Nov 20, 2011

हमारी भूलें : गुण दोषों के सम्यक ज्ञान का अभाव

जीवन के विकास के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने आपको सहज सरल बनाये रखे| नियंत्रणों के माध्यम से व्यक्ति पर यदि बोझ ढोया जाएगा, तो वुक्ति अपनी स्वाभाविकता को खो देगा| इस समझ को खोकर व्यक्ति ने अपने आप पर अत्यधिक धार्मिक, सामाजिक व राजनैतिक बंधन थोप लिए है| यह बंधन जैसे जैसे बढते गए, मनुष्य का जीवन अधिक जटिल व कलुषित होता चला गया| बंधनों से मुक्ति हेतु प्रयत्न करना जीव का स्वभाव है| जब अस्वाभाविक तरीकों से उसके विकास का प्रयत्न किया जाएगा, परिणाम निश्चित रूप से विपरीत निकलेगा| हमने समाज व व्यक्ति के पतन को रोकने के लिए प्रतिबंधों को दिन प्रतिदिन कठोर करना प्रारंभ कर दिया, जिससे पतन की गति रुकी नहीं बल्कि और बढती गयी| अत: अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रतिबंधों के चक्कर से बचकर जीवन को पुन: सरल व हल्का होने की अनुमति प्रदान की जाय| यह तभी हो सकता है, जब गुण-दोषों के बारे में सम्यक ज्ञान हो|

भगवान में छ: गुणों का विकास बताया गया है| इन गुणों को विकसित करने के लिए छ: दोषों का दमन नहीं,उन पर नियंत्रण करना आवश्यक है| प्रत्येक दोष पर नियंत्रण प्राप्त करने पर एक गुण का विकास का स्वत: हो जाता है| व्यक्ति व समाज के विकास की जितनी सहज व सरल यह प्रक्रिया है, जिसका विस्मृत कर हम जटिलताओं में फंसकर बोझिल होते जा रहे है|
(१) पहला दोष है “काम”- प्रचलित भाषा में काम का अर्थ लोग स्त्री प्रसंग ही समझते है| जबकि इसका प्रयोजन कामना से है| जो वास्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को काम कहते है| काम की उत्पत्ति संकल्प से होती है व सेवन करने से यह निरंतर बढ़ता रहता है| आसक्ति रहित होने से व सेवन का त्याग करने से यह तत्काल नष्ट हो जाता है| काम से उत्पन्न होने वाले दोष है, शिकार खेलना, जुआ खेलना,शराब पीना, स्त्री प्रसंग, दिन में सोना, पर निंदा करना, नाचना, गाना व बजाना व व्यर्थ घूमना| इन दोषों से रहित होने पर मनुष्य में एश्वर्य रूपी गुण का विकास होता है| शास्त्रों के अनुसार दंड को धारण करना व नीति के अनुसार प्रजा का पालन करना ही एश्वर्य है| शील,धर्म,सत्य,सदाचार,बल व लक्ष्मी इसके अंग है|

(२) दूसरा दोष है “क्रोध”- क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है व दूसरे के दोष देखने से बढ़ता है| क्षमा से इसका बढ़ाव रुकर यह धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है| क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोष है वाणी की कटुता, उग्रता, मारपीट करना, शरीर को कैद कर देना, त्याग देना, आर्थिक हानि पहुँचाना, चुगली, अति साहस, द्रोह ईर्ष्या व दोष दर्शन| इन दोषों पर जो विजय प्राप्त कर लेता है, उसमे गुण, रूप, धर्म की स्थापना होती है| धर्म की परिभाषा करना संभव नहीं| पितामह भीष्म ने कहा है कि मिटटी को लगातार पीसते रहने पर वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती चली जाती है, उसी प्रकार तपस्या व धर्म पर आरूढ़ रहने से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्व निरंतर विकसित होते चले जाते अहि, फिर भी यह कहा जा सकता है कि शील को धारण करने पर धर्म का तत्व स्वत: ही समझ में आने लगता है| मन, वाणी व शरीर से किसी भी प्राणी के साथ दोह न करे, सब पर दया करें व उत्तम पात्र को दान से, यही शील है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख मिलता है|

(३) तीसरा दोष है “मद”- उत्तम कुल, अधिक जानकारी व एश्वर्य के अभिमान से, मद मनुष्य पर सवार हो जाता है| वास्तविकता अर्थात अपने आपको मात्र निमित जानने से मद तुरंत उतर जाता है| यश की व्याख्या करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि यह स्वत: विकसित होने वाली क्रिया है| शास्त्रकारों ने यश के विषय में लिखा है, “फूलों की पवित्र एवं मनोहर सुगंध बिना बोले ही महक कर अनुभव में आती है तथा सूर्य भी बिना कुछ कहे ही आकाश में सबके समक्ष प्रकाशित हो जाता है| इसी प्रकार संसार में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ है; जो बोलती नहीं, किन्तु अपने यश से प्रकाशित होती रहती है|”

(४) चौथा दोष है “लोभ”- प्राप्त हुई वास्तु की अधिक से अधिक संख्या में पाने की इच्छा को लोभ कहते है| प्राणियों में भोगों के प्रति जो लोभ देखा जाता है, वह अज्ञान ही के कारण है, लोभ से ही पाप, अधर्म व दुःख का जन्म होता है| भोगों की क्षणभंगुरता को देखने व जानने से उसकी निवृति हो जाती है| पूर्वजन्मों के पुण्यों के क्षीण हो जाने पर व्यक्ति में जब मानसिक व बौद्धिक दरिद्रता व्याप्त होती है, तो वह भूख के भय से घबराकर लोभ का आश्रय लेने लगता है| इस लोभ पर विजय प्राप्त करने पर “श्री” नामक गुण का विकास होता है| लक्ष्मी व कांटी “श्री” के ही स्वरुप है| पितामह भीष्म के अनुसार “श्री” धर्म शील पुरुषों के भेष में, नगर में व घर में तथा युद्ध में पीठ न दिखाकर विजय से सुशोभित न होने वाले सुर वीरों के शरीर में सदा प्रतिष्ठित रहती है|

(५) पांचवा दोष है “ मोह”- मोह अज्ञान से उत्पन्न होता है| व पाप के अभ्यास से बढ़ता है| महात्मा पुरुषों के सत्संग से यह धीरे धीरे नष्ट हो जाता है| स्वभाव, जिसके वसीभूत होकर व्यक्ति मोह पाश में बंधता चला जाता है| केवल संत पुरुषों के संग से ही बदला जा सकता है| इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है| मोह पर विजय प्राप्त करने पर ही ज्ञान रूपी गुण का उदय होता है| ज्ञान व प्रकाश तप का फल है| भीष्म कहते है , “ जैसे आकाश में चिडियाओं के व जल में मछलियों के चलने के चिन्ह दिखाई नहीं पड़ते, उसी प्रकार ज्ञानियों की मति का भी किसी को पता नहीं चलता|” हृदय की गहराई से उत्पन्न होने वाले ज्ञान तत्व को पूरी तरह प्रकट करना व्यक्ति की सामर्थ्य के बाहर है| अत: ज्ञान का केवल अनुभव किया जा सकता है| वास्तव में जिसे ज्ञान कहा जाता है वह ज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञान के नजदीक की कोई वास्तु है जिसके आश्रय से व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त कर सकता है|

(६) छटा दोष है “मात्सर्य”- सत्य का त्याग व दुष्टों का संग करने व ईर्ष्या भाव से इसकी उत्पत्ति होती है| तथा सत्पुरुषों का संग अथवा सेवा करने से इसकी नवरीति संभव है| “मात्सर्य” पर विजय प्राप्त करने पर वैराग्य रूपी गुण की उत्पत्ति होती है| योग से जिन ऐश्वर्यों अथवा सिद्धियों की प्राप्ति होती है| उनकी अवहेलना करके पूर्ण विरक्त हो जाना अथवा पूर्णरूप से आसक्ति का त्याग कर देना ही वैराग्य है|
इन छ: दोषों पर विजय प्राप्त कर, छ: गुणों को उपार्जित करना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है| इस कार्य में जो जितने अंशों तक सफल होता है, उसको संसार में उतने ही अंश में मान, सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्ति होती है| फिर भी यदि लोग प्रतिबंधों को ही धर्म का अंग समझने लगें तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Nov 18, 2011

हमारी भूलें : गरीब जनता को ठुकरा देना

लोग कहते है कि इस्लामिक आक्रांताओं ने इस देश के धर्म ग्रंथों का जबरदस्त विनाश किया| इन ही आक्रांताओं पर वेदों को नष्ट करने का आरोप लगाया जाता है| वेदों की एक सौ से अधिक शाखाओं में से आज केवल सोलह शाखाएं उपलब्ध है वे भी मैक्समुलर की कृपा से| विचारणीय विषय यह कि जिन वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदीय, चतुर्वेदियों ने वेदों को कंठस्थ याद कर कर कीर्ति अर्जित की थी, उनके रहते ये वेद कैसे नष्ट हो गए? क्योंकि आक्रांता ग्रंथों को जला सकते थे, व्यक्ति की स्मृति को शस्त्र से नष्ट नहीं किया जा सकता|

दूसरा विचारणीय विषय यह कि सभी पुराण सुरक्षित है, उनमे से न तो कोई पुराण नष्ट हुआ और न ही उसका कोई भाग| इन परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि वेद आक्रांताओं द्वारा नष्ट नहीं किये गए बल्कि जिनके हित साधन में वे बाधक बन गए थे, उन्होंने ही वेदों को नष्ट किया होगा|

पुराणवाद द्वारा सृजित पंडावाद के विरुद्ध जो भयानक विद्रोह हुआ, उसे शांत करने के लिए सभी श्रेष्ठ लोगों ने, जब यह व्यवस्था दी कि पुराणों का वही अंश मान्य होगा, जो वेद सम्मत है, तो पुराण-जन्य पाखण्ड को बचाने का एक मात्र तरीका यही बचा कि वेदों को ही नष्ट कर दिया जाए, ताकि पुराणों को मिथ्या साबित करने का कोई आधार ही शेष नहीं रहे|
उपरोक्त तथ्य को समझ लेने के बाद हम निकट भूतकाल के इतिहास पर नजर डालते है| इस देश पर लगातार वर्षों तक इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमण हुए, जिनसे देश को बचाने के लिए एक एक इंच भूमि के लिए क्षत्रियों के कड़े व निरंतर संघर्ष में जो बलिदान हुए, उसकी तुलना में संसार का कोई बलिदान टिक नहीं सकता|

विचारणीय विषय यह है कि इन संघर्षों के दौर में किन लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर युद्धरत क्षत्रियों का साथ दिया व बाद में अमनकाल में उनके साथ क्या सलूक किया गया ?

आज जो पंडा-पूंजीपति गठबंधन अपने आपको देश और धर्म का रक्षक बतलाता है, वह उस समय भी आनंद में व् अपने व्यवसाय व जनता के शोषण में आज की तरह ही संलग्न था जबकि गरीब जनता ने देश व धर्म की आवाज को सुना था व संघर्ष क्षत्रियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर त्याग व बलिदान में बराबरी का हिस्सा लिया| यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि कोई भी समय ऐसा नहीं रहा, जब गरीब जनता त्याग व बलिदान करने वालों के साथ सहयोग करने से पीछे हटी हो|
इस्लामिक आक्रांताओं के आक्रमण के पश्चात जैसे व्यवस्था स्थिति उत्पन्न होती गयी, वैसे वैसे बुद्दिजीवी वर्ग ने अपने पर फैलाना आरम्भ कर दिया| क्षत्रिय शिक्षा के क्षेत्र में तो पहले ही बुरी तरह पिछड़ चुके थे, अब वे साधना के क्षेत्र में भी मार्गदर्शन का अभाव अनुभव कर रहे थे| क्योंकि एक हजार वर्ष तक लगातार युद्ध करने व एक-एक युद्ध में ही घर की कई पीढ़ियों के काम आ जाने के कारण वंशानुगत साधना व आराधना पद्धति छिन्न-भिन्न हो गयी थी| इस परिस्थिति का बुद्धिजीवी वर्ग ने पूरा-पूरा लाभ उठाया व यह वर्ग यह प्रदर्शित करने में सफल हो गया कि अगर उनके बताए मार्ग पर चला जाय तो कल्याण निश्चित है|

परिणाम जो होना चाहिए था, वही हुआ| स्वयं के मार्ग से भ्रमित ज्ञान से विहीन हुआ क्षत्रिय पंडावाद के फरेब में बुरी तरह फंस गया| जगह जगह मंदिरों व मठो के निर्माण होने लगे| इन संस्थाओं के लिए भूमिदान, अन्नदान व द्रव्यदान आमतौर पर प्रचलित हो गए| क्योंकि क्षत्रिय स्वयं अपने कल्याण के मार्ग से विमुख हो चुके थे, अत: उन्हें इन पंडावादी हथकंडो में अपना कल्याण दृष्टिगोचर होने लगा| सम्यक मार्गदर्शन के अभाव में, यह मर्ज दिन प्रतिदिन व पुश्तदर –पुश्त इस तेजी से बढ़ा कि उनके पास धन का अभाव होने लगा, जिसकी पूर्ति के लिए गरीब जनता का शोषण आरम्भ हुआ| उस गरीब का शोषण जिसने हर कठिन समय में उच्चतम त्याग कर, सहयोग प्रदान किया था, स्वर्ग व मोक्ष के भूखे क्षत्रिय कृतज्ञता को भूलकर कृतध्न बन गए|

बाल्मीकीय रामायण में लिखा है “गोहत्यारे,शराबी,चोर और वृत्त भंग करने वाले पुरुष के लिए सत्य पुरुषों ने प्रायश्चित का विधान किया है| किन्तु कृतध्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं है|”

