Aug 21, 2011

हमारी भूलें : काल चक्र से मार्ग दर्शन प्राप्त नहीं करना

बुद्धिमान व्यक्ति यदि यह नहीं देख पाता है कि किस मार्ग पर अग्रसर होने से मेरा कल्याण संभव है ; तो भी वह संसार में घटित होने वाली घटनाओं व समय के स्वरूप को समझकर अपना मार्ग खोज निकालता है,लेकिन हमने इस आधार पर कभी अपना मार्ग खोजने की चेष्टा नहीं की|

हमारे धर्म के प्रचारक लोग,जिनका धर्म पर एकाधिकार है,यह प्रचारित कर लोगों का मनोबल गिरा रहे है कि अभी कलयुग आरम्भ हुआ है व घोर कलयुग अभी आने वाला है,अतः मनुष्य का नैतिक पतन उत्तरोत्तर होता चला जाएगा| हम इस कथन को यथावत स्वीकार करते हुवे अपने आप को भाग्य भरोसे छोड़ने को उतारू हो जाते है| हम यह भी नहीं जानते कि समय कि गणना का शास्त्र ज्योतिष है,व ज्योतिष की जिस प्रकार गणना होती है उस हिसाब से कलयुग में कलयुग का अंतर व कलयुग का ही प्रत्यंतर जो ४३२० वर्ष का घोर कलयुग का समय था,वह बीत चूका है|
इस घोर कलयुग के समय में संसार में धर्म के नाम से पचाने जाने वाले चरित्र-निर्माण की आधारशिला खंडित हुई| बोद्ध,जैन,इसाई,यहूदी,इस्लाम व सिक्ख आदि धर्मो का उदय हुआ| धर्म खंड खंड हो गया| हम अपने आप को हिन्दू या वैष्णव कहने लगे,यह भी भूल गए कि कलयुग के आगमन से पूर्व,संसार में धर्म केवल धर्म के ही नाम से जाना जाता था| उसके आगे हिन्दू या मुसलमान आदि किसी प्रकार की उपाधि नहीं लगाई जाती थी|

आज जगह जगह दीवारों पर जब हम लिखा देखते है कि सतयुग का आगमन हो रहा है तो हमें पाखण्ड सा नज़र आता है,क्योंकि हम नहीं जानते की पिछले ८०० वर्षों से कलयुग में कलयुग का अंतर तथा उनमे सतयुग का प्रत्यंतर चल रहा है,जो १७,००० से अधिक वर्ष तक चलेगा| इस अवधि में जितने भी धर्मों का उदय हुआ है,उनका नाश होना व पुनः मूल धर्म का उदय होना अवश्यम्भावी है| क्या हम यह कल्पना करते है| की एक रोज हम कलयुग में सोयेंगे व दुसरे रोज जब उठेंगे तो सतयुग हो?ऐसा कभी होने वाला नहीं है क्योंकि कलयुग के बाद सतयुग आता है अतः समाज अभी से मूल धर्म की और अग्रसर होगा व सतयुग के आगमन तक मनुष्य का चरित्र पूरी तरह से विकसित हो चुकेगा,जिस पर किसी भी प्रकार के सामजिक या राजनैतिक नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होगी|

पिछले ८०० वषों में क्या हुआ? धर्म के नाम पर युद्ध व एक धर्म के विरूद्ध दुसरे धर्म के युद्ध समाप्त हो गए| सभी धर्मों में ऐसे संतों का प्रादुर्भाव हुआ,जिन्होंने लोगों का ध्यान धार्मिक कट्टरता से हटाकर,मूल धर्म की और खेंचने की चेष्टा की है| ऐसे संतों का साहित्य धार्मिक सीमाओं को लांघ कर आज संसार के सभी भागों में पढ़ा जा रहा है| इस्लाम धर्म के सूफी संत व भारत के भक्ति मार्गी व वेदांती संतों ने संसार में एक ऐसी धूम मचा दी है कि भोतिकतावाद से त्रस्त लोग,आज संतों कि खोज में लगे हुए है| यह दूसरी बात है कि इस परिस्थिति का फायदा उठाकर अनेक ढोंगी साधू जनता के साथ ठगी कर रहे है| लेकिन यह ठगी भी अधिक समय तक चलने वाली नहीं है क्योंकि संतों कि आवाज़ अपने अपने धर्म के पंडावाद के विरुद्ध उठी है| अगर कोई इसी पंडावाद को अपनाने के लिए साधुवेश का उपयोग करेगा,तो वह भी नष्ट हुए बिना नहीं रहेगा|

जहाँ चीन के महान संत लाओत्से व उनकी परम्परा के अनेक संतों ने बोद्धों को धर्म के मूल की खोज के लिए प्रेरित किया,वहीँ पर खलील जिब्रान जैसे संतों ने गिरजाघरों द्वारा किये जाने वाले शोषण को लोगों के सामने प्रस्तुत करते हुए,धर्म की वास्तविकता व सेवा के महत्व को स्वीकार करने के लिए उन्हें प्रेरित किया है|

आज इस्लाम धर्म के अनुयायियों का जिन राष्ट्रों में बाहुल्य है,उनमे हम क्या देख रहे है? इस्लामिक क्रांतियाँ हो रही है| किस लिए? इस्लाम के प्रचार के लिए नहीं, इस्लामिक पंडावाद को बचा लेने के लिए| इस्लाम धर्म को मानने वाले 'बाबा'नामक एक व्यक्ति हुए जिन्होंने यह घोषणा की कि 'रसूल मोहम्मद साहब से यह कहा था कि मेरा चलाया हुआ धर्म एक हजार वर्ष तक चलेगा अतः इससे आगे जो करना है उसका सन्देश लेकर मै आ गया हूँ'| उन्होंने कहा संसार के सभी धर्मों का आदर करो| धर्म के नाम पर लड़ना मनुष्यता नहीं है| विज्ञान को जीवन में अपनाओ| समाज को शिक्षित करो तथा भोतिकवाद व 'आध्यात्मवाद' दोनों का साथ साथ विकास करो|

इन बाबा महाशय का मदीना में क़त्ल कर दिया गया लेकिन अपनी मृत्यु के पूर्व उन्होंने घोषणा की थी कि ४० वर्ष बाद मेरे विचारों का प्रचारक फिर आएगा| तदनुसार इतने ही समय बाद 'अब्दुल बहा' ने उन्ही विचारों को अपनाने की घोषणा कर दी,जिनको 'बाबा' ने प्रगट किया था| अब्दुल बहा को जेल में डाला गया,यातनाएं दी गई,लेकिन अंत में उन्हें रिहा कर दिया गया| परिणामस्वरूप वे अपनी मृत्यु से पूर्व अपने बहुत सारे अनुयायी छोड़ गए जिन्होंने 'बहाई धर्म' की स्थापना कर सब धर्मों को आदर देने की विचारधारा को फैलाने का कार्य अपने हाथ में ले रखा है|इन्ही उदारवादियों से भयभीत होकर इस्लामिक क्रांतियां की जा रही है व उदारवादियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है| जेल से छूटने के बाद बहाउल्ला जिस स्थान पर रहे वहां इज़राइल नाम का देश बन गया है जो इस्लामिक देशों को तहस नहस कर रहा है|

मनुष्य यह नहीं जानता कि उसमे काल चक्र को बदलने की क्षमता नहीं है| इसीलिए बुद्धिमान लोग सबसे पहले चारों तरफ दृष्टि फैला कर समय की गति को पहचानने की चेष्टा करते है|
संसार में घटित होने वाली उपरोक्त व ऐसी ही हजारों अन्य घटनाओं को देखते हुए भी हमने अपने आपको नए सिरे से बनाने व युगानुकूल बनने की कभी चेष्टा नहीं की| हमारे सभी शास्त्रों में उल्लेख है कि वर्ण व आश्रम प्रणाली केवल त्रेत्रा व द्वापर युग में स्थापित रहती है| कलयुग में यह नष्ट हो जाति है व सतयुग में इनकी कोई आवश्यकता ही नहीं होती| क्योंकि यह तो जब समाज विकृत होने लगता है,तो उसे पतन से रोकने के साधन मात्र है|

आवश्यकता इस बात की है किसमाज के भौतिक स्वरूप को बनाए रखने के बजाय हमारे धर्म के मूल की खोज की जानी चाहिए क्योकि वास्तविकता तो धर्म का मूल है न कि उसका भौतिक स्वरूप| क्षात्र तत्व की खोज व उसे उपार्जित करना ही युगधर्म है|
क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Aug 2, 2011

हमारी भूलें : स्वयं अपने इतिहास का सिंहावलोकन न करना

हम समाज के इतिहास को पढना चाहते है,इसलिए नहीं की हम उसमे से हमारी भूलों को खोजे व भविष्य में उन भूलों को न करें,और न ही इसलिए कि हम हमारी महानताओं को खोजे व उन महानताओं को अपने में स्थापित करे| बल्कि आज हम इतिहास का केवल इसलिए अध्ययन करना चाहतें है कि अपने पुरखों के नाम पर कुछ डींगे हांक सके| बिना कोई श्रेष्ठता अर्जित किये अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ साबित कर सके|

हम समाज जागरण व समाज कल्याण के हेतु इतिहास के अध्ययन की बात भी कहते हे,लेकिन कटु वास्तविकता यह हे कि आज क्षत्रिय समाज नाम कि कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं है| समाज पूर्ण रूपेण छिन्न भिन्न होकर व्यक्तियों में विभाजित हो चूका है| आज प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को अमाज समझता है व समाज का ठेकेदार बनता है| जो कोई व्यक्ति उसके अनुकूल रहने कि बात करता है,समाज सेवी है,तथा जैसे ही उसके आचरण में व्यक्ति के प्रति अनुकूलता आती है,उसे हम समाज द्रोही घोषित कर देते है| सम्माज के सामने व्यक्ति यदि समर्पित नहीं हो तो समाज कि रचना संभव नहीं है|

आज हमारे व्यक्तिगत अहंकार ने समाज को छिन्न भिन्न कर दिया है| अतः वास्तविकता यह रह गई है कि न कोई समाज है और न समाज चरित्र| ऐसी अवस्था में हम को समाज के इतिहास का अध्ययन करने के बजाय हमारे व्यक्तिगत इतिहास का अध्ययन करना चाहिए |ताकि हम कुछ समझ सके|

अपने आप के इतिहास को देखना,उसे पढना,व उस पर मनन करना अत्यंत कठिन कर्म है| इस कर्म को यदि हम निरंतर बढाते चले तो यह कार्य और अधिक कठिन होता चला जाता है| फिर भी कठिनाई कि परवाह किये बिना इस मार्ग पर यदि हम निरंतर बढ़ते चले तो एक रोज व्यक्तिगत इकाइयां समाप्त हो जायेगी व समाज चरित्र का निर्माण अवश्य होगा|
आखिर व्यक्ति का इतिहास है क्या? हम प्रत्येक क्षण को व्यतीत करते जा रहे है| यह बिता हुआ क्षण ही हमारा इतिहास है|

क्या हम विचार करने के लिए तैयार है कि इस बीते हुए क्षण में हमने किसे व क्यों नीचा दिखाने कि चेष्टाएँ कि थी?क्या हम यह भी सोचने के लिए तैयार है कि इस बीते हुए क्षण में हमने जिन आदर्शों की बात की,उनका निर्वाह हमने पिछले क्षणों में किया है,व भविष्य में आने वाले क्षणों में करेंगे? अगर इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो उत्तर नकारात्मक मिलेगा|

मनुष्य मौत से डरता क्यों है? निर्भयता,जो क्षत्रिय के लिए आवश्यक हे,का उपार्जन कैसे किया जा सकता है? जो मौत से डरता है,वह इंसान भयमुक्त नहीं हो सकता| मौत से डरने का कारण हमारा व्यक्तिगत इतिहास है| मौत की कल्पना आते ही हमारे सामने वे सारे कुकर्म आकर खड़े हो जाते है,जिनको हमने समाज से छिपाकर किया है| अगर किसी व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत इतिहास का अध्ययन किया हो व वास्तव में वह निर्दोष रहा हो तो मौत से उसे भय क्यों होगा? सच्चे व्यक्ति को सच्ची अदालत में जाने से क्या भय हो सकता है?

हम अपने आप से व एक दुसरे से भयभीत है| क्योंकि हम जानते है की हम आदर्शों की बात कर उनके विरुद्ध एक दुसरे पर आघात करने की चेष्टा करते है| त्याग के स्थान पर हमने स्वार्थ साधन किया है| समाज को अधिक देने के नाम पर हम सबसे अधिक प्राप्त करने की चेष्टा करते रहे| तब फिर निर्भरता व क्षत्रियोचित गुणों का विकास आखिर कैसे होगा?

इस जीवन के हमारे व्यक्तिगत इतिहास का हम स्मरण कर सकते है| वह सम्पूर्ण नहीं तो प्रमुख घटनाएं हमे अवश्य याद है, जिनके आधार पर हम अपना विश्लेषण कर अपनी कमियों को पहचान सकते है,उन्हें हटाकर उनके स्थान पर अच्छाइयों का सृजन कर सकते है|

लेकिन अपने इतिहास का अध्ययन यहीं समाप्त नहीं होता| इससे भी हमे आगे बढ़ना होगा| यदि हम हमारे वास्तविक शत्रुओं व मित्रों की खोज करना चाहते है,तो हमे विचार करना होगा कि इस जीवन से पहले भी क्या यह स्थूल शारीर हमारे साथ था? तो उत्तर मिलेगा नहीं? तब हमे विचार आएगा कि क्या हमारा सूक्ष्म शारीर यानी मन,बुद्धि,अहंकार भी इस जीवन से पूर्व हमारे साथ था? तो भी उत्तर मिलेगा नहीं| क्योंकि सूक्ष्म शारीर का निर्माण प्रारब्ध के आधार पर होता है| उन पाप पुण्यों के आधार पर जिनका हमे इस जीवन में भोग करना है| तब फिर सवाल उठता है कि जब में स्थूल शारीर भी नही हूँ , यह सूक्ष्म शारीर भी नहीं तो फिर अपने आप को मई कहने वाली वह कोंसी चीज है जो इस जन्म से पहले से चली आ रही है?

वह शक्ति जो इस जन्म से पहले से ही नही,बल्कि न मालुम कितने जन्मों के साथ चली आ रही है, 'प्राण' है| इस जन्म के हमारे व्यक्तिगत इतिहास को बुद्धि के द्वारा जान सकते है,लेकिन इसके पहले के इतिहास को बिना प्राण की मदद के हम नहीं जान सकते| और जब तक हम हमारे पहले के इतिहास को नही जानते,तब तक हमारे संपर्क में आने वाले प्रमुख व्यक्तियों के हेतु को भी हम नहीं जान सकते कि कौन मित्रता वश हमारा कल्याण करने के लिए हमारे पास आ रहा है|व कौन शत्रुता वश हमसे कुछ छीन कर ले जाने के लिए हमारे पास आ रहा है|
प्राण के इस महत्व व प्राण की इस भूमिका को स्वयं के इतिहास को समझने के लिए समझना आवश्यक होगा| और यही क्षत्रियों की परम्परागत साधना का मार्ग है|

जब हम किसी बार को दावे के साथ कहते है तो अपने दाहिने हाथ को सीने पर ठोकते है| हमारे हाथ का कलाई वाला भाग जिस स्थान पर पडता है,उसी स्थान पर सूक्ष्म अंग,जो सामान्य आँखों से नहीं दिखाई देता,'हृदय,स्थित है| और इस हृदय में प्राण निवास करता है,जिसका सतत विकास करने के लिए आत्मा सदा उसकी रहती है| इस प्रकार व्यक्ति स्वभाविक रूप से धीरे धीरे स्वतः ही विकसित हो रहा है| लेकिन हम प्रयास करें,व अपने प्राण से सम्पर्क साधने की चेष्टा करे,अपनी स्मृति को प्राण की खोज में लगा दें-जो हमारे व्यक्तिगत इतिहास को जानता है तो,निश्चित रूप से हम प्राण की मदद से अपने शत्रु व मित्रो की खोज कर सकते है|

अनंत जन्मों से चला आने वाला प्राण यह भी जानता है कि हमारी किसी बोद्धिक व आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ती कौन कर सकता है व उनमे मार्ग दर्शन कैसे प्राप्त किया जा सकता है| अतः निश्चित यह हुआ कि अगर हम अपने आपके इतिहास की खोज करने में जुट जाएँ तो हमे न केवल आपसी खिचातन व तनाव से मुक्ति मिलेगी बल्कि हम हमारे वास्तविक साधनापथ व साधनापथ के सहयोगियों को भी पहिचान सकेंगे| जिससे हमारे जीवन के संचालन में सुविधा होगी तथा जो लोग पहले हमारे से पीड़ित रहे है| अगर वे बदले की भावना से हमारे ऊपर आक्रामक कार्यवाही भी करते है तो हमारे मन में प्रतिरोध व प्रतिशोध की भावना पैदा नहीं होगी? क्योंकि हम जान जायेंगे कि यह सब हमारी गलती का परिणाम है,जिसका प्रतिकार नहीं करके ही हम अनावश्यक संघर्ष को हमेशा के लिए समाप्त कर सकते है|

अतः आवश्यक यह है कि हम अपने आप के इतिहास को देखने व समझने की चेष्टा करें| इस जन्म के इतिहास को मनन द्वारा,व पूर्व जन्म के इतिहास को ध्यान के द्वारा ही समझा जा सकता है| अगर इस प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया गया तो हमारी यह भूल कभी सुधरने वाली नहीं है| व्यक्तियों में विभाजित हमारा आज का समाज बिना इस प्रक्रिया को अपनाए कभी भी वास्तविक समाज नहीं बन सकेगा|

क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Aug 1, 2011

हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना-२

अब हम आधुनिक इतिहास की और दृष्टि डालते है | आमेर राजवंश के सबसे प्रतापी राजा ; बाल्टी यों कहा जाए कि आधुनिक युग के सबसे पराक्रमी योद्धा पंजवनराय जी , अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख सामंत थे , उनका नाम हमको इतिहास में देखने को नहीं मिलता | पंजवनराय ने ६४ बड़े युद्ध लड़े व दो बार अकेले अपनी ही सेना से मोहम्मद गौरी को परास्त कर बंदी बनाया | उस माहन शूरवीर का आज इतिहास में नाम नहीं मिलता | लोगों की जबान पर आज भी प्रचलित है |
"गहत गौरी साह के , भागी सेना और |
आयो वाह लिए तब , फिर कूर्म नागौर ||"


इतिहासकारों का कथन है कि जयपुर राजवंश की वंशावली में पंजवनराय का जो काल अंकित है वह पृथ्वी राज के काल से मेल नहीं खाता जबकि पृथ्वीराज - रासौ का आधे से अधिक भाग केवल पंजवन के युद्धों से भरा पड़ा है | केवल एक छोटी सी विसंगति बताकर इतने बड़े शूरवीर का नाम इतिहास से मिटा दिया गया व हमने उसको स्वीकार कर लिया |

हमने कभी प्राचीन हस्तलिखित लेखों को पढने व संतों से सत्संग करने का श्रम नहीं किया | इसी के कारण बहुत सारी लिखित व प्रचलित बातों को इतिहास से हटा दिया गया | विज्ञान के दास हुए पुण्य हीन लोग यदि संत परंपरा के इतिहास को समझने की सामर्थ्य खो चुके है , तो उनके द्वारा सुरक्षित इतिहास का क्या दोष है ? ऐसे आख्यानो को छिपाना नहीं जाना चाहिए , क्योकि आने वाली पीढ़ियों ने , यदि अपने आप को शिक्षित व दीक्षित करने को चेष्टा की तो वे इन तथ्यों से प्रेरणा नहीं ले पाएगी | इस प्रसंग में प्रसिद्ध दो घटनाओं का वर्णन करना आवश्यक प्रतीत होता है - पहली घटना आमेर के राजा मिर्जा राजा जय सिंह से सम्बंधित है | आमेर के राजाओं का यह संकल्प था कि किसी भी हिन्दू राज्य को जीतकर मुग़ल साम्राज्य में नहीं मिलायेंगे | मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने मिर्जा राजा जय सिंह को शिवाजी पर चढ़ाई करने भेजा था | शिवाजी को सब प्रकार से शक्तिहीन कर देने पर भी जब वे समझोता करने के लिए तैयार नहीं हुए , तो मिर्जा राजा धर्मसंकट में पड़ गए | उन्होंने दौसा के भोमिय सूरजमल जी को याद किया व उनसे अनुरोध किया कि " रात को सोते हुए शिवाजी कि पाग उतार लाये व एक चिट्ठी उनके सिराहने छोड़ दें | भूमिया जी ने ऐसा ही किया "| प्रातः काल शिवाजी ने जब अपनी पाग नहीं देखि तो सिराहने रक्खे हुए पर्चे को पढ़ा | उसमे मिर्जा राजा जय सिंह ने लिखा था , " मेरे से आकर बात करो , वर्ना आज तो पाग मंगवाई है | कल सिर मंगवा लूँगा | " इसके बाद शिवाजी ने जिजाबाई से परामर्श कर मिर्जा राजा से भेंट की | आज के तापहीन लोग यदि सूक्ष्म शरीरों में तपस्या कर रहे संतों व शूरवीरों का साक्षात्कार नहीं कर सकते तो इसमें उन लेखकों का क्या दोष है ? जिन्होंने इन घटनाओं को बड़े यत्न से अंकित कर सुरक्षित रक्खा है |

दूसरी घटना मीरा बाई के इतिहास से सम्बंधित है | संतो में प्रचलित कथा के अनुसार मीरा बाई के विवाह के बाद राणा ने यह अनुभव किया किया कि मीरां आध्यात्मिकता में उनसे बढ़ी चढ़ी है | अतः उन्होंने अपने गुरु के सानिध्य में कुछ समय तक रहकर आध्यात्मिक बल को बढाने का निश्चय किया | राजा जब गुरु के पास जाने लगे तो मिरां बाई ने किसी सेवक को साथ नहीं ले जाने का अनुरोध किया , लेकिन राजा ने उसे अस्वीकार करते हुए एक सेवक को साथ ले गए | कुछ वर्षों तक गुरु के सानिध्य में रहकर , राणा ने साधना की व परकाया प्रवेश की विद्या भी सीखी | राणा का सेवक अत्यंत चतुर था | वह भी राणा के साथ साथ इन सारी विद्याओं को सीखता रहा | कुछ समय बाद जब राणा गुरु से विदा होकर वापस लौट रहे थे , तो मार्ग में जंगल में एक ताज़ा मरे हुए शेर को उन्होंने देखा व उनके मन में परकाया प्रवेश की विद्या का परिक्षण करने की बात उठी | राणा ने अपने सेवक को आदेश दिया कि वह उनके शारीर कि रक्षा करे व स्वयं शेर के शारीर में प्रवेश कर जंगल में भ्रमण के लिए निकल पड़े | इस परिस्थिति को देखकर सेवक के मन में लोभ उत्पन्न हुआ व उसने अपने शरीर को छोड़ कर राणा के शरीर में प्रवेश कर राजमहल का मार्ग अपनाया | राणा के शरीर में सेवक जब राजमहल पंहुचा , तो मीरा को पहचानते देर नहीं लगे | इस घटना के बाद तो मिरां कि भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति और भी बढ़ गई | आज के इतिहास में इन सब घटनाओं को विज्ञान सम्मत नहीं मानकर हटा दिया गया | लेकिन हमे यह नही भूलना चाहिए कि स्थूल विज्ञान से सूक्ष्म विज्ञान हमेशा अधिक प्रभावशाली रहा है | व आज के युग में हम सूक्ष्म विज्ञान की उपेक्षा कर , स्थूल के उपासकों के अनुचर बने जा रहे है |

वर्तमान इतिहास में नीतिज्ञ लोगों को कलंकित करने की कम चेष्टाएं नहीं की गई है | जिसके पीछे प्रयोजन यही रहा है कि हठवादिता में फंसे रहकर हमारा समाज परिस्थितियों से पिटता रहे , जिसका लाभ हमारे शत्रुओं को मिले | आधुनिक शास्त्रों से सज्जित यवनों के दल अरब देशों से भारत की तरफ कूच कर रहे थे | आज का अफगानिस्तान है जहाँ पर उस समय पांच मुस्लिम राज्य थे , उनको शास्त्र प्रदान करते थे व उसके बदले में वे भारत से जो धन लूट कर ले जाते थे , उसका आधा भाग प्राप्त करते थे | इस प्रकार काबुल का यह क्षेत्र उस समय बड़ा भारी शास्त्र उत्पादक केंद्र बन गया था | जिसकी मदद से यवनों ने भारत में लूट कीव बाद में राज्य स्थापना करने की चेष्टा में संलग्न हुए | इतिहास कारों ने इस बात को छिपाया है कि बाबर के आक्रमण से पूर्व बहुत बड़ी संख्या में हिंदू शासकों के परिवारजन व सेनापति राज्य के लोभ में मुसलमान बन गए थे व यह क्रम बराबर जारी था | ऐसी परिस्थिति में आमेर के शासक भगवन्तदास व उनके पुत्र मान सिंह ने मुगलों से संधि कर अफगानिस्तान के उन पांच यवन राज्यों पर आक्रमण किया व उन्हें इस प्रकार तहस नहस कर दिया कि वे भविष्य में उठ नहीं सके | इस कार्यवाही के परिणाम स्वरूप ही यवनों के भारत पर आक्रमण बंद हुए व बचे कुचे हिंदू राज्यों को भारत में अपनी शक्ति एकत्रित करने का अवसर प्राप्त हुआ | मान सिंह की इस कार्यवाही को तत्कालीन संतों ने पूरी तरह संरक्षण दिया व उनकी मृत्यु के बाद हरिद्वार में उनकी स्मृति में हर की पीडियों पर , उनकी विशाल छतरी बनवाई | लेकिन आधुनिक इतिहास के लेखकों ने मान सिंह के इतिहास में से उन घटनाओं को इस प्रकार से ओझल कर दिया गया है , जिससे तद्कालीन परिस्थिति में उनके द्वारा किया गया कार्य महत्वहीन हो जाए | नाथ सम्प्रदाय के लोगों के द्वारा " गंगामाई " का एक भजन अब भी गया जाता है , जिसमे भारत के धर्म रक्षक अनेक वीरों का उल्लेख आता है | इस भजन में रजा भागीरथ से क्रम शुरू होता है व भजन की अंतिम कड़ी राजा मान के यश गान के साथ समाप्त होती है |

इन सब तथ्यों को जनता की आखों से ओझल कर क्षत्रिय इतिहास को कलंकित करना व क्षत्रियों के गुण धर्म को नष्ट करना इन आक्रांताओं द्वारा लिखे गए इतिहास का मुख्या उद्देश्य रहा है , जिसको नहीं समझकर इस इतिहास को सही मानकर , हम आपस में लड़ते गए व एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे | अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हमारे विरोधियों द्वारा लिखे गए , इस इतिहास को स्वीकार नहीं करें तथा प्राचीन से लेकर आज तक के इतिहास व ग्रंथों में जहाँ कहीं भी क्षात्र तत्व के दर्शन होतें हो उनको ग्रहण कर अपने अंदर क्षमताओं का विकास करने का प्रयत्न करे |

क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |