Jul 29, 2008

समर चढै़ काठां चढै़, रहै पीव रै साथ

समर चढै़ काठां चढै़, रहै पीव रै साथ।
एक गुणा नर सूरमा, तिगुण गुणा तमय जात॥

चन्द ऊजाळै एक पक, बीजै पख अंधिकार।
बळ दुंहु पाख उजाळिया, चन्द्रमुखी बळिहार॥

खाटी कुळ रो खोयणां, नेपै घर घर नींद।
रसा कंवारी रावतां, वीर तिको ही वींद॥

ऊंघ न आवै त्रण जणां, कामण कहीं किणांह।
उकडू थटां बहुरिणां, बैर खटक्के ज्यांह॥

एक्कर वन वसंतड़ा, एकर अंतर काय।
सिंघ कवड्डी ना लहै, गँवर लक्ख विकाय॥

संकलित काव्य Rajul Shekhawat

~*~ जय चितोड़ ~*~

Rajul shekhawat
मांणक सूं मूंगी घणी जुडै़ न हीरां जोड़।
पन्नौं न पावै पांतने रज थारी चित्तौड़॥
आवै न सोनौं ऒळ म्हं हुवे न चांदी होड़।
रगत धाप मूंघी रही माटी गढ़ चित्तोड़॥
दान जगन तप तेज हूं बाजिया तीर्थ बहोड़।
तूं तीरथ तेगां तणौ बलिदानी चित्तोड़॥
बड़तां पाड़ळ पोळ में मम् झुकियौ माथोह।
चित्रांगद रा चित्रगढ़ नम् नम् करुं नमोह॥
जठै झड़या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।
कमधज कट बणिया कमंध गढ थारै चित्तोड़॥
गढला भारत देस रा जुडै़ न थारी जोड़।
इक चित्तोड़ थां उपरां गढळा वारुं क्रोड़॥

संकलित काव्य

Jul 26, 2008

~*~ राजपूतों से अर्ज करूँ ~*~

Rajul Shekhawat


तन-मन से है नारा मेरा , बोलो जय भवानी |

धिक्कार है उन राजपूतों को ,खोदी जिन्होंने अपनी जवानी ||

तन-मन से है नारा मेरा , बोलो जय भवानी |

कायर नही आज हम , दुनिया को यह आज बतानी ||

हम जन रक्षक रहे सदा से , क्षात्र धर्म का यह नारा है |

दुष्टों को हम मार भगाए , यही फर्ज हमारा है ||

कठिनाइयों के बीहड़ पथो में , हमने जीवन गुजारा है |

जन हित की रक्षा खातिर , दुश्मन को ललकारा है ||

त्याग बलिदान के पुंज हम है , सबको यह बात बतानी |

तन मन से है नारा मेरा , बोलो जय माँ भवानी ||

|| जय माँ भवानी ||





Jul 25, 2008

महाराणा प्रताप के बारे में एक भ्रांती

Bhupendra Singh Chundawat

राजपूताने में यह जनश्रुति है कि एक दिन बादशाह ने बीकानेर के राजा रायमसिंह के छोटे भाई पृथ्वीराज से, जो एक अच्छा कवि था, कहा कि राणा प्रताप अब हमें बादशाह कहने लग गए है और हमारी अधीनता स्वीकार करने पर उतारू हो गए हैं। इसी पर उसने निवेदन किया कि यह खबर झूठी है। बादशाह ने कहा कि तुम सही खबर मंगलवाकर बताओ। तब पृथ्वीराज ने नीचे लिखे हुए दो दोहे बनाकर महाराणा प्रताप के पास भेजे-
पातल जो पतसाह, बोलै मुख हूंतां बयण।
हिमर पछम दिस मांह, ऊगे राव उत॥
पटकूं मूंछां पाण, के पटकूं निज जन करद।
दीजे लिख दीवाण, इण दो महली बात इक॥
आशय : महाराणा प्रतापसिंह यदि अकबर को अपने मुख से बादशाह कहें तो कश्यप का पुत्र (सूर्य) पश्चिम में उग जावे अर्थात जैसे सूर्य का पश्चिम में उदय होना सर्वथा असंभव है वैसे ही आप के मुख से बादशाह शब्द का निकलना भी असंभव है। हे दीवाण (महाराणा) मैं अपनी मूंछों पर ताव दूं अथवा अपनी तलवार का अपने ही शरीर पर प्रहार करूं, इन दो में से एक बात लिख दीजिये।
इन दोहों का उत्तर महाराणा ने इस प्रकार दिया-
तुरक कहासी मुख पतौ, इण तन सूं इकलिंग।
ऊगै जांही ऊगसी, प्राची बीच पतंग॥
खुसी हूंत पीथल कमध, पटको मूंछा पाण।
पछटण है जेतै पतौ, कलमाँ तिस केवाण॥
सांग मूंड सहसी सको, समजस जहर स्वाद।
भड़ पीथल जीतो भलां, बैण तुरब सूं बाद॥
आशय : भगवान एकलिंगजी इस शरीर से तो बादशाह को तुर्क ही कहलावेंगे और सूर्य का उदय जहां होता है वहां ही पूर्व दिशा में होता रहेगा। हे वीर राठौड़ पृथ्वीराज जब तक प्रतापसिंह की तलवार यवनों के सिर पर है तब तक आप अपनी मूछों पर खुशी से ताव देते रहिये। राणा सिर पर सांग का प्रहार सहेगा, क्योंकि अपने बराबरवाले का यश जहर के समान कटु होता है। हे वीर पृथ्वीराज तुर्क के साथ के वचनरूपी
विवाद में आप भलीभांति विजयी हों।
यह उत्तर पाकर पृथ्वीराज बहुत ही प्रसन्न हुआ और महाराणा की प्रशंसा में उसका उत्साह बढ़ाने के लिये उसने नीचे लिखा हुआ गीत लिख भेजा-
नर जेथ निमाणा निलजी नारी,
अकबर गाहक बट अबट॥
चौहटे तिण जायर चीतोड़ो,
बेचै किम रजपूत बट॥
रोजायतां तणें नवरोजे,
जेथ मसाणा जणो जाण॥
हींदू नाथ दिलीचे हाटे,
पतो न खरचै खत्रीपण॥
परपंच लाज दीठ नह व्यापण,
खोटो लाभ अलाभ खरो॥
रज बेचबा न आवै राणो,
हाटे मीर हमीर हरो॥
पेखे आपतणा पुरसोतम,
रह अणियाल तणैं बळ राण॥
खत्र बेचिया अनेक खत्रियां,
खत्रवट थिर राखी खुम्माण॥
जासी हाट बात रहसी जग,
अकबर ठग जासी एकार॥
है राख्यो खत्री धरम राणै,
सारा ले बरतो संसार॥
आशय : जहां पर मानहीन पुरूष और निर्लज स्त्रियां है और जैसा चाहिये वैसा ग्राहक अकबर है, उस बाजार में जाकर चित्तौड़ का स्वामी रजपूती को कैसे बचेगा। मुसलमानों के नौरोज में प्रत्येक व्यक्ति लूट गया, परन्तु हिन्दुओं का पति प्रतापसिंह दिल्ली के उस बाजार में अपने क्षत्रियपन को नहीं बेचता। हम्मीर का वंशधर अकबर की लाानक दृष्टि को अपने ऊपर नहीं पड़ने देता और पराधीनता के सुख के लाभ
को बुरा तथा अलाभ को अच्छा समझकर बादशाही दुकान पर राजपूती बेचने के लिए कदापि नहीं आता। अपने पुरुखाओं के उत्तमर् कत्तव्य देखते हुए आप ने भाले के बल से क्षत्रिय धर्म को अचल रक्खा, जबकि अन्य क्षत्रियों ने अपने क्षत्रियत्व को बेच डाला। अकबररूपी ठग भी एक दिन इस संसार से चला जाएगा और उसकी यह हाट भी उठ जाएगी, परन्तु संसार में यह बात अमर रह जायेगी कि क्षत्रियों के धर्म में रहकर
उस धर्म को केवल राणा प्रतापसिंह ने ही निभाया। अब पृथ्वी भर में सबको उचित है कि उस क्षत्रियत्व को अपने बर्ताव में लावें अर्थात राणा प्रतापसिंह की भांति आपत्ति भोग कर भी पुरुषार्थ से धर्म की रक्षा करें।

Jul 21, 2008

ज्रयपुर के मेजर भानुप्रतापसिंह शहीद

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
जम्मू.एलोसी के समीप आतंकवादियों से मुठभेड़ में आर्मी का एक मेजर और जम्मू-कश्मीर पुलिस का एक सिपाही शहीद हो गए हैं। वहीं, तीन अन्य सिपाही गंभीर रूप से घायल हुए हैं। मेजर का नाम भानू प्रताप था और वह श्याम नगर, जयपुर का रहने वाला था। मेजर भानू प्रताप इन दिनों 43 आरआर में डेपुटेशन पर थे। शहादत पाने वाले जम्मू-कश्मीर पुलिस के सिपाही का नाम संजीव कुमार था।
मिली जानकारी के मुताबिक राजौरी जिले के थानामंडी क्षेत्र में शहादरा शरीफ के समीप आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी। इस पर 43 आरआर और जेएंडके पुलिस के जवानों ने शनिवार रात को इस क्षेत्र को घेर लिया। वहां जंगल में एक पुराने मकान में आतंकवादी छुपे हुए थे।जैसे ही जवानों ने मकान का दरवाजा तोड़ा, भीतर से आतंकवादियों ने जबरदस्त फायरिंग शुरू कर दी। मेजर भानू प्रताप और संजीव कुमार की मौके पर ही मौत हो गई। अभी बाकी जवान कुछ सोच पाते इससे पहले ही आतंकवादियों ने मकान के भीतर से एक ग्रेनेड फैंक दिया जिससे अफरतफरी मच गई। इस बीच आतंकवादी वहां से फरार हो गए। इस हमले में तीन जवान जावेद जाफर, ज्ञान प्रकाश और रविंद्र सिंह भी गंभीर रूप से घायल हो गए। हालांकि सुरक्षा बलों ने रात को ही इस पूरे क्षेत्र को घेर कर तलाशी अभियान शुरू कर दिया था लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

Jul 20, 2008

प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
मेवाड वीर सपूत महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 154॰ को हुआ। उस समय ज्येष्ठ शुक्ला तीज संवत् 1597 का समय मुगलों का आंतक व अत्याचारों का युग चल रहा था। चारों तरफ मेवाड में मानवता रो रही थी। लोग अपने-अपने धर्म व कर्म से हताश हो गए थे, चारों ओर घोर अंधकार और निराशा के बादल छा चुके थे। बडे-बडे शक्तिशाली राजा-महाराजाओं तक ने उस समय के मुगल शासकों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। जन-जन को निराशा हो चुकी थी मूक रूप से जन-जन अपने जीवन रक्षक से रक्षा की आशाएंे संजोये बैठे हुए देख रहे थे। ऐसे विकट दासता के समय में जन-जन में चेतना जाग्रत करने व वीरता की भावना भरने तथा मेवाड भूमि की रक्षा करने के लिए परमात्मा ने इस वीरभूमि एक देशभक्त सपूत दिया जिसका नाम था। महाराणा प्रताप मेवाड भूमि का कौन जन तानता था कि आगे चलकर यही वीर सपूत प्रताप मेवाड की स्वतंत्रता का अग्रदूत बनकर मेवाड की रक्षा व मान-सम्मान बनाये रखने के लिये जंगलों की राहों में घुमता फिरेगा। इसके जन्म पर ऐसा प्रतीत हुआ मानों सृष्टि सरोवर में मानवता का शतदल खिल उठा हो, मानो पीडित, उपेक्षित, दासता वद्व जन-जन की निराशा आशा का सम्बल पा गई हो। पहली सन्तान होने के कारण उदयसिंह ने उसके बडे लाड प्यार से पाल पोषकर बडा किया तथा माता-पिता द्वारा इसको वीरता की शिक्षा मिली। बचपन में ही इसको अस्त्रों-शस्त्रों से खेलने तथा शिकार करने का बडा शौक था। इन पर मेवाड की जनता अपना बलिदान दकने तथा सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर थी अपने पिता की मृत्यु के बाद मेवाड राज्य का उत्तराधिकारी होकर इन्होंने राजसिंहासन सुशोभित किया। इस समय दिल्ली में सम्राट अकबर राज्य कर रहा था। वह सभी राजा महाराजाओं के राज्यों को अपने अधीन करके पूरे भारत पर मुगल साम्राज्य का ध्वज फहराना चाहता था। परन्तु इस देशभक्त वीर ने मेवाड भूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अपने को तथा अपने पूरे परिवार को जंगल में भटकते रहने को मजबूर कर संकट झोलकर भी अकबर की अधीनता सम्बन्धी बातों को कभी स्वीकार नहीं किया और समय-समय पर मुगल सेना व मुगलशासकों से लोहा लेते रहे। मुगलों को लोहे के चने चबवाते रहे। परन्तु मेवाड भूमि के एक भी कण को गुलामी की जंजीरों में जकडने नहीं दिया। इन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड आजाद नहीं होगा, तब तक महलो को छोडकर जंगलों में निवास करूंगा। सोने के पलंग को छोडकर तृण शैया पर शयन करूंगा। स्वादिष्ट भोजन को त्यागकर जंगली कन्द मूलों का आहार ग्रहण करूंगा। चांदी के बरतनों को छोडकर वृक्षों की पत्तियों से बनी पत्तलों में भोजन करूंगा। परन्तु जीते जी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं करूंगा और अपने प्रण की प्रतिज्ञा का पालन करता रहूंगा। अकबर तथा महाराणा प्रताप के बीच 1576 में हल्दीघाटी नामक स्थान पर युद्ध हुआ वह अविस्मरणीय है। इस युद्ध में प्रताप ने अपनी वीरता से शत्रु सेना के दांत खट्टे कर दिए तथा अपनी वीरता का अपूर्व व अनोखा परिचय दिया। सैकडों मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। परन्तु भाग्य की विडम्बना इस युद्ध का कोई परिणाम न निकल सका। उसके कारण इनके मन में
निराश की भावना जाग्रत हो गई और धन के अभाव के कारण चिंतित होने लगे। ऐसे समय में भामाशाह ने अपना धन देकर इनको सहायता देकर अपना नाम भामाशाह दानी बनाया। इस तरह महाराणा प्रताप अपने सम्पूर्ण जीवन को संघर्ष में बिताकर मुसीबतों का सामना करके संकटों को झेलते रहे, लेकिन अन्याय के पथ पर कभी आगे नहीं बढे। जिस तरह महाराणा प्रताप ने अपने देश की आन-बान-मान आदि की रक्षा के लिए अपने पूरे जीवन को बलिदान कर दिया, उसी तरह हम भी अपने देश की रक्षा तथा सुरक्षा के लिये बलिदान व त्याग की भावना अपनावे।

Jul 19, 2008

शौर्य शक्र विजेता शहीद सुबेदार गुमान सिंह बैजूपाडा की मूर्ति का अनावरण

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
शहीद सुबेदार गुमान सिंह बैजूपाडा की प्रतिमा का अनावरण बुधवार दौसा में आबकारी एवं पर्यटन मंत्री श्री देवी सिंह भाटी ने किया गया। प्रतिमा अनावरण के बाद उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुये श्री भाटी ने कहा कि शहीद गुमान सिंह ने शाहदत देकर न केवल अपने गाᆳव बैजूपाडा का बल्कि पूरे प्रदेश और राष्टᆭ का सिर गौरव से マᆳचा कर दिया। उन्होंने राजस्थान के वीर सपूतों की हजारों साल पुरानी परम्परा को शहीद गुमान सिंह ने निभाया है, जिसके लिए समाज व देश चिरकाल तक उन्हें याद रखेगा। आबकारी एवं पर्यटन मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार वीर शहीदों के सम्मान में कोई कसर नहीं छोडे+गी तथा शहीदों के परिवार को नियमानुसार सहायता प्रदान की जा रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश के विकास के लिए संकल्पबद्ध है। देश के पढे - लिखे बच्चों को पढाई के लायक काम नहीं मिलने पर कई बार वे असामाजिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते है। जिसे रोकने के लिए राज्य सरकार बेरोजगार युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर जुटाने के लिए प्रयासरत है। श्री भाटी ने कहा कि राज्य सरकार ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए हर सभंव कोशिश कर रही है। समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष श्रीमती सरोज कॅवर ने कहा कि यह वीर धरती महान है, जिसने शहीद गुमान सिंह जैसे बहादुरों को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि शहीदों की माᆳ बहुत भाग्यशाली होती है। मातृभूमि की रक्षा के लिए जान न्यौछावर करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। पर्यटन मंत्राी ने शहीद गुमान सिंह की माᆳ तथा पत्नी को शॉल भेंट कर उनका सम्मान किया।
उल्लेखनीय है कि २ जुलाई २००५ को जम्मू कश्मीर राज्य के राजोरी सैक्टर में थाना मण्डी इलाकें में आतंकवादियों से मुठभेड में मातश् भूमि की रक्षा के पुनीत कार्य में शहीद हो गये थे। बीसवीं राष्टᆭीय राइफल्स बेल्ट नम्बर ४३ धारक श्री गुमान सिंह को २१ मार्च २००७ मरणों परान्त राष्टपति द्वारा शौर्य चव् प्रदान किया गया जिसे इनकी धर्मपत्नी श्रीमती रमादेवी ने ग्रहण किया था।

Jul 15, 2008

शहीद मेहताबसिंह की राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
ऱ्णबाकुंरों की धरती सीकर का एक और लाल देश के लिए शहीद हो गया। शहीद मेहताबसिंह की 10 जुलाई को जम्‍मूत्रकश्‍मीर के जनरल एरिया में शहीद हो गए थे। वे 13 राजरिफ के 44 वर्षीय शहीद सूबेदार मेहताब सिंह की रविवार को उनके पैतृक गांव बृजपुरा में राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि की गई। रविवार सुबह शव पहुंचा तो बृजपुरा सहित निकटवर्ती गांवों में शोक की लहर दौड़ गई। जब तक सूरज चांद रहेगा-मेहताब तेरा नाम रहेगा, भारत माता की जय, शहीदों की जय... जैसे गगनभेदी नारे गूंज उठे। इससे पहले जयपुर से आए 12 ग्रेनेडियर व राजस्थान पुलिस के जवानों ने कैप्टन राहुल कोहली की अगुवाई में शहीद की पार्थिव देह को सम्मान स्वरूप तिरंगा ओढ़ाया और बिगुल बजाकर सलामी दी। दोपहर 12. 30 बजे शहीद की अंतिम यात्रा शुरू हुई। शहीद की अर्थी को सेना के जवानों ने कंधा दिया। शहीद के येष्ठ पुत् संदीप व प्रदीप ने मुखाग्नि दी। उनकी तीन बेटियां व दो पुत्र है। उन्होंने दानोें बेटियों की शादी मई 2008 में ही की थी। एक पुत्र नेवी में है। शहीद का पूरा परिवार सेना से जुड़ा हुआ है। शहीद के चारों भाइयों में से तीन सेना से रिटायर्ड हैं तथा एक भाई सेवारत है।

Jul 12, 2008

क्षत्रिय

क्षत्रियों की छतर छायाँ में ,क्षत्राणियों का भी नाम है |
और  क्षत्रियों की छायाँ में ही ,पुरा हिंदुस्तान है |
क्षत्रिय ही सत्यवादी हे,और क्षत्रिय ही राम है  |
दुनिया के लिए क्षत्रिय ही,हिंदुस्तान में घनश्याम है |
हर प्राणी के लिए रहा,शिवा का कैसा बलिदान है |
सुना नही क्या,हिंदुस्तान जानता,और सभी नौजवान है |
रजशिव ने राजपूतों पर किया अहसान है |
मांस पक्षी के लिए दिया ,क्षत्रियों ने भी दान है |
राणा ने जान देदी परहित,हर राजपूतों की शान है |
प्रथ्वी की जान लेली धोखे से,यह क्षत्रियों का अपमान है |
अंग्रेजों ने हमारे साथ,किया कितना घ्रणित कम है |
लक्ष्मी सी माता को लेली,और लेली हमारी जान है |
हिन्दुओं की लाज रखाने,हमने देदी अपनी जान है |
धन्य-धन्य सबने कही पर,आज कहीं न हमारा नाम है |
भडुओं की फिल्मों में देखो,राजपूतों का नाम कितना बदनाम है |
माँ है उनकी वैश्याऔर वो करते हीरो का कम है |
हिंदुस्तान की फिल्मों में,क्यो राजपूत ही बदनाम है |
ब्रह्मण वैश्य शुद्र तीनो ने,किया कही उपकार का काम है |
यदि किया कभी कुछ है तो,उसमे राजपूतों का पुरा योगदान है |
अमरसिंघ राठौर,महाराणा प्रताप,और राव शेखा यह क्षत्रियों के नाम है ||
.                "जय क्षात्र धर्म"    
                                                                                                                          संकलन : राजुल शेखावत

Jul 11, 2008

उदयपुर किरण अब क्षत्रिय वेबसाइट पर


उदयपुर से भूपेंद्र सिंह चुण्डावत द्वारा प्रकाशित क्षत्रिय अख़बार उदयपुर किरण अब क्षत्रिय वेब साईट
पर उपलब्द है सभी क्षत्रिय महानुभाव क्षत्रिय वेबसाइट पर जाकर उदयपुर किरण अख़बार
डाउनलोड कर पढ़ सकते है
For Download udaipur Kiran click to http://rajputworld.co.in

Jul 9, 2008

क्षत्रिय समाज में शोक की लहर

जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ महादेव की सुरक्षा व्यवस्था में तैनाती के दौरान दिवंगत हुए बीएसएफ जवान स्वदेशसिंह चूंडावत (मान्यास) की पार्थिव देह बुधवार दोपहर महाराणा प्रताप एयरपोर्ट लाई जाएगी। एयरपोर्ट पर अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी चूंडावत को श्रध्दांजलि देंगे। महासभा के जिलाध्यक्ष चंद्रगुप्तसिंह चौहान के अनुसार एयरपोर्ट पर श्रध्दांजलि के बाद स्वदेशसिंह व ऋतुकंवर की पार्थिव देह पैतृक गांव मान्यास (राशमी) ले जाई जाएंगी। वहां सैनिक सम्मान से अंत्येष्टि की जाएगी। उन्होंने बताया कि स्वदेशसिंह के निधन की खबर मिलते ही क्षत्रिय समाज में शोक की लहर दौड़ गई।

बीएसएफ कमांडेंट स्वदेशसिंह व पत्नी का जम्मू में निधन





उदयपुर। बीएसएफ में असिस्टेंट कमांडेंट मान्यास (राशमी) निवासी स्वदेशसिंह (43) पुत्र स्व. चंद्रसिंह चूंडावत व उनकी पत्नी ऋतुकंवर (38) का कश्मीर में हुए हादसे में निधन हो गया। हादसे में तीन बच्चे, गनमैन और ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हो गए। बीएसएफ की 143वीं बटालियन में बालटाल में तैनात स्वदेशसिंह छह जुलाई की दोपहर अमरनाथ के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गए। स्वदेशसिंह के चचेरे भाई मान्यास सरपंच अजयपालसिंह ने बताया कि इलाके की पेट्रोलिंग के दौरान 6 जुलाई को अमरनाथ के पास उनकी जिप्सी करीब एक हजार फीट गहरी खाई में गिर गई।  जिप्सी में पत्नी ऋतुकंवर (38), बेटी कनुप्रिया (13), निहारिका (5), बेटा क्षितिज (5) और दो गनमैन, एक ड्राइवर भी थे। घायलों का कश्मीर के अस्पताल में इलाज चल रहा है। इधर, सैनिक सम्मान देने के लिए बीएसएफ की कंपनी उदयपुर पहुंच गई है। शवों को उनके पैतृक गांव मान्यास ले जाया जाएगा। जहां बुधवार शाम करीब पांच बजे स्वदेशसिंह का सैनिक सम्मान से अंतिम संस्कार किया जाएगा।





बच्चों की हालत गंभीर : स्वदेशसिंह के साथ हादसे का शिकार हुए तीनों बच्चों कनुप्रिया, निहारिका व क्षितिज का कश्मीर के अस्पताल में इलाज चल रहा है। तीनों की हालत गंभीर बनी हुई है। बीएसएफ अधिकारियों के परिवार उनकी देखभाल में जुटे हुए हैं।

स्वदेशसिंह का जीवन परिचय : स्वदेशसिंह ने स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई उदयपुर में ही पूरी की थी। 1987 में स्थानीय आट्र्स कॉलेज से ग्रेज्यूएशन के बाद वे बीएसएफ में भर्ती हो गए। पहली बार सब इंस्पेक्टर के पद पर उनकी नियुक्ति पंजाब प्रांत में हुई। इसके बाद उन्होंने कश्मीर, आसाम, मणिपुर, बंगाल में भी डयूटी की। स्वदेशसिंह ने चार वर्ष तक राष्ट्रीय परेड में बीएसएफ की मोटरसाइकिल टीम का नेतृत्व किया। वे स्वभाव से बहादूर थे।


Jul 8, 2008

श्री सोभाग्य सिंह शेखावत : संक्षिप्त परिचय

प्राचीन राजस्थानी साहित्य के मर्मघे विद्वान् एवं मूर्धन्य साहित्यकार श्री सोभाग्य सिंह जी का जन्म
२२ जुलाई १९२४ को सीकर जिले के भगतपुरा गाँव में हुआ राजपूत परिवार में जन्मे श्री शेखावत
के पैत्रिक गाँव के समीपस्त खूड आपके पूर्वजों का बड़ा ठिकाना रहा है श्री शेखावत पिछले पॉँच
दशक से राजस्थानी प्राचीन साहित्य के उद्धार और अनुशीलन के लिए शोध कर्म से जुड़े हुये है इस क्षेत्र में अपनी उत्क्रष्ट एवं सुदीर्घ सेवाओ से श्री शेखावत राजस्थानी शोध जगत का पर्याय बन चुकें है आपने राजस्थानी साहित्य को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने में अहम् भूमिका निभाई है राजस्थान ,राजस्थानी भाषा और सस्कृति पर शोध और इतिहास लेखन करने वाले विद्धवानो के प्रकाशित ग्रंथों के सन्दर्भ लेखों में श्री शेखावत का जगह जगह प्रकाशित नाम और उनके सन्दर्भ
उन्हें राजस्थानी मनीषी के रूप में प्रतिष्ठापित करते है शोध लेखन के साथ ही आपने राजस्थानी
भाषा की डिंगल शैली की अनेक महत्वपूर्ण पांडुलिपियों को संपादित कर उनका उद्धार किया

1-आपकी प्रकाशित कृतियाँ
१-राजस्थानी निबंध संग्रह (१९७४) २- राजस्थानी साहित्य संपदा (१९७७) ३- पूजां पाँव कविसरा (१९७७)

४-राजस्थानी साहित्य संस्कृति और इतिहास (१९९१) ५- जीणमाता ६- राजऋषि मदन सिंह दांता

७- भक्तवर रघुवीर सिंह जावली जीवन परिचय ८- राजस्थानी वार्ता भाग -३ (१९५७)

९-राजस्थानी वार्ता भाग -४ १०- राजस्थानी वार्ता भाग -५ ११-राजस्थानी वार्ता भाग -७

१२-राजस्थानी वीर गीत संग्रह प्रथम भाग १३- विन्हे रासो (१९६६) १४- बलवन विलास (१९७२)

१५- राजस्थानी वीर गीत द्वितीये भाग १६- राजस्थानी वीर गीत संग्रह तृतीये भाग

१७- राजस्थानी वीर गीत संग्रह चतुर्थ भाग १८- जाडा मेह्डू ग्रन्थावली

१९- डून्गरसी रतनु ग्रंथावली (१९७९) २०- स्वतंत्रता सेनानी डुंगजी जवाहर जी (१९७२)

२१- कविराज बाँकीदास आशिया ग्रंथावली प्रथम खंड (१९८५)

२२- कविराज बाँकीदास आशिया ग्रंथावली द्वितीय खंड (१९८७) २३- मारवाड़ रा उमराव ऋ बारता

२४- इसरदान नामक विभिन्न चारण कवि २५- चारण साहित्य की मर्म परीक्षा

२६-राजस्थानी शोध संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथों की सूची भाग -३

२७- राजस्थानी साहित्य और इतिहास सम्बन्धी प्रकाशित ग्रंथों की सूची

२८- शेखावाटी के वीर गीत २९- मालाणि के लोक गीत ३०- कहवाट विलास

३१- कविराज बाँकीदास ३२- वीर भोग्या वसुंधरा ३३- गज उद्धार ग्रन्थ

३४- राजस्थानी हिन्दी शब्दकोष प्रथम खंड संशोधन परिवर्धन -संपादन

३५- रसीले राज रा गीत (सहयोग) ३७- राजा उमेद सिंघ सिसोदिया रा वीर गीत (सहयोग)

३७-एतिहासिक रुके परवाने (सहयोग) ३८- अजीत विलास (सहयोग) ३९-माता जी रि वचनिका (सहयोग)

४०- डा. टेसीटोरी का राजस्थानी ग्रन्थ सर्वेक्षण (सहयोग) ४१- सुर्येमल्ल मिषण विसेषांक (सहयोग)

४२-वीर सतसई राजस्थानी टीका (सहयोग) ४३- राजलोक साहित्य (सहयोग) ४४-मोहणोत नेणसी (सहयोग)

४५- रणरोल काव्य ४७- अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा नई दिल्ली सताब्दी समारोह स्मारिका संपादन

४७-पत्र दस्तावेज (महाराज कुमार रघुवीर सिंह जी एवं सोभाग्ये सिंह का पत्र व्यवहार )

४८ - पत्र प्रकाश ( इतिहासकार सुरजन सिंह एवं सोभाग्य सिंह के पत्र )

४९- ठिकाना खूड एवं दांता का इतिहास

आपकी अन्य ग्रंथों की भूमिका लेखन
१- राव शेखा - (सुरजन सिंह शेखावत ) २- मीरां बाई - (डा. कल्याण सिंह शेखावत )

३- जोबन म्हारा देश रो (राम सिंह सोलंकी ) ४- होनहार के खेल - (तन सिंह जी )

५- स्वतंत्रता के पुजारी महाराणा प्रताप सिंह -( कुंवर देवी सिंह मंडवा )

६- चांपवातों का इतिहास -( ठाकुर मोहन सिंह कानोता) ७- राणा रासो -(दयालदास राव )

८- केसरी सिंह गुण रासो ९- मारवाडी व्याकरण - (पंडित रामकरन शर्मा आसोपा )

१०- राजपूत शाखाओं का इतिहास - ठाकुर देवी सिंह मंडवा ११- हिये रा हरफ -डा. प्रकाश उम्रावत

१२- हम्मीरदे के कछवाह - ठाकुर मोहन सिंघ कानोता १३-मरुधर री मठोठ - गिरधरदान रतनु

१४- शार्दुल प्रकाश एवं करवाड राज्य का संक्षिप्त इतिहास - गिरवर सिंह १९९५

आपने निम्न पदों पर कार्य किया

१- संपादक सुप्रभात (मासिक हस्तलिखित ) १९४४-४५

२-संपादक मासिक "संघर्ष" - जयपुर १९४७-५२

३- शोध साक्षर, साहित्य संस्थान (राजस्थान विद्यापीठ) उदयपुर १९५७-६३

४- सहायक निदेशक , राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी ,जोधपुर १९६३-८०

५-संपादक राजस्थानी शब्दकोष (राजस्थानी हिन्दी व्रहद कोश ) १९८२-८४

६-सदस्य संचालिका ,राजस्थानी साहित्य अकादमी ,उदयपुर

७-सदस्य कार्यकारणी , राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ,बीकानेर

८- परामर्शी सदस्य , श्री शार्दुल शेखावाटी शोध संस्थान ,काली पहाड़ी , झुंझुनू

९- सदस्य श्री खिंची शोध संस्थान ,इन्द्रोका , जोधपुर

१०-अवरफेलो संस्कृति एवं शिक्षा मंत्रालय , भारत सरकार ,नई दिल्ली १९७९-८१

११-सचिव शेखावाटी अनुसन्धान समिति श्री सार्दुल एजुकेशन ट्रस्ट , झुंझुनू

१२- चेयरमैन , राजस्थानी भाषा उनयन एवं संवेधानिक मान्यता समिति (राजस्थान सरकार द्वारा गठित १९९०)

१३-चेयरमैन , राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी , बीकानेर

१४-राज्य प्रतिनिधि एवं सदस्य ,राजस्थानी परामर्श मंडल , साहित्य अकादमी ,नई दिल्ली १९९८-२००२

१५-सर्वेक्षण जयपुर मंडल The Indian National Trust and Cultural Heritage (1984-86)

१६- संपादक एवं परामर्शी सदस्य (त्रेमासिक शोध पत्रिकाएं ) - वरदा बिसाऊ ,शेखावाटी, मरुभारती पिलानी,

अनवेष्णा , लोकनिधि-उदयपुर , राजस्थान रत्नाकर ,मज्झिमिका ,वैचारिकी ,वरदाई, विश्वम्भरा,

जागतिजोत आदि



लेख क्षत्रिय वेबसाइट पर