Dec 27, 2011

हमारी भूलें : जातिगत व धर्मगत भावनाओं में डूबे रहना

पहले आध्यात्मिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को ही धर्म के नाम से संबोधित किया जाता था| किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है| धर्म के नाम पर कुछ क्रिया-कलाप होने लगे है| तथा इन्हीं क्रिया कलापों को धर्म कहा जाता है| कौन किस प्रकार से जीवन बिताता है,इसको झगड़े व विवाद का विषय बना लिया गया है| व् इसी विषय पर साधारण झगड़े ही नहीं महायुद्धों तक की रचना हुई है|

वर्ण व जातियां भी किसी प्रकार से धर्म का अंग नहीं है| चार युगों में से सतयुग व कलियुग में वर्ण नहीं होती| कलियुग में वह नष्ट हो जाती है और सतयुग में उसकी आवश्यकता ही नहीं रहती| त्रेता के आरम्भ में जब समाज पत्नोमुखी होने लगा, उसकी रोकथाम के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया जाता है| जो कलियुग के आरम्भ होते होते पूरी तरह से विफल हो,नष्ट हो जाती है| इस प्रकार से चार योगों के कार्यकाल को जोड़ा जाय तो आधे भाग में सतयुग व कलियुग होता है, जिसमे वर्णव्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता| फिर भी यदि लोग वर्ण व जाति व्यवस्था को धर्म का आधार बताने की चेष्टा करे तो इसे दुस्साहस ही कहा जायेगा|

आज व्यावसयिक बुद्धि के लोग धर्म व जाति के नाम पर अनेक प्रकार के संगठनों का निर्माण, न केवल सुविधा पूर्वक जीवन बीता रहे है, बल्कि वे समाज के शोषण के हेतु बने हुए है| ऐसे लोग जातिय व धार्मिक कट्टरता फैलाकर समाज को शेष मानवता से अलग-थलग कर देने के लिए दोषी समझे जाने चाहिए|

जातिय व धार्मिक संगठनों कि यदि वास्तव में कोई उपयोगिता है तो वह यही हो सकती है कि अपने पूर्व पुरुषों द्वारा आध्यात्मिक विकास में जो मार्ग खोजे गए थे, उनका अन्वेषण कर, उस पाठ पर चल कर स्वयं का, समाज का व मानवता का कल्याण किया जाए| लेकिन यह करू अत्यंत कठिन है| इसके लिए व्यक्ति को कठोर साधना का आश्रय लेकर अपने तथाकथित भौतिक सुख साधनों का उत्सर्ग करना पड़ता है| इस लिए लोगों ने पूर्वजों के नाम पर,गौरव गाथाओं का बखान कर संगठन बनाने की पद्धति अपना ली है, ताकि समाज व पूर्वजों के नाम पर स्वयं हित का साधन कर सके व लोगों को गुमराह कर, उनके साधनों व शक्तियों का अपने हित में उपयोग कर सकें|

यह निश्चित तथ्य है कि वर्तमान युग में जिस प्रकार से जितने धर्म व जातियां चल रही है उनका अस्तित्व अधिक समय तक चलने वाला नहीं है| अत: जातिय संगठनों को वास्तविकता स्वीकार कर लोगों को स्वयं का विकास करने के लिए परम्परागत आध्यात्मिक प्रणालियों का आश्रय लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए| जो धार्मिक व सामाजिक संगठन यह कार्य नहीं कर सकेंगे, वे कालांतर में स्वयं समाज व धर्म का विनाश करने के लिए दोषी ठहराए जायेंगे|

आज से एक हजार वर्ष पूर्व जब मौखिक विज्ञान अपने विकास को द्रुतगति दे रहा था| उस समय अन्धकार में डूबे हुए लोग अपनी यश गाथाएँ सुनने, भोग विलास करने, व धार्मिक मदान्धता में लिप्त हुए अपने आपको अद्भुत प्राणी समझ रहे थे| लेकिन विज्ञान के चमत्कार ने उनकी सारी बुद्धिमानियों को मूर्खता साबित कर दिया| पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान जिस गति से आगे बढ़ा है, उसने समस्त भौतिक मूल्यों को ही बदल दिया है| पालकियों, रथ, हाथी, घोड़ों व चरसों को किसी ने नष्ट नहीं किया, वे बदले हुए काल चक्र के प्रभाव से अपने आप ही समाज द्वारा भुला दिए गए व स्वत: ही नष्ट हो गए|

पिछले आठ सौ वर्षों से आध्यात्मिक जगत में विलक्षण चमत्कार हो रहे है| संसार की सभी कौमों में व संसार के सभी धर्मों में धार्मिक कट्टरता, मदान्धता व धार्मिक पंडावाद के खिलाफ विद्रोह करने वाले श्रेष्ठ पुरुष पैदा हुए है| उनकी आवाज को बुद्धिमान लोगों ने सुना व ह्रदय गम किया है| व समाज को नए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया है| लेकिन धर्म व जातिगत भावनाओं से लोग अंधे हो गए है, उन्हें यह सब कुछ दिखाई नहीं देता है| वे आज भी बैल गाड़ियों से चंद्रलोक तक पहुँचने की कल्पना लेकर समाज को मुर्ख बनाने की चेष्टा कर रहे है|

आगे आने वाले दो सौ वर्ष संसार में आध्यात्मिक विकास के लिए उतने ही मत्वपूर्ण होंगे जितने महत्वपूर्ण पिछले दो सौ वर्ष भौतिक विज्ञान के विकास के लिए रहे है| मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, मठ व चर्चों की दीवारों में जो लोग धर्म को बाँध कर रखना चाहते है उनके हौसलें इस तरह से पस्त होंगे, जिनकी आज लोग कल्पना भी नहीं कर पा रहे है| इन धर्म के नाम पर ठगी के अखाड़ों को किसी को नष्ट करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी| समाज द्वारा इन्हें सभी प्रकार से परित्यक्त कर दिया जावेगा| जिस प्रकार रथ,हाथी व घोड़े समाज द्वारा छोड़ दिए गए है|

धर्म व जाती के नाम पर चलने वाले अखाड़ों के भीतर घुसकर यदि हम देखने की चेष्टा करें तो न वहां हमें जीवन दिखाई देगा और न ही सौंदर्य| जीवन से विहीन, विशाल भवनों व किलों की दुर्गति आज हम देख रहे है वही गति इन धर्म के नाम पर चलाये जाने वाले संगठनों की होगी| वे स्वत: ही खंडहर बनकर लोगों के द्वारा छोड़ दिए जायेंगे| जिन लोगों में जीवन जीवन है, उन्हें चाहिए कि सम्यक रूप से स्वयं पर व समाज व सामाजिक संगठनों पर दृष्टि डाले| इन खंडहरों को का जो स्वरूप है, उसे बचाया नहीं जा सकता| इस तथ्य को स्वीकार कर लेने के बाद ही नव निर्माण का सूत्रपात होगा|

नव निर्माण का प्रयोजन केवल एक ही हो सकता है| अपनी परम्परागत साधना व आराधना पद्धतियों कि खोज तथा उनका अनुसरण कर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण| जो भी व्यक्ति, समाज या धर्म इस कार्य को कर लेगा, वही आने वाले समय में जीवित रहेगा,विकसित रहेगा व संसार पर छा जायेगा| वह समय दूर नहीं है, जब आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न लोग उसी तरह से छा जायेंगे, जिस प्रकार आज भौतिकवादी छाये हुए है|


लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 21, 2011

हमारी भूलें : भविष्य की कल्पना में दुबे रहना

क्रांतदर्शी होने का तात्पर्य है,आर पार देखने की सामर्थ्य| अर्थात वतमान को छोड़कर भविष्य को देख लेने की सामर्थ्य| यह एक गुण है खास तौर से नेतृत्व् का यह विशिष्ट गुण है| जिस नेता में यह गुण नहीं है व समाज का मार्ग दर्शन करता है तो उसे दोषपूर्ण कार्य ही कहा जाएगा| क्योंकि जिसको स्वयं मार्ग नहीं दिखाई देता वह दूसरों का मार्ग दर्शन करने का दावा किस आधार पर कर सकता है|

भविष्य को देखकर,वर्तमान व भविष्य दोनों का समन्वय करने वाली योजनाओं की रचना तो नेता करता है,वही लोकप्रियता व सफलता दोनों को प्राप्त कर सकता है| जो लोग केवल दीर्घकालिक योजना बनाकर कार्य आरम्भ करते है,उनके कार्यकर्ताओं का वर्तमान इतना बोझिल हो जाता है कि वे लक्ष्य को प्राप्त करने से पूर्व ही थक कर निराश हो जाते है| इसके विपरीत जो केवल वर्मान को देखकर ही परिस्थितियों के निवारण हेतु कार्य करते रहते है,वे अपने जीवन के अंत में इस अनुभव पर पहुँचते है कि वे कुछ भी नहीं कर पाए|

भविष्य को देख पाने कि क्षमता व भविष्य कि कल्पना में डूबे रहना दो अलग अलग बात है| भविष्य कि कल्पना में डूबे रहने से तात्पर्य यह है कि बिना भविष्य को देख,केवल काल्पनिक भविष्य की रचना करते रहना| और आज का समाज व आज का व्यक्ति इसी प्रकार के काल्पनिक भविष्य की रचना करने का अभ्यस्त हो गया है,क्योकि हम पिछले लम्बे समय से केवल कल्पना की दुनियां में जीवित रहे है व अब भी उसी प्रकार की दुनियां में बसे रहना चाहते है|

वर्तमान,जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है| जो वर्तमान को ठीक प्रकार से व्यतीत करता है,उसी को भविष्य की दृष्टि या भविष्य को देखने की सामर्थ्य मिल सकती है| कल्पना,मन ओर बुद्धि की उड़ान है,जिनके पास वास्तविकता कुछ भी नहीं होती| अतः वास्तविकता में स्थित होकर किसी भी प्रकार की उपलब्धि को प्राप्त करना असम्भव है|

हमने व हमारे समाज ने वतमान में स्थित रहना व वर्तमान को ठीक प्रकार से व्यतीत करने की कला को खो दिया है जिसने वर्तमान को खो दिया,उसका भविष्य स्वतः ही खो जाता है,क्योकि भविष्य वर्तमान से अगला कदम है| जिसके कदम अभी जमीन पर स्थित नहीं है,अगले कदम की कल्पना नहीं कर सकता ओर अगर वह कल्पना करता है तो ऐसी कल्पना हमेशा कल्पना ही रहेगी,वह कभी वास्तविकता नहीं बन सकती|

वतमान में जीने का अभीप्राय यह है कि मै हूँ,उसी प्रकार से अपने आपको स्वीकार करूँ| आज लोग अपने आपको प्रतिष्ठित दिखाने व बुद्धिमान साबित करने कि दौड में लगे रहते है| जिसका परिणाम यह होता है कि लोग आडम्बरों में फंस कर अपनी जीवन शक्ति व आर्थिक शक्तियों का विनाश करते रहते है| धीरे धीरे ये प्रतिस्पर्धाएं इस हद तक पहुँच जाती है कि व्यकि व समाज उनके भार को सहन करने में असमर्थ हो जाता है| जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति की अर्थ व्यवस्था व समाज की परम्पराएं नष्ट भ्रष्ट हो जाती है| अपने स्वभाव से विमुख होकर कोई भी कल्याण की कल्पना नहीं कर सकता| स्वाभाविक जीवन हमेशा सरल होता है | संसार द्वारा विज्ञान में अदभुत प्रगति की गई है,इसके बावजूद सौंदर्य की अनुभूति के लिए उन्हें प्रकृति कि गोद से जाने के लिए बाध्य होना पड़ता है,क्योकि रचना पर रचना तथा आविष्कार पर आविष्कार जीवन में जटिलता को पैदा करते है|इस प्रकार उत्पन्न हुई जटिलताओं में जीवन का सौंदर्य खो जाता है|

प्राकृतिक,सहज सुंदरता को खोकर,तब लोग क्रत्रिम साधनों का शारीर में प्रयोग कर अपने बोझिल जीवन को हल्का करने कि चेष्टा करने लगते है| जिससे स्वाभाविकता की निरंतर क्षति होती है व पर निर्भरता का व्यक्ति व समाज अभ्यस्त होता चला जाता है| जिसके परिणामस्वरूप क्षीणता से उत्पन्न अनेक रोगों से घिर कर व्यक्ति विनाश के गर्त में जा गिरता है|
वतमान में जीने का पहला आधार है,अपनी सव्भाविक स्थिति को अक्षुण्य बनाए रखना,दूसरों की देखा देखी प्रतिस्पर्धाओं व अस्वभाविक आयोजनों में नहीं पड़ना| इस स्थिति को प्राप्त करलेने के बाद वर्तमान में जीवित रहने का दूसरा आयोजन सामने प्रगट होता है| वह है “मै कौन हूँ?” “समय कैसा है” “मेरी सामर्थ्य क्या है?” “कौन शत्रु है?” “व कौन मेरे मित्र है?” इन सारी बातों पर विचार कर अपना कार्य क्षेत्र निश्चित करना व अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ कार्य में जुट पड़ना|

हमारे समस्त सामजिक संघटनों की आज व पिछले सैकड़ों वर्षों से एक सी ही स्थिति चली आ रही है| उनका निर्माण बहुत उत्साह के साथ किया जाता है| थोड़े समय तक उत्साहपूर्वक कार्य भी होता है व उसके बाद धीरे धीरे धाराशायी होने लगते है| इस परिस्थिति का क्या कारण है?इस विषय पर यदि हम गंभीरता से विचार करें तो एक ही निष्कर्ष पर पहुंचेंगे ओर वह यह कि,हम संघटन के निर्माण से लेकर उसके पराभवकाल तक केवल भविष्य को सुन्दर व सुखद बनाने कि कल्पना में डूबे रहे थे| हमने लोगों को उज्जवल भविष्य की कल्पना दी थी| अपने स्वयं के मष्तिष्क में भी उसी प्रकार कल्पनाओं को संजोया था| लेकिन अपने वर्तमान को सम्भाल लेने की हमारे में सामर्थ्य नहीं थी,जिसके कारण बालू की भीत की तरह कल्पनाये धाराशाई होती चली गई|

वास्तविक कठिनाई यह है कि वर्तमान में जीने के लिए व्यक्ति को अपने आप को संभालना पड़ता है| अपनी वृतियों को विकासोन्मुख करना पड़ता है व अपनी घिसी पिटी परम्पराओं को तोड़ना पड़ता है| इन सब कार्यों को करने के लिए व्यक्ति को अपने भीतर व बाहर संघर्ष का आव्हान करना पड़ता है| ऐसे संघर्ष को समय की सीमाओं में भी बाँध कर नहीं रखा जा सकता| जीवन पर्यन्त सतत संघर्ष एक डरावनी कल्पना है| उससे बचने के लिए हम चालबाजी व बुद्धि का सहारा लेकर अनेक रास्ते निकालते है व निकालते रहे है| उसी प्रकार के रास्तों पर चलकर हमारे समाज ने अपना सर्वस्व गंवाया|

