धूमर लेते हैं।

रंगीली वेशभूषा में सजे नर्तक चुन्नटों वाला खुला लम्बा स्कर्ट पहनते है। फाल्गुन के महीने में ढोल, थाली और मृदाल की ध्वनि सुनी जा सकती हैं और लोक नर्तक लम्बी छडियों को लिए इनकी ताल में ताल मिलाते हुए परस्पर टकराते देखे जा सकते हैं। जब वे नृत्य करते ह तो युद्घ के मैदान जैसा परिदृश्य दिखाई देता है। लोक मान्यता है कि इस नृत्य का सम्भावित रूप से युद्घों से कोई अनोखा सम्बन्ध रहा होगा।

उन्होंने बताया कि गैर नृत्य की इस अनुपम छटा को प्रदेश के लोक कलाकार प्रदेश की झाँकी के आगे प्रकट करेंगे।

Dec 19, 2008

राजपुताना समाज की आम वार्षिक बैठक

राजपुताना समाज की आम वार्षिक बैठक निम्न कार्यक्रम अनुसार रखी गई है --
स्थान:- महाराणा प्रताप भवन
B-4 केशवपुरम,लाल साईं मन्दिर के पास,
लोरेंस रोड (नजदीक केशवपुरम मेट्रो स्टेशन )
नई दिल्ली -110035
दिनांक :- 28 दिसम्बर 2008
समय :- प्रात: 11 बजे
बैठक के कार्य बिन्दु निम्न प्रकार है -
1- स्वगत भाषण
2- नए चुने गए प्रतिनिधियों का अभिनन्दन
3- नई कार्यकारिणी का गठन (चुनाव द्वारा)
4- कार्य प्रगति एवं आर्थिक लेखे का ब्यौरा
5- भविष्य की योजनाओं पर विचार
6- अध्यक्ष की अनुमति से अन्य कार्य बिन्दु
इस बैठक में आप सभी की उपस्थिति परिवार व मित्रों सहित प्रार्थनीय है | बैठक के पश्चात श्री भारत सिंह राठौड़ के माध्यम से भोजन की व्यवस्था रखी गई है
जय सिंह राठौड़,अध्यक्ष

डा.लक्ष्मण सिंह राठौड़ ,महामंत्री

गिरधारी सिंह शेखावत,खजांची

भवदीय

श्रवण सिंह शेखावत

ph-9313501171

Dec 14, 2008

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ

राजस्थान के पांच पीर हुये है । जिनका नाम पाबूजी,हङबू जी,रामदेवजी,मंगलिया जी और मेहा जी है पाबूजी वीर थे उन्होनें गायों की रक्षार्थ अपने प्राणो की आहुती दी । यह वीडियो इस श्रंखला की शुरुआत है ।

