Jul 30, 2011

पुर्व केन्‍दीय मंत्री स्‍व श्री कल्‍याण सिंह कालवी को 19 वी पुण्‍य तिथि पर याद किया करणी सेना ने किया रक्‍तदान

पुर्व केन्‍दीय मंत्री स्‍व श्री कल्‍याण सिंह कालवी की19 वी पुण्‍य तिथि को श्री राजपूत करणी सेना ने प्रदेश भर में स्‍मति दिवस के रूप मे मनाया । सेना के प्रदेश संयोजक श्‍याम प्रताप सिंह इटावा ने बताया कि प्रात 8 बजे सेना के जिला कार्यालय मे स्‍म्रति सभा रखी गयी जंहा स्‍व कालवी को श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद कार्यालय स्थित उघान मे वक्षारोपण किया गया ।। सेना के प्रदेश उपाध्‍यक्ष महीपाल सिंह मकराना व जिलाध्‍यक्ष नारायण सिंह दिवराला ने कहा कि स्‍व कालवी सक्रिय राजनेता होते हुए भी सदेव समाज के साथ खडे नजर आए चाहे वह भु स्‍वामि आन्‍दोलन हो , चाहे जोधपूर मे चोपासनी बचाओ आन्‍दोलन , चाहे दिवराला सती हो या भवानी निकेतन पर समाज के अधिकार कि लडाई । युवा वर्ग उनके दिखाए रास्‍ते पर चलने की श्‍ापथ ली ।

सेना की जिला ईकाइ के मंजीत सिंह चौहान व झब्‍बर सिंह राठौड के नेतत्‍व मे खातीपुरा स्‍ितथ मरूधर हास्पिटल मे विशाल रक्‍तदान शिविर का आयोजन रखा गया युवाओ ने अति उत्‍साह दिखाते हुए 186 युनिट रक्‍तदान किया जिसे जरूरत मंदो को दिया जाएगा । शिविर मे मुख्‍य तौर पर काग्रेस नेता विक्रम सिंह शेखावत , श्री प्रताप फाउडेश्‍न के सयोजक महावीर सिंह सरवडी , श्री राजपूत सभा के अध्‍यक्ष गिर्राज सिंह लोटवाडा , सचिव बलबीर सिंह हाथोज कग्रेस नेता देवेन्‍द्र सिंह बुटाटी व युवा भाजपा नेता अभिमन्‍यु सिंह राजवी पधारे ।





स्व.कालवी साहब को शत शत नमन

Jul 17, 2011

हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना

यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि जिस समाज को गिराना हो उसके इतिहास को पहले विकृत कर देना चाहिए| इस सिंद्धांत का आश्रय ले बुद्धिजीवियों ने महाभारत काल से लेकर अब तक निरंतर हमारे इतिहास को विकृत किया ह| यह ठीक है कि क्षत्रियों ने हमेशा इतिहास लेखन की पद्दति को हतौत्साहित किया है , क्योंकि इतिहास जातियों व धर्मों के बीच स्थाई द्वेष का कारण बन जाता है| लेकिन दुसरे लोग इतिहास लिखने लगे व उनका उद्देश्य जब हमारे इतिहास को कलंकित करना हो तो ऐसे प्रयासों का विरोध किया जाना चाहिए , व इस प्रकार विद्वेष की भावना से लिखे गए इतिहास को स्वीकार नहीं करना चाहिए| इस सिद्धांत की उपेक्षा कर हमारे मौन ने लोगों को यह समझा किया कि वास्तव में जो कुछ लिखा गया है , वाही सत्य है| धीरे - धीरे हमारी पीढियां भी इस विकृत इतिहास को सही समझने लगी| जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग वास्तविकता को समझने पर भी समझने को तैयार नहीं है| भावना लेखक कि भाषा से प्रकट हुए बिना नहीं रह सकती| महाभारत के युद्ध के बारें में महाभारत ग्रन्थ में लिखा है कि पुण्यात्मा क्षत्रियों को स्वर्ग में पहुचाने के लिए इस महान संग्राम कि रचना हुई , जबकि भागवत पुराण का लेखक लिखता है कि नीच व पापी क्षत्रियों के बोझ से धरती दबी जा रही थी| इया धरती का कल्याण करने के लिए यह संग्राम हुआ|

