Aug 29, 2010

राज्य एवं शक्ति

राज्य का उद्देश्य होता है व्यवस्था को बनाये रखना |न्याय ,धर्म,सत्य एवं पुण्यात्मक समाज की व्यवस्था को बनाये रखना |अनादि काल से भारतीय मनीषियों द्वारा शोध करने के बाद यह उद्दघोषणा की गयी की इस सृष्टि में पाप का पुण्य से ,अधर्म का धर्म से ,अन्याय के न्याय से,असत्य का सत्य से एवं बिषरूपी समाज का अमृतरूपी समाज से झगडा है,एवं दोनों ही के अस्तीत्व को नकारना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा |क्योंकि असत्य के बगेर सत्य को,अधर्म के बगेर धर्म को,अन्याय के बगेर न्याय को,परिभाषित ही नहीं किया जासकता है |और न हीं इन अच्छाइयो का कोई महत्व ही रह जायेगा |अत: दोनों अस्तीत्व एक दुसरे के लिए अत्यावश्यक है |और दोनों में द्वंद्द होना भी स्वभाविक है |अर्थात यह सृष्टि द्वंदात्मक है |अच्छाई को बुरे,न्याय को अन्याय ,सत्य को असत्य ,धर्मं को अधर्म एवं अमृतरूपी समाज को बिष रूपी समाज हमेशा दबाने की कोशिश करते रहते है |अत:सत्य,न्याय,धर्म,अच्छाई,एवं बिष रूपी समाज पर अमृतरूपी समाज की विजय सुनिशिचित करने के लिए एवं व्यवस्था को बनाये रखने के लिए ,परमपिता-परमेश्वर ने एक शक्ति की उत्पत्ति अपने ह्रदय से की |और उसे यह जिम्मेदारी सौंपी की अमृत रूपी समाज (अच्छाई युक्त समाज) की बिष रूपी समाज(बुराईमें रत समाज)से रक्षा करना |इस सृष्टि को क्षय से त्राण कराने की,अर्थात इस सुन्दर सृष्टि को विनाश से बचाने की |और उस शक्ति का नाम है क्षत्रिय ,अत:क्षत्रियों का यह कर्तव्य है कि वह इस सृष्टि(संसार) को विनाश से बचाए|
अब यही जिम्मेदारी राज्य की भी हैकि वह संसार या समाज को विनाश से बचाए |इसीलिए आजकल यह सुनने में अरहा हैकि अब क्षत्रित समाज एवं क्षत्रित्व की कोई आवयश्कता नहीं रही,और आदमी की पूंछ की तरह यह अनुपयोगी है |क्योंकि तर्क है की समाज,धर्म,राष्ट,एवं न्याय की रक्षा का दायित्व राज्य भली भांति वहां कर रहा है |मई यहाँ पर पाठको का ध्यान थोडा इस बात पर केन्द्रित करना चाहता हूँ कि वर्तमान में समाज कितना व्यवस्थित वह निम्न उदहारण द्वारा अच्चितारह समझा जा सकेगा |बिहार के एक IAS अधिकारी जिसका नाम कुछ विश्वास करके था|करीब 9 -10 वर्ष पूर्व देल्ही भाग कर आया और उसने अपनी नौकरी छोड़ते हुए बताया कि उसकी पत्नी का पिछले एक वर्ष से स्वयं उस ही के सरकारी बंगले में उस ही के सामने कुछ तथाकथित राजनैतिक गुंडे बलात्कार करते रहे है|वह अपने साथ हुए इस भीषण अत्याचार का कारण स्वयं का दलित IAS होना बता रहा था |उसकी इस दलील के बाद सभी राजनैतिक दल एवं मिडिया जगत ने उसके साथ-साथ खूब आंसू बहाए \अब बताइए कि क्या भारतीय संविधान में दलित IAS अधिकारी को सामान्य वर्ग के IAS अधिकारी से कम शक्तियाँ प्रदान कि गयी है ?मई जानना चाहता हूँ कि इतने निकृष्ट व्यक्ति का चयन IAS में कैसे होगया ?क्या चयन में उसका किताबी ज्ञान एवं आरक्षण के लिए जाति हिआधर मन गया था,और यदि हाँ तो यह बहुत ही शोचनीय स्थिति है | और सहानुभूति इस कायर के बजाय उन चार-पांच जनपदों कि जनता के साथ दर्शाओ जिनका जिला-कलेक्टर यह कायर(न:पुंसक)रह चुका था |उपरोक्त उदहारण का प्रतिपाद्द है कि केवल शक्तिशाली पद पर बैठ जाने मात्र से कोई शक्ति का सदुपयोग नहीं कर सकता है जबतक कि उस व्यक्ति के स्वभाव में कोई गुण एवं क्षमता ना हो |जब राज्य में नौकरशाही का चयन ही इतना घटिया है तो व्यवस्था क्या खाक बनाये रखेगा |क्योंकि विश्वास जैसे प्रशासक ना जाने कितने ही भरे पड़े है|राज्य में शक्ति तो असीमित है पर उनमे प्रयोग करने वालो में ना क्षमता है और ना ही दृढ़ इच्छा शक्ति ही है |