अब समाज सेवक बनकर सामने आने वाले लोग भविष्य के सुन्दर सपनों की कल्पना दे, तो उन्हें दो काम अवश्य कर लेने चाहिए, पहला तो यह है कि वर्तमान को जीने के बारे में उनके पास क्या धारणा व कार्यक्रम है; उसको ठीक प्रकार से मालूम कर लेना चाहिए| दूसरे वे तथा उनके साथी वर्तमान को किस प्रकार से जी रहे है, इसका ठीक,प्रकार से अध्ययन कर लेना चाहिए, क्योंकि जिनके पास वर्तमान नहीं है, वे जो भी भविष्य की योजना लेकर आवेंगे वह मृग-मरीचिका ही होगी|

इस प्रकार की परीक्षा से बचने के लिए समाज सेवा के नाम पर चलने वाली दुकानों के दुकानदारों ने यह कहना आरम्भ किया है कि लोगों को व्यक्तियों के व्यक्तिगत जीवन के बारे में नहीं सोचना चाहिए| जबकि वास्तविकता यह है कि व्यक्ति का जीवन ही उसका वर्तमान है और जिसके पास वर्तमान नहीं है, उसका भविष्य कभी भी उज्जवल नहीं हो सकता| इतना ही नहीं बल्कि उसका भविष्य निश्चित रूप से अंधकारमय होगा|

लम्बे चौड़े भाषण, लंबी चौड़ी योजनाओं व लम्भी चौड़ी भविष्य की कल्पनाओं से प्रभावित होकर आज तक समाज ने खोया ही खोया है| अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम कल्पनाओं की दुनियां से दूर होकर अपने वर्तमान को देखें, उसे सहज व सुन्दर बनाने का प्रयास करे,आडम्बरों व प्रतिस्पर्धाओं से बचें, तो अपनी भूलों को ठीक करने की ओर अग्रसर हो सकेंगे|
लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 19, 2011

हमारी भूलें : दुनियां का अंधानुकरण करना

हमारा समाज ही नहीं संसार के अधिकांश लोग अंधानुकरण करने के अभ्यस्त होते है| तथा अंधानुकरण को बनाये रखने के लिए उनका सबसे तर्क होता है कि दुनिया क्या कहेगी ?

भौतिकवादियों में समय समय पर अधिक लोग ऐसे निकलते है, जो धनोपार्जन के रुढिवादी तर्कों व व्यवस्थाओं को बदल देते है| लेकिन उनको भी यथास्थिति वादियों से कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ता है| जब तक नया काम करके नहीं देखा दो, उसकी उपयोगिता को सिद्ध नहीं कर दो, तब तक लोग उसको अपनाने को तैयार नहीं होते|

वर्तमान शताब्दी में भारतवर्ष में भौतिक क्षेत्र में अनेक रूढिवादियों को ध्वंस किया व उसके अग्रणी लोगों ने आर्थिक क्षेत्र में बेतहासा लाभ भी प्राप्त किया| तब हमारा समाज बोतल के नशे में, अज्ञान के अंधकार में व निष्क्रियता के गर्त में पड़ा, यह सब देखता रहा|

अब समाज के समझदार कहे जाने वाले लोग कहने लगे है कि हम पिछड़ गए है| हमको शहरों की ओर दौडना चाहिए, ताकि इस आर्थिक प्रगति की दौड में हम भी शामिल हो सकें| भौतिक प्रगति व विज्ञापन के आविष्कारों में भारत स्वयं दुनिया के देशों से एक हजार वर्ष पीछे चल रहा है| हमको इस बात का बोध नहीं है कि विज्ञान अपने विनाश के लिए बेताबी से तडफ़ रहा है| इतने विनाशकारी हथियारों का अविष्कार हो चूका है कि किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व का विज्ञानं राख की ढेरी बन सकता है| जब बढ़ने व लाभ उठान एके दिन थे, तब हम सोते रहे और अब जब विनाश के दिन आने लगे है, हम उस और दौड पड़ना चाहते है|
संसार के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व व समाज परिवर्तन की है| जो भी व्यक्ति या समाज इस कार्य को कर सकेगा,वही समाज में जीवित रह सकेगा| आज सारा संसार धर्मों,राष्ट्रों व आर्थिक वादों के झंझटों में फंस कर इस प्रकार भया-क्रांत है,कि उसे चारो और अपने विनाश के अलावा कुछ नहीं दीखता| यह आश्चर्यजनक बात है कि विनाश को कोई भी पसंद नहीं करता,फिर भी विनाश से सब भयभीत है| इसलिए है कि वे धर्म,राष्ट्र व आर्थिक वादों के,अपने रूढिगत बंधनों को छोड़ नहीं सकते और यही रूढ़ियाँ नहीं चाहते हुए भी संसार के लोगों को विनाश के कगार पर पंहुचा देगी,इस बात को संसार के लोग अच्छी तरह समझने लगे है|
ऐसी परिस्थिति में लोग चमत्कारों की खोज में लगे हुए है| आज से पचास या सौ वर्ष पहले जिन भविष्य वाणियों व आध्यात्मिक शक्ति को लोग पिछड़ापन व रूढीग्रस्तता कहते थे|उनकी बात लोग सुनने लगे है| इसी के परिणाम स्वरूप ऐसी खबरों को इस समय अखबारों में प्रमुखता दी जा रही है|लोग अन्धकार में किसी प्रकाश की किरण खोज लेने के लिए आतुर है| ऐसा समय ही श्रेष्ठ लोगों को नेतृत्व की और आगे बढ़ने के लिए उपयुक्त होता है| गोरखनाथ कहते है "रात गई मध्यरात्रि गई,तब एक बालक चिल्लाता है,है कोई शूरवीर इस संसार में" घोर कलियुग समाप्त हुआ,नवयुग के निर्माण की बेला सामने खड़ी है| संसार का असहाय मनुष्य बालक की भांति चिल्ला रहा है,है कोई शूरवीर इस संसार में,जो आये और हमें बचाए|
एक कहावत है,'समय का सर पीछे से गंजा है ',तथा वह अपने बाल चेहरे पर डाले रखता है|इसलिए समय आता है तो लोग पहचान नहीं पाते,जब वह आगे बढ़ जाता है,तब उसके सर की गंज को पहचानते है और पकड़ने को दौड़ते है,किन्तु पकड़ नहीं पाते| वाही विडम्बना आज क्षत्रिय समाज के समक्ष है| लोग शक्ति संपन्न,श्रेष्ठ पुरुषों की तलाश में है और हम दुर्गुणों व भ्रष्टाचार की दौड़ में शरीक हो रहे है| अपनी गति को और बाधा लेना चाहते है कि दुनियां से कही पिछड़ न जाय|
व्यक्ति आसानी से बुराई व भ्रष्टाचार में पड़ना नहीं चाहता|उसकी स्वाभाविक वृत्ति सतत विकास की और आगे बढ़ते रहना है,लेकिन वह दुनियां जो उसके चारों और फ़सी हुई है,उसे बाध्य कर देती है इस बात के लिए कि,वह अपने अनोभावों को दबाये| अपनी मौलिक स्वतंत्रता को खोकर दुनियां की दासता को स्वीकार करले|
एक व्यक्ति के लिए समाज के विरुद्ध लड़ना बहुत ही दुष्कर कार्य प्रतीत होता है| यदि अमुक रीति रिवाज़ का पालन नहीं किया तो दुनियां क्या कहेगी?अगर अमुक प्रकार से आचरण किया तो दुनियां क्या कहेगी?अगर अमुक प्रकार से विचारों को व्यक्त किया तो दुनिया क्या कहेगी?दुनिया के ही लोग दुनियां की दुहाई देकर,व्यक्ति को दुनियां का गुलाम बना लेने के लिए आतुर है|और दुर्बल व्यक्ति चहरे पर अप्राकृतिक मुस्कान लिए हुए बोझिल दिल के साथ इस गुलामी को स्वीकार कर लेता है|