भावनाओं के बाद हम तथ्यों पर आते है| तथ्यों के आधार पर भी बुद्धिजीवियों द्वारा द्वेष भावना से रचे इन पुराणों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता| भागवत पुराण में उल्लेख है कि राम के वंशज क्षत्रियों का राज्य नष्ट हो जाएगा| अन्य किसी क्षत्रिय वंश के बारे में ऐसी भविष्यवाणी पुराण में नहीं कि गयी है| हम देख रहे है कि इस पुराण कि यह भविष्यवाणी पूर्णतया मिथ्या साबित हुई है| समस्त क्षत्रिय वंशो का राज्य नष्ट हो जाने के बाद भी राम के वंशजों का नेपाल में राज्य अब तक कायम है| भागवत पुराण में राम के वंशजों का राज्य नष्ट हो जाएगा , ऐसे भविष्यवाणी करते हुए इस वंश के अंतिम राजाओं के नाम भी दिए गए है | ये नाम नेपाल के राजवंश से कही भी मेल नहीं खाते| इतने सारे पाखंड के स्पष्ट दिखाई देने के बाद भी इतिहास कहे जाने वाले इन पुराणों को यदि हम स्वीकार करते हे , तो इससे बड़ी भूल और कोई नहीं हो सकती|

क्षत्रिय " शब्द ब्रह्म " अर्थात बीज तत्व के उपासक है , जब कि ब्राह्मण " पर ब्रह्म " अर्थात विस्तृत ज्ञान पद्दति के उपासक है| इसी प्रकार क्षत्रिय निष्काम कर्मयोग को स्वीकार करते है , जबकि ब्राह्मण केवल ब्रह्म के उपासक है व " ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या " के सिद्धांत को मानते है| संसार में केवल दो ही तत्व है एक " ब्रह्म " तत्व दूसरा " क्षात्र " तत्व| इन तत्वों कि अलग अलग साधना व उपासना पद्दति है| इस प्रकार सिद्धांत के अनुसार ब्राह्मण अपनी ही पद्दति के जानकार व गुरु हो सकते है| क्षत्रिय पद्दति का जानकार व गुरु भी केवल क्षत्रिय ही हो सकता है | व्यवहार में में यदि हम देखें तो श्री राम को समस्त ज्ञान व शक्ति उनके गुरु विश्वामित्र जी ने प्रदान की थी व अर्जुन को ज्ञान श्री कृष्ण ने दिया था| अतः यह स्वतः सिद्ध है कि क्षत्रिय की अपनी ज्ञान परंपरा हमेशा अलग रही है , लेकिन पुराणों में लिख दिया गया है कि ब्राह्मण के घर में जन्म लेने वाला प्रत्येक बालक संसार का गुरु है| इस प्रकार उन मिथ्या ग्रंथों के सहारे ये बुद्धिजीवी समाज के गुरु बन बैठे व हम धीरे धीरे अपनी ज्ञान परम्पराओं को खो बैठे|

पुनीत ग्रन्थ महाभारत के शान्ति पर्व में उल्लेख है कि " ब्राह्मण को राज सेवा , खेती के धन , व्यापार कि आजीविका , कुटिलता , परस्त्रीगमन और ब्याज इनसे दूर रहना चाहिए| जो ब्राह्मण दुश्चरित्र , धर्महीन , कुलटा का स्वामी , चुगलखोर , नाचने वाला , राज्य सेवक अथवा और कोई विकर्म करने वाला होता है , वह अत्यंत अधर्म है , उसे तो शुद्र ही समझो और उसे शूद्रों कि पंक्ति में बिठा कर ही भोजन करना चाहिए|" फिर आगे लिखते है , जिन्होंने अपने जातीय कर्मों को छोड़ दिया है , तथा जो कुत्सित कर्मों में प्रवृत होकर ब्राह्मणत्व से भ्रष्ट हो चुके है ,वे ब्राह्मण शुद्र के तुल्य है| इसी तरह जिन्होंने वेद नहीं पढ़ें , जो अग्रिहोत्र नहीं करते , वे भी शुद्र के तुल्य है| इन सब से धार्मिक राजा को कर और बेगार लेने का अधिकार है| न्यायालय में अभियुक्तों को पुकारने का काम करने वाले , वेतन लेकर देव मंदिर में पूजा करने वाले ये पांच प्रकार के ब्राह्मण चांडाल के सामान है|"

उक्त कथनों का मनन करने के बाद यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आज के युग में ब्राह्मण नगण्य है | फिर इन पंडावादी तत्वों को गुरु कि पदवी देने का जघन्य पाप कर्म क्षत्रिय समाज ने किया है जिसका परिणाम इस समाज ने न केवल अब तक भोग है बल्कि भविष्य में भी भोगना पड़ेगा| इन्ही तथ्यों व परिस्थितियों को देखकर पिछले डेढ़ हजार वर्षों से संतों ने केवल संत परंपरा के लोगों को व केवल संतों को ही गुरु रूप में स्वीकार करने कि बात कही | लेकिन इस और हमने कोई ध्यान नहीं दिया व पुराणवाद के चक्कर में फंसकर निरंतर पतन के गहरे गर्त की और अग्रसर होते गए|

अब हम आधुनिक इतिहास की और दृष्टि डालते है| आमेर राजवंश के सबसे प्रतापी राजा ;बल्कि यों कहा जाए कि आधुनिक युग के सबसे पराक्रमी योद्धा पंजवनराय जी , अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख सामंत थे , उनका नाम हमको इतिहास में देखने को नहीं मिलता| पंजवनराय ने ६४ बड़े युद्ध लड़े व दो बार अकेले अपनी ही सेना से मोहम्मद गौरी को परास्त कर बंदी बनाया| उस माहन शूरवीर का आज इतिहास में नाम नहीं मिलता| लोगों की जबान पर आज भी प्रचलित है|
"गहत गौरी साह के , भागी सेना और|
आयो वाह लिए तब , फिर कूर्म नागौर||

"इतिहासकारों का कथन है कि जयपुर राजवंश की वंशावली में पंजवनराय का जो काल अंकित है वह पृथ्वी राज के काल से मेल नहीं खाता जबकि पृथ्वीराज - रासौ का आधे से अधिक भाग केवल पंजवन के युद्धों से भरा पड़ा है | केवल एक छोटी सी विसंगति बताकर इतने बड़े शूरवीर का नाम इतिहास से मिटा दिया गया व हमने उसको स्वीकार कर लिया|
क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jul 15, 2011

हमारी भूलें : मार्गदर्शकों का मार्गदर्शन स्वीकार नहीं करना

व्यक्ति की सम्पूर्ण शक्तियों पर उसका स्वयं का प्रभुत्व होता है | उसके विकास के सम्पूर्ण साधन व आवश्यक गुण - धर्म उसके अन्दर विद्यमान होते है , इसके बावजूद वह अपनी प्रत्येक विफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराने का अभ्यस्त हो गया है |
हमारे समाज के पतन काल के बहुत पिछले भाग को छोड़ भी दें , जिसमे बुद्ध , व महावीर आदि हुए , तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि समाज के लिए मार्ग दर्शकों का अभाव रहा है| पिछले एक हज़ार वर्षों में देश के प्रत्येक भाग में ऐसे अनेक क्षत्रिय तपस्वी हुए जिन्होंने अपनी वाणियों व विचार आन्दोलनों द्वारा समाज को भविष्य का संकेत देने व पूर्वाग्रहों से मुक्त करने कि चेष्टा की लेकिन हमने इनकी और कभी ध्यान नहीं दिया तथा अपने पूर्वाग्रहों व दुराग्रहों से पीड़ित रहने के कारण , इनके मार्गदर्शन को स्वीकार नहीं कर सके|

देश पर मुसलामानों के आक्रमण के आरम्भ काल में संत रामदेवजी हुए जिन्होंने समझने की चेष्टा की कि हरिजनों को नजदीक लेने व उनको समाज का अभिन्न अंग बनाने की आवश्यकता है , लेकिन हमारे समाज ने उनका मार्गदर्शन स्वीकार नहीं किया| हरिजन आज भी गीत गाते है - " तंवरा की बोली प्यारी लागे सा " लेकिन रामदेव जी के वंशजों को हरिजनों की बोली कटु लगती रही| परिणाम यह हुआ कि हरिजनों को गले लगा कर महात्मा गाँधी राष्ट्र पिता बन गए व हरिजनों से नफरत करने वाले स्वयं अपनी ही नफरत से आज भी तड़प रहे है|

इसी परम्परा में ' रूपादे ' व ' मल्लिनाथ जी ' ने भी हरिजनों द्वारा की विचारश्रंखला को आगे बढाने का प्रयत्न किया , लेकिन इनके उपासक केवल हरिजन ही रह गए| रूपादे के भजनों का कहीं संग्रह मिल सकता है क्या ? यह प्रश्न मल्लिनाथ जी के वंशजों से पूछे जाने पर उत्तर मिला " उनके भजन तो हरिजन गाते है|" जिस समाज में संतों व भविष्य द्रष्टाओं के बारे में यह द्रष्टिकोण हो , उसका मार्ग दर्शन कोण कर सकता है ?

कार्ल मार्क्स के समकालीन सिरोही में संत अनोपदास जी हुए , जिन्होंने कहा कि समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों का उदय पूंजीपति ( बनिये ) के यहाँ से होता है , अतः पूंजीपतियों का सामजिक बहिष्कार करो , जिससे समस्त बुराइयां स्वतः ही समाप्त हो जायेगी| हमने उनकी बात भी नहीं सुनी| परिणाम यह हुआ कि पूंजीपतियों ने बुद्धि जीवियों के साथ गठजोड़ कर समस्त राज तंत्र पर अपना आधिपत्य जमा लिया|

जिस समय निकृष्ट पंडावादी लोगों के तांत्रिक आघातों से समाज पूरी तरह से पीड़ित था|महान संत मुच्छंदरनाथ व गोरखनाथ का उदय हुआ| जिन्होंने सात्विक साधना के द्वारा जनता को तांत्रिकों के अत्याचारों से मुक्त किया व उनमे नया आत्म विशवास पैदा किया| ब्राह्मणों का सर्वांगीण पतन हो जाने के कारण शास्त्रों में वर्णित ब्राह्मणों की महिमा के स्थान पर उन्होंने संतों की महिमा प्रतिपादित की व सत्संग को ही कल्याण का मार्ग बताया| गरीब जनता ने इन संतों को ह्रदय से लगा लिया| इनका अनुसरण गुरुनानक देव , कबीरदास , दादूदयाल आदि सैकड़ों संतों ने किया व अपनी वाणियों से देश की जनता में एक आध्यात्मिक शक्ति पैदा की| लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि क्षत्रिय समाज के बहुत कम लोगों ने इनका अनुसरण किया व जिन लोगों ने अनुसरण किया वे भी अपने आपको पुराणवादी कुसंस्कारों से मुक्त नहीं कर सके|

आधुनिक काल में भी रामकृष्ण परमहंस , स्वामी विवेकानंद , स्वामी रामतीर्थ , अरविन्द , महर्षि रमण व सांईबाबा जैसे सैकड़ों प्रगट व कितने ही गुप्त संत हुए| लेकिन हमने उनका आशीर्वाद व उनसे मार्गदर्शन लेने कि कोई चेष्टा नहीं की|
हमने कभी यह देखने की चेष्टा नहीं की कि कठिन समय व कठिन परिस्थितियों में हमारा साथ किसने दिया ? जो व्यक्ति या समाज अपने हित चिंतकों के प्रति कृतज्ञ नहीं हो सकता उसका विनाश अवश्यम्भावी है| पिछले एक हजार वर्षों तक , हमारा समाज निरंतर मुसलामानों के आक्रमणों के विरुद्ध लड़ता रहा है| क्या ऐसा कहीं प्रमाण मिलता है कि एक भी बनिए अथवा ब्राह्मण ने अपना बलिदान दिया हो? आज हम जिनको आदिवासी कहते है उन भील व मीणों ने तथा हरिजनों ने हमेशा उस कठिन परिस्थिति में , जब कदम कदम पर हमें तलवार का सामना करना पड़ा पड़ रहा था , हमारा साथ दिया | लेकिन इस स्वामिभक्ति व देशभक्ति का उन्हें क्या बदला चुकाया गया ?