video

Dec 6, 2008

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें
1-राजस्थान रा पिछोला - पिछोला को अंग्रेजी में Elegy कहते है और उर्दू में मरसिया | मर्त्यु के उपरांत मृतात्मा के प्रति उमड़ते हुए करूँ उदगारों के काव्य रूप को ही पिछोला कहतें है | पिछोले म्रत्यु की ओट में गए प्रेमी की मधुर स्मृति पर श्रद्धा व प्रेम के भाव-प्रसून है |इस पुस्तक से करुण रस का रसास्वादन करके हम राजस्थानी साहित्य की सम्पन्नता प्रमाणित करने में समर्थ हो सकतें है |
2- समाज चरित्र - समाज जागरण के निमित केवल आन्दोलन ही उचित मार्ग नही है | आन्दोलन तो संगठन शक्ति का प्रदर्शन मात्र है | वह जनमत की अभिव्यक्ति है | किंतु स्वयम जनमत का निर्माण करना एक कठिन काम है | अनेक सामाजिक संस्थाएं सामाजिक शक्ति को उभारने का कार्य करती है,किंतु निर्बल की नैसर्गिक शक्ति बार -बार उभर कर अपने विनाश का कारण ही बनती है जब तक की शक्ति को उभारने वाले स्वयम शक्ति के उत्पादक न बन जाय | संस्थाएं स्वयम अपने और अपने उदेश्य के प्रति स्पष्ट नही होती तब तक सामाजिक चरित्र गोण ही बना रहता है |
इसी कमी को पुरा करने के लिए एक व्यवसायिक शिक्षण और मार्ग दर्शन की आवश्यकता महसूस करके यह पुस्तक लिखी गई | जो साधना की प्रारम्भिक अवस्था में साधकों का मार्ग दर्शन करने में उपयोगी सिद्ध हो रही है |
3-बदलते द्रश्य- इतिहास के इतिव्रतात्मक सत्य के अन्दर साहित्य के भावात्मक और सूक्ष्म सत्य के प्रतिस्ठापन की चेष्ठा ही समाज में चेतना ला सकती है | समाज में आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावनाओं का सर्जन करना इस पुस्तक का लक्ष्य है |
4- होनहार के खेल -पु.तनसिंहजी के पॉँच रोचक हिन्दी निबंदों से सृजित होनहार के खेल राजस्थान की संस्कृति,योधा समाज के जीवन दर्शन,और जीवन मूल्यों से ओत-प्रोत है इसमे राजपूत इतिहास और राजपूत सस्कृति मुखरित है | क्षत्रिय समाज के सतत संघर्ष,अद्वितीय उत्सर्ग,और महान द्रष्टि का शाश्वत सत्य गुंजित है | पु.तनसिंहजी की पीडा,तड़पन,उत्सर्ग की महत्ता और उत्थान की लालसा पुस्तक के प्रत्येक शब्द में संस्पदित है | हमारे लिए एतिहासिक आधार भूमि को ग्रहण कर एक जीवन संदेश है |
5-साधक की समस्याएं- साध्य प्राप्ति के लिए साधक के पथ में क्या समस्याएं व कठिनाईयां क्या है ? और कब-कब सामने किस रूप में बाधक बन कर आती है तथा उन्हें कैसे पहचाना जाय और उनका किस प्रकार सामना किया जाय इन सब पहलुओं का विस्तार से इस पुस्तक समाधान किया गया है |
6-शिक्षक की समस्याएं- सच्ची शिक्षा का अभिप्राय अपने भीतर श्रेष्ठ को प्रकट करना है | साधना के शिक्षक को प्राय: यह भ्रम हो जाता है कि वह किसी का निर्माण कर रहा है | सही बात तो यह है कि जो हम पहले कभी नही थे,वह आज नही बन सकते | हमारा निर्माण,किसी नवीनता की सृष्टी नही है,बल्कि उन प्रच्छन शक्तियों का प्रारम्भ है जिनसे हमारे जीवन और व्यक्तित्व का ताना बना बनता है | साधना पथ में स्वयम शिक्षक एक स्थान पर शिक्षक है और उसी स्थान पर शिक्षार्थी भी है | इसलिय शिक्षण कार्य में आने वाली समस्याएं शिक्षक की समस्याएं होती है | वे समस्याएं क्या है और किस रूप में सामने आती है,उनका समाधान क्या है ? यही इस पुस्तक का विषय है |
