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हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता - 2

आहार व्यवहार की अपवित्रता भाग - १ से आगे..............

व्यवहार में पवित्रतता लाने के लिए आहार की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है| कहा गया है कि – “ जैसा अन्न वैसा मन”| जिस प्रकार का हम आहार करते है उसी प्रकार का मन बनने का आशय है कि यदि हमारा आहार तामस है तो मन उससे प्रभावित होकर अहंकार के पक्ष में निर्णय करेगा व यदि आहार सात्विक है तो मन सदा बुद्धि के अनुकूल रहकर हमको तर्क संगत विकासशील मार्ग अग्रसर करता रहेगा|

आज मदिरा व मांस जैसे तामसिक आहार का समाज में आम प्रचलन ही नहीं हुआ ,बल्कि हम इस प्रकार के आहार को अपनी परम्परा का एक अंग समझने लगे है| क्योकि हम नहीं जानते कि हमको पथ भ्रष्ट व शक्तिहीन बनाने क लिए मुगलकाल में षड्यंत्र रचा गया| देवताओ क मंदिरों में बली देकर मांस भक्षण को नैमितिक कर्म बताकर कहा गया की देवी के प्रसाद के रूप में मांस मदिरा का भक्षण करने से पाप नहीं लगेगा|

हमने कभी इस विषय पर विचार करने की चेष्टा नहीं की कि देवियों के मंदिर में बलिदान कि परम्परा कब व क्यों आरम्भ हुई? एक हज़ार वर्ष से अधिक प्राचीन एक देवी का मंदिर ऐसा नहीं मिलेगा जहाँ पर पशुओ कि बली दी जाती हो या मूर्ति पर मदिरा चढाई जाती हो| कच्छवाहों की कुल देवी जमवारामगढ़ की "जमवाय माता",जम्मू की वैष्णव देवी,संभार की शाकम्भरी देवी के मन्दिर इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण है लेकिन जिव्हा के स्वाद के चक्कर में फंसे लोग यदि वास्तविकता की उपेक्षा कर हठधर्मी पर आमादा रहें तो फिर उन्हें स्वयं अपने आप के व समाज के उत्थान की कल्पना नहीं करनी चाहिए|

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यदि आहार क संबंद में विचार किया जावे तो हम पायेंगे की मांसाहारी पशुओ के नाख़ून नुकीले तथा बगल के दांत लम्बे व दाढो के बीच में जगह पाई जाती है|उनकी आंते अन्य पशुओ से चौड़ी होती है व आहार किये हुए भोजन की उल्टी कर उसे दुबारा खाने की उनकी आदत होती है|इन सब प्राक्रतिक लक्षणों से मनुष्य युक्त नहीं है फिर भी वह केवल स्वाद का परित्याग नहीं सकते के कारण अपने स्वास्थे के लिए हानिकारक इस आहार को ग्रहण करता है
मांस मदिरा भक्षण के विरोधी तीसरे प्रबल तथ्य पर आने से पूर्व इसके पक्ष में कहे गए एक वचन पर विचार कर लेना आवश्यक होगा |

एक पंडितो की सभा में चेतन्य महाप्रभु की उनकी आहार की अशुद्धता के लिए निंदा की जा रही थी |महाप्रभु जिन्हें उनमे से कोई पहचानता नहीं था ,एक कोने में बेठे यह सब सुन रहे थे |जैसे ही भाषण समाप्त हुए,उन्होंने खड़े होकर एक प्रश्न किया कि कबूतर जो चुगा व अन्न का सात्विक आहार करता है,हमेशा काम वासना से पीड़ित रहता है ,लेकिन शेर जो मांसहारी है एक वर्ष में केवल एक बार सम्भोग करता है |फिर आहार की पवित्रता का क्या महत्व है?पंडित इसका तर्कसंगत उत्तर नहीं दे सके |लेकिन हमे ये नहीं भूलना चाहिये की चेतन्य महाप्रभु इतने उच्च कोटि के संत थे की वे साधना पथ पर आने वाली कठिनाइयों की स्थिति को भली प्रकार समझने तथा नियंत्रित करने में सक्षम थे|ऐसे महान लोगो तथा जो लोग आध्यात्मिक विकास के लिए उत्सुक थे,उनके लिए आहार की शुद्धता अर्थहीन है|इसके अलावा हमे ये भी नहीं भूलना चाहिए है की प्रत्येक प्राणी में अपने विशिष्ट गुण होते है |किसी भी प्रकार की सांसारिक परिस्थियाँ उन गुणों को नष्ट नहीं कर सकती|

क्रमश:..........


लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |


Comments :

11 comments to “हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता - 2”
Rajput said... Hindi Blog
on 

बिलकूल सही है सा , मांस मदिरा को बेवजह हमारे साथ जोड़ा गया है और हमारे लोग भी शराब जैसी घटिया चीज को राजपूत से जोड़ कर
देखत हैं , जैसे कहना चाहते हों की शराब और मांस के बिना "राजपूत" की कल्पना ही नहीं की जा सकती | हमें जरूरत है देवी सिंह जी जैसे विचारों की ताकि
हम एस दाग को धो सकें की राजपूत का परिचय शराब और मांस नहीं है |
/विक्रम शेखावत /

DR. ANWER JAMAL said... Hindi Blog
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स्वामी विवेकानंद ने पुराणपंथी ब्राह्मणों को उत्साहपूर्वक बतलाया कि वैदिक युग में मांसाहार प्रचलित था . जब एक दिन उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कौन सा काल था तो उन्होंने कहा कि वैदिक काल स्वर्णयुग था जब "पाँच ब्राह्मण एक गाय चट कर जाते थे ." (देखें स्वामी निखिलानंद रचित 'विवेकानंद ए बायोग्राफ़ी' प॰ स॰ 96)
€ @ क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?
या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?
2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .
ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .
-ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य
सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।
क्या सायण और विवेकानंद की गिनती असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?

Rajput said... Hindi Blog
on 

अनवर साहब . धर्म बहुत पेचीदा विषय है , जैसे कोई भी इंसान शत प्रतिशत परफेक्ट नहीं होता वैसे धार्मिक ग्रंथो में भी थोडा बहुत उंच नीच है , वो चाहे कोई भी मजहब हो |
कबीर दस जी ने कहा है "साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ..सार सार को गहि रहे थोथा देहो उडाय" . बहुत से संत पीर हुए सब ने अपने विचार लिखे य कहे , वो उस वक्त के
हिसाब से हो सकत है ठीक रहे हो और आज हमें हजम नहीं होते हों | बेहतर होगा हम उन पुराणों मेसे अच्छाई निकाल लें और जो कुछ बहस के लायक ही उसे रहने दें | एक दुसरे के धार्मिक ग्रंथों को सरे राह खिंच कर उनपे टिका टिप्पणी कर हम धर्म और धार्मिक ग्रंथो को बदनाम ही करेंगे | हम अच्छे इंसान बनें ना की धर्म को अच्छा बुरा बनाये |

DR. ANWER JAMAL said... Hindi Blog
on 

@ भाई रतन सिंह शेख़ावत जी ! हम न तो मांसाहार को बुराई मानते हैं और न ही हिंदू धर्मग्रंथों का उद्धरण इसलिए दे रहे हैं कि उनमें बुराई साबित की जाए।

इस लेख का लेखक बलि और मांसाहार को एक हज़ार साल से पुराना नहीं मानता।
उसकी इसी मान्यता की ग़लती सामने लाने के लिए इन प्राचीन ग्रंथों के उद्धरण दिए जा रहे हैं।

जो इंसान ख़ामोश चीज़ों तक की जबान जानता हो, वह इतना बहरा कैसे हो जाता है कि धर्म की उन हज़ारों ठीक बातों को वह कभी सुनता ही नहीं, जिनका चर्चा दुनिया के हरेक धर्म-मत के ग्रंथ में मिलता है लेकिन अपना सारा ज़ोर उन बातों पर लगा देता है जिन पर सारी दुनिया तो क्या ख़ुद उस धर्म-मत के मानने वाले भी एक मत नहीं हैं।
शुभकामनायें !

Rajput said... Hindi Blog
on 

अनवर साहब आपका तस्लीमा नसरीन के इस बयान के बारें में क्या कहना है ?

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/10453739.cms

Rajput said... Hindi Blog
on 

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow
/10453739.cms

DR. ANWER JAMAL said... Hindi Blog
on 

तसलीमा जी के बारे में हम बहुत पहले एक पोस्ट हमारी अंजुमन पर लिख चुके हैं।
http://www.hamarianjuman.com/2010/03/weeping-crocodiles.html

सुज्ञ said... Hindi Blog
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देवीसिंह जी सही विवेचन किया है, राजपूतों में देवी समक्ष बलि प्रथा और मांसाहर एक हजार साल से अधिक पुराना नहीं है। यही वह समय था जब भारत के पश्चिम से मुस्लिम आक्रमण हो रहे थे। वे आक्रांता क्रूर और अनैतिक आक्रमणखोर थे। नीति-नियम से शौर्यवान राजपूत उनकी हिंसक व क्रूर निति से पिछड़ रहे थे। जब राजपूतो को उन आक्रांतो के क्रूरता से लड़नें का तात्कालिक कारण यही समझा गया कि वे मांसभक्षी थे।
इन आक्रांताओं का उसी निष्ठुरता और क्रूरता से जवाब देने के लिए राजपूतों में भी क्रूरता से बलि देने की प्रथा और मांसहार का प्रचलन हुआ।

निरामिष said... Hindi Blog
on 

सत्य विवेचना, यथार्थ चिंतन!!

DR. ANWER JAMAL said... Hindi Blog
on 

पूर्वजों के इतिहास के बारे में जानकारी देती हुई इस पोस्ट का चर्चा है आज
ब्लॉग की ख़बरें पर
देखिए
पूर्वजों की शक्ति का रहस्य ?

इसी पोस्ट को आप ऑल इंडिया ब्लॉगर्स ऐसोसिएशन और भारतीय ब्लॉग समाचार पर भी देख सकते हैं।

Rajput said... Hindi Blog
on 

अनवर साहब , पहले भी एक दो बार मासाहार को लेकर टिक्का टिप्पणी हुई है | मेरा सवाल शास्त्र , पुराण को लेकर नहीं है मेरा सवाल ये हैं की अगर आप माँसाहार के रसिया है तो क्या जरुरी है पूरी दुनिया आप जैसी हो ? ग्रंथो में बहुत कुछ लिखा है , गीता कुरान में जो लिखा है उसका कोन शत प्रतिशत निर्वाह करता है ? धार्मिक गर्न्थों मर अच्छा भी बहत कुछ लिखा है , जरा उसको भी चर्चा में लायें | क्यों बेकार के हाजमे ख़राब करने वाले मुद्दे
उठाते हैं | आप अच्छा लिखते हैं मगर कभी कभार..

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