हम पंडो व पूंजीपतियों के हाथ के खिलोनें बन गए| गरीब किसान व हरिजन वर्ग का शोषण कर , स्वर्ग में जाने के लिए मंदिरों के दरवाजों पर थैलियाँ भेंट की गई| बोहरों को गरीबों को लूटकर धन संग्रह करने की खुली छुट दे दी गई जिसका परिणाम वाही निकला जो निकलना चाहिए था| हमें कुमार्गगामी बनाकर , हमारे से ही उत्पीड़न कराकर ,जनता से हमारे विरुद्ध बगावत का झंडा खड़ा करवाया गया , लेकिन तब तक हम पूरी तरह शक्तिहीन व विवेकहीन हो चुके थे| अतः परिणाम निकला , " स्वेच्छापूर्वक अपनी मृत्यु को , हर्ष प्रगट करते हुए मजबूरी के साथ स्वीकार करना|

भील जाति के ऋषि श्रेष्ठ बाल्मीकि के आश्रम में १० वर्ष तक राम , लक्ष्मण व सीता रहे| कम से कम 16 वर्ष तक सीता जी व लवकुश रहे | नर्बदा नहीं के तट पर भगवान् शंकर को प्रसन्न करने के लिए माँ पार्वती ने जब कठोर तपस्या की , तब उन्होंने भी भीलों की सेवा स्वीकार की , जिसके कारण भीलों को आज भी 'मामा ' कहते है| उन भील व मीणों को इन बुद्धिजीवियों के षड्यंत्र में फंसकर हमसे पृथक कर दिया जिससे हम तो शक्तिहीन हुए ही , ये जातियां भी समाज से अलगाव के कारण निरंतर पिछड़ती गई व आज उनमे हमारे प्रति शत्रुता का भाव मौजूद है|
संत मल्लुकदास जिन्होंने पंडावादी क्रियाकलापों से मुक्त होकर अपने आप द्वारा मार्ग दर्शन प्राप्त करने की चेष्टा करने को कहा| मीरा जिन्होंने घृणा को त्याग कर व विद्वेष छोड़कर , प्रेम में लीन होने की प्रेरणा दी| दादुजी के शिष्य सुन्दरदास जी जिन्होंने आत्म चिंतन व स्वयं के मन के शुद्धिकरण का महत्व बताया| उनकी व उन जैसे अनेक अन्य संतों की , हमने एक नहीं सुनी| अपने आपको बदलने के बजाय हम हठधर्मी बने रहे व दुराग्रहों पर अड़े रहे , जिसके परिणाम स्वरूप पूर्ण परभाव से साक्षात्कार करना पड़ा|
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक

Jul 8, 2011

हमारी भूलें : मूल आराधना पद्दति की खोज नहीं करना

वह समाज व उसका धर्म कभी जीवित नहीं रह सकता जो निरंतर खोज काय में संलग्न नहीं रहता | क्योंकि प्रकृति का यह नीयम है कि वह चीजों को बनती व बिगाड़ती रहती है | अतः जिन वस्तुओं को प्रकृति ने समय पाकर नष्ट कर दिया है , उनकी पुनः पुनः खोज करते रहना हमेशा आवश्यक है |
हमारी ' प्राणगत' व 'हृदयगत' साधना का उल्लेख पहले विस्तार से किया जा चूका है | यहाँ पर इस विषय में केवल इतना ही कहना उपेक्षित है कि आज के समय कि सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम हमारी भूल आराधना पद्दति की पुनः खोज आरम्भ करें | बिना किसी सहारे के इस कार्य को आरम्भ करना व उसमे सफलता प्राप्त करना चाहे कठिन आवश्य लगे , लेकीन एक बार अपने आप की खोज आरम्भ कर देंगे , तो हमें यह समझते देर नहीं लगेगी कि ' युक्ष्म जगत ' में हमारा मार्ग दर्शन करने वाले लोग मौजूद है , व उनसे हमे हर कठिन परिस्थिति में मार्ग दर्शन प्राप्त होगा |
यही कारण है कि शास्त्रों के नष्ट हो जाने या उन्हें विकृत कर देने के बाद भी धर्म नष्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि वास्तविकता को जानने वाले व इस स्थूल जगत का संचालन करने वाले वे लोग है जो सूक्ष्म जगत में निवास करते है | परिस्थितियां उन्हें नष्ट नहीं कर सकती | इसलिए सत्य आँखों से ओझल हो सकता है , उसे घूमिल किया जा सकता है | जो सत्य कि खोज में निकलेगा उसका साक्षात्कार सत्य से अवश्य होगा |
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jul 7, 2011

हमारी भूलें : अपने आदर्शों को छोटा कर लेना

व्यक्ति उतनी ही ऊंची उड़ान भर सकता है जितना ऊंचा उसका लक्ष्य है | जिन व्यक्तियों के लक्ष्य उच्च होते है वे ही पुरुषार्थ का अनुसरण कर महान कार्यों में प्रवृत होते देखे गए है | अपने प्राचीन इतिहास से अनभिज्ञता के कारण आज हमने अपने आदर्शों को इतना छोटा कर लिया है , जिससे अधिक महत्वपूरण कार्यों को करने व उच्च आदर्शों तक पंहुचने की संभावना ही धूमिल हो गई है | आज जब हम हमारे संघठनो में आदर्श पुरुषों को स्मरण करते है , तो महाराणा प्रताप , दुर्गादास व छत्रपति शिवाजी जैसे वीरों के नाम हमारे सामने आते है
आज हम इतने छोटे हो गए है कि हमारी तुलना मै यह महापुरुष काफी बड़े थे | किन्तु हमारा समाज जितना उच्च रहा है , उस समाज कि दृष्टि से देखने पर यह आदर्श बहुत छोटे दिखाई देने लगते है | अपने बल व पराक्रम से समस्त भूमंडल पर शासन करने वाले राजा पृथु , जिसके नाम से इस धरती का नाम पृथ्वी पड़ा ; देवताओं को अपनी प्रजा मानकर उन से कर वसूलने वाले राजा 'रघु' ; अपनी तपस्या से संसार को विस्मित कर अदभुत शक्ति उपार्जन करने वाले विश्वामित्र ; बिना आशक्ति के समस्त राज्य कार्य का संचालन करने वाले राजा जनक ; श्री कृष्ण को प्रतिज्ञा भंग कराने वाले पितामाह भीष्म , जैसे लोग जिस समाज मै हुए हों उनके लिए आज जो आदर्श अपनाए जा रहे है , वे अत्यंत छोटे प्रतीत होते है |
हमारी यह सबसे बड़ी भूल रही है कि हमने हमारे आदर्शों को छोटा बना लिया है | जब हमारी महत्वकांक्षा विश्वामित्र व पितामह भीष्म बनने कि नहीं है तो हम उस उंचाई तक कल्पना नहीं कर सकते जंहा से उन्नत विचार धाराओं का उदगम होता है | इसी भूल के कारण हम तपस्या कि परंपरा से विमुख हो गए | तपस्या से विहीन होकर आज हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारे पूर्वज कभी इतने बलशाली रहे होंगे | इस प्रकार मति भ्रमित हुए हम लोग परकीय विचारधाराओं व साधना पद्दति कि और आकृष्ट होने लगे | श्रापों व तथा कथित धर्म ग्रन्थों व धर्म कि निंदा से हमको भय लगने लगा | हम यह भूल गए कि धर्म के संस्थापक हम ही थे व उसकी स्थापना का दायित्व जिस पर हो वह धर्म कभी भी भय का कारण नहीं हो सकता |
अतः आज आवश्यकता है कि हम हामारे प्राचीन ग्रन्थों को पढ़ें पूर्वजों के महिमामय कृत्यों का स्मरण करे , उनके द्वारा किये गए कार्यों का अनुसरण करें व राम तथा कृष्ण को यदि भगवान समझकर हम आदर्श बनाने का साहस न भी करें तो भी हजारों ऐसे श्रेष्ठ व तपस्वी वीर हुए है जिनको हमें आदर्श बनाना चाहिए व उनके समान क्षमताओं को अर्जित करने केलिए कठोर ताप व कर्म का आश्रय लेकर अपने जीवन को कर्मशील व कर्त्तव्य परायण बनाने कि चेष्टा करनी चाहिए |

लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jul 3, 2011

हमारी भूलें : कार्य व मार्गदर्शन की अवास्तविक मांग

आज लोग कहते है - " हम काम करना चाहते है , लेकिन हमको कोई काम देने वाला नहीं है | हम सामजिक व आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में मार्गदर्शन के लिए तड़प रहे है लेकिन हमको कोई मार्गदर्शन देने वाला नहीं है| " यह दोनों की मांगे पूरी तरह से असत्य व अपने आप को धोके में डालने वाली है|

जो कार्य करना चाहता है , उसको काम करने से संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती और जो मार्ग को खोजना चाहता है , उसे मार्ग को प्राप्त करने से कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती| काम की मांग करना अपनी निष्क्रिय पे पर्दा डाल कर अपने आप को भ्रमित करना है |
लोग कहते है कि हम श्री क्षत्रिय युवक संघ में काम करना चाहते है | हम काम तब करें , जब हमको कोई अधिकृत व्यक्ति काम करने के लिए कहे | अगर हम वास्तविकता में जाएँ तो यह कथन कतई सही नहीं है , क्योंकि इस कथन के साथ भी दुराग्रह जुड़े हुए है | क्षत्रिय युवक संघ कोनसा है ? इसकी परिभाषा भी हम करें| उस प्रकार से हो तो हमें स्वीकार है अन्यथा नहीं | काम क्या हो व कैसा हो ? यह भी हम कहें जैसे तो तो ठीक है है अन्यथा गलत| फिर काम व मार्गदर्शन कि मांग कहाँ रह जाती है ? यह सब निष्क्रियता को छिपाने के बहाने है |
अगर कोई व्यक्ति समाज मै काम करना चाहता है तो उसे कोन रोक रहा है ? समाज मै हजारों तरह कि बुराइयाँ है , उनके निवारण केलिए उतने ही कार्यक्षेत्र है| हम कार्य क्षेत्र में उतर सकते है , लोगों से सहयोग मांग सकते है| सहयोग मिलेगा व कार्य होगा , किन्तु यह सब कुछ हम करना नहीं चाहते है| हम तो पड़े पड़े नेता बनना चाहते है , पद चाहते है व यश चाहते है| यह सब उपार्जन कि वस्तुएं है , जिनको हम बिना श्रम किये प्राप्त करना चाहते है , जिसकी कोई संभावना नहीं है |

आज हमारी निष्क्रियता कि अवस्था यहाँ तक दयनीय हो गई है कि कार्य करना व शाखायें चलाने कि बात तो दूर रही , महीनों व वर्षों तक आपस में मिलते नहीं , फिर भी दुसरे लोगों के बारे मै बिना जाने , पड़े पड़े निंदा व आलोचना करते रहते है|
सक्रियता ही जीवन है व निष्क्रियता मृत्यु| आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रविष्टि होने कि पहली सीढ़ी है , सुकर्म में प्रवृत होना| बिना सुकर्म में लगे अपने आप को जानने कि प्रेरणा जागृत नहीं हो सकती| अतः जिन लोगों में अपने आपकी खोज करने की उत्कष्ट अभिलाषा नहीं है , उन्हें आध्यात्मवाद के मार्ग पर अग्रसर होने की चेष्टा करने के बजाय सदा सुकर्मों में लगे रहने की चेष्टा करनी चाहिए , ताकि अपने आप की खोज के लिए वास्तविक लगन व वास्तविक पीड़ा स्वतः ही पैदा हो सके|

जो लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में मार्गदर्शन की मांग कर रहे है , उनकी भी मांग उतनी ही अवास्तविक है जीतनी सामजिक क्षेत्र में कार्य करने वालों की मांग अवास्तविक है| क्षत्रियों की आराधना व साधना पद्दति ' प्राणगत 'व ' हृदयगत ' साधना है| हमारे ह्रदय में प्रतिष्ठित ' प्राण ' हमारा मार्गदर्शन करने के लिए सतत प्रयत्नशील है , फिर हम किससे मार्गदर्शन की मांग कर रहे है ? आवश्यकता केवल इतनी ही है कि हम सहज भाव से व सहज गति से अपनी सात्विक साधना को कायम रखते हुए हमारे मार्गदर्शक ' प्राण ' कि खोज के कार्य को गति दें| अपने आपको जानने के लिए व्यथा व पीड़ा कि ज्योति को जागृत करें व उसे सतत ज्वलंत रखने कि चेष्टा करें|
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jul 1, 2011

