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हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना

यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि जिस समाज को गिराना हो उसके इतिहास को पहले विकृत कर देना चाहिए| इस सिंद्धांत का आश्रय ले बुद्धिजीवियों ने महाभारत काल से लेकर अब तक निरंतर हमारे इतिहास को विकृत किया ह| यह ठीक है कि क्षत्रियों ने हमेशा इतिहास लेखन की पद्दति को हतौत्साहित किया है , क्योंकि इतिहास जातियों व धर्मों के बीच स्थाई द्वेष का कारण बन जाता है| लेकिन दुसरे लोग इतिहास लिखने लगे व उनका उद्देश्य जब हमारे इतिहास को कलंकित करना हो तो ऐसे प्रयासों का विरोध किया जाना चाहिए , व इस प्रकार विद्वेष की भावना से लिखे गए इतिहास को स्वीकार नहीं करना चाहिए| इस सिद्धांत की उपेक्षा कर हमारे मौन ने लोगों को यह समझा किया कि वास्तव में जो कुछ लिखा गया है , वाही सत्य है| धीरे - धीरे हमारी पीढियां भी इस विकृत इतिहास को सही समझने लगी| जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग वास्तविकता को समझने पर भी समझने को तैयार नहीं है| भावना लेखक कि भाषा से प्रकट हुए बिना नहीं रह सकती| महाभारत के युद्ध के बारें में महाभारत ग्रन्थ में लिखा है कि पुण्यात्मा क्षत्रियों को स्वर्ग में पहुचाने के लिए इस महान संग्राम कि रचना हुई , जबकि भागवत पुराण का लेखक लिखता है कि नीच व पापी क्षत्रियों के बोझ से धरती दबी जा रही थी| इया धरती का कल्याण करने के लिए यह संग्राम हुआ|

भावनाओं के बाद हम तथ्यों पर आते है| तथ्यों के आधार पर भी बुद्धिजीवियों द्वारा द्वेष भावना से रचे इन पुराणों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता| भागवत पुराण में उल्लेख है कि राम के वंशज क्षत्रियों का राज्य नष्ट हो जाएगा| अन्य किसी क्षत्रिय वंश के बारे में ऐसी भविष्यवाणी पुराण में नहीं कि गयी है| हम देख रहे है कि इस पुराण कि यह भविष्यवाणी पूर्णतया मिथ्या साबित हुई है| समस्त क्षत्रिय वंशो का राज्य नष्ट हो जाने के बाद भी राम के वंशजों का नेपाल में राज्य अब तक कायम है| भागवत पुराण में राम के वंशजों का राज्य नष्ट हो जाएगा , ऐसे भविष्यवाणी करते हुए इस वंश के अंतिम राजाओं के नाम भी दिए गए है | ये नाम नेपाल के राजवंश से कही भी मेल नहीं खाते| इतने सारे पाखंड के स्पष्ट दिखाई देने के बाद भी इतिहास कहे जाने वाले इन पुराणों को यदि हम स्वीकार करते हे , तो इससे बड़ी भूल और कोई नहीं हो सकती|

क्षत्रिय " शब्द ब्रह्म " अर्थात बीज तत्व के उपासक है , जब कि ब्राह्मण " पर ब्रह्म " अर्थात विस्तृत ज्ञान पद्दति के उपासक है| इसी प्रकार क्षत्रिय निष्काम कर्मयोग को स्वीकार करते है , जबकि ब्राह्मण केवल ब्रह्म के उपासक है व " ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या " के सिद्धांत को मानते है| संसार में केवल दो ही तत्व है एक " ब्रह्म " तत्व दूसरा " क्षात्र " तत्व| इन तत्वों कि अलग अलग साधना व उपासना पद्दति है| इस प्रकार सिद्धांत के अनुसार ब्राह्मण अपनी ही पद्दति के जानकार व गुरु हो सकते है| क्षत्रिय पद्दति का जानकार व गुरु भी केवल क्षत्रिय ही हो सकता है | व्यवहार में में यदि हम देखें तो श्री राम को समस्त ज्ञान व शक्ति उनके गुरु विश्वामित्र जी ने प्रदान की थी व अर्जुन को ज्ञान श्री कृष्ण ने दिया था| अतः यह स्वतः सिद्ध है कि क्षत्रिय की अपनी ज्ञान परंपरा हमेशा अलग रही है , लेकिन पुराणों में लिख दिया गया है कि ब्राह्मण के घर में जन्म लेने वाला प्रत्येक बालक संसार का गुरु है| इस प्रकार उन मिथ्या ग्रंथों के सहारे ये बुद्धिजीवी समाज के गुरु बन बैठे व हम धीरे धीरे अपनी ज्ञान परम्पराओं को खो बैठे|

पुनीत ग्रन्थ महाभारत के शान्ति पर्व में उल्लेख है कि " ब्राह्मण को राज सेवा , खेती के धन , व्यापार कि आजीविका , कुटिलता , परस्त्रीगमन और ब्याज इनसे दूर रहना चाहिए| जो ब्राह्मण दुश्चरित्र , धर्महीन , कुलटा का स्वामी , चुगलखोर , नाचने वाला , राज्य सेवक अथवा और कोई विकर्म करने वाला होता है , वह अत्यंत अधर्म है , उसे तो शुद्र ही समझो और उसे शूद्रों कि पंक्ति में बिठा कर ही भोजन करना चाहिए|" फिर आगे लिखते है , जिन्होंने अपने जातीय कर्मों को छोड़ दिया है , तथा जो कुत्सित कर्मों में प्रवृत होकर ब्राह्मणत्व से भ्रष्ट हो चुके है ,वे ब्राह्मण शुद्र के तुल्य है| इसी तरह जिन्होंने वेद नहीं पढ़ें , जो अग्रिहोत्र नहीं करते , वे भी शुद्र के तुल्य है| इन सब से धार्मिक राजा को कर और बेगार लेने का अधिकार है| न्यायालय में अभियुक्तों को पुकारने का काम करने वाले , वेतन लेकर देव मंदिर में पूजा करने वाले ये पांच प्रकार के ब्राह्मण चांडाल के सामान है|"

उक्त कथनों का मनन करने के बाद यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आज के युग में ब्राह्मण नगण्य है | फिर इन पंडावादी तत्वों को गुरु कि पदवी देने का जघन्य पाप कर्म क्षत्रिय समाज ने किया है जिसका परिणाम इस समाज ने न केवल अब तक भोग है बल्कि भविष्य में भी भोगना पड़ेगा| इन्ही तथ्यों व परिस्थितियों को देखकर पिछले डेढ़ हजार वर्षों से संतों ने केवल संत परंपरा के लोगों को व केवल संतों को ही गुरु रूप में स्वीकार करने कि बात कही | लेकिन इस और हमने कोई ध्यान नहीं दिया व पुराणवाद के चक्कर में फंसकर निरंतर पतन के गहरे गर्त की और अग्रसर होते गए|

अब हम आधुनिक इतिहास की और दृष्टि डालते है| आमेर राजवंश के सबसे प्रतापी राजा ;बल्कि यों कहा जाए कि आधुनिक युग के सबसे पराक्रमी योद्धा पंजवनराय जी , अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख सामंत थे , उनका नाम हमको इतिहास में देखने को नहीं मिलता| पंजवनराय ने ६४ बड़े युद्ध लड़े व दो बार अकेले अपनी ही सेना से मोहम्मद गौरी को परास्त कर बंदी बनाया| उस माहन शूरवीर का आज इतिहास में नाम नहीं मिलता| लोगों की जबान पर आज भी प्रचलित है|

"गहत गौरी साह के , भागी सेना और|
आयो वाह लिए तब , फिर कूर्म नागौर||

"इतिहासकारों का कथन है कि जयपुर राजवंश की वंशावली में पंजवनराय का जो काल अंकित है वह पृथ्वी राज के काल से मेल नहीं खाता जबकि पृथ्वीराज - रासौ का आधे से अधिक भाग केवल पंजवन के युद्धों से भरा पड़ा है | केवल एक छोटी सी विसंगति बताकर इतने बड़े शूरवीर का नाम इतिहास से मिटा दिया गया व हमने उसको स्वीकार कर लिया|
क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Comments :

4 comments to “हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना”
Udan Tashtari said... Hindi Blog
on 

अच्छा जानकारीपूर्ण....

Bhupendra Singh said... Hindi Blog
on 

हमारी सबसे बङी भूल यह है कि हम हम में मर गये । संकीर्णता से उबर कर एक नाम एक छत्र के नीचे संघर्ष ही हमें विजय दिलायेगा ।
जय राजपूताना
ना कि जय शेखावटी , जय मेवाङ , जय मारवाङ ......

Praveen Singh Bisen said... Hindi Blog
on 

Well said sir

नरेश सिह राठौड़ said... Hindi Blog
on 

इतिहास तो हमेशा ही तोड़ा मरोड़ा गया है |

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श्री तनसिंह जी की कलम से

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