संसार में एक भी श्रेष्ठ व्यक्ति या महापुरुष ऐसा नहीं हुआ, जिसने दुनियां की गुलामी को स्वीकार किए हो| और दुनियां में ऐसा कोई भी व्यक्ति महापुरुष नहीं बन सका, जिसने अपने जीवन में दुनियां की गुलामी को अंगीकार किया हो| दुनियां में किसी भी श्रेष्ठ पुरुष के वचनों को इस दुनियां के लोगों ने कभी भी आसानी से स्वीकार नहीं किया और न ही किसी भी महापुरुष के कार्यों में सक्रीय योगदान दिया| लेकिन जब उनके कार्य पुरे हो गए वे ही दुनियां के लोग, उनको पूजने व उनके नाम पर दूकान दारियां चलाने के लिए सबसे आगे हो गए|

भगवान राम, बन्दर व भालुओं की सेना लेकर लंका विजय कर आये| जब वापस अयोध्या लौटे तो ३०० राजा लंका पर चढाई करने के लिए उपस्थित थे| दुनियां का यह रिवाज कोई नया नहीं है| राम को भगवान मानकर पूजने में गौरव समझने वाली दुनियां, उनका साथ नहीं दे पाई|

महान तपस्वी व ज्ञानी पितामह भीष्म, नीतिज्ञ विदुर, विद्वान द्रोणाचार्य, धनुर्धर कर्ण में से किसी के भी कान ने कृष्ण की पुकार को नहीं सुनी| लेकिन पुरुषार्थी पांडवों की कृष्ण जि ने जब विजय करादी तो वही दुनियां श्री कृष्ण को भगवान के रूप में पूजने को आतुर हो गयी|

बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद आदि कितने लोग इस संसार में ऐसे हुए जिन्होंने इस संसार को नई ज्योति व नया मार्ग दिया| लेकिन दुनियां के लोगो ने कभी उनका साथ नहीं दिया| इतना ही नहीं उनके जीवन के आरंभकाल में दुनियां के लोगों ने, उनका कठिनतम विरोध किया|
हम और हमारा समाज आज उसी दुनियां की दुहाई देकर पतन के गर्त में पड़े रहना चाहते है| हम कायरतावश इतना साहस नहीं जुटा पाते कि आत्मचिंतन कर, वास्तविकता को समझे और सत्य पर आधारित होकर उस मार्ग की खोज करें जिससे स्वयं का, समाज का व संसार का कल्याण हो|

संसार में क्षात्र धर्म को छोड़कर एक भी धर्म ऐसा नहीं है जो संसार के कल्याण के कल्पना करता हो, अथवा जिससे आत्मकल्याण तक पहुँचने की क्षमता हो| संसार के सबसे बड़े वैभव, व सबसे बड़ी संपदा के स्वामी होकर भी आज हम दुनियां के फरेब में फंसकर, दीन हीन व दरिद्र है तथा इसी दरिद्रता को बनाये रखने व भोगते रहने का उपक्रम कर रहे है|

समाज चरित्र, व्यक्ति के निर्माण में यदि सहायक है तो उसे स्वीकार करना चाहिए| यदि वह समाज के चरित्र को गिराने की चेष्टा करता है,तो ऐसे समाज चरित्र के विरुद्ध विद्रोह अनिवार्य है| आज समाज के सुधार की आवश्यकता नहीं, विद्रोहियों की आवश्यकता है, जो अस्वीकार कर सके, इस सब पंडावादी व परम्परावादी पाखंड को|

वह समाज, समाज नहीं है जो लोगों को पतित करना चाहता है| लोगों के विकास को रोक देना चाहता है| अबोध बालकों में कुसंस्कार पैदा कर देना चाहता है| ऐसा समाज बूचड़खाना है जहाँ इंसानों की सरे आम हत्या की जाती है|

ऐसे समाज को बदलना ही पड़ेगा| उसकी मान्यताओं व परम्पराओं को ठुकराना पड़ेगा| सारा सामजिक पाखंड, धर्म के नाम पर खड़ा किया गया है| इसके लिए हमको समझ लेना चाहिए कि मानव, मानव के बीच केवल तीन ही आध्यात्मिक सम्बन्ध है| यदि लोगों के बीच में तीन सम्बन्ध नहीं हो तो समाज किसी भी सूरत में धार्मिक समाज नहीं है| और ऐसे अधार्मिक समाज को तौड देना, उसके विरुद्ध विद्रोह करना सच्चा धर्म है|

पहला आध्यात्मिक सम्बन्ध है, पिता व पुत्र का| पिता का उसका पुत्र बारह वर्ष का तो उससे पूर्व सिद्ध मन्त्र प्रदानकर संस्कारित करना चाहिए| इस प्रकार पिता व पुत्र एक ही मन्त्र का जो सिद्ध किया जा चूका है, जप करते है तो वे एक दूसरे की इस संसार के कर्मों में ही नहीं, मृत्यु के पश्चात भी अधोगति होने से बचा सकते है|

दूसरा आध्यात्मिक सम्बन्ध है पति व पत्नी का| यदि पति अपने जीवन में पत्नी के अलावा किसी दूसरी स्त्री को अपने मन में स्थान नहीं देता व इसी प्रकार यदि पत्नी अपने मन में पति के अलावा अन्य किसी पुरुष को स्थान नहीं दे तो वे एक दूसरे की रक्षा करने में समर्थ होते है| यही क्रम जब सात जन्मों तक पहुँचता है तो पत्नी महासती की श्रेणी में आ जाती है|

तीसरा आध्यात्मिक सम्बन्ध अहि गुरु व शिष्य का| जिसके नाम पर आज दुनियां में सबसे ज्यादा ठगी हो रही है| लोग गुरु बनकर कल्याण का ठेका ले रहे है| जबकि उन्हें यह भी पता नहीं है कि गुरु का चयन बुद्धि से नहीं किया जा सकता| और न ही अंधाधुंध शिष्यों की भर्ती की जा सकती है| यदि पिता समर्थ है व उसने मन्त्र देकर पुत्र को दीक्षित कर दिया है तो वही गुरु है| लेकिन आज के गिरे हुए समाज में इस प्रक्रिया के लोप हो जाने पर, बाजारों में कान में फूंक देकर बनने वाले गुरु बनने लगे है| जिनके फरेब से लोगों को बचाना चाहिए| व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी मार्ग दर्शन की चाह रखे जैसी भी उसकी रूचि हो, उसी प्रकार की साधना में लगा रहे | एक रोज उसको अचानक गुरु की प्राप्ति हो जायेगी| बनाने से गुरु नहीं बनते| कोई भी तुच्छ बुद्धि से संत की खोज नहीं कर सकता|

इसीलिये दादूजी ने कहा है-“ गैब माहि गुरु देव मिल्या” गुरु प्रयत्न करने से या खोने से नहीं मिलते| जब पात्र में पात्रता उत्पन्न होती है टी वे करुणा करके स्वयं मार्गदर्शन देने को तैयार होते है|

अत: स्पष्ट है कि जो लोग समाज सेवा के संगठन की बात करते है, उनको दुनियां के विरुद्ध कमर कसनी होगी| उनके द्वारा किये जाने वाले विरोध व अत्याचारों को सहन करना पड़ेगा| जो लोग ऐसा करने को तैयार नहीं है, उनके लिए यही हितकर है कि वे कम से कम समाज कल्याण की बात करना बंद करदे|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 16, 2011

हमारी भूलें : जीवन मे जटिलता को अपना लेना

भगवान ने सृष्टि की रचना बहुत सरल रूप से की है| इसकी हर चीज सहज रूप से पैदा होती है, विकसित होती है व विनाश को प्राप्त होती है|उसमे कहीं भी जटिलता की कोई आवश्यकता का अनुभव नहीं प्राप्त होता, लेकिन व्यक्ति ने अपने आप को दूसरे लोगों के सामने विशिष्ट व ज्ञानवान साबित करने के लिए जीवन में इतनी जटिलताएं उत्पन्न करली है है कि अब उनसे निकलना व स्वतंत्र होना कठिन हो गया है|