हमारी भूले : भविष्य के ज्ञान का अभाव

आज हम समाज को नेतृत्व देने की बात कहते है व ऐसी ही अभिलाषा अपने अन्दर संजोये हुए है , किन्तु यह नही जाते की नेतृत्व देने की क्षमता के लिए जो सबसे पहली आवश्यकता है वह है " भविष्य का ज्ञान " | नेता " क्रान्तदर्शी " होता है | अर्थात आर पार देखने वाला , कालचक्र किस और व किस गति से बढ़ रहा है , इसके सम्बन्ध में नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों में स्पष्ट धारणा होनी चाहिए | हम पाच हज़ार वर्ष से पांच सौ वर्ष पीछे तक की बातें कहते है , सुनते है , व उन्ही घिसीपिटी परिपाटियों पर चलना चाहते है | यदि हमे भविष्य का बोध होता तो हमारा मार्ग व हमारा आचरण हमारे पतन काल के ढर्रे से पूरी तरह बदल गया होता | अपने आप को बदलने के लिए व भविष्य को देखने के लिए यह आवश्यक है कि हम हमारी रूढिगत बुराइयों का परित्याग करे व नए समय के साथ जो नहीं ज्योति व नया विचार आ रहा है , उसको ग्रहण करने कि क्षमता उपार्जित करे |

हम कहते कि हमे बैठकर विचार करना चाहिए कि हमारा कार्यक्रम क्या हो ?हम हमारे मतभेदों को किस प्रकार भुला सकते है या कम कर सकते है | लेकिन हम नहीं जानते कि अंधा अंधे का मार्ग दर्शन नहीं कर सकता | जिनको भविष्य नहीं दीखता , वे बहुत सारे लोग मिलकर यदि भविष्य को बनाने कि योजना बनावें तो वह अँधेरे में लट्ठ मारने के सामान होगा |

ऐसा नहीं है कि हम भविष्य को देख नहीं सकते | लेकिन वास्तविकता यह है कि भविष्य को देखने कि हमारे में चाह नहीं है | क्योंकि हमे भय लगता है कि भविष्य के चक्कर में कहीं वर्तमान न बिगड़ जाए | क्योंकि हम नहीं जानते कि जिसका भविष्य बिगड़ा हुआ है उसका वर्तमान कभी सफल नहीं हो सकता | इस प्रकार हम समाज को संघठित कर उसका मार्ग दर्शन करने व समाज का कल्याण करने कि मृगतृष्णा में अपने आप को छलते जा रहे है | ये छलना जैसे जैसे खडित होती जायेगी वैसे वैसे , समाज में और अधिक निराशा व्याप्त होगी |

पहले भी समाज में बड़े बड़े सामाजिक संघठन बने ' लेकिन किसी ने भी तपस्या का आश्रय ले , भविष्य कि दृष्टि प्राप्त करने कि चेष्टा नहीं कि | परिणाम स्वरूप वे संघठन धराशाही हुए , समाप्त हुए व समाज के लिए छोड़े गए केवल निराशा |

अगर चाह हो तो व्यक्ति मार्ग दर्शकों कि खोज भी कर सकता है , किन्तु हमने ऐसा भी नहीं किया | ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में मार्ग दर्शक नहीं हुए या नहीं है , लेकिन हमने अपने अहंकार , पूर्वाग्रह व अपनी रुढ़िवादीता के कारण कभी उसका मार्ग दर्शन प्राप्त करने या उनके वचनों पर चिंतन , मनन कर अपने आपको बदलने पर ध्यान नही दिया | परिणाम जो होना चाहिए था , वाही हुआ | अब भी समय है , जब स्थिति को बदला जा सकता है , व भविष्य कि वास्तविकता को समझकर तदनुसार कार्यक्रम तैयार किये जा सकते है |
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |