Aug 28, 2009

धरती माता किसने रखी लाज तेरे सम्मान की

धरती माता किसने रखी लाज तेरे सम्मान की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||
हाँ ! गाथाएँ बलिदान की ||

काबुल के तुफानो से जब जन मानस था थर्राया |
गजनी की आंधी से जाकर भीमदेव था टकराया ||
देख खानवा यहाँ चढी थी राजपूतों की त्योंरियां |
मतवालों की शमसिरों से निकली थी चिंगारियां ||
यहाँ कहानी गूंज रही सांगा के समर प्रयाण की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||

देखो इस चितौड़ दुर्ग का हर पत्थर गौरव वाला |
यहाँ चढाई कुल देवी पर शत-शत मुंडो की माला ||
महलों में जौहर धधका हर राजपूत परवाना था |
हर-हर महादेव के नारों से अवनी अम्बर गूंजा था ||
यहाँ गाथाएँ गूंज रही कण-कण में गौरव गान की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||

यही सीकरी यह पानीपत यही वही हल्दीघाटी |
वीर बांकुरों के शोणित से तृप्त हुई जिसकी माटी ||
हाल बता बुन्देल धरा तेरे उन वीर सपूतों का |
केशारियां कर निकल पड़े थे मान बचने माता का ||
भूल गए तो याद करो उस पृथ्वीराज महान की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||

आन बान हित कई बाँकुरे आजीवन थे यहाँ लड़े |
यवन सैन्य के झंझावत से पर्वत बनकर यहीं अडे ||
क्षिप्रा झेलम बोल जरा क्यों लाल हुआ तेरा पानी |
महाकाल से यहाँ जूझने दुर्गा की थी भृकुटी तनी ||
तेरी ही बेदी पर माता चिता जली अरमानों की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||

महाराणा सा सपूत पाकर धन्य हुई यह वसुंधरा |
जयमल पत्ता जैता कुम्पा झाला की यह परम्परा ||
जिन्दा है तो देख जरा जालौर और गढ़ उंटाला |
तारागढ़ और रणतभंवर में लगा शहीदों का मेला ||
आओ फिर से करें प्रतिष्ठा उस पावन प्रस्थान की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||

तडफ रहे है अब परवाने उसी शमां पर चढ़ने को |
आग उठी है रग-रग में फिर से बदला लेने को ||
भभक रहे है अब अंगारे प्रतिहिंसा के झोंको से |
भीख मांगता महाकाल निर्वासित राजकुमारों से ||
जगो यहाँ जगदेवों की लगी है बाजी जान की |
अलबेलों ने लिखी खड्ग से गाथाएँ बलिदान की ||
श्री शिवबख्श सिंह जी ,चुई : ३० दिसम्बर १९५८
क्षत्रिय युवक संघ आई.टी.सी केम्प : त्रिलोकपुरा |

Aug 25, 2009

साथी संभल-संभल कर चलना

साथी संभल-संभल कर चलना बीहड़ पंथ हमारा |
है अँधियारा पर प्राची में झांक रहा सवेरा ||
बलिवेदी का अंगारा तू जीवन ज्योति जला दे | जीवन ...
लम्बी मंजिल बढ़ता जा होनी से कदम मिला ले , होनी से ...
गौरव से जीने मरने की बढ़ने की यह परम्परा ||
साथी संभल-संभल कर चलना बीहड़ पंथ हमारा ||

साधन कम है फिर भी तुम पर आशाएं हमारी आशाएं , आशाएं ...
कर्म कठिन है कोमल काया अग्नि परीक्षा तुम्हारी , अग्नि परीक्षा ...
भुला पंथी भटक रहा तू बन जा रे ध्रुवतारा ||
साथी संभल-संभल कर चलना बीहड़ पंथ हमारा ||

यह जीवन न्योछावर करके क्या संतोष करेगा | क्या ..
जन्म जन्म का कर्जा कैसे एक जन्म में चुकेगा , एक जन्म ...
लहरों से हरो मत साथी दूर नहीं है किनारा ||
साथी संभल-संभल कर चलना बीहड़ पंथ हमारा ||

शमां जली है परवानों की आई है ऋतू मरने की , आई ...
मरने की या अरमानो की साथी पूरा करने की , साथी ...
करने की बेला में अच्छा लगता नहीं बसेरा ||
साथी संभल-संभल कर चलना बीहड़ पंथ हमारा ||

जौहर शाको की कीमत को आज चुका बलिदान से , आज ..
दोल उठेंगे दिग्गज साथी तेरे महाप्रयाण से , तेरे ............
अरमानो को बना न देना आंसुओं की धारा ||
साथी संभल-संभल कर चलना बीहड़ पंथ हमारा ||

श्री शिव बख्श सिंह , चुई : १ अप्रेल १९५९
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Aug 19, 2009

क्या भारतीय जनता पार्टी खत्म हो रही है

भारतीय जनता पार्टी भारत की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी है | इस पार्टी ने अपनी शुरूआत हिन्दू एजेंडे के साथ की थी | हिन्दू कौन ? हिन्दू वह जो अपने राष्ट्र से प्यार करे | शुरू में भावना यही थी | शायद इसी विचार धारा के कारण राजपूत समाज जो हमेशा ही अपने देश व अपने गौरव के लिए अपने प्राण न्योछावर करता रहा है, ने भी इस पार्टी में जुड़ने में हित देखा | आज राजपूत समाज का बहुमत इस पार्टी के साथ है | एक दूसरा कारण यह भी था की रियासतों के एकीकरण में कुछ लोग हमेशा कांग्रेश का ही हाथ मानते है जो रजवाडे अपनी रियासतों को खो चुके वो कॉंग्रेस को अपना दुश्मन मानने लग गए | उनके पास भारतीय जनता पार्टीके साथ जुड़ने के अलावा दूसरी कोई पार्टी उस समय नही थी | उनमे से एक वसुंधरा राजे सिंधिया की माता जी विजय राजे भी थी | जब भारतीय जनता पार्टी को संसदीय चुनावों और राजस्थान विधान सभा चुनावों में हार का सामना करना पडा तो उस हार का ठीकरा किसी न किसी के सर पर तो फोड़ना ही था | इसके लिए उन्हें वसुंधरा राजे से अच्छा कोई मोहरा नही मिला | और पार्टी ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए विवश कर दिया साथ में अनुशासन हीनता के नाम पर ज्ञान देव आहूजा व राजेन्द्र सिंह राठौड़ को भी निलंबित कर दिया | क्या पार्टी बात चित से कोई हल नही निकाल सकती थी ? एसी कोई समस्या नही है जिसका बातचीत से रास्ता ना निकल सकता हो बशर्ते की इसके लिए इच्छा शक्ती भी हो | पार्टी एक एक कर मेहनती और मजबूत नेताओं को निकाल कर पार्टी अपनी हार की बोखलाहट को दिखा रही है |
आज अभी ताजा खबरों में सुना की जसवंत सिंह जी जैसे कद्दावर नेता को पार्टी ने अपनी प्राथमिक सदस्यता से भी निकाल दिया है | यह तो होना ही था बिना बींद की बरात हमेशा इसी प्रकार की होती है | इस पार्टी का मुख्य नेता तो माननिय श्री अटल बिहारी वाजपेयी थे । जिनके जाने के बाद आडवाणी जी इस नैया को खे रहे थे लेकिन जहा सभी नेता , बड़े नेता हो वहा अनुशासन की बात करना बेमानी लगता है |


इस प्रकार भारतीय जनता पार्टी धीरे धीरे करके राजपूतो का जनाधार खो रही है | एक दिन एसा भी आयेगा जब भारतीय जनता पार्टी केवल भूत काल की बात हो जायेगी | इस परिस्थिति को देख कर यही बात दिमाग में आती है विनाश काले विपरीत बुद्धी | - *

Aug 1, 2009

इतिहास याद दिलाये

इतिहास याद दिलाये मेवाड़ी जयमल पत्ता की !
मेवाड़ी जयमल पत्ता की ! जागो ! जागो !!

जली रानियाँ जौहर व्रत ले , अंगारों से खेली थी अंगारों से खेली |
शान बेचकर कायर की भांति अश्रु धारा ले ली अब अश्रु धारा ले ली ||

भूल गया क्यों भोले तलवार राणा सांगा की !
तलवार राणा सांगा की ! जागो ! जागो !!

केशरिया बन जूझ गए हमको गौरव देने , हाँ हमको गौरव देने |
रखते क्यों नहीं प्राण ह्रदय में उनकी पीडा लेने रे उनकी पीडा लेने ||

आई प्रलय की बेला , है मांग गोरा बादल की !
है मांग गोरा बादल की जागो ! जागो !!

यहाँ घास की रोटी से वैभव ने हार मानी वैभव ने हार मानी |
इस धरती से गूंज रही जीवन की अमर कहानी - जीवन की अमर कहानी ||

वह थाती न गुमाना , महान हल्दी घाटी की !
महान हल्दी घाटी की जागो ! जागो !!

चढा नहीं पूजा में तो पैरों से कुचलेंगे -हाँ पैरों से कुचलेंगे |
कल जो कुचले गए आज फिर तुमसे बदला लेंगे - वे तुमसे बदला लेंगे ||

बिता युग है कोस रहा , धिक्कार ऐसे जीने को |
धिक्कार ऐसे जीने को जागो ! जागो !!
श्री अर्जुन सिंह व कैलाशपाल सिंह द्वारा २४ दिसम्बर १९५८ को रचित |

Jul 13, 2009

राजपूत संस्‍कृति के साथ छेड़छाड़

मैं आप लोगों को प्रतियोगिता दर्पण के अप्रेल 2009 के अंक में थारू जनजाति के संबंध में एक लेख छपा है उसका लिंक भेज रहा हूं उसमें किस तरह से राजपूती संस्‍कृति के बारे में कहां गया है उसको पढ़कर भी अगर हम कुछ नहीं कहेंगे तो लोग ऐसे ही हमारी संस्‍कृति के साथ खिलवाड़ करने की हिमाकत करते रहेंगे और हम कुछ नहीं कर पायेंगे और आने वाली पीढि़यां हम माफ नहीं करेंगी। पहले तो इस लेख में कोई सांमजस्‍य है ही नहीं क्‍योंकि कि चित्‍तौड़ और थार के मरूस्‍थल के बारे में वह लेखक कुछ जानता ही नहीं है क्‍योंकि कहां चित्‍तौड़ रहा और कहां थार का मरूस्‍थल। उसके बाद में वह लेखक को यह पता होना चाहिए कि चित्‍तौड़ में सारी राजपूती महिलाओं ने जौहर किया था न कि किसी के साथ उनको भेज दिया था।

मैंरे कहने के मतलब यही है कि हम सभी को अपने अपने तरीके से ऐसे लेखों और लिखने वालों का विरोध करना चाहिए। चाहे वो कितना भी बड़ा और ताकतवर क्‍यों न हो। आप सभी से निवेदन है कि आप अपने अपने तरीके से प्रतियोगिता दर्पण और ऐसे लेखकों को जरूर लताड़े।

आप अपनी प्रतिक्रियाएं भी मुझे जरूरी बताएं और जितना हो इसके लिए अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल करते हुए इसका विरोध करवाएं।

http://www.ezinemart.com/pratiyogitadarpan/01042009/Home.aspx?pgno=88&mode=2



Bhupendra Singh Chundawat
Udaipur
chundawat@yahoo.com

इस पत्रिका के लेखक व संपादक को info@pratiyogitadarpan.org ,delhi@pratiyogitadarpan.org पर मेल भेज कर अपना विरोध प्रकट करे |

Jun 5, 2009

सीहा जी पर लगे मिथ्या आरोप

पिछले लेख में मोहम्मद गौरी का नाम शहाबुद्धीन लिख देने से काफी पाठको ने इस बात को समझाने में परेशानी अनुभव की | मोहम्मद गौरी का पूरा नाम मोहम्मद शहाबुद्धीन गोरी था | अब बात करते है सीहा जी की |
सीहा ,कनौज के प्रमुख राजा जयचन्द राठौड के पौत्र थे राजस्थान मे राठौड वंश की स्थापना इनके कनौज से राजस्थान आगमन से ही हुई है इन पर आरोप लगाया गया था कि पल्लीवाल ब्राहम्णो को धोखे से मार कर पाली पर अधिकार किया था इस लेख मे हम इस आरोप की सच्चाई की पड़ताल करेंगे
कर्नल टोड के " राजस्थान के इतिहास ' में लिखा है कि:- सीहाजी ने गुहिलो को भगा कर लुनी के रेतीले भाग मे बसे खेड पर अपना राठौडी झण्डा खड़ा किया
उस समय पाली, और उसके आस पास का प्रदेश पल्लीवाल ब्राहम्णो के अधीन था ,और उस पाली नामक नगर के कारणः ही वे पल्लीवाल कहाते थे परंतु आस पास की मीणा मेर नामक जंगली लूटेरी कोमो से तंग आकर उन्होने सीहाजीसे सहायता मांगी इस पर सीहा जी ने सहायता देना स्वीकार किया और शीघ्र ही लूटेरो को दबाकर ब्राहम्णो का संकट दूर कर कर दिया ।यह देख पल्लीवालो ने, भविष्य मे होने वाले लूटेरो के उपद्रव से बचने के लिये,सीहाजी से कुछ भूमि लेकर वही बस जाने की प्रार्थना की, जिसे उन्होने भी स्वीकार कर लिया परंतु कुछ समय बाद सीहाजी ने ,पल्लीवाल ब्राहम्णो के मुखिया को धोखे से मार कर, पाली को अपने जीते हुये प्रदेश मे मिला लिया
इस लेख से प्रकट होता है कि ,पल्लीवालो को सहायता देने से पूर्व ही महेवा और खेड राव सीहा जी के अधिकार मे चुके थे ।ऐसी हालत मे सीहाजी का उन प्रदेशों को छोड़ कर पल्लीवाल ब्राहम्णो की दी हुई साधारण सी भूमि के लिये पाली मे आकर बसना कैसे सम्भव समझा जा सकता है ? इसके अलावा उस समय उनके पास इतनी सेना भी नही थी कि, वह महेवा और खेड दोनों का प्रबन्ध करने के साथ पाली पर आक्रमण करने वाले लूटेरो पर भी आतंक बनाये रखते
इसके अतिरिक्त पुरानी ख्यातो मे पल्लीवाल ब्राहम्णो को केवल वैभवशाली व्यापारी ही लिखा है पाली के शासन का उनके हाथ मे होना ,या सीहाजी का उन्हें मार कर पाली पर अधिकार करना उसमे कही भी नही लिखा है वि.. 1262 से वि.. 1306 के बीच समय के कुछ लेख भीनमाल से मिले है जिससे ज्ञात होता है कि ये प्रदेश पहले सोलंकीयो के हाथ मे था बाद मे चौहाणो के हाथ मे गया उस समय की भौगोलिक अव राजनीति स्थितियों को समझने पर ज्ञात होता है कि पाली भी पल्लीवाल ब्राहम्णोकेअधीन होकर सोलंकीयो या चौहानो के अधिकार मे रहा होगा एसी अवस्था मे निर्बल,शरणागत, और व्यापार करने वाले पल्लीवाल ब्राहम्णो को मारने की कौनसी आवश्यकता थी ? इसके अतिरिक्त टोड के लेख से यह भी सिद्ध हो जाता है कि पल्लीवाल ब्राहम्णो ने स्वय ही उन्हें बुलाया था अपने रक्षार्थ इस हिसाब से देखा जाये तो सीहाजी वैसे ही वहा के शासक तो हो ही चुके थे और व्यापारी पल्लीवाल ब्राहम्णो को उजाड़ कर उन्हें क्या मिलता उन्हे तो बसाने से फायदा हो रहा था क्यों कि आपने राज्य मे व्यापार का बढ़ावा ही मिल ता इस लिये पल्लीवाल ब्राहम्णो को उजाडने मे तो उन्हीं का नुकसान था

सौजन्य से - (राठौङो का इतिहास लेखक विश्वनाथ रेवु )

May 25, 2009

जय चन्द राठौड़ पर लगे मिथ्या आरोप

कुछ लोग जिनमें इतिहासकार भी शामिल है जयचंद को हिन्दू साम्राज्य का नाशक कहकर उससे घरना प्रकट करते है | और कुछ उनके पौत्र सीहा जी पर पल्लीवाल ब्राहमणों को धोखे से मार कर पाली पर अधिकार करने का कलंक लगाते है | वास्तव में देखा जाए तो इसे लोग इन कथाओं को "बाबा वाक्य प्रमाणं " समझ कर ,या ‘पृथ्वीराज रासो ' में और कर्नल टोड के " राजस्थान के इतिहास ' में लिखा देख कर ही सच्ची बात मान लेते है लेकिन वास्तविकता पर गौर नहीं करते है |

पृथ्वीराज रासो के अनुसार जयचंद ने वि.स. ११४४ में 'राजसूय यज ' और संयोगिता का स्वंयवर करने का विचार किया, तब प्रथ्वी राज ने विघ्न डालने के उद्देश्य से खोखन्द पुर में जाकर जयचंद के भाई बालुक राय को मार डाला और बाद में संयोगिता का हरण कर लिया, इससे लाचार होकर जयचंद को युद्घ करना पडा | यह युद्घ ११५१ में हुआ | उसके बाद पृथ्वीराज संयोगिता के मोह पाश में बंध गया और राज कार्य में शिथिल पड़ गया | इन्ही परिस्थितियों को कर शहाबुद्धीन ने देहली पर फिर चढाई की |पृथ्वीराज सेना लेकर मुकाबले में आ गया | इस युद्ध में शहाबुद्धीन विजयी हुआ | पृथ्वीराज पकडा गया | और गजनी पहुँचाया गया जहा पर शहाबुद्धीन और पृथ्वीराज दोनों मारे गए | कुतुबुद्धीन उनका उत्तराधिकारी बना | कुतुबुद्धीन ने आगे बाधा करा कनौज पर चढाई की जयचंद युद्ध में मारा गया | और मुसलमान विजयी हुए |

इस उपरोक्त कथा में जिस यज्ञ व स्वयंवर का वर्णन किया है उसके बारे में जयचंद के समय की किसी भी प्रशस्तियो मे नहीं है | जयचंद के समय के १४ ताम्र पात्र और २ लेख मिले है इनमें अंतिम लेख वि.स. १२४५ का है | रासो मे जिस संयोगिता के हरण की बात कही गयी है वह काल्पनिक है क्यों की इसका उल्लेख ना तो पृथ्वीराज के समय बने ‘पृथ्वीराज विजय महाकाव्य’ मे ही मिलता है और न ही वि.स. की चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे बने ’हम्मीर महाकाव्य’ मे ही मिलता है इसी हालत मे इस कथा पर विश्वास करना अपने आप को धोखा देना है रासो मे शहाबुद्धीन के स्थान पर कुतुबुद्धीन का जयचंद पर चढाई करना लिखा है | परन्तु फारसी तवारिखो के अनुसार यह चढाई शहाबुद्धीन के मरने के बाद न होकर उसकी जिन्दगी मे हुयी थी| स्वय शहाबुद्धीन ने इसमें भाग लिया था उसकी मृत्यु वि.स. १२६२ मे हुयी थी इसके अलावा किसी भी फारसी तवारिखो मे जयचंद का शहाबुद्धीन से मिल जाना नहीं लिखा है |

यदि ‘रासो’ की सारी कथा सही भी मान ले तब भी उसमे संयोगिता हरण के कारण जयचन्द का शहाबुद्धीन को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने का निमंत्रण देना या उससे किसी प्रकार का सम्पर्क रखना कही भी लिखा हुआ नही मिलता है । इसके विपरीत उसमे स्थान स्थान पर पृथ्वीराज को परायी कन्याओ का अपहरणकर्ता बताया गया है । जिससे उसकी उद्दण्डता ,उसकी कामासक्ति का वर्णन होने से उसकी राज्य कार्य में गफ़लत ,उसके चामुण्ड राय जैसे स्वामी भक्त सेवक को बिना विचार के कैद में डालने की कथा से उसकी गलती ,और उसके नाना के दिए राज्य में बसने वाली प्रजा के उत्पीड़न से कठोरता ही प्रकट होती है | इसी के साथ उसमे पृथ्वीराज के प्रमाद से उसके सामंतो का शहाबुद्धीन से मिल जाना भी लिखा है |

एसी हालत मे विचार शील विद्वान स्वंय सोच सकते है कि जयचन्द को हिन्दू साम्राज्य का नासक कह कर कलंकित करना कहाँ तक न्यायोचित है ।

रासो के समान ही ‘आल्हाखण्ड’मे भी संयोगिता के स्वयंवर का किस्सा दिया हुआ है । परंतु उसके रासो के बाद की रचना होने से स्पष्ट ज्ञात होता है कि उसके लेखक ने रासो का ही अनुसरण किया है इस लिये उसकी कथा पर भी विश्वास नही किया जा सकता है ।

जयचंद कनौज का अन्तिम हिन्दू प्रतापी राजा था | उसने ७०० योजन (५६०० मील) भूमि पर विजय प्राप्त की | जयचंद नेअनेक किले भी बनवाये थे इन में से एक कनौज में गंगा के तट पर ,दूसरा असीई ( जिला इटावा) में यमुना के तट पर ,तीसराकुर्रा में गंगा ले तट पर - शेष अगले भाग में |
सौजन्य से - (राठौङो का इतिहास लेखक विश्वनाथ रेवु )

Apr 24, 2009

राजस्थान के लोक देवता श्री गोगा जी चौहान


राजस्थान की लोक गाथाओं में असंख्य देवी देवताओं की कथा सुनने में आती है | इन कथाओं में एक कथा श्री जाहर वीर गोगा जी चौहान की भी है | मै इस कथा के बारे में लिखने से पहले पाठको को एक बात बताता चलू की यह कथा इतिहास के नजरिये से अगर आप देखते है तो इसमें बहुत से विवाद और पेच है | और जन मानस की भावना के दृष्टीकोण से देखने पर यह आपको एक सुन्दर कथा लगेगी |
वर्तमानकाल में जिसे ददरेवा कहा जाता है यह जिला चुरू (राज.) में आता है | इसका पुराना ऐतिहासिक महत्व भी था क्यों की यह चौहान शासको की राजधानी थी | ददरेवा के राजा जीव राज जी चौहान की पत्नी ने भगवान की भक्ती की जिसके फलस्वरुप वहा गुरु गोरखा नाथ जी महाराज पधारे और उन्होंने बछल देवी को संतानोपत्ति का आशीर्वाद दिया | कुछ समय उपरांत उनके घर एक सुन्दर राजकुमार का जन्म हुआ | जिसका नाम भी गुरु गोरखनाथ जी के नाम के पहले अक्षर से ही रखा गया | यानी गुरु का गु और गोरख का गो यानी की गुगो जिसे बाद में गोगा जी कहा जाने लगा | गोगा जी ने गूरू गोरख नाथ जी से तंत्र की शिक्षा भी प्राप्त की थी |
यहाँ राजस्थान में गोगा जी को सर्पो के देवता के रूप में पूजा जाता है | कुछ कथाकार इनको पाबूजी महाराज के समकालीन मानते है तो कुछ इतिहास कार गोगाजी व पाबूजी के समयाकाल में दो सो से दाई सो वर्षो का अंतराल मानते है | कथाओं के मुताबिक पाबूजी के बड़े भाई बुढाजी की पुत्री केलम इनकी पत्नी थी | इनकी शादी का भी एक रोचक वर्तांत है जो मै अगले भाग में बताऊंगा |
नोट - इस पोस्ट में लिए गए चित्र हमारे नही है गूगल से लिए गए है | कथा लोगो के मुख से सुनी गयी है | इस पोस्ट के किसी भी अंश पर किसी को आपत्ति हो तो हम से समपर्क करे हम तुंरत हटा देंगे |

Apr 10, 2009

बलि पथ के सुंदर प्राण

बलि पथ के सुंदर प्राण |
बलि होना धर्म तुम्हारा,
जीवन हित क्यों पय पान ||

आज खडा तू मंदिर आगे,
देव पुरुष के है भाग्य जागे |
टूट रहे है जग के धागे ||
मत मांग अभय वरदान ||१||
जीवन है कर्तव्य की कहानी,
चंद दिनों की मस्त जवानी |
मर कर चख ले रे अज्ञानी ||
कर ले पुरे अरमान ||२||
दीपक की बलि है जलने में,
फूलों की बलि है खिलने में |
बलि होता स्वच्छ सलिल झरने में ||
कह बलिदान चाहे कल्याण ||३||
वीर पूंग्वो की धरनी पर ,
प्रेममई भारत जननी पर |
यज्ञ भूमि दुःख ताप हरनि पर ||
अब जलने दो श्मशान ||४||
श्री तन सिंह बाड़मेर
२४ मार्च १९५०

Apr 5, 2009

आराम कहाँ

आराम कहाँ अब जीवन में अरमान अधूरे रह जाते |
दिल की धड़कन शेष रहे हाथों के तोते उड़ जाते ||

तिल-तिल कर तन की त्याग तपस्या का अमृत संचय करते |
अमिय भरे रस कुम्भ कभी यदि माया की ठोकर खाते ||

सागर में सीपें खोज-खोज माला में मोती पोये थे |
पर हाय ! अचानक टूट पड़े यदि प्रेम तंतु जब पहनाते ||

घोर अँधेरी रात्रि में था दीप जला टिम-टिम करता |
अंधेर हुआ जब बह निकला नैराश्य पवन मग में चलते ||

निर्जीव अँगुलियों के चलते स्वर साधक बनना सीखा था |
मादक वीणा के टूट चुके हों तार अभागे हा ! बजते ||

बचपन में बाहें डाल चले सोचा था साथी है जग में |
दो कदम चले फिर बिछुड़ गए एकाकी को आराम कहाँ ?
श्री तन सिंह ,बाड़मेर
११ अगस्त १९४९

Apr 1, 2009

काली पहाड़ी ग्राम में जमुवाय माता के मन्दिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा

बगड़ ग्राम काली पहाडी में जमुवाय माता की मूर्ति स्थापना पर दो दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम में सोमवार को शोभा यात्रा निकाली गयी शोभा यात्रा टीले पर स्थित श्री करनी माता मंदिर से ग्राम के मुख्य मार्गो से होती हुये मंदिर स्थल पहुँची | आरम्भ में मंदिर परिसर में भक्त शायर सिंह शेखावत के सान्निध्य में पूजा अर्चना की गयी | शोभा यात्रा में फूलों से सजी जीप में जमुवाय माता की मूर्ति को विराजमान किया गया | मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद हवन का कार्यक्रम हुआ | हवन का कार्यक्रम . सुभाष शर्मा के आचार्यत्व में हुआ |
मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में सोमवार को हुए जागरण में भजन गायकों ने एक से बढ़ कर एक प्रस्तुतिया दी | भजन गायक बलबीर बेदी , जानी राम बेदी & पार्टी ने माँ के भक्ति भरे भजन गाकर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया |




मंगलवार ३१ मार्च दोपहर ११ बजे को इस दो दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम का समापन जमुवाय माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के साथ हुआ | प. सुभाष शर्मा व प्रकाश शर्मा के आचार्यत्व में भक्त शायर सिंह शेखावत व दादू द्वारा बगड़ के महा मंडलेश्वर अर्जुन दास महाराज ने प्राण प्रतिष्ठा कराई | इससे पूर्व ग्राम के चोंक में महा मंडलेश्वर का ग्रामीण जनों द्वारा बैंड बाजे के साथ स्वागत किया गया | चौक से मंदिर स्थल तक बैंड बाजे के साथ लाया गया | और हवन की पूर्ण आहुति का कार्यक्रम संपन्न किया गया | इस अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालु व एव
गणमान्य लोग उपस्थित थे जिनमें पूर्व पालिका अध्यक्ष विक्रम सिंह शेखावत , कनिष्ठ अभियन्ता जगदीश सिंह शेखावत ,डॉ नत्थू सिंह शेखावत आदि मुख्य थे | इस अवशर पर मंदिर के मुख्य पुजारी शायर सिंह शेखावत ने बताया की इससे पूर्व जमुवाय माता का मंदिर धमाणा धाम ग्राम भोडकी जिला झुंझुनू में व बड़ा व पुराना मंदिर जमुवाय रामगढ में स्थित है | अब इस मंदिर के बन जाने से आस पास के शेखावत भक्तो को देवी के दर्शनों के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा | ज्ञात रहे की माँ जमुवाय शेखावत वंश की कुल देवी है |
(इस पोस्ट मे जो चित्र काम मे लिये गये है वह अस्थायी है मूल चित्र बाद मे मिलेन्गे तब दुबारा लगा दिये जायेन्गे । यह रिपोर्ट दैनिक भास्कर के शेखावाटी संस्करण में दिनांक ३० व ३१ मार्च को प्रकाशन के अधार पर लिखी गयी )

Mar 22, 2009

शेखावाटी के प्रसिद्ध युद्ध

1. हरिपुरा का युद्ध --> खंडेला के राजा केशरी सिह और बादशाह औरंगजेब के सूबेदार सैयद अब्दुल्ला के मध्य वि स० 1754 में हुआ था | युद्ध का कारन केशरी सिह का बादशाह को ट्रिब्यूट ना देना था | इस युद्ध में केशरी सिह रण खेत रहे |
2. फतेह पुर का युद्ध --> नवाब कामयाब खां ओर शार्दूल सिंह ,शिव सिंह के मध्य हुआ वि स ० 1788 में हुआ नवाब की पराजय हुयी | युद्ध का कारण फतेह पुर पर कब्जा करना था |
3. मावन्डा का युद्ध--> जाट राजा जवाहर मल व महाराजा जयपुर की सेना जिसमें सभी शेखावत ठिकानो के सरदार शामिल थे के मध्य वि.स. 1824 में मावन्डा मढौली के पास हुआ जिसमे जवाहर मॉल की पराजय हुयी लेकिन ठिकाने दारो का भी काफी नुकशान हुआ |
4. मान्ढण का युद्ध -->दिल्ली के सुलतान शाह आलम के वफादार नजब कुली खा और शेखावत सरदारों के मध्य वि.स. 1832 में सिघाना के पास हुआ | शाही सेना को भागना पड़ा बहुत से शेखावत सरदार शहीद हुए |
5. खाटू का युद्ध--> शाही सेना के वफादार मुर्ताज खा भडेज और देवी सिंह के मध्य हुआ | देवी सिंह का साथ जयपुर की सेना व शेखावत सरदार थे यह युद्ध वि.स.1837 में खाटू के मैदान में हुआ | शाही सेना के २२ हजार सैनिक मारे गए और मैदान छोड़ के भागना पडा
6. पाटन का युद्ध -->मराठो व जयपुर की सेना के बीच हुआ था जिसमें मराठो का नेतृत्व फ्रैंच सेनापति डिबेयन कर रहा था | इधर जयपुर की सेना में जोधपुर के सैनिक व् जयपुर की नागा महंतो की जमात अन्य शेखावत सरदार थे |यह युद्ध पाटन (तोरावटि) नमक स्थान पर वि.स.1847 में हुआ जिसमें शेखावतों की हार हुयी |
7. फतेहपुर का युद्ध --> यह युद्ध वि.स.1856 में मराठो व् जयपुर की सेना के बीच लड़ा गया | यह फतेहपुर के पास हुआ था | मराठो की तरफ से बामन राव के नेतृत्व में तथा जयपुर की तरफ से रोडा राम दरजी के नेतृत्व में लडा गया | इसमें भी जयपुर सेना की हार हुयी | लेकिन बामन राव को भी बहुत बडी कीमत चुकानी पडी ।
(यह लेख इतिहास के ग्रंथो को आधार मानकर लिखा गया है । चित्र गुगल से लिये गये है । किसी को आपत्ति होने पर हटा दिये जायेंगे ।)

Feb 24, 2009

जौहर मेले में गूंजी मेवाडी शौर्यगाथाएं


उदयपुर से भूपेंद्र सिंह चुण्डावत :
जौहर मेले की शोभायात्रा में मेवाड की आन-बान और शान की गाथाएं बखान करती स्वरलहरियां गूंज उठी। भव्य शोभायात्रा ने शहरवासियों को मेवाड के वीर-वीरांगनाओं के शौर्य और बलिदान की याद दिला दी। जौहर श्रद्धांजलि समारोह के तहत परंपरागत शोभायात्रा भीलवाडा मार्ग स्थित भूपाल छात्रावास परिसर से रवाना हुई। घुडसवार केसरिया पताका लिए चल रहे थे। शोभायात्रा में दो दर्जन से अधिक घोडे शामिल थे। बैंडबाजों पर ‘वो मेवाडी सरदार कठै, ‘धन्य-धन्य चित्तौड की भूमि क्या-क्या करूं बडाई मैं’जैसे मेवाडी गीतों की स्वरलहरियां बिखर रही थीं। इस दौरान राजपूत समाज के पुरुष सिर पर मेवाडी पगडी धारण किए और महिलाएं रंग-बिरंगे परंपरागत परिधानों में चल रही थीं। शोभायात्रा में भगवान एकलिंगनाथ, महाराणा प्रताप, जौहर करने वाली वीरांगनाओं की छवि सहित भगवान शिव दरबार वाली झांकियां ट्रैक्टर में सजी हुईं थीं। शोभायात्रा में मेवाड के महाराणा महेन्द्रसिंह मेवाड, जौहर स्मृति संस्थान के अध्यक्ष उम्मेदसिंह धौंली, उपजिला प्रमुख जनकसिंह, कर्नल रणधीरसिंह बस्सी सहित कई प्रमुख लोग भी पैदल जनसामान्य का अभिवादन करते हुए चल रहे थे।

चित्तौडगढ के इतिहास में हुए बलिदान एक ऐसी मिसाल है जो पूरे देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलती है। जौहर स्मृति संस्थान के तत्वाधान मे आयोजित जौहर श्रद्धांजलि समारोह के तहत दुर्ग स्थित फतह प्रकाश महल प्रांगण में आयोजित मुख्य श्रद्धांजलि समारोह को कई वक्ताओं ने संबोधित करते हुए कहा कि चित्तौडगढ के इतिहास में जो बलिदान हुआ, उसकी गौरव-गाथा सदैव अमर रहेगी।

समारोह के मुख्य अतिथि सिरोही के महाराव रघुवीरसिंह ने चित्तौडगढ को पूरे राष्ट्र का तीर्थ बताते हुए कहा कि यहां जो बलिदान हुआ वह देश में हुए बलिदान से अलग था। उन्होने यहां हुए बलिदान को एक अद्धितीय मिसाल बताया। समारोह के धर्म गुरु बडीसादडी के स्वामी बंशीधराचार्य महाराज ने कहा कि यह समारोह केवल क्षत्रियों का नहीं बल्कि पूरे हिन्दु समाज का समारोह है। उन्होने आयोजको से इस समारोह को प्रतिवर्ष तय की गई २३ फरवरी के स्थान पर तिथि के अनुसार मनाया जाने का सुझाव दिया।

धर्म गुरु ने कहा कि मेवाड के लिए जिन लोगो ने भी सेवा की, उन सभी लोगो का सम्मान इस समारोह से जुडे आयोजकों को किया जाना चाहिए, फिर चाहे वे किसी भी समाज से जुडे हुए क्यों न हो। उन्होने कहा कि यदि महाराणा प्रताप नहीं होते तो हल्दी घाटी का रंग लाल नहीं होता।

समारोह के विशिष्ठ अतिथि सिविल लाईन्स, जयपुर के विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास ने कहा कि देश को आजादी किसी एक समुदाय ने नहीं बल्कि सभी ने दिलाई थी। ऐसी स्थिति में आजादी के बाद जाति को ले कर क्यों लडाई लडी जा रही है। खाचरियावास ने कहा कि आजादी से पहले धर्म व जाति के नाम पर कभी भी झगडा नहीं हुआ एवं जाति की नहीं बल्कि सम्मान की लडाई लडी गई।

भीलवाडा का सांसद वी.पी.सिंह, चित्तौडगढ सांसद श्रीचन्द कृपलानी, मनासा विधायक विजेन्द्र सिंह चन्द्रावत, गुजरात राजपूत युवक संघ के चेयरमेन डॉ. जयेन्द्र सिंह जी.एम. जाडेजा, भीम सिंह चुण्डावत, जिला कलेक्टर डॉ. समित शर्मा आदि ने भी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि चित्तौड दुर्ग शौर्य, साहस, त्याग, बलिदान, भक्ति, शक्ति का ऐसा संगम स्थल है जिसके हर पत्थर पर शूरवीरता की अमिट इबारत अंकित है।

वक्ताओं ने कहा कि जौहर से बढकर कोई त्याग बलिदान नहीं है। वक्ताओं ने कहा कि जौहर ओर साका मेवाड राष्ट्र की अस्मिता के लिए ऐसा श्रद्धासुमन है, जिसकी खुशबू हर कोईर् लेना चाहता है। समारोह के प्रारम्भ में संस्थान के अध्यक्ष उम्मेद सिंह ने समारोह के बारे में प्रकाश डालते हुए कहा कि पूर्व में यह समारोह तिथि के अनुसार आयोजित किया जाता था, लेकिन कुछ वर्षो से प्रति वर्ष २३ फरवरी को यह समारोह आयोजित किया जा रहा है, लेकिन कई जनें इसे पुनः तिथि के अनुसार, बीज एकादशी को ही आयोजित करने का सुझाव दे रहे है। इस सुझाव को संस्थान की आगामी बैठक में रखा जाएगा।

कई जनों का हुआ सम्मान

इस अवसर पर अतिथियों का संस्थान के पदाधिकारियों द्वारा माल्यार्पण कर पगडी पहनाकर एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मान किया गया। मुख्य अतिथि सिरोही दरबार द्वारा जौहर भवन के निर्माण के लिए ५० हजार से अधिक राशि देने वाले भामाशाहों का सम्मान किया गया। मेवाड़ महारानी साहिबा निरुपमा कुमारी मेवाड द्वारा विभिन्न क्षेत्रो में उल्लेखनीय कार्यों के लिए २० जनों को महारानी पद्मनी पुरस्कार, विधायक खाचरियावास द्वारा प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया।

फूलों की बारिश से हुआ स्वागत

शोभायात्रा में एक दर्जन से भी अधिक घुडसवार अपने हाथों में भाला एवं ध्वज लिए चल रहे थे, जबकि दो ऊंट भी शोभायात्रा की शोभा बढा रहे थे। शोभायात्रा में लगभग आधा दर्जन झांकिया भी शामिल थी। शोभायात्रा के स्वागत में नगर में कई स्वागत द्वार बनाए गए। विभिन्न संगठनों आदि के ओर से शोभायात्रा पर फूलों की बारिश कर स्वागत किया गया, वहीं कई स्थानों पर फल, शरबत आदि के काउन्टर भी लगाए गए। सुभाष चौक पर मोहम्मद शेरखान एवं अल्पसंख्यकों की ओर से लगाए गए फल काउन्टर पर मौजूद पूर्व सरपंच उस्मान खान आदि द्वारा फलों का वितरण किया गया। इसी तरह शोभायात्रा के दरगाह के बाहर पहुंचने पर दरगाह कमेटी की ओर से इसका स्वागत किया गया।



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Feb 17, 2009

इतिहास की चोटों का

इतिहास की चोटों का एक दाग लिए फिरते है |
सीने के घराने में इक दर्द लिए फिरते है ||

हम भूल नही सकते महमूद तेरी गजनी |
अब तक भी आंखों में वह खून लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||

बाबर तेरे प्याले टूटे बता कितने ?
पर सरहदी का अफ़सोस लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||

झाला था इक माना कुरम था इक माना |
सोने के लगे जंग पै अचरज लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दर्द लिए फिरते है |||

कर्जन तेरी दिल्ली में अनमी था इक राना |
सड़कों पे गिरे ताजों के रत्न चुगा फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दर्द लिए फिरते है |||

आपस में लड़े भाई गैरों ने हमें कुचला |
अब मिलकर लड़ने का अरमान लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||

Feb 10, 2009

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ-भाग ३ (अन्तिम भाग)


गुजरात राज्य मे एक स्थान है अंजार वैसे तो यह स्थान अपने चाकू,तलवार,कटार आदि बनाने के लिये प्रसिद्ध है । इस स्थान का जिक्र मै यहाँ इस लिये कर रहा हूं क्यों कि देवल चारणी यही कि वासी थी । उसके पास एक काले रंग की घोडी थी । जिसका नाम केसर कालमी था । उस घोडी की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी। उस घोडी को को जायल (नागौर) के जिन्द राव खींची ने डोरा बांधा था । और कहा कि यह घोडी मै लुंगा । यदि मेरी इच्छा के विरूद्ध तुम ने यह घोडी किसी और को दे दी तो मै तुम्हारी सभी गायों को ले जाउगां ।
एक रात श्री पाबूजी महाराज को स्वप्न आता है और उन्हें यह घोडी(केशर कालमी) दिखायी देती है । सुबह वो इसे लाने का विचार करते है । और अपने खास सरदार चान्दा जी, डेमा जी के साथ अंजार के लिये कूच करते है । देवल चारणी उनकी अच्छी आव भगत करती है और आने का प्रयोजन पूछती है । श्री पाबूजी महाराज देवल से केशर कालमी को मांगते है । देवल उन्हें मना कर देती है और उन्हें बताती है कि इस घोडी को जिन्द राव खींची ने डोरा बांधा है और मेरी गायो के अपहरण कि धमकी भी दी हुइ है । यह सुनकर श्री पाबूजी महाराज देवल चारणी को वचन देते है कि तुम्हारी गायों कि रक्षा कि जिम्मेदारी आज से मेरी है । जब भी तुम विपत्ति मे मुझे पुकारोगी अपने पास ही पाओगी । उनकी बात सुनकर के देवल अपनी घोडी उन्हें दे देती है ।
श्री पाबूजी महाराज के दो बहिन होती है पेमल बाइ व सोनल बाइ । जिन्द राव खींची का विवाह श्री पाबूजी महाराज कि बहिन पेमल बाइ के साथ होता है । सोनल बाइ का विवाह सिरोही के महाराज सूरा देवडा के साथ होता है । जिन्द राव
शादी के समय दहेज मे केशर कालमी कि मांग करता है । जिसे श्री पाबूजी महाराज के बडे भाइ बूढा जी द्वारा मान लिया जाता है लेकिन श्री पाबूजी महाराज घोडी देने से इंकार कर देते है इस बात पर श्री पाबूजी महाराज का अपने बड़े भाइ के साथ मनमुटाव हो जाता है ।
अमर कोट के सोढा सरदार सूरज मल जी कि पुत्री फूलवन्ती बाई का रिश्ता श्री पाबूजी महाराज के लिये आता है । जिसे श्री पाबूजी महाराज सहर्ष स्वीकार कर लेते है । तय समय पर श्री पाबूजी महाराज बारात लेकर अमरकोट के लिये प्रस्थान करते है । कहते है कि पहले ऊंट के पांच पैर होते थे इस वजह से बरात धीमे चल रही थी । जिसे देख कर श्री पाबूजी महाराज ने ऊंट के बीच वाले पैर के नीचे हथेली रख कर उसे उपर पेट कि तरफ धकेल दिया जिससे वह पेट मे घुस गया । आज भी ऊंट के पेट पैर पांचवे पैर का निशान है ।
इधर देवल चारणी कि गायो को जिन्दा राव खींची ले जाता है | देवल चारणी काफी मिन्नते करती है लेकिन वह नही मानता है , और गायो को जबरन ले जाता है | देवल चारणी एक चिडिया का रूप धारण करके अमर कोट पहुच जाती है | अमर कोट में उस वक्त श्री पाबूजी महाराज की शादी में फेरो की रस्म चल रही होती है तीन फेरे ही लिए थे की चिडिया के वेश में देवल चारणी ने वहा रोते हुए आप बीती सुनाई | उसकी आवाज सुनकर पाबूजी का खून खोल उठा और वे रस्म को बीच में ही छोड़ कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते है | (कहते है उस दिन से राजपूतो में आधे फेरो का ही रिवाज कल पड़ा )
पाबूजी महाराज अपने जीजा जिन्दराव खिंची को ललकारते है | वहा पर भयानक युद्ध होता है | पाबूजी महाराज अपने युद्ध कोशल से जिन्दराव को परस्त कर देते है लेकिन बहिन के सुहाग को सुरक्षित रखने के लिहाज से जिन्दराव को जिन्दा छोड़ देते है |सभी गायो को लाकर वापस देवल चारणी को सोप देते है और अपनी गायो को देख लेने को कहते है | देवल चारणी कहती है की एक बछडा कम है | पाबूजी महाराज वापस जाकर उस बछड़े को भी लाकर दे देते है |
रात को अपने गाँव गुन्जवा में विश्राम करते है तभी रात को जिन्दराव खींची अपने मामा फूल दे भाटी के साथ मिल कर सोते हुओं पर हमला करता है | जिन्दराव के साथ पाबूजी महाराज का युद्ध चल रहा होता है और उनके पीछे से फूल दे भाटी वार करता है | और इस प्रकार श्री पाबूजी महाराज गायो की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देते है | पाबूजी महाराज की रानी फूलवंती जी , व बूढा जी की रानी गहलोतनी जी व अन्य राजपूत सरदारों की राणियां अपने अपने पति के साथ सती हो जाती है | कहते है की बूढाजी की रानी गहलोतनी जी गर्भ से होती है | हिन्दू शास्त्रों के अनुसार गर्भवती स्त्री सती नहीं हो सकती है | इस लिए वो अपना पेट कटार से काट कर पेट से बच्चे को निकाल कर अपनी सास को सोंप कर कहती है की यह बड़ा होकर अपने पिता व चाचा का बदला जिन्दराव से जरूर लेगा | यह कह कर वह सती हो जाती है | कालान्तर में वह बच्चा झरडा जी ( रूपनाथ जो की गुरू गोरखनाथ जी के चेले होते है ) के रूप में प्रसिद्ध होते है तथा अपनी भुवा की मदद से अपने फूफा को मार कर बदला लेते है और जंगल में तपस्या के लिए निकल जाते है |
पाठक मित्रो को बोरियत से बचाने के लिये कथा को सीमित कर दिया गया है । पिछली पोस्ट मे कही टिप्पणी करते हुये ताऊ ने पूछा कि गोगा जी अलग थे क्या ? जवाब मे अभी मै इतना ही कहूंगा कि गोगाजी चौहान वंश मे हुये थे श्री पाबूजी महाराज के बड़े भाई बूढा जी कि पुत्री केलम दे के पती थे । गोगाजी चौहान के बारे मे विस्तार से अगली पोस्ट मे लिखूगां । अब चलते चलते पाबूजी महाराज कि शादी का एक विडियो भी हो जाये