7- जेल जीवन के संस्मरण- भू-स्वामी आन्दोलन समय श्री तनसिंह जी को गिरफ्त्तार कर टोंक जेल में रखा गया था | जेल में जेलर और सरकार का उनके साथ व्यवहार व जेल में रहकर जो घटा और जो अनुभव किए उनके उन्ही संस्मरणों का उल्लेख इस पुस्तक में है |
8- लापरवाह के संस्मरण- इस पुस्तक में पु.तनसिंह जी के अपने अनुभव है तो उनके संघ मार्ग पर चलते उनके अनुगामियों का चित्रण भी है जिसे रोचक और मनोरंजक भाषा में पिरोकर पुस्तक का रूप दिया गया है |
9-पंछी की राम कहानी- संघ कार्य की आलोचना समय-समय पर होती रही है | तन सिंह जी की आलोचना और विरोध भी कई बार विविध रूपों में होता रहा है | विरोध के दृष्टीकोण से ही देखकर संघ के बारे में जिस प्रकार की आलोचना की गई या की जा सकती है उसे ही मनोविनोद का रूप देकर पु.तनसिंह जी ने एक लेखमाला का रूप दिया,जो इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है |
10-एक भिखारी की आत्मकथा- श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित एक भिखारी की आत्मकथा बहु-आयामी संघर्षों के धनी जीवन का लेखा-जोखा है और यह लेखा-जोखा स्वयम श्री तनसिंह जी के ही जीवन का लेखा-जोखा है |वास्तव में आत्मकथा श्री तनसिंह जी की अपनी ही है |
11-गीता और समाज सेवा - गीता श्री तनसिंह जी का प्रिय और मार्गदर्शक रही है | गीता ज्ञान के आधार पर ही उन्होंने श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना की थी | धेय्य निष्ठां और अनन्यता का मन्त्र भी उन्होंने गीता से ही पाया | क्षात्रशक्ति और संघ की आवश्यकता और महत्व भी उन्होंने गीता पढ़कर ही महसूस की |गीता का व्यवहारिक ज्ञान जिसमे कर्म,ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है, को संघ में उतारने का बोध भी उन्हें गीता से ही हुआ-इसी से प्रेरणा मिली | एक सच्चे समाज सेवक के लिए गीता का क्या आदेश है और किस प्रकार सहज भाव से किया जा सकता है और क्या करना आवश्यक है,इन्ही महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख "गीता और समाज सेवा " पुस्तक में किया गया है |
12- साधना पथ- गीता के आध्यात्मवाद के आन्दोलन पथ पर बढ़ते योगेश्वर श्री कृष्ण ने योग का जो मार्ग सुझाया है उसी लक्ष्य को सम्यक रूप से आत्मसात करने तक हर साधना को गतिमय होना चाहिय | सर्वांगीण साधना वही है जिसमे व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को जागृत कर सके स्वधर्म पालन एक महान कार्य है |महान कार्यों की पूर्ति के लिए ईश्वर से एकता स्थापित करना परमाव्यस्क है, किसी अनुष्ठात्मक भक्ति से ईश्वर को छला नही जा सकता |
श्री तन सिंह जी ने सम्पूर्ण योग योग मार्ग के आठ सूत्र सुझाएँ है वे हैं -
1- बलिदान का सिद्धांत 2- समष्टि योग 3- श्रद्धा 4- अभिप्षा 5- शरणागति 6- आत्मोदघाटन 7- समर्पण भाव
8- योग
14- झनकार- श्री तनसिंहजी द्वारा लिखे गए 166 गीतों,कविताओं आदि के संकलन को "झनकार" नाम देकर पुस्तक का रूप दिया गया है झनकार के एक-एक गीत एक-एक पंक्ति अपने आप में एक काव्य है |
उपरोक्त पुस्तकें " श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास A / 8, तारा नगर झोटवाडा, जयपुर -302012 से प्राप्त की जा सकती है |
संदर्भ - श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास द्वारा प्रकाशित " पूज्य श्री तनसिंहजी-एक परिचय " पुस्तक से

