मैं आप लोगों को प्रतियोगिता दर्पण के अप्रेल 2009 के अंक में थारू जनजाति के संबंध में एक लेख छपा है उसका लिंक भेज रहा हूं उसमें किस तरह से राजपूती संस्कृति के बारे में कहां गया है उसको पढ़कर भी अगर हम कुछ नहीं कहेंगे तो लोग ऐसे ही हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने की हिमाकत करते रहेंगे और हम कुछ नहीं कर पायेंगे और आने वाली पीढि़यां हम माफ नहीं करेंगी। पहले तो इस लेख में कोई सांमजस्य है ही नहीं क्योंकि कि चित्तौड़ और थार के मरूस्थल के बारे में वह लेखक कुछ जानता ही नहीं है क्योंकि कहां चित्तौड़ रहा और कहां थार का मरूस्थल। उसके बाद में वह लेखक को यह पता होना चाहिए कि चित्तौड़ में सारी राजपूती महिलाओं ने जौहर किया था न कि किसी के साथ उनको भेज दिया था।
मैंरे कहने के मतलब यही है कि हम सभी को अपने अपने तरीके से ऐसे लेखों और लिखने वालों का विरोध करना चाहिए। चाहे वो कितना भी बड़ा और ताकतवर क्यों न हो। आप सभी से निवेदन है कि आप अपने अपने तरीके से प्रतियोगिता दर्पण और ऐसे लेखकों को जरूर लताड़े।
आप अपनी प्रतिक्रियाएं भी मुझे जरूरी बताएं और जितना हो इसके लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इसका विरोध करवाएं।
http://www.ezinemart.com/pratiyogitadarpan/01042009/Home.aspx?pgno=88&mode=2
Bhupendra Singh Chundawat
Udaipur
chundawat@yahoo.com
इस पत्रिका के लेखक व संपादक को info@pratiyogitadarpan.org ,delhi@pratiyogitadarpan.org पर मेल भेज कर अपना विरोध प्रकट करे |


ये तो वाकई इतिहास और तथ्यों के खिलाफ़ छेडछाड है. इसका विरोध हर संभव तरीके से किया जाना चाहिये. आपकी बात से सहमति है.
रामराम.
जब जब जिसके पास कलम रूपी हथियार आया है तब तब इतिहास के साक्ष्यो की धज्जियां उड़ाई गयी है । इस प्रकार की पत्रिकायें बिना सोचे समझे लेखक पर विश्वास कर के ज्यों का त्यों लेख छाप देती है । जब विरोध ज्यादा होने लगता है तो किसी कोने मे माफी नामा भी छाप देते है । समाज की जो प्रतिष्ठा गिरती है उसकी उन्हे कब परवाह होगी । भूपेन्द्र सिह जी हम आभारी है आपके कि आपने इस प्रकार की खबर दी है । आपको इस लेख के साथ प्रतीयोगिता दर्पण का ई मेल आईडी भी देना चाहिये था ताकी पाठक अपना विरोध उसे भेज पाते । इस लेख को पत्रीका के 1613 न. पेज पर छापा ग्या है तथा पत्रीका का ई मेल आईडी info@pratiyogitadarpan.org
delhi@pratiyogitadarpan.org है
मेक्ले की दी हुई सिक्षा पद्धति ऐसी ही है की उसमे हमलोग पढ़ कर कुछ करें या नहीं पर हम हिन्दू & अपने संस्कृति विरोधी जरुर हो जाते हैं | एक धाँसू इ-मेल प्रतियोगिता दर्पण को भेज चूका हूँ , देखते हैं कुछ रेपली आता है या नहीं |
hi... just dropping by!
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