video

Jan 26, 2009

पु.श्री तन सिंह जी की जयंती मनाई गई


जोधपुर (25जनवरी) श्री क्षत्रिय युवक संघ के संस्थापक स्व.पु.श्री तन सिंह जी की जयंती बासनी स्थित जय भवानी नगर में मनाई गई | कार्यकर्म में उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आव्हान किया गया इस अवसर पर आयोजित समारोह में बोलते हुए क्षत्रिय युवक संघ के प्रान्त प्रमुख श्री प्रेम सिंह जी ने कहा कि स्व.पु. तन सिंह जी जैसा जीवन जीने का हम सभी को अनुसरण करना चाहिए तभी संघ की कार्यप्रणाली की सार्थकता बढेगी | इस अवसर श्री गजेन्द्र सिंह महरोली , श्री माधो सिंह चाडी,श्री शिव सिंह राठोड ,श्री उम्मेद सिंह सेतरावा आदि ने भी अपने अपने विचार व्यक्त किए |

पु.तन सिंह जी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें !

Jan 4, 2009

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ भाग-2

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ की कथा श्रृंखला की यह दूसरी कडी है । पाठकों से निवेदन है
कि इस लेख को इतिहास कि कसौटी पर ना परखे क्यों कि यह एक कथा है और जन मानस के मुख से
सुनी हुइ है ।श्री पाबूजी राठौङ का जन्म कोळू ग्राम में हुआ था । कोळू ग्राम जोधपुर से फ़लौदी जाते है
तो रास्ते मे आता है । कोळू ग्राम
के जागीरदार थे धांधल जी । धांधल जी की ख्याति व नेक नामी दूर दूर तक थी । एक दिन सुबह सवेरे
धांधलजी अपने तालाब पर नहाकर भगवान सूर्य को जल तर्पण कर रहे थे । तभी वहां पर एक बहुत ही
सुन्दर अप्सरा जमीन पर उतरी । राजा धांधल उसे देख कर मोहित हो गये । उन्होने अप्सरा के सामने
विवाह का प्रस्ताव रखा । जवाब में अप्सरा ने एक वचन मांगा कि राजन आप जब भी मेरे कक्ष में प्रवेश
करोगे तो सुचना करके ही प्रवेश करोगे ।जिस दिन आप वचन तोङेगें मै उसी दिन स्वर्ग लोक लौट जाउगीं।
राजा ने वचन दे दिया ।
कुछ समय बाद धांधलजी के घर मे पाबूजी के रूप मे अप्सरा रानी के गर्भ से पुत्र प्राप्ति होती है । समय
अच्छी तरह बीत रहा था । एक दिन भूल वश या कोतुहलवश धांधलजी अप्सरा रानी के कक्ष में बिना सूचित
किये प्रवेश कर जाते है । वे देखते है कि अप्सरा रानी पाबूजी को सिंहनी के रूप मे दूध पिला रही है । राजा
को आया देख अप्सरा अपने असली रूप मे आ जाती है और राजा धांधल से कहती है कि "हे राजन आपने
अपने वचन को तोङ दिया है इसलिये अब मै आपके इस लोक में नही रह सकती हूं । मेरे पुत्र पाबूजी
कि रक्षार्थ व सहयोग हेतु मै दुबारा एक घोडी(केशर कालमी) के रूप में जनम लूगीं । यह कह कर अप्सरा
रानी अंतर्ध्यान हो जाती है ।


समय पाकर पाबूजी महाराज बड़े हो जाते है । गुरू समरथ भारती जी द्वारा उन्हें शस्त्रों की दीक्षा दी जाती
है । धांधल जी के निधन के बाद नियमानुसार राजकाज उनके बड़े भाई बुङा जी द्वारा किया जाता है । इसी
बात को विडीयो मे भी दिखाया है ।



क्या कभी ऊंट के पांच पैर थे ? जवाब जानने के लिये आपको इस
कथा कि अगली कडी का इन्तजार करना पड़ेगा शेष
कथा अगले भाग में :-