एक बार एक राजा था जिसने अपना राज्य में अनेको कल्याण कार्य जैसे कुंए,नाहर,सड़क,परिवहन एवं विद्धालयो का निर्माण किया था |उसने सोचा कि मेरी शासन व्यवस्था का आकलन करवाना चाहिए ,इसके लिए उसने अपने एक वृद्द प्रजाजन को बुलवाया और उससे पूंछा कि आपने मेरे पितामह से लेकर मुझ तक सभी कि शासन व्यवस्था देखी है| अत:आप बताइए कि किसका राज्य सबसे श्रेष्ट था ?वह वृद्ध बोला कि "महाराज मै अपने जीवन में घटित एक वाकया आपको सुनना चाहता हूँ जिससे शायद आपको कोई कुछ संकेत मिल जायेगा |जब आप के पितामह का राज्य था ,उन दिनों मै युवा अवस्था में था|एक शाम कि संधि बेला में गाँव से कुछ दूर जंगल में मुझे हाँफती हुई एक सुन्दर युवति मिली, जो कि स्वर्ण आभुषनो से लदी हुई थी ,उसने बताया कि कुछ डाकू उसके पीछे लगे हुए है| मने डाकुओ से उसे बचा लिया तथा उसे अपनी बहिन मन कर अपने घर में रात्रि में रखा|प्रात-काल उसे उसके पति के पास छोड़ कर आगया |उसके पति ने मुझे स्वर्ण आभूषण देना चाहे तो मैंने उसे अपनी बहिन मानने कि बात बताकर यथा संभव उपहार देकर आगया | .
उस घटना के १५ वर्ष बाद आपके पिता महाराज का राज्य-अभिषेक हुआ थ |कुछ ही दिनों बाद मुझे अहसास होने लगा की मैंने घर आये धन को यों ही लौटा दिया |युवति को बहिन बना कर रखना तो ठीक था किन्तु उसके स्वर्ण-आभूषण लौटने की क्या आवश्यकता थी |और महाराज अब मै आपके राज्य में हूँ और मुझे लगता है की मैंने इतनी सुन्दर स्त्री को अपनी मुर्खता से यों ही जाने दिया वरन उसे भी भोगता और उन स्वर्ण-आभूषण को भी रख लेता तो इस बुढ़ापे में दोनों कम आते |यह सुन कर रजा का भ्रम दूर हो गया और वह जन गया की उसके राज्य में स्त्री एवं धन दोनों असुरक्षित है |और आजकल हमे रोज अखबारों में पड़ने को मिल जाता है कि कुछ नर-पिशाच अपनी सगी बेटियों तक से बलात्कार कर रहे है |तो इस राज्य में शक्ति कहाँ रही ?अर्थात क्षात्र-धर्म,क्षत्रिय समाज एवं क्षत्रित्वता कि आज जितनी आवश्यकता तो पहले कभी नहीं रही |और अब यह मान लेना चाहिए कियाः समाज,यह राष्ट्र,विनाश के गहरा गर्त में तेजी से जा रहा है |लेकिन यह सब हम क्षत्रियों के जीवित रहते हो रहा है तो लानत है हमारे क्षत्रित्व पर ,और लानत हमारे जीवन पर !क्या आज हम हमारे क्षात्र-धर्म का पालन करने में सक्षम है ?शायद नहीं ,क्योंकि क्षात्र-धर्म पालन के लिए राज्य(दंड) हमारे(क्षत्रिय) अनुकूल होना चाहिए|जबकि राज्य(दंड) इस समय किन्ही कमजोर,बेबश,मनचले,स्वार्थी ,एवं दिग्भ्रमित हाथो में है ,जो कदाचित सड़क,पानी,बिजली,स्कूल,परिवहन,आरक्षण एवं संचार की व्यवस्था तोजैसे तैसे ,जोड़-तोड़ बिठा-कर या झूंटे-सच्चे आंकड़े एकत्रित करके करके दिखा भी देंगे |किन्तु राज्य का अत्यावश्यक कार्य न्याय ,शांति,एवं धन और इज्जत की सुरक्षा को बनाये रखने में पूर्णतःअक्षम सिद्ध हुए है |हमारे धर्म पालन में बाधक है वर्तमान राज्य ,क्षत्रिय ही ब्राहमण सहित समाज के सभी वर्णों के भी धर्म पालन में यह राज्य-व्यवस्था बाधक है |इसीलिए योगीराज अरविन्द ने तो यहाँ तक कहा है की "जिस देश का रजा क्षत्रिय नहीं हो उस देश में ब्राहमण को निवश ही नहीं करना चाहिए |अतः धर्म-पालन राज्य क्षत्रिय धर्मानुकूल हो|अतः राज्य में शक्ति लानी हो या क्षत्रिय को अपना धर्म-पालन करना दोनों का हल केवल और केवल मात्र एक ही है की "क्षत्रिय दंड(राज्य)को धारण करे |यही आज सभी का धर्म एवं कर्म है की क्षात्र तेज़ को जाग्रत किया जाये ताकि इस बिलखती हुई मानवता को सत्य,न्याय,धर्म एवं शांति-पूर्ण जीवन जीने का नैसर्गिक अधिकार मिल सके |
"कुँवरानी निशा कँवर नरुका"
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति


एक वीर जिसने दो बार वीर-गति प्राप्त की |
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