स्व.पु.श्री तनसिंह जी: एक अद्भभुत व्यक्तित्व का परिचय

मैंने स्व.श्री तनसिंहजी के लिखे कई लेख इस चिट्ठे पर प्रस्तुत किए है आज मै श्री तनसिंहजी का संक्षिप्त परिचय आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ हालाँकि उनके अद्भुत व्यक्तित्व पर एक पुरी पुस्तक ही लिखी जा सकती है फ़िर भी मै अपने इस छोटे से लेख के माध्यम से स्व.पु.तनसिंहजी का परिचय कराने की कोशिश कर रहा हूँ |

वि.सं.१९८० में बाड़मेर जिले के गांव रामदेरिया के ठाकुर बलवंत सिंह जी महेचा की धर्म पत्नी मोतिकंवरजी के गर्भ से तनसिंह जी का जन्म अपने मामा के घर बैरसियाला गांव में हुआ था वे अभी शैशवावस्था में अपने घर के आँगन में चलना ही सीख रहे थे कि उनके पिता मालाणी के ठाकुर बलवंत सिंघजी का निधन हो गया और चार वर्ष से भी कम आयु का बालक तनैराज अपने सिर पर सफ़ेद पाग बाँध कर ठाकुर तनैराज हो गया | मात्र ९०रु वार्षिक आय का ठाकुर | भाग्य ने उनको पैदा करके पालन-पोषण के लिए कठिनाईयों के हाथों सौप दिया |
घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद भी श्री तनसिंह जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बाड़मेर से पुरी कर सन १९४२ में चौपासनी स्कूल जोधपुर से अच्छे अंकों के साथ मेट्रिक परीक्षा पास कर सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त किया,और उच्च शिक्षा के लिए पिलानी चले आए जहाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद नागपुर से उन्होंने वकालत की परीक्षा पास कर सन १९४९ में बाड़मेर आकर वकालत का पेशा अपनाया,पर यह पेशा उन्हें रास नही आया | 25 वर्ष की आयु में बाड़मेर नगर वासियों ने उन्हें बाड़मेर नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया और 1952 के विधानसभा चुनावों में वे पहली बार बाड़मेर से विधायक चुन कर राजस्थान विधानसभा पहुंचे और 1957 में दुबारा बाड़मेर से विधायक चुने गए | 1962 व 1977 में आप बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए | 1962 में तन सिंघजी ने दुनिया के सबसे बड़े और विशाल बाड़मेर जैसलमेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव मात्र एक जीप,कुछ साथी,सहयोगी स्वयम सेवक,कार्यकर्त्ता,किंतु अपार जन समूह के प्यार और समर्थन से मात्र 9000 रु. खर्च कर सांसद बने |
1979 में मध्यावधि चुनावों का फॉर्म भरने से पूर्व अपनी माताश्री से आशीर्वाद लेते समय 7 दिसम्बर 1979 को श्री तनसिंह जी ने अपनी माता की गोद में ही अन्तिम साँस ली |
पिलानी के राजपूत छात्रावास में रहते हुए ही श्री तनसिंह जी ने अपने भविष्य के ताने-बाने बुने | यहीं उनका अजीबो-गरीब अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ और समाज की बिखरी हुयी ईंटों से एक भव्य-भवन बनाने का सपना देखा | केवल 22 वर्ष की आयु में ही उनके हृदय में समायी समाज के प्रति व्यथा पिघली जो " श्री क्षत्रिय युवक संघ" के रूप में निश्चित आकार धारण कर एक धारा के रूप में बह निकली |
लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह फॉर्म भरना,सदस्यता लेना,फीस जमा करना,प्रस्ताव पारित करना,भाषण,चुनाव,नारेबाजी,सभाएं आदि करना श्री तन सिंह जी को निरर्थक लगी और 22 दिसम्बर 1946 को जयपुर के मलसीसर हाउस में नवीन कार्य प्रणाली के साथ "श्री क्षत्रिय युवक संघ " की विधिवत स्थापना की और उसी दिन से संघ में वर्तमान संस्कारमयी मनोवैज्ञानिक कार्य प्रणाली का सूत्रपात हुवा | इस प्रकार क्षत्रिय समाज को श्री तनसिंह जी की अमूल्य देन "श्री क्षत्रिय युवक संघ " अपनी नई प्रणाली लेकर अस्तित्व में आया |
राजनीती में रहकर भी उन्होंने राजनीती को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया | क्षत्रिय युवक संघ के कार्यों में राजनीती भी उनकी सहायक ही बनी रही | सन 1955-56 में विवश होकर राजपूत समाज को राजस्थान में दो बड़े आन्दोलन करने पड़े जो भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से विख्यात हुए,दोनों ही आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में क्षत्रिय युवक संघ की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी |
स्व.श्री तनसिंह जी की ख्याति एक समाज-संघठक,कर्मठ कार्यकर्त्ता,सुलझे हुए राजनीतीज्ञ,आद्यात्म प्रेमी,गंभीर विचारक और दृढ निश्चयी व्यक्ति के रूप में अधिक रही है किंतु इस प्रशिधि के अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है जिसे विस्मृत नही किया जा सकता | यह एक तथ्य है कि एक कुशल प्रशासक,पटु विधिविज्ञ,सजग पत्रकार और राजस्थानी तथा हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के लेखक भी थे | पत्र लेखन में तो उनका कोई जबाब ही नही था अपने मित्रों,सहयोगियों,और सहकर्मियों को उन्होंने हजारों पत्र लिखे जिनमे देश,प्रान्त,समाज और राजपूत जाति के अतीत,वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है | अनेक सामाजिक,राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने साहित्य,संस्कृति और धार्मिक विषयों पर लिखने के लिए समय निकला |
श्री क्षत्रिय युवक संघ के पथ पर चलने वालों पथिकों और आने वाली देश की नई पीढियों की प्रेरणा स्वरूप स्व.श्री तनसिंह जी एक प्रेरणादायक सबल साहित्य का सर्जन कर गए | उन्होंने अनेक पुस्तके लिखी जो जो पथ-प्रेरक के रूप में आज भी हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए पर्याप्त है |
1-राजस्थान रा पिछोला
2-समाज चरित्र
3- बदलते द्रश्य
4- होनहार के खेल
5- साधक की समस्याएं
6- शिक्षक की समस्याएं
7- जेल जीवन के संस्मरण
8- लापरवाह के संस्मरण
9-पंछी की राम कहानी
10- एक भिखारी की आत्मकथा
11- गीता और समाज सेवा
12- साधना पथ
13- झनकार( तनसिंहजी द्वारा रचित 166 गीतों का संग्रह)
श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकों पर पुरा विवरण अगले लेख में |
कैसा लगा स्व.तनसिंह जी का व्यक्तित्व अपनी राय जरुर दे |