समाज कल्याण की बात तो करते है, लेकिन समाज जिन जटिलताओं में उलझा हुआ है, उनसे न तो स्वयं बाहर निकलने का सहारा बटोर पाते है और उन दूसरे लोगों को जो बाहर निकलना चाहते है, थोड़ी मदद देने को तैयार है| यदि अवस्था यही रही तो सामाजिक संगठनों की ओर लोग आँख उठाकर देखना भी पसंद नहीं करेंगे|

एक तरफ हम सामजिक विकास के साथ साथ व्यक्तिगत विकास व उद्दर्वगामी साधना की बात करते है, दूसरी ओर टीका,शराब,वैभव का प्रदर्शन आदि महानतम सामाजिक बुराइयों से अपने आपको बचा लेने का साहस तक नहीं जुटा पाते| क्योंकि इनका परित्याग करने से हमारी बुरी आदतों व गौरखनाथ जैसे महान संत क्या कहते है, उनपर भी हम विचार करने को तैयार हो तो हमें हमारी बुरी आदतों से मुक्त होना पड़ेगा|
अवधू मान भषन्त दया धर्म का नास|
मद पीवतं तहां प्राण निरास|
भांगी भखंत ज्ञानं ध्यानं षोवतं|
जम दरबारी ते प्राणी रोवतं|
गोरखनाथ


मांस भक्षण करने से दया व धर्म का विनाश होता है| मदिरा पीने से प्राण शक्ति पर आघात लगता है, वह अंत समय में रोता है| लोगों के कल्याण की अभिलाषा रखने वाले संत इससे अधिक स्पष्ट ओर क्या कह सकते है? फिर भी यदि हम सुनने को तैयार नहीं हों व समाज सेवा की बातें करते रहे तो हमारी कथनी वृथा प्रवचना ही साबित होगी|

सत्य,धर्म का आधार है, चाहे क्षात्रधर्म हो या संसार का अन्य धर्म हो| बिना उसका आश्रय लिए कोई भी अपने धर्म को प्राप्त नहीं कर सकता| यदि आज कोई व्यक्ति सत्य पर आधारित हो जाय तो क्या समज उसको जीवित रहने देगा| विवाह शादियों के बड़े बड़े आडम्बर, बिकाऊ पुत्र के लिए टीके की थैलियाँ व अन्य सैकड़ों नहीं हजारों ऐसे रिवाज है, जिनको ईमानदारी से जीवनयापन कर सत्या-चरित हो कर कोई भी व्यक्ति पूरा नहीं कर सकता|

इस प्रकार हम देख रहे है कि जहाँ समाज को व्यक्ति का रक्षक होना चाहिए, वहीँ आज समाज व्यक्ति का भक्षक बन गया है| व्यक्ति का परिवार व्यक्ति के सगे,सम्बन्धी,व्यक्ति के भाई बंधू, उस व्यक्ति को खा जाने को तैयार हो जाते है, जो इमानदारी से जीवन यापन करना चाहता है| इन्हीं कारणों से समाज पहले खंडित हुआ है| जिनकी हम आज बात नहीं करना चाहते कि हमारे काले कारनामों को देखें तो मुसलमानों की अनेक खांपें जैसे पीरजादे,कायमखानी, लुहार, नीलगर, आदि तथा हिंदुओं की बहुत सारी जातियां जैसे गुजर,दरोगे,जाटों की कई खांपें, राणा,बड़वा,कलाल आदि राजपूतों से बनी है|

ये लोग समाज से पृथक क्यों कर दिए गए या पृथक हुए ? क्योंकि समाज ने अपने जीवन का जितना आडंबरपूर्ण बना रखा था, उसकी पूर्ति करने के लिए आर्थिक साधन इनके पास नहीं रहे, यदि हम इन आडम्बरों के आधार पर व्यक्ति को प्रतिष्ठा देते रहे होते तो वह दिन दूर नहीं, जब समाज का निचला वर्ग अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लेगा|

हम जिस लोभ व लालच में पड़कर अधिक धनवान लोगों से सामाजिक बंधन बनाकर गरीबों को ठुकरा रहे है, अमीर लोग लोग जिन्होंने धन को ही अपना लक्ष्य समझा है, कभी भी विश्वनीय नहीं रहे है| जब इन लोगों के पास दौलत कुछ ओर बढ़ जायेगी तो ये लोग स्वत: ही तुम्हारे समाज को छोड़कर व्यवसायी वर्ग के साथ चले जायेंगे| इतिहास में महावीर के अनुयायी इसके प्रमाण है| ये समाज के धनवान लोग महावीर के अनुयायी लोगों के साथ जितने जल्दी चलें जाए, उतना ही समाज का कल्याण है|
इस प्रकार हमने देखा कि समाज का अल्प संख्यक धनीवर्ग पैसे के लोभ में माध्यम वर्ग को प्रभावित कर गरीब वर्ग को पहले समाज से पृथक कर देगा व बाद में स्वयं ही पृथक हो जायेगा| इस भयावह घटना की ओर यदि समाज सेवक के नाम पर काम करने वाले लोग घ्यान नहीं देंगे तो न समाज बचेगा ओर न ये सेवक| ऐसी समाज में अनेक जातियां है,जिन्होंने समय पर अपने आप को सुधारने की चेष्टा नहीं की और वे हमेशा के लिए समाप्त हो गई| ऐसा नहीं है कि हमने सानाजिक क्षेत्र में ही जीवन को जटिल बनाया है,हम धार्मिक क्षेत्र में भी उसी प्रकार की जटिलताओं में फंसे हुए है,जिससे हमको वास्तविकता को समझने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है|जैसा कि पहले कहा जा चूका है,धर्म सरलता का ही दूसरा नाम है| यदि व्यक्ति को भगवान के अस्तित्व में विशवास है तो उसे किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं है| वह स्वयं सात्विक रूप से भगवान का भजन करता हुआ,अपने जीवन को इतना सरल व साधारण बनाले कि जिन लोगों के बीच में वह रह रहा है,उनको किसी प्रकार की असाधारण गतिविधि का पता ही नहीं चले| लेकिन हम ऐसा करना नहीं चाहते,क्योंकि हमको भजन नहीं करना है| हमको मात्र भक्ति का प्रदर्शन करना है|तो फिर मंदिर चाहिए,मठ चाहिए,पंडे पुजारी चाहिए,तीर्थयात्राएं चाहिए व दान पुण्य चाहिए| अगर यह सब नहीं हो तो समाज का गरीब वर्ग हमसे पृथक कैसे हो सकता है| व यह सब वही कर सकता है, इसलिए वह पापी है और हम पाप से कमाए धन से यह सब कर रहे है| इसलिए धर्मात्मा है| अगर समाज के जीवन में ये जटिलताये इसी प्रकार से ही कायम रही, और हमने इस पाखंड का परित्याग कर सहज व सरल जीवन को नहीं अपनाया तो समाज कभी जीवित नहीं रह सकता| सामज के जीवित रहने की आवश्यक शर्त है, जीवन के प्रत्येक अंग से जटिलताएं व आडम्बरों को निकाल फैंकना| सात्विक सरल व स्वाभाविक जीवन को व्यतीत करना, आडंबबरियों का तिरस्कार करना, व गरीबों का सत्कार करना|

आडम्बर जीवन की वास्तविकता को भुला ही नहीं देता, उसे ठुकराता है| लोग इस परिस्थिति को अधिक समय तक देख सकेंगे व बर्दास्त कर सकेंगे, ऐसे कल्पना हमें नहीं करनी चाहिए| पहले लोग कल्पनाओं पर जीवित रहने के अभ्यस्त थे| तब परलोक की कल्पनाओं में लोग उलझकर धार्मिक व सामाजिक आडम्बरों को सहन कर लेते थे| लेकिन अब प्रत्यक्ष का युग है, विज्ञान का युग है व्यक्ति विश्वासों पर नहीं जीना चाहता| औरों के जीवन में क्या होगा, क्या मिलेगा| इससे सरोकार नहीं| आज के व्यक्ति को प्रत्येक्ष चाहिए, जो कुछ है उसे आज देखना चाहता है| यदि समाज व्यक्ति को सुख नहीं दे सकता, सम्मान नहीं दे सकता, आध्यात्मिक मार्ग नहीं बतला सकता, ईश्वर से साक्षात्कार नहीं करा सकता तो वह अगले जीवन तक इंतजार नहीं करेगा| उसे जो आज देगा, उसके साथ वह चला जायेगा|

ठाकुर रविंद्रनाथ टेगौर के दादा अपने जमाने के बहुत धार्मिक व्यक्ति गिने जाते थे| उनके मकान के पास से एक नदी बहती थी| सर्दी के दिन, मध्यरात्रि का समय, एक युवक नदी में कूदा, वह भीगे कपड़ों से उनके सामने आकार पूछने लगा, क्या आपने भगवान को देखा है ? बहुत ही अजीब सवाल था| वे कुछ सोचने लगे| इतने में युवक पीछे मुड़ा और नदी में फिर कूद गया| यह युवक ओर कोई नहीं, स्वामी विवेकानंद थे| जिसने देखा है, उसके लिए सोचने का क्या कारण हो सकता है| यही सवाल स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से किया और उनका उत्तर था, हाँ देखा है, वह अभी दिखा सकता हूँ|

आज का समाज राम-कृष्ण व विवेकानंद को प्राप्त करना चाहता है| वह आज में जीवित रहने को तैयार है| कल की व्यर्थ कल्पना ने फंसे नहीं रहना चाहता| जो संगठन समाज का कल की व्यर्थ कल्पनाओं में दीर्घ सूत्री योजनाओं के नाम पर उलझाए रखना चाहते है, समाज उनका परित्याग कर देगा| जो आज की बात करेगा चाहे वह बात कितनी ही छोटी क्यों न हो, समाज उसका साथ देगा, क्योंकि उसके द्वारा कुछ तो प्राप्त किया जा सकता है|

वैज्ञानिक युग का व्यक्ति व्यर्थ की कल्पना के आधार पर जीने को तैयार नहीं है| इसलिए जो धर्म आडम्बरों में फंसे रहेंगे, उनका इस जमाने में अवश्य नाश होगा| तथा जो लोग अपने सामाजिक व धार्मिक जीवन को बहुत सरल व सीधा बना लेंगे, उनका विकास अवश्य होगा|

परम्पराओं व संस्कृति के नाम पर आज तक हम आडम्बरों व जटिलताओं से बंधे है व अपने जीवन को उलझा दिया है| अब भी समय है कि हम समझें इन आडम्बरों व जटिलताओं का परित्याग करें व् उत्साह पूर्वक अनुसरण करें| कल्याण का यही एक मात्र मार्ग ही हो सकता है|

लेखक : श्री देवीसिंह,महार

Dec 15, 2011

हमारी भूलें : मात्र भूलों को खोजते रहना

अपनी भूलों को खोजना, उनकी चर्चा, उनका प्रचार करना, यह आत्मनिंदा की परिभाषा में आता है व आत्म निंदा आर्यों का धर्म नहीं है| श्रेष्ठ लोग अपनी निंदा नहीं करते, क्योंकि आत्म निंदा करने से स्वयं का व समाज के दूसरे लोगों का मनोबल टूटता है, प्राण शक्ति पर आघात लगता है|

आत्मचिंतन व आत्म मनन श्रेष्ठ लोगों का धर्म है| अपने बारे में विचार किये बिना व अपने गुण दोषों के सम्यक ज्ञान के अभाव में कोई भी विचार के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता|

इसलिए ऐसे समाज, जो मात्र अपने दोषों का वर्णन करते है, प्रचार करते है व एक दूसरे को दोषी ठहराने में गौरव अनुभव करते है, वे विग्रह व विनाश के गर्त में पड़कर हमेशा के लिए नष्ट हो जाते है| लेकिन ऐसे लोग व समाज को अपनी त्रुटियों व अपनी भूलों को खोजते है, उनको अपने व्यक्तिगत व समाज के जीवन से जीवन से निकालने की चेष्टा करते है, वे अपने खोये हुए गौरव को पुन: प्राप्त कर यश के भागी होते है|

अब जो लोग अपने व समाज के बारे में चिंतनशील है वे स्वयं अपने व समाज के आज के चरित्र को देखें उसके बाद उनकी अंतरात्मा स्वयं जबाब दे देगी कि उनका व समाज का क्या भविष्य है ? भविष्य वर्तमान में छिपा है, भविष्य को बनाना है तो वर्तमान को उज्जवल बनाना ही होगा| इसके अलावा अन्य कोई उपचार नहीं है|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 8, 2011

हमारी भूलें : उत्साह व उत्सव विहीन जीवन

क्षात्र-धर्म वीरों का है| हिंदी साहित्य का जिन्होंने अध्यन किया है, वे जानते है कि वीर रस का स्थाई भाव उतशाह है| अर्थात जिस काव्य में आदि से अंत तक निरंतर उतशाह बना रहे,उसी रचना को विर रस से परिपुर्र्ण कहा जायेगा|

आज लोग अपने आप को क्षात्र धरम के अनुयाई या धारणा करने वाले कहते है, लेकिन उनके जीवन में कही बी इस जीवन कि झलक नजर नहीं आती है| मुरझाये हुए चेहरे,टूटे हुए दिल वे लड्खडाते कदम क्षत्रिय कि पहचान नहीं है |यदि उन लक्षणों से युक्त लोग अपने आप को क्षात्र धर्म के प्रचारक या क्षत्रियोचक विचारों के साधक कहते है तो ये मात्र उनके मन का धोका है| ऐसे लोग मात्र अपने अपने अहंकार कि तुस्टी के लिए अपने आपको व् समाज को धोके में डाले हुए है|

कहावत है “भावित व् राजपूती किसी के बाप कि नहीं है|” वास्तविकता तो यहे है कि राजपूती और भक्ति दो अलग अलग वस्तुवें है ही नहीं| भक्ति कि पराकाष्ठा का नाम ही राजपूती या क्षत्रियत्व है|
उनके प्राप्त करने के लिए निरास व् हताश साधको कि आवशकता नहीं है| क्यूंकि ऐसे लोग इस लक्ष्य को जीवन में कभी नहीं प्राप्त नहीं कर सकेंगे |इस मार्ग पर चलने कि लिए हक़दार तो वे ही लोग हो सकते है जिन्होंने जीवन को सदेव एक उत्सव के रूप में बिताने का अभ्यास कर लिया है|

मुग़ल काल के आरंभ तक हमारे समाज के पास वह संजीवनी शक्ति थी,जिस से लोगो के जीवन में उत्साह भंग ही नहीं होता था| यही कारण था कि एक हजार वर्ष तक लगातार आकराअंताओं से व् बार बार पराजित होने के बाद भी, हमने पराजय सुविकार नहीं कि | अंतिम हिंदू सम्राट प्रथ्वीराज चोहान के प्रमुख सामंत पंजवनराय को जब नागौर में समाचार मिला कि मोहमद गौरी अपनी विशाल सेना के साथ दिल्ली कि और बढ़ रहा है तो उन्होंने मात्र पांच हजार सैनिकों के साथ गौरी पर आक्रमण किया गौरी कि सेना भाग कड़ी हुई और उनको बंदी बना किया गया