उपकार का बदला नहीं चुकाया जा सकता| कठिन समय में मदद करने वाला उपकारी होता है| उसके प्रति कृतध्न का भाव बनाये रखना ही उसका प्रत्युतर हो सकता है, लेकिन हुआ इसके बिलकुल विपरीत| कृत्यज्ञता का भाव रखने के बजाय, शोषण प्रारंभ कर दिया गया| गरीब किसान व मजदुर के तन पर कपड़ा नहीं रहा| सेठों की दुकानें व मंदिरों के भवन स्वर्ण आभूषणों से भर गए| इस प्रकार जब यह देख लिया गया कि हम हमारी हित चिन्तक गरीब जनता से पूरी तरह बिछुड़ चुके है, तब उनके दिलों में प्रति घृणा व प्रतिशोध की भावना का बीजारोपण शैने: शैने: किया जाने लगा|

ऐसा नहीं था कि यह सब कुछ इतना चुचाप हुआ हो कि किसी को कानों कान खबर भी न लगी हो| यह सारा षड्यंत्र सरे आम चल रहा था| उधर क्षत्रिय समाज दिन प्रतिदिन पतन की और अग्रसर था| सारे कुकर्म करते हुए दान करने पर स्वर्ग व मोक्ष की गारंटी पण्डों ने उन्हें दे रखी थी| मदिरा और कामिनी में आसक्त हुए क्षत्रिय पूर्णरूप से मदहोश व अंधे हो चुके थे| समय-समय पर अनेक संतों ने उन्हें जगाने, समय गति को पहिचानने व कुमार्ग को छोड़ने का आग्रह किया था| किन्तु पाप से ग्रसित व्यक्ति कभी भी पुण्यात्मा की बातों पर ध्यान नहीं देता| क्षत्रिय समाज अपने कुमार्गों पर चलता रहा व समाज का शोषण जारी रहा|

अब विद्रोह का बिगुल खुल्लम-खुल्ला बजने लगा| वही पंडा-पूंजीपति गंठबंधन जिसने क्षत्रियों को कुमार्ग पर डालने का षड्यंत्र रचा था, इस विद्रोह का अग्रणी था| सभी प्रकार से शक्तिहीन हुए क्षत्रिय ऐसी परिस्थिति में क्या कर सकता था| जब उन्होंने अपने परम्परागत हित चिंतकों की और नजर डाली तो वे भूखी नंगी अवस्था में विरोधी खेमे में खड़े थे| व्यक्तिगत शक्ति का आभाव व समूह की शक्ति को खोकर शस्त्र डाल देने के अलावा, क्या उपलब्धि प्राप्त की जा सकती थी|

बिना संघर्ष किये सत्ता परिवर्तन संसार का एक अनोखा आश्चर्य भारतवर्ष में देखा गया| और यह उन लोगों ने कर दिखाया, जिनके पास इतनी समृद्ध विचार धारा व आराधना पद्धति थी, जिसका सारा संसार कभी लोहा मानता था|

ऐसा नहीं है कि पंडा-पूंजीपति गठबंधन के हाथों फंस कर गरीब जनता संतुष्ट हों| उसे कुछ राहत अवश्य मिली है, किन्तु वह शांति के बजाय एक अजीब बेचैनी का अनुभव कर रही है| बेचैनी का कारण अविश्वसनीयता है| गरीब, बुद्धिजीवी पर विश्वास करने का अभ्यस्त नहीं है| और ऐसे वर्ग पर विश्वास किया भी नहीं जा सकता| क्योंकि बुद्धि को नित्य प्रति नई वस्तु चाहिए| वह कभी भी किसी का परित्याग कर सकती है| ऐसी परिस्थिति में गरीब जनता को फिर से साथ लेना व उनके हृदय को जीतना कठिन कार्य नहीं है| किन्तु आज के कर्णधारों के लिए यह कार्य असंभव प्रतीत होता है|

जो कार्य वास्तव में कठिन नहीं है, उसके असम्भव दिखने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य निहित होना चाहिए| पाप व्यक्ति का छाया की तरह पीछाकरता है| गरीब वर्ग अपने प्रति किये हुए अन्याय को भूल जाने के लिए तैयार है| वह हमेशा अत्याचारों को भूल ही जाता है| उसका स्वाभाव है, किन्तु कर्णधारों को अपने पीछे पाप का भूत खड़ा नजर आ रहा है| वे अपने भूत से भयभीत हुए चिल्ला रहे है, यह असम्भव है वे षड्यंत्रकारी पंडा-पूंजीपति गठबंधन का चरण स्पर्श कर कल्याण की अभिलाषा रखते है, जो नितांत असंभव है|

इस व्याधि का एक मात्र इलाज यही हो सकता है कि परम्परागत साधनों व आराधना पद्धति का आश्रय लें| आत्मबल को विकसित किया जावे, जिसको देखते ही भय का भूत अपने आप पलायन कर जाएगा| तब गरीब जनता के साथ आनंद प्रेम मिलन संभव हो सकेगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Nov 17, 2011

हमारी भूलें : अपने आपको सीमित कर लेना

कोई व्यक्ति हो अथवा धार्मिक, सामाजिक या राजनैतिक संगठन, सबका यह रिवाज हो गया है कि वे सबसे पहले अपने आपको सीमाओं में बांधकर रखना चाहते है| उद्देश्य और विधान क्या है? यह स्वयं द्वारा निर्मित वे सीमा रेखाएँ है जिन्होंने हमको संकुचित व सीमित बना दिया है तथा इन सीमाओं में बंधकर हम नित्यप्रति और अधिक संकुचित व सीमित होते चले जा रहें है|

एक ही समाज में कार्यरत एक संगठन के लोग दूसरे संगठन द्वारा संचालित अच्छे कार्यक्रमों में भाग लेने से क्यों कतरातें है? क्योंकि उन्होंने स्वयं ही अपने चरों और सीमा रेखाएँ खीच ली है, जिनमे वे अपने आपको बंधा हुआ अनुभव करते है| जीन लोगों में बुद्धि द्वारा लोगों का उत्पीडन कर स्वार्थ साधन करने की क्षमता अधिक है, वे इन बंधनों को आस्था, विश्वास व श्रद्धा की संज्ञा देकर अपने पक्ष में लोगों की शक्ति का उपयोग करने में सफलता अर्जित कर लेते है| जो लोग इस प्रकार के उत्पीडन में सहायक सिद्ध होते है वे यह जानते हुए भी कि हम बुरे काम में सहायक रहे है कुछ कर पाने में अपने आपको असमर्थ अनुभव करते है, क्योंकि वे स्वयं द्वारा निर्मित जाल में खूद ही फंस गए है|

अत: यदि किसी समाज को उन्नत होना है तो उसे संस्थानों, विधानों, नियमों आदि से ऊपर उठकर केवल श्रेष्ठता उपार्जित करने वे श्रेष्ठ कार्यों में सहयोग करने के दृष्टिकोण से सोचना व समझना पड़ेगा| फिर चाहे ऐसे कार्य किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा चलाये जा रहें हो| व्यक्ति पहले बंधनों का निर्माण स्वयं के कल्याण की कल्पना करके करता है, लेकिन बाद में स्वयं उसमे बंधकर दूसरों के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह जाता है| सतत चिंतन और मनन द्वारा यदि व्यक्ति इस बात की खोज कर्ता रहे कि उसे क्या करना चाहिए तो कोई भी बंधन उसके विकास को रोक नहीं सकेगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता

Nov 16, 2011

हमारी भूलें : श्रेष्ठता स्थापित करने की चेष्टा

महाभारत काल व उसके बाद जब ब्राह्मणों ने नवीन ग्रंथों की रचना कर व पुराने ग्रंथों में मिश्रण कर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की चेष्टा की तो प्रतिक्रिया स्वरुप क्षत्रियों ने भी अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया| आध्यात्मवाद के नाम पर रचे गए इस घटिया खेल के परिणाम स्वरुप पहले अनेक धर्मों व बाद में अनेक संप्रदायों का जन्म हुआ | परिणामत: लोग धर्म के नाम पर इतने भ्रमित हो गए कि धर्म का मूल तत्व ही उनकी आँखों से ओझल हो गया| जातियां व वर्ण धर्म के प्रतीक बन गए|

जब पंडावाद की आलोचना की जाती है तो उसका तात्पर्य ब्राह्मणों की आलोचना से नहीं है, बल्कि उस समस्त वर्ग की आलोचना से है, जो धर्म के नाम पर धर्म की जड़ों पर कुठाराघात कर, अपने व्यक्तिगत या वर्ग गत हित साधन में लगा हुआ है|

इस देश में वर्णों की स्थापना वंश परम्परा के आधार पर कभी नहीं हुई, बल्कि वर्णों की स्थापना उनकी साधना पद्धति के आधार पर निर्मित थी| ब्राहमण उस वर्ग का नाम था जिनके पास मनोगत साधना व मनोनिग्रह की श्रेष्ठ साधना पद्धति थी| इसी प्रकार क्षत्रिय का वह वर्ग था, जिसके पास “हृदयगत साधना” या प्राण से संपर्क साधने की श्रेष्ठ साधना पद्धति थी|
लोग, कौन श्रेष्ठ है, इसको सिद्ध करने के लिए लड़ रहे है, क्यों कि वे नहीं जानते कि श्रेष्ठता का कोई माप-दंड नहीं हो सकता| जो पूर्ण है, बस केवल पूर्ण ही है| न वह इससे कम हो सकता है और न ही इससे अधिक| लेकिन जैसे जैसे ब्राहमण व क्षत्रियों का स्तर गिरता गया, वे पूर्णता को परित्याग कर अपूर्णता की गर्त में जा गिरे| उन्होंने अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की चेष्टाएं आरम्भ की और इन चेष्टाओं ने उन्हें ईर्ष्या, द्वेष, व अहंकार से पीड़ित कर और भी नीचे गिरा दिया| आज का ब्राह्मण और क्षत्रिय जो अपनी आराधना पद्धतियों को पूरी तरह से भूल चूका है, कृत्रिम मदिरा के नशे में मद मस्त गटर की नाली में पड़ा हुआ, मैं श्रेष्ठ हूँ, चिल्ला रहा है व् लोग इस पागलपन को देखकर हंस रहे है| क्योंकि वे जानते है कि न तो ये ब्राहमण या क्षत्रिय है और न ही श्रेष्ठ है|

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हमारी वास्तविक साधना व आराधना पद्धति को खोजकर उसके साधन से अपने आप में श्रेष्ठता अर्जित करें| आज विभिन्न धर्मों के लोग अपने धर्म ग्रंथों के आधार पर अपने धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने में लगे हुए है| क्या वे नहीं जानते कि आज सभी देशों व सभी धर्मावलंबियों के पास सभी धारों के धर्म ग्रन्थ उपलब्ध है| यही ग्रंथों में ही श्रेष्ठता होती तो आज सारा संसार ही श्रेष्ठ हो गया होता| श्रेष्ठता समाज का धर्म नहीं है| यह व्यक्ति का धर्म है| व्यक्ति ही श्रेष्ठता का उपार्जन कर सकता है| जिस समाज में श्रेष्ठ व्यक्ति है, वही समाज श्रेष्ठ समाज कहलाता है| अत: यदि कोई समाज बिना श्रेष्ठता का उपार्जन किये ग्रंथो या पुरखों के आधार पर अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की चेष्टा करता है, तो इसे उसकी निरी मूर्खता कहा जायेगा|

मैक्समुलर ने वेदों को छपवाया जो आज समस्त संसार में उपलब्ध है, लेकिन इससे संसार का कोई विकास तो नहीं हुआ और न ही जर्मनी के लोग जगद्गुरु कहलाने की क्षमता अर्जित कर सके|

संसार के लोग आज भी आध्यात्मिक क्षेत्र में मार्ग दर्शन के लिए भारत की और देखते है, जिसका कारण यहाँ के धर्म ग्रन्थ नहीं है बल्कि वे गिने चुने श्रेष्ठ पुरुष है जो गली कूचों में बैठे श्रेष्ठ ब्राहमण व क्षत्रिय आराधना पद्धतियों को जीवित रखे हुए है| उनको इस बात की कतई चिंता नहीं है कि कोई उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर रहा है या नहीं अथवा कोई उन्हें श्रेष्ठ स्वीकार करता है या नहीं क्योंकि श्रेष्ठता का कोई माप दंड नहीं हो सकता| श्रेष्ठता को केवल श्रेष्ठता ही पहचान सकती है|

आज लोग धर्म की रक्षा करने व धर्म ग्रंथों की रक्षा करने की बात कहकर अपनी दुकानदारियां चलाना चाहते अहि, लेकिन जो लोग धर्म के तत्व को जानते है, उनके मुख से एसी कोई बात कभी नहीं सुनी गयी| क्योंकि वे जानते है कि प्रत्येक तत्व व बीज की रक्षा का कार्य प्रकृति स्वयं करती है| जिसे व्यक्ति द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता| अत: यह कहना भी भ्रान्ति फैलाना है कि मार्ग दर्शन का अभाव हो गया है| जिसके पास आँखें है, वह उनका उपयोग कर स्वत: ही मार्ग को देख सकता है, मार्ग की खोज कर सकता है, लेकिन जिनमे खोज करने की चाह ही नहीं है, उनका कोई मार्ग दर्शन करना भी चाहे तो नहीं कर सकता|

इस प्रकार स्पष्ट है कि श्रेष्ठता स्थापित करने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही कोई उपयोगिता| आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम श्रेष्ठता का उपार्जन करें|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |


Nov 15, 2011

हमारी भूलें : हठवादिता

संसार का कोई भी व्यक्ति या समाज नहीं, कोई भी भौतिक पदार्थ या विचारधारा तक भी अगर यह हाथ धारण करले ले कि वह जैसे है, वैसे ही बने रहेंगे तो यह असंभव बात होगी| परिवर्तन व विकास सृष्टि के आवश्यक अंग है| संसार में कोई भी इस से बचकर नहीं रह सकता| इस सनातन सत्य की उपेक्षा कर हम हठवादी विचारधारा व हठवादी सामाजिकता पर कायम रहना चाहते है, जसका परिणाम विनाश के अलावा और कुछ नहीं हो सकता| क्योंकि जो स्वयं बदलने के लिए तैयार नहीं है, उसको प्रकृति स्वयं नष्ट कर देती है|

जिस प्रकार उद्यान में माली नित्य सफाई,कांट छांट करता है, उसी प्रकार सामाजिक कार्यकर्ताओं का दायित्व है कि वे समाज में जो भी अनावश्यक चीजें उत्पन्न हो गयी है, उनको समय-समय पर निकाल कर बाहर करते रहे है| अगर इस परम्परा का निर्वाह नहीं किया जाए तो उद्या भी जंगल में बदल जायेगा तथा विकसित समाज भी समय पाकर जंगली जातियों में बदल जायेगा|

मजबूत पकड़ तथा श्रद्धा किसी भी व्यक्ति व समाज के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, जिसका प्रयोजन है कि जिस वस्तु का परिक्षण किया जा रहा है, उसके सिद्धांत पर दृढ़ता पूर्वक विश्वास करके कार्य क्षेत्र में मजबूती के साथ आगे बढ़ना| नवीन कार्य के संपादन व नवीन उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए इन गुणों की आवश्यकता है| लेकिन आज लोग हठवादिता को, इन गुणों का बाना पहनाकर, आपकी दुष्प्रवृतियों व सामाजिक बुराइयों को नहीं छोड़ने के लिए सैद्धांतिक आधार तैयार कर लेते है|

नया विचार व्यक्ति के मष्तिक में तब ही प्रवेश कर सकता है, जब वह अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर किसी भी बात को पूर्ण रूचि के साथ सुनने को तैयार हो| अगर यह विचार उचित प्रतीत हो तो उसे इस विचार को अपने मस्तिष्क में स्थान देने के लिए जगह देनी होगी| अत: यह आवश्यक हो जायेगा कि मस्तिष्क में से उन अनावश्यक विचारों को बाहर निकाला जावे, जिनकी अब कोई आवश्यकता नहीं है| विचारधारा के विकास का यही क्रम है|

समाज में जो भी रीती-रिवाज प्रचलित है, उनमे से जब तक अनुपयोगी रीतिरिवाजों को छोड़ा नहीं जायेगा तब तक नए उपयोगी रिवाजों को ग्रहण करने के लिए जगह नहीं बन सकेगी| अत: सामाजिक कार्यकर्ता का यह परम दायित्व है कि वे केवल संगठन के बवंडर में ही नहीं फंसे रहे, बल्कि समाज में जो कुरीतियाँ व्याप्त हो गयी है, उनको खोजें तथा उनको मिटाने के लिए यत्नपूर्वक प्रयास करें| इस प्रकार खाली हुई जगह को नवीन विचारों, जो समयानुकूल व उपयोगी हो, उनसे भरने का प्रयास करे| ऐसा नहीं कर पाने के कारण ही, जब सामाजिक कार्यकर्ता व उनके स्वयं परिवारों को ही सामाजिक कुरुतियों से भरा हुआ देखते है तो उनके विचारों को ग्रहण करने के प्रति पर्याप्त रूचि उत्पन्न नहीं हो पाती|

आज आवश्यकता है कि व्यक्तिगत विकास अर्थात स्वयं का विकास व सुधार,समाज के निर्माण यां उसके विकास व सुधार के साथ साथ चलाया जावे| अगर दोनों क्रमों में से एक भी पिछड़ा तो वह विकास की और बढ़ने वाले को खा जाएगा| एक चत्रिवान व्यक्ति व ईमानदार व्यक्ति सामाजिक कुरुतियों से पीटकर समाज में अपमानित होने व मुर्ख कहलाने के लिए बाध्य कर दिया जायेगा| इसी प्रकार अगर सामाजिक संगठन उच्च आदर्शों की केवल बातें करते रहे व व्यक्तियों के चरिते-निर्माण विचारधारा के अनुकूल नहीं हुए, तो एक दिन घटिया लोग अपने ही नेताओं को खा जायेंगे, वे स्वयं तो निकम्में है ही| इसलिए सब कुछ बना बनाया ढांचा कुछ ही समय में नष्ट हो जायेगा|

यह सब तभी संभव है, जबकि व्यक्ति व समाज अपनी हठवादिता का परित्याग कर समय की आवश्यकता व अपनी आवश्यकताओं को समझे| प्रकाश की हर नई किरण को उत्सुकता के साथ देखें| उसे तुरंत ग्रहण करने के लिए प्रति क्षण तैयार रहें| जिस समाज में ऐसा हो सकता है, उसके विकास को कोई भी नहीं रोक सकता| इसी भाव को दूसरे शब्दों में उदारता कहते है, जो क्षत्रिय में सबसे अधिक आवश्यक है|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |



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Nov 14, 2011

हमारी भूलें : विस्तारवादी नीति

नीति व व्यक्तिगत चरित्र अथवा समाज चरित्र में बहुत भेद है| नीति का उपयोग हमेशा दूसरों के लिए किया जाता है| नीति के एक श्लोक का अर्थ है - " ब्राहमण के असंतुष्ट होने पर व क्षत्रिय के संतुष्ट होने पर उसका नाश हो जाता है|" इसका अर्थ हमने यह समझ लिया की क्षत्रिय में विस्तारवाद की प्रवृति हमेशा बनी रहनी चाहिए, जबकि उसका वास्तविक प्रयोजन यह है कि क्षत्रिय को कभी अपनी शक्ति व सामर्थ्य से कभी नहीं रहना चाहिए| भौतिक, मानसिक व अध्यात्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों को बढाने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए|

जिन्होंने बाल्मिकिय रामायण पढ़ी है, वे जानते है कि जब श्री राम लंका विजय कर वापस अयोध्या लौटे, उस समय जनक सहित तीन सौ राजा अपनी अपनी सेनाओं के साथ अयोध्या में लंका पर चढ़ाई कारनमे के लिए तैयार थे| कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय तीन सौ राज्य थे| अयोध्या के राजा राम के राज्य का क्षेत्रफल कितना रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है कि तीन सौ राज्यों के अलावा भी इस देश का बहुत बड़ा भाग उजाड़ पड़ा था, जिन प्रदेशों को विजयकर श्री राम ने अपने पुत्रों व भाइयों के पुत्रों को राज्य दिए| इन छोटे राज्यों में अगर देवासुर संग्राम में भाग लेने वाले राजा दशरथ, रावण, व मेघनाथ का वध करने वाले राम तथा महान तपस्वी विश्वामित्र व जनक हो सकते है तो फिर राज्यों के विस्तार की व विस्तारवादी निति की क्या आवश्यकता है, जिसके कारन विघटन व विनाश का बीजारोपण होता है? महाभारत के पश्चात् का हमारा इतिहास इस विस्तारवादी निति का ही इतिहास रहा है|

आज राज्य नहीं होने पर भी हमने इस प्रवृति का परित्याग नहीं किया है| एक संगठन दुसरे संगठन को तथा एक नेता दुसरे नेता को हड़प लेने के प्रयत्न में लगा रहता है| जिसके परिणाम स्वरूप समाज में प्रतिभाओं का विकास अवरुद्ध हो जाता है तथा सामाजिकता भी विकसित नहीं हो पाती है|

अगर हम गंभीरता से विचार करें तो संगठन को हड़पने व दुसरे नेतृत्व को गिराने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है| आज तक जिन संस्थाओं ने भी दूसरी संस्थाओं को हड़पा है, वे हड़पी गई संस्थाओं द्वारा संचालित कार्यक्रमों को कहीं भी सुचारू रूप से नहीं चला सकी| जबकि हडपते समय उन्होंने आरोप यह लगाया था कि इस संस्था के लोग कार्य करने में असमर्थ है तथा सच्चे व इमानदार नहीं है| अत: (हडपने वाले लोग) इस संस्था को सुचारू रूप से चलाएंगे| होता क्या है कि दुसरे के विकास को देखकर हम अपने आपको संशय में डाल लेते है कि कहीं यह संगठन हमको छोटा साबित नहीं करदे| इस आत्म लघुत्व की हीन भावना से ग्रसित होकर हम दुसरे संगठनों पर कब्ज़ा करने के लिए प्रेरित होते है क्योंकि हम नहीं जानते कि समाज इतना विशाल कार्यक्षेत्र है कि एक नहीं हजारों संगठन व लाखों कार्यकर्ता भी जीवन पर्यंत बिना एक दुसरे से टकराए कार्य करते रहें, तो भी कार्य का कभी अंत नहीं आएगा|

यही स्थिति नेताओं के टकराहट के सम्बन्ध में है| हमको अधिक दूर जाने की जरुरत नहीं है| निकट के भूतकाल के इतिहास को देखें, समाज में कितने नेतृत्व उभरे, उनको किन-किन ने गिराने की चेष्टा की और क्या गिराने कि चेष्टा करने वाला व्यक्ति एक भी ऐसे व्यक्ति को पैदा कर सका जिसमे समाज को नेतृत्व देने की क्षमता हो? एसा क्यों नहीं हुआ कारण स्पष्ट है एसा हो ही नहीं सकता| व्यक्ति यह समझता है कि मैं कार्यकर्ताओं को तैयार कर रहा हूँ और इनमे से नया नेतृत्व तैयार होगा| लेकिन हकीकत में वह कभी भी नेता तैयार करने का प्रयत्न ही नहीं करता| वह तो हमेशा ही अनुचरों का ही निर्माण चाहता है| जिस किसी कार्यकर्ता में भी नेतृत्व के गुण विकसित होते नजर आते है, वह उसे शत्रु प्रतीत होने लग जाता है, क्योंकि उसमे अपने प्रतिद्वंदी की शक्ल नजर आने लगती है|

वास्तविकता यह है कि नेताओं का निर्माण नेता नहीं कर सकता| जो लोग समाज के लिए नेतृत्व देने वाले लोगों का निर्माण करना चाहते, उन्हें सबसे पहले स्वयं को नेतृत्व से हटा लेना चाहिए ताकि कार्यकर्ता में उन्हें अपना प्रतिद्वंदी नजर नहीं आये| विश्वामित्र ने राज्य व शस्त्र का परित्याग करके ही समाज को श्रीराम जैसे नेता तथा इसी पद्धति का अनुसरण कर श्री कृष्ण ने अर्जुन जैसा नेता प्रदान किया था| इस परम्परा से पृथक होकर अगर आज हम समाज कल्याण की कल्पना करते है, तो यह वृथा सिद्ध होंगी|

विस्तारवादी प्रवृति व्यक्ति व समाज का सामाजिक विकास दोनों के लिए घटक है| इससे व्यक्ति का विकास व समाज का सामाजिक विकास दोनों ही अवरुद्ध होता है, अत: इसका परित्याग कर व्यक्ति को आत्मनिष्ठ होकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति स्वयं के विकास के लिए लगानी चाहिए, ताकि वह न तो दुसरे को अपने से अधिक शक्तिशाली होता हुआ देखेगा और न ही उसके सामने ईर्ष्या करने का अवसर उपस्थित होगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |




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Nov 13, 2011

हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता : अंतिम भाग

भाग-१भाग- २ से आगे............
अब हम मुख्य विषय पर आते है| एक ब्राह्मण अध्ययन के लिए दूर देश जा रहा था| मार्ग में एक प्रेत मिला व ब्राह्मण बालक को मारने का भय दिखाया| जब बालक ने यह कहा कि तू मेरी अभी ह्त्या मत कर, मैं शिक्षित होकर इसी मार्ग से लौटने का वचन देता उन,उस वक्त तूं मुझे मार देना| प्रेत ने इसे स्वीकार कर लिया| वर्षों बाद जवान ब्राह्मण जब उस मार्ग से वापस लौटा तो प्रेत उसे एक मकान में ले गया जहाँ मदिरा व मांस रखे थे तथा एक स्त्री व एक बालक था| प्रेत ने ब्राह्मण से कहा तू मदिरा पान, मांस भक्षण, स्त्री के साथ भोग या बालक की हत्या इन चारों में से एक भी कर्म कर लेगा तो मैं तुझे छोड़ दूंगा| यह कहकर प्रेत लुप्त हो गया| ब्राह्मण ने पर स्त्री गमन व बाल हत्या को महापाप समझा तथा मांस भक्षण में उसे हिंसा दिखाई दी अत: उसने सबसे कम दोषयुक्त दिखाई देने वाली शराब का सेवन कर लिया| शराब के सेवन से जाग्रत होने वाली भूख को तृप्त करने के लिए उसने मांस भक्षण किया व काम से पीड़ित होकर स्त्री के पास पहुंचा तो उसने कहा कि पहले बालक की हत्या कर ताकि हमें देखने वाला कोई नहीं रहे| युवक ने बालक की हत्या कर पर स्त्री गमन भी कर लिया| इस प्रकार जिस शुद्ध ब्राहम्ण बालक व शुद्ध ब्राह्मण युवक का प्रेत कुछ नहीं बिगाड़ सका था, उसके दोष युक्त होने पर प्रेत ने उसकी हत्या कर दी|

यह कथा चाहे सत्य हो अथवा प्रतीकात्मक- हमारे लिए यह समझने के लिए पर्याप्त है कि स्थूल जगत में हम निवास कर रहे है से पृथक एक प्राण सृष्टि भी है| जिसमे ऐसे प्राण निवास करते है जो या तो जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर पूर्णरूप से भगवत लीं होने के लिए तपस्या कर रहे है जैसे संत, भोमिया जुझार आदि| दुसरे वे प्राण है जो अकाल मृत्यु को प्राप्त होने के कारण दूसरा जन्म प्राप्त होने तक सूक्षम शरीर सूक्षम जगत में विचरण कर रहे है व भोगों की अभिलाषा से मुक्त होने के कारण जिन लोगों के प्राण मन, बुद्धि, व अहंकार से दबे हुए क्रियाहीन हो रहे है, उनके शरीर में प्रवेश कर भोग भोग रहे है|

आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने वाले प्राणगत साधना के साधक, जो प्राण के माध्यम से ही अपना मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहता है, के ऊपर ऐसे दुष्ट प्राण जिन्हें हम प्रेत आदि की संज्ञा देते है, जाने अनजाने में शरीर में प्रवेश कर साधक के प्राण को आघात पहुंचाने की नियत से उसे दुष्ट कर्मों को करने के लिए प्रेरित करते है| लेकिन अगर साधक का आहार व्यवहार पवित्र है तो ये दुष्ट प्राण उस पर किसी प्रकार का आघात नहीं कर सकते|

जो श्रेष्ठ "प्राण" सूक्षम जगत में तपस्या में लीन है उनकी भी एक विशिष्ठ भूमिका है| जो सात्विक लोग साधना पथ पर अग्रसर हो रहे है उनका वे मार्ग दर्शन करते है व दुष्ट शक्तियों के आघात से उन्हें बचाते है|

अत:यदि हम आहार व्यवहार में पवित्रता नहीं रख पाते तो एक तरफ हम अपने आपको दुष्ट शक्तियों द्वारा आघात करने के लिए खुला छोड़ देते है, दूसरी और श्रेष्ठ लोगों के मार्ग दर्शन व सहयोग से वंचित होह जाते है क्योंकि श्रेष्ठ शक्तियां पवित्र पात्र पर ही अवतरित होती है |

अध्ययन के प्रति रूचि के अभाव से हमको आज इस बात का बोध नहीं रहा कि प्राचीन काल में मदिरा-मांस का भक्षण श्रेष्ठ लोगों के लिए वर्जित था| बहुत से पंडावादी ग्रंथों में तांत्रिक क्रियाओं के लिए बलिदान आदि की प्रथा बताकर मांस मदिरा के प्रयोग को उचित ठहराने की चेष्टा की गयी है| लेकिन हमें बाल्मिकीय रामायण व महाभारत के समान, अन्य ग्रंथों को स्वीकार नहीं करना चाहिए| यधपि महाभारत के अंतिम भाग अनुशासन पर्व को प्रमाणित कहना कठिन है, फिर भी शेष महाभारत ग्रन्थ एक अद्भुत रचना है, जिसका लाभ सबको उठाना चाहिए| यह दुर्भाग्य कि बात है कि आज हमारे घरों में महाभारत व बाल्मिक रामायण जैसे ग्रन्थ नहीं है| पंडों ने यह प्रचारित कर दिया कि महाभारत ग्रन्थ जो कोई पढ़ेगा, व जिसके घर में यह ग्रन्थ रहेगा उस घर में कलह होगा| यह साड़ी बातें उस बुद्धिजीवी षड्यंत्र का अंग है, जो हमको हमारी परम्पराओं से अलग कर देना चाहते है| जिन्होंने महाभारत ग्रन्थ पढ़ा है, वे शुक्राचार्य के इन वचनों को कभी नहीं भूल सकते-

" जो मंद बुद्धि अपनी ना समझी के कारण मदिरा पीता है, धर्म उसी क्षण उसका साथ छोड़ देता है, वह सभी की निंदा व अवज्ञा का पात्र बन जाता है| यह मेरा निश्चित मत है| लोग आज से इस बात को शास्त्र मान लें और उसी पर चलें|"

इसी प्रकार बाल्मिकिय रामायण में अनेक स्थलों पर मधु मांस भक्षण का निषेध किया है| इन सब तथ्यों की अवहेलना कर आज हमने अपने आहार व व्यवहार को इतना अशुद्ध बना लिया है जिससे हमारे विकास की समस्त संभावनाएं क्षीण हो गयी है|

अत: यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यदि हम अपने आपका व समाज का कल्याण चाहते है तो कुछ सौ वर्षों से आरम्भ हुई आहार व्यवहार की अपवित्रता को हमें समाप्त करना पड़ेगा तथा शुद्ध व सात्विक आहार व्यवहार को अपनाना पड़ेगा| अन्यथा जिन लोगों के मन व बुद्धि पर स्वयं अधिकार नहीं हो उन लोगों से समाज कल्याण की अभिलाषा कौन संजोयेगा तथा अगर कोई ऐसी अभिलाषा रखता है तो वह दुराशा ही सिद्ध होगी|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | |

Nov 12, 2011

हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता - 2

आहार व्यवहार की अपवित्रता भाग - १ से आगे..............

व्यवहार में पवित्रतता लाने के लिए आहार की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है| कहा गया है कि – “ जैसा अन्न वैसा मन”| जिस प्रकार का हम आहार करते है उसी प्रकार का मन बनने का आशय है कि यदि हमारा आहार तामस है तो मन उससे प्रभावित होकर अहंकार के पक्ष में निर्णय करेगा व यदि आहार सात्विक है तो मन सदा बुद्धि के अनुकूल रहकर हमको तर्क संगत विकासशील मार्ग अग्रसर करता रहेगा|

आज मदिरा व मांस जैसे तामसिक आहार का समाज में आम प्रचलन ही नहीं हुआ ,बल्कि हम इस प्रकार के आहार को अपनी परम्परा का एक अंग समझने लगे है| क्योकि हम नहीं जानते कि हमको पथ भ्रष्ट व शक्तिहीन बनाने क लिए मुगलकाल में षड्यंत्र रचा गया| देवताओ क मंदिरों में बली देकर मांस भक्षण को नैमितिक कर्म बताकर कहा गया की देवी के प्रसाद के रूप में मांस मदिरा का भक्षण करने से पाप नहीं लगेगा|

हमने कभी इस विषय पर विचार करने की चेष्टा नहीं की कि देवियों के मंदिर में बलिदान कि परम्परा कब व क्यों आरम्भ हुई? एक हज़ार वर्ष से अधिक प्राचीन एक देवी का मंदिर ऐसा नहीं मिलेगा जहाँ पर पशुओ कि बली दी जाती हो या मूर्ति पर मदिरा चढाई जाती हो| कच्छवाहों की कुल देवी जमवारामगढ़ की "जमवाय माता",जम्मू की वैष्णव देवी,संभार की शाकम्भरी देवी के मन्दिर इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण है लेकिन जिव्हा के स्वाद के चक्कर में फंसे लोग यदि वास्तविकता की उपेक्षा कर हठधर्मी पर आमादा रहें तो फिर उन्हें स्वयं अपने आप के व समाज के उत्थान की कल्पना नहीं करनी चाहिए|

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यदि आहार क संबंद में विचार किया जावे तो हम पायेंगे की मांसाहारी पशुओ के नाख़ून नुकीले तथा बगल के दांत लम्बे व दाढो के बीच में जगह पाई जाती है|उनकी आंते अन्य पशुओ से चौड़ी होती है व आहार किये हुए भोजन की उल्टी कर उसे दुबारा खाने की उनकी आदत होती है|इन सब प्राक्रतिक लक्षणों से मनुष्य युक्त नहीं है फिर भी वह केवल स्वाद का परित्याग नहीं सकते के कारण अपने स्वास्थे के लिए हानिकारक इस आहार को ग्रहण करता है
मांस मदिरा भक्षण के विरोधी तीसरे प्रबल तथ्य पर आने से पूर्व इसके पक्ष में कहे गए एक वचन पर विचार कर लेना आवश्यक होगा |

एक पंडितो की सभा में चेतन्य महाप्रभु की उनकी आहार की अशुद्धता के लिए निंदा की जा रही थी |महाप्रभु जिन्हें उनमे से कोई पहचानता नहीं था ,एक कोने में बेठे यह सब सुन रहे थे |जैसे ही भाषण समाप्त हुए,उन्होंने खड़े होकर एक प्रश्न किया कि कबूतर जो चुगा व अन्न का सात्विक आहार करता है,हमेशा काम वासना से पीड़ित रहता है ,लेकिन शेर जो मांसहारी है एक वर्ष में केवल एक बार सम्भोग करता है |फिर आहार की पवित्रता का क्या महत्व है?पंडित इसका तर्कसंगत उत्तर नहीं दे सके |लेकिन हमे ये नहीं भूलना चाहिये की चेतन्य महाप्रभु इतने उच्च कोटि के संत थे की वे साधना पथ पर आने वाली कठिनाइयों की स्थिति को भली प्रकार समझने तथा नियंत्रित करने में सक्षम थे|ऐसे महान लोगो तथा जो लोग आध्यात्मिक विकास के लिए उत्सुक थे,उनके लिए आहार की शुद्धता अर्थहीन है|इसके अलावा हमे ये भी नहीं भूलना चाहिए है की प्रत्येक प्राणी में अपने विशिष्ट गुण होते है |किसी भी प्रकार की सांसारिक परिस्थियाँ उन गुणों को नष्ट नहीं कर सकती|

क्रमश:..........


लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |


Nov 10, 2011

हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता - 1

आज संसार का वातावरण इतना दूषित हो चूका है कि मानव के नैतिक मूल्यों की समाज के सामने कोई कीमत नहीं रही| इस वातावरण का हमारे समाज पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा है तथा सत्य,निष्ठां व उदारता जैसे आवश्यक व्यक्तिगत गुणों को खोकर हमने हमारे निर्माण के आधार को खंडित व क्षय विक्षत कर दिया है|
पाखण्ड व फरेब को आज दुनिया में सफलता के लिए आवश्यक उपकरण समझा जाने लगा है जिसके परिणाम स्वरूप वचन की गरिमा व परस्पर विशवास की भावना का लोप होता जा रहा है| लोग नहीं जानते कि घटिया माल बाजार में अच्छे माल के अभाव की स्थिति में ही खपता है| पाखण्ड व फरेब का अस्तित्व तब तक है जब तक लोग सत्य निष्ठा की और उन्मुख नही होते|

घर्म की जड़ सत्य है,जो उदारता के जल से सिंचित होने पर बढ़ता है| आज लोग वचन की गरिमा को खोकर तथा पाखण्ड व फरेब का आश्रय लेकर मात्र धर्म के पालन की बात करते है,तो इसे विडंबना ही कहा जाएगा|

अकारण,बिना किसी हेतु के झूंठ बोलना व प्रत्येक कार्य में अपने हित की बात ढूँदना आज लोगों की सामान्य आदत हो गई है| यही सामजिक संगठनों में विग्रह व विवाद का मुख्या कारण है|लोगों ने आज परस्पर विश्वास को खो दिया है क्योंकि हमारे वचनों ने अपनी विश्वशनीयता खो दी है| राजनैतिक ही नहीं सामाजिक संघठन भी आज हमारे लिए लोक कल्याण या समाज कल्याण के हेतु नहीं रहे क्योंकि उदारता को खोकर हमने स्वार्थपरता का पाठ सीख लिया है जिसके परिणाम स्वरुप संगठनों के माध्यम से भी हम उदारता खोकर स्वार्थ सिद्धि या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने में लग जाते है| जब तक समाज के लिए कार्य करने वाले कार्यकर्त्ता,पहले स्वयं अपने व्यवहार को सत्यनिष्ठ व उदार नहीं बनायेंगे तब तक समाज के अन्य लोगों को इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित नहीं क्या जा सकता| व्यवहार की पवित्रता को खोकर कोई भी व्यक्ति समाज और अपने कल्याण की कल्पना नहीं कर सकता| यदि इस मार्ग की उपेक्षा कर कोई थोड़े समय तक लोकप्रियता अर्जित भी करले तो उससे साधक का पथ भ्रष्ट नहीं होना चाहिए क्योंकि कुछ समय बाद ऐसे लोगों को समाज उस समय स्वत: ही ठुकरा देगा, जब वास्तविकता प्रगट हो जायेगी|

व्यवहार में पवित्रतता लाने के लिए आहार की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है| कहा गया है कि – “ जैसा अन्न वैसा मन”| जिस प्रकार का हम आहार करते है उसी प्रकार का मन बनने का आशय है कि यदि हमारा आहार तामस है तो मन उससे प्रभावित होकर अहंकार के पक्ष में निर्णय करेगा व यदि आहार सात्विक है तो मन सदा बुद्धि के अनुकूल रहकर हमको तर्क संगत विकासशील मार्ग अग्रसर करता रहेगा|

क्रमश:...................


लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Nov 2, 2011

सवाई जय सिंह जी की ३२४ वी जयंती : करणी सेना मनाएगी गौरव दिवस

महाराजा सवाई जय सिंह जी की ३२४ वी जयंती
श्री राजपूत करणी सेना करेगी श्रधासुमन अर्पित

जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह जी की ३२४ वी जयंती को श्री राजपूत करणी सेना गौरव दिवस मनाने जा रही है ! सेना के जयपुर जिला अध्यक्ष नारायण सिंह दिवराला ने बताया की कल दिनांक ३ नवम्बर को झोटवाडा स्थित जिला कार्यालय मे प्रात ९ बजे श्र्धासुमन अर्पित करेंगे ! दिवराला ने बताया की विश्व प्रसिद्ध शहर गुलाबी नगर की स्थापित्य कला व इसकी बसावट मे सवाई जय सिंह जी का बहुत बड़ा योगदान है , उनकी दूरदर्शिता ने ही जयपुर को एक अलग पहचान दिलाई ! जयपुर वासियों को उन पर गर्व है इसी लिए उनकी जयंती को करणी सेना गौरव दिवस के रूप मे मनाने जा रही है ! समारोह मे सेना के प्रदेश संयोजक श्याम प्रताप सिंह इटावा , प्रदेश उपाध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना सहित सेना के जिला पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे !
दिवराला ने बताया की साय ७ बजे स्टेचू सर्किल पर करणी सेना की ओर से घी के दीपक जलाये जायेंगे !

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Shyam Prarap Singh Etawa
Pradesh Sanyojak
Shri Rajput Karni Sena
9887380511