आई समर साकेत में,पीड करी पज्जौन|
गोरी सम गोरी अनि,गई लजत भजि भौन||


उत्साह वीरता की पराकाष्टा है| परिस्थितियों की विषमता या परिणामों का भय उसे रोक नहीं सकता| लोग आज अपने आपको अधिक बुद्धिमान समझने लगे है| हर चीज के परिणाम के बारे में आश्वस्त होना चाहते है| यही से कायरता का जन्म होता है| सुरक्षा की गारंटी मांग कर, न तो आज तक संसार में किसी ने महान उद्देश्यों की प्राप्ति की है न ही ऐसे लोग भविष्य में कोई उपलब्धि कर सकेंगे|

पितामह भीष्म के अनुसार फल की इच्छा रखने वाला ही कृपण है| कृपणता व कायरता समान गुण धर्म वाले शब्द है| फल की अभिलाषा से ही अथवा फल की और ध्यान देने पर ही कायरता का उदय होता है| अर्जुन ने युद्ध से उत्पन्न होने फल को देखकर ही धनुष डाल दिया था| जब कृष्ण ने उसे लताड़ा, तो उसने कहा था, “मैं कृपणता जन्य दोष से ग्रसित हो गया हूँ| अत: आप मुझे शिष्य की तरह स्वीकार कर मेरा मार्गदर्शन करें|” जहाँ फल की अभिलाषा है, वहां उत्साह निरंतर नहीं रह सकता, क्योंकि परिस्थितियों के वेग में जब फल में विध्न उपस्थित होता दिखाई देता है, तो उत्साह भंग होता दिखाई देता है| फल की इच्छा से मुक्त हुए बिना कोई भी स्थायी रूप से उत्साह को अपने अंदर स्थापित नहीं कर सकता| कहावत है कि- “ सदा दिवाली संत के आठों पहर उछाह”, जिसने इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, उसका ही जीवन सर्वदा उत्साह व उत्सव से परिपूर्ण रह सकता है| कर्मयोगी क्षत्रिय के लिए आसक्ति से रहित होकर कर्म करना ही फल का सर्वोत्तम त्याग बताया गया है| इस तत्व को पुन: उपार्जित करने का जब तक हम प्रयास नहीं करेंगे, निराशा हमारा पीछा नहीं छोड़ सकती|

जब समाज ने जीवन में उत्साह को उपार्जित करने व उत्सवमय जीवन बिताने की कला खो दी तो उसे पुन: प्राप्त करने की चेष्टा के बजाय, कृत्रिम तरीके खोजने लगे व इसी भूल के कारण जन्म हुआ नशीले पदार्थों का सेवन का व बिडदावली गाने का| ऐसे लोग हो गए जिनका वंश परम्परागत यही कार्य रहा कि वे युद्धों के अवसर पर वीर रस से परिपूर्ण कवितायेँ सुनाकर, सैनिकों को युद्ध के लिए प्रेरित करते थे| ऐसे आयोजनों के आविष्कारकों ने यह नहीं सोचा कि कोई भी शक्ति जब शरीर में कृत्रिम रूप से आरोपित की जाती है, तो उसका अंतिम परिणाम यह होता है कि उसकी अवधि समाप्त हो जाने पर शरीर व जीवन में शिथिलता व घोर निराशा का जन्म होता है| तथा ऐसे उपाय बार बार किये जाये तो उनसे शरीर पूरी तरह से निकम्मा बन जाता है|

हमारे समाज ने का, से कम पांच सौ वर्षों तक इसी प्रकार के कृत्रिम उपायों का आश्रय ले, अपने आपको वीर साबित करने की चेष्टा की, जिसके फलस्वरूप समाज शरीर का प्रत्येक अंग शिथिल व हृदय निराशायुक्त हो गया|
आज लोग सभाओं व संगठनों के द्वारा इस निष्क्रिय शरीर में जीवन फूंकने की चेष्टा कर रहे है| लोग समझते है कि पूर्वजों के गीत व गाथाएँ सुनाने पर, इस शरीर में पुन: जीवन जागृत होगा, क्योंकि वे नहीं जानते कि जो प्रयोग वे आज करना चाहते है, उसी प्रयोग ने आज समाज की शक्ति को नष्ट किया है| कृत्रिम उपाय कभी दीर्घजीवी नहीं हो सकते| अत: यदि हम वास्तविक रूप में अपना व अपने समाज का कल्याण चाहते है तो हमें पुन: उसी उत्साह व उत्सवपूर्ण जीवन को उपार्जित करना पड़ेगा| यह कार्य कठिन अवश्य है , लेकिन यही एक मात्र उपचार है| इसलिए जो लोग कल्याण चाहते है, उन्हें इस मार्ग पर और केवल इसी मार्ग पर आगे बढ़ना होगा|

प्राण शक्ति को जागृत करने व जीवन में उत्साह का संचार करने के कई साधन है, जैसे प्रकृति के साथ एकता व सामंजस्य स्थापित करना| इसको और स्पष्ट किया जावे तो यों कहा जा सकता है कि ईश्वर की सृष्टि से समीपता स्थापित करना व व्यक्ति द्वारा निर्मित सृष्टि से दुरी को अनुभव करना होगा| पहाड की छोटी या बालू रेत के टीबे पर बैठकर, प्रकृति की गोद में झूमकर, हम जीवन को उत्साह से भर सकते है| समुद्र की लहरें व चाँद की चांदनी, हमारे हृदयों में स्नेह की धारा बहा सकती है| इसीलिए मनुस्मृति में उल्लेख है कि जब क्षत्रिय का राज्य नष्ट हो जाए तो उसे खेती को अपनाना चाहिए ताकि वह प्रकृति के निकट रहे व अपने स्वाभाविक गुणों को खो न दे| ऐसे ही और भी अनेक साधन हो सकते है, लेकिन यह साधन मात्र स्फूर्तिदायक है| जीवन में सतत उत्साह की धारा प्रवाहित हो व जीवन एक उत्सव बन जाए, उसके लिए हमको इससे भी आगे बढ़ना होगा, तब ही हम उस मूल तत्व को उपार्जित कर सकेंगे, जिसको हम खो चुके है|

क्षत्रियों की साधना सबसे सरल व पूरी तरह से परीक्षित है| सृष्टि की उत्पत्ति "शब्द" से हुई है| इसलिए इसके रहस्यों को समझने के लिए सबसे पहले 'शब्द' का ही आश्रय लेना पड़ेगा,जिसको आज की भाषा में हम 'जप' कहते है| इस प्रक्रिया के आरम्भ व स्थिर हो जाने के बाद हमको आत्म परिचय करना होगा| आत्म परिचय से प्रायोजन है "मै कौन हूँ" इस विषय पर बार बार व निरंतर विचार करते रहना,जिससे हमे यह विश्वास हो जाए कि न तो यह संसार ही निरर्थक है और न ही हमारी मुसीबतें| जो कुछ हो रहा है,यह सब हमारे कल्याण के लिए है| जब इतनी अनुभूति हो जाए तो हम दृष्टा बनने की सामर्थ्य अर्जित कर सकेंगे| 'मै कर नहीं रहा हूँ' मात्र ऐसे विचार से कर्तापन की भावना का लोप नहीं हो सकता| इसका लोप तब ही होगा,जब आत्मपरिचय के द्वारा हमारा,हमारे 'प्राण' से सम्बन्ध जुड़ेगा व हम यह समझने लगेंगे कि जो लोग हमारे साथ है,वे अकारण नहीं है|उनका पहले से सम्बन्ध चला आ रहा है| यह जीवन एक धरा है,जिसमे स्वभावतः सब लोग आगे बढ़ रहे है| इस कार्य के सम्पादन में मनुष्य की भूमिका नगण्य है| इस समझ के उदय होने पर ही व्यक्ति दृष्टा बनकर जीवन के समस्त कर्मों को कर सकेगा|लेकिन यहाँ पर पहुंचकर भी जीवन में कभी नष्ट होने वाले उत्साह की उत्पत्ति नहीं होती| इसलिए भक्त जहाँ इस स्थिति को पराकाष्टा समझता है,वहीँ क्षत्रिय उसको नकारता है| वह कहता है, 'अभी कार्य पूरा नहीं हुआ'| अर्जुन की तरह मुझे आदेश चाहिए श्री कृष्ण का 'तुम युद्ध मै प्रवृत हो जाओ'

व्यक्ति जो अपने जीवन के समस्त कर्म भगवान के आदेश प्राप्त कर संपादित करता है,उसके जीवन में क्या कभी उत्साह भंग हो सकता है? इस भौतिक संसार में भी यदि कोई उद्योगपति अपने छोटे श्रमिक को,अथवा एक अच्छा अधिकारी अपने छोटे कर्मचारी को,किसी छोटे कार्य करने के लिए कहता है तो वह उसे अपना अहोभाग्य समझता है तथा कृतज्ञता व उत्साह से भर जाता है| आदेश की इतनी महिमा जब भौतिक जगत में हो,तो आध्यात्मिक जगत में विचरण करने वाला तुच्छ प्राणी सर्वशक्तिमान से आगेश प्राप्त कर ले तो क्या वह कृतज्ञता से भर नहीं जायेगा? क्या उसके जीवन में उत्साह का उदभव नहीं होगा?जो जीवन पर्यंत कभी क्षीण नहीं हो| क्या उसका जीवन उत्सव नहीं बन जाएगा?अवश्य बनेगा,इसी प्रकार के उत्सवमय जीवन को जब क्षत्रिय भोगते थे,तभी उनकी यश पताकाएं संसार पर लहराती थी| यदि आज भी किसी को अपनी वंश परम्पराओं पर गौरव है और यदि कोई समझता है कि उस गौरवमयी परम्परा को नष्ट होने से बचाना है,तो उसे अपनी भूल सुधार कर जीवन से पुनः उत्साह का उपार्जन करना ही होगा|

यह साधना की लम्भी प्रक्रिया है| अतः इसमें लगे रहने के साथ व्यक्ति को सुकर्मों में प्रवृत होकर व प्रकृति के साथ सम्बन्ध रखकर अपने उत्साह को पुनर्जीवित करने की चेष्टा भी सतत रूप से करते रहना चाहिए,जिससे न केवल उसको कठिनाइयों को पार करने में सहायता मिलेगी,बल्कि मूल लक्ष्य की प्राप्ति में भी सहायता मिलेगी|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 3, 2011

हमारी भूलें : काल धर्म की उपेक्षा करना

युगधर्म के नाम पर आज संगठन की शक्ति की बात की जाती है| हम देख भी रहे है कि संसार के अधिकांश देशों में राजतंत्र, संगठनों की शक्ति द्वारा संचालित हो रहे है| लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है कि संगठनों के ऊपर से भी व्यक्ति व उसके व्यक्तित्व की छाया हट नहीं पा रही है| व्यक्ति के महत्व को कम करने के लिए, संगठनों ने कठोर से कठोर नियमों का सृजन किया, फिर भी व्यक्ति को संगठन दबा नहीं सका| स्टालिन व माओत्से तुंग इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है| संसार में कठोरतम नियमों वाले संगठन मरने के बाद स्टालिन की कब्र खोद सकते है| लेकिन जीतेजी उसके सामने चूं नहीं कर सकते|
व्यक्ति गरिमा के विकास के लिए काल धर्म को समझना आवश्यक है|

सतयुग में समाज पूरी तरह से बंधनों से मुक्त होता है, क्योंकि वह केवल “शब्द” को ही अपने विकास का आधार बनाता है| जिसके उच्चारण के लिए, किसी प्रकार के प्रतिबंधित जीवन की आवश्यकता नहीं होती| धीरे-धीरे उस महिमा को खो देने पर, जब व्यक्ति अपना पराभव देखने लगता है, तो त्रेतायुग में वह दूसरी भौतिक शक्तियों से मदद की अपेक्षा कर, यज्ञादि व कर्मकांडो की सृष्टि कर, उनके द्वारा व्यक्ति की शक्ति को बनाए रखता है| लेकिन इन सबके लिए इतने प्रतिबंधित जीवन की आवश्यकता होती है कि दीर्घकाल तक उन प्रतिबंधों का निर्वाह भी नहीं कर पाने के कारण पुन: गिरावट की और चला जाता है, जिसको रोकने के लिए द्वापर में वह आराधना पद्धति को विकसित कर्ता है, जिसके लिए प्रतिबन्धों की आवश्यकता तो है, लेकिन कर्मकांडी नियमों के समान कठोर प्रतिबंधों से बचा जा सकता है| इससे पतनोन्मुख व्यक्ति को कुछ समय तक राहत अवश्य मिलती है, लेकिन धीरे-धीरे वह उन प्रतिबंधों को भी सहन करने की क्षमता खो देता है, तब प्रादुर्भाय होता है कलियुग का, जिसके आरम्भ में व्यक्ति तंत्रादी निकृष्ट क्रियाओं का आश्रय ले, पुन: शक्तिशाली बनने की चेष्टा करता है| क्योंकि इस पद्धति में प्रतिबन्धों की आवश्यकता तो है लेकिन अल्पकालिक| इस प्रकार जब अल्पकाल में घटिया साधनों से अर्जित शक्ति से लोग शोषण में प्रवृत होते है,तब उनसे पीड़ित जनता आत्मरक्षा के लिए सोचने को विवश हो जाती है|

इस समय तक सामाजिक व जीवन पद्धतियाँ इतनी दूषित व पराश्रित हो जाती है कि उनके रहते किसी प्रकार की प्रतिबंधित साधना की सम्भावना ही समाप्त हो जाती है| तब एक मार्ग शेष रह जाता है, अपनी मूल स्वाभाविकता की और वापस लौटना| प्रतिबंधित जीवन जीवन व साधना पद्धतियों की नकार देना| इस अस्वीकृति के पीछे जो स्वीकृति छिपी है, वह “शब्द” साधना को स्वीकार कर लेने की| केवल साहित्यक रूप से मन्त्र जप की पद्धति को अंगीकार कर लेना| इसके लिए न तो किसी पद्धति की आवश्यकता है न बाहरी शक्ति की मदद की, क्योंकि शब्द सृष्टि में ही विचरण करने वाली जो सात्विक शक्तियाँ है, वे इस मार्ग पर चलने वालों का स्वत: ही अपने स्वभाव के वशीभूत हो कर मार्गदर्शन आरम्भ कर देती है| इस प्रकार कलियुग की पुन: सतयुग की और अग्रसर करने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है|

वर्तमान काल का इस दृष्टि से अध्ययन किया जावे, तो काल धर्म यही कहेगा कि वह समय आ गया है, जब समस्त प्रपंचों एवं प्रतिबंधों से मुक्त होकर सहज व सरल नाम स्मरण का आश्रय ले, व्यक्ति अपनी शक्ति को पुनर्जीवित करे| इसी पद्धति से समाज, राष्ट्र, व विश्व धीरे-धीरे स्वत; ही परिवर्तित होते चले जायेंगे| व्यक्ति की गरिमा बढ़ेगी| मानवता का पुनरोदय होगा| समाज को शोषण से मुक्ति मिल सकेगी| यही समय की पुकार है, काल धर्म है व युग धर्म है|
लेखक : श्री देवीसिंह महार


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