Apr 24, 2011

धर्मं शास्त्र और क्षत्रिय

कुँवरानी निशा कँवर
आज उपलब्ध लगभग सभी धर्म शास्त्रों में किसी न किसी रूप में क्षत्रियों का वर्णन अवश्य ही आता है |फिर भी धर्म शास्त्रों का शोध पूर्ण अध्ययन किया जाये तो एक बात उभर कर सामने आती है कि अधिकांश धर्म शास्त्र विरोधाभाषी है |जैसे आज भारतीय जन मानस पर गहरी छाप छोड़ चुकी "श्री राम चरित मानस " को ही लें |इसमें गोस्वामीजी लिखते है कि महाराज मनु और महारानी शतरूपा को वैराग्य हुआ तो वे नैमीसारान्य में जाकर घोर तप करने लगे |और उनकी इस कठोर तपस्या के मध्य साधारण देवी देवताओं से लेकर ब्रह्मा,विष्णु और आदिदेव शंकर जी कई बार आए और उनकी कठोर तपस्या का प्रयोजन जानना चाहाकिन्तु मनु जी ने इनको न तो तरजीह ही दी और न ही इस ओर ध्यान ही दिया |उनका लवाना तो परम-पिता परमेश्वर ,इस जगत के आधार,अखिल ब्रह्मांड के नायक,अक्षर ,अकाल,परब्रह्म के प्रति लगी हुयी थी |और अंत में वह परब्रह्म प्रकट भी हुए ,और उस परब्रह्म का जो वर्णन गोस्वामीजी ने किया है वह श्री राम और साक्षात् प्रकृति स्वरूपा माता सीता का है न कि विष्णुजी और एवं लक्ष्मी जी |फिर उन्ही को अपने पुत्र रुपे में जन्म का वरदान पाने में राजा मनु एवं शतरूपा सफल भी हुए |किन्तु आगे चलकर इन्ही गोस्वामीजी की रामचरित मानस में श्री राम को विष्णुजी और माता सीता को लक्ष्मीजी का अवतार बता दिया जाता है |और इसी में सुन्दर कांड में श्री हनुमानजी जब लंका की राजसभा में रावण के समक्ष उपस्थित होते है तो रावण को समझाते है | "शंकर सहस्त्र ,विष्णु ,अज तोही ! सकहिं राखि राम कर द्रोही ! !"अर्थात हजार शंकरजी ,हजार ब्रह्माजी और हजार विष्णु जी मिलकर भी उसे नहीं बचा सकते जो श्री राम का द्रोही है |अर्थात श्री राम विष्णु जी कई हजार गुना बड़े और शक्तिवान है |फिर बीच बीच में गोस्वामीजी श्री राम को विष्णुजी का अवतार श्री को कभी आकाश और कभी एकदम से धरती पर पटक कर आखिर गोस्वामीजी सिद्ध क्या करना चाहते है मेरी तो समझ से परे है |जब मनुजी को अक्षर ,परब्रह्म ने प्रकट होकर दर्शन दिए थे तब वे श्री राम और सीता जी के रूप का वर्णन स्वयं गोस्वामीजी ने दो

भुजा धारी,धनुष बाण धारी के रूप में किया है |और अगले जन्म में महारानी कौशल्या के सामने उनको गोस्वामीजी द्वारा "भये प्रगट कृपाला ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,," में उनको चार भुजा धारी ,विष्णुजी बना देते है |आखिर गोस्वामीजी साबित क्या करना चाहते है ???क्या श्री राम महाराज दशरथ के अंश और महारानी कौशल्या की कोख से पैदा नहीं हुए थे ??तो क्या उस अक्षर ,उस सर्व शक्तिमान परम-अविनाशी इश्वर द्वारा महाराज मनु और शतरूपा को दिया गया वचन झूंठा था ???क्या इश्वर के लिए कुछ भी असंभव होसकता है जो वह कोख में भी प्रविष्ट नहीं होपाया ???????मुझे बड़ा आश्चर्य है कि सैकड़ों बार अध्यन कर चुके प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान कभी इस ओर गया ही नहीं |बात इतनी ही नहीं है आगे देखिये धनुष यज्ञ के समय परशुरामजी से श्री राम के मुख से गोस्वामीजी ने कहलवाया है कि "आप लड़ने तो मेरी हानि ही है क्योंकि मारूम्गा तो ब्रह्माण की हत्या का पाप लगेगा और हरूँगा तो सुर्यवंश की अपकीर्ति होगी |" यह क्या कहलवा रहे है तुलसीदास जी ????और वो भी उन श्री राम जी के मुख से जिन्होंने अपने जीवनकाल में सिर्फ "वानर राज बाली" के अतिरक्त जिसे भी मारा वह ब्रह्माण ही था |ऐसा भी नहीं की धनुष यज्ञ से पूर्व उन्होंने किसी ब्रह्माण को नहीं मारा हो ,इस यज्ञ तक पहुँचने से पूर्व ताड़का,सुबाहु आदि को मारा जाचुका था |इसके अलावा रावण ,कुम्भकरण ,मरीचि ,सुबाहु,सूर्पनखा सहित समस्त दैत्य ब्राहमण ही तो थे |दैत्य का अर्थ होता है दिति के पुत्र ,ब्रह्माण ऋषि कश्यप और ब्रह्माण कन्या दिति के वंशज ही दैत्य कहलाये थे |यहाँ तक की महर्षि बाल्मीकि जी ने जिस रामायण की रचना की उसका तो नाम भी "पौलस्त्य वध " जिसका का सीधा सा अर्थ पुलस्त्य ऋषि के वंशजों का वध |इस राम चरित मानस में उसी के नायक श्री राम के चरित्र में इस प्रकार की विरोधाभाषी बाते किसी ने नोट नहीं की यह बड़े ही आश्चर्य की बात है |
केवल राम चरित मानस में ही ऐसा हो ऐसा भी नहीं है |महाभारत में वेद-व्यास जी के नाम से विख्यात श्री कृष्ण दैवपायन (अर्थात दुसरे कृष्ण)को पराशर ऋषि एवं सत्यवती का नाजायज पुत्र बताया गया है |जबकि उन्ही वेद-व्यास जी से उनके शिष्य पूंछते है कि"आपको श्री हरि का पुत्र क्यों कहते है ??"तब वेद-व्यास जी बताते है क्योंकि "मुझे श्री हरि ने अपनी वाणी से उत्पन्न किया है |मै किसी भी माता या पिता के द्वारा पैदा किया गया नहीं हूँ |"फिर महभारत जिसके रचियता स्वयं वेद-व्यास जी ही है उसमे वे अपने आपको पराशर ऋषि एवं सत्यवती की नाजायज संतान क्यों मानेंगे ????आगे देखिये फिर महाराज विचित्र-वीर्य जब निसंतान रहकर मर्जाते है तो उनकी रानियों का इन्ही वेद-व्यासजी से नियोग करवा कर पुत्र उत्पन्न करवाए जाते है |यह सब कितना अनैतिकता से भर पूर लगता है |जब आज के परिवेश में यह अनैतिक लग रहा है तब उस समय तो घोर अनैतिक लग रहा होगा |पर ऐसा धर्म शास्त्रों में क्यों है ??जबकि विचित्र-वीर्य का नाम ही विचित्र-वीर्य इसलिए पड़ा था क्योंकि उनके मृत्यु के उपरांत भी उनका अंश सुरक्षित रखा जासकता था जिसे क्वे-व्यास जी जैसे उच्च कोटि के ऋषि ही सुरक्षित रखने की विधि जानते थे |जिसे पितामह भीष्म के साथ वेद-व्यासजी की अभिन्न मित्रता के कारन वेद-व्यासजी ने उस विधा का उपयोग कर महाराज विचित्र वीर्य के अंश से ही रानियों के पुत्र पैदा करवाए |मुझे तो लगता है की धर्म शास्त्रों के साथ कोई छेड़छाड़ हुयी है |और उसमे क्षत्रिय पत्रों के चरित्र को निम्न साबित करना उदेदश्य रहा होगा |उनके धार्मिक ग्रंथों में इस प्रकार का झूंठ भर दिया गया है जिसमे लगता है की सत्य इस असत्य के ढेर में कहीं दब कर रह गया है |इन्होने श्री कृष्ण के चरित्र को तो ऐसा पेश किया है जो कि लगता कि कृष्ण इश्वर नहीं कोई आवारा छोकरा था |योगेस्ग्वर श्री कृष्ण के कभी १६१०८ गोपिकाओं से शारीरिक सम्बन्ध बताते है तो कभी महारास के जरिये अनैतिक लीलाए बताते है |जबकि श्री कृष्ण जब गोकुल से मथुरा जाते है तब उनकी उम्र मात्र ११-१२ वर्ष थी |इतनी अल्प-आयु के बालक से ऐसी अनैतिक लीलाएं इन धर्म के ठेकेदारों ने कैसे संभव करा दी यह बात अपने आप में ही शोध का विषय है |क्योंकि मथुरा आने के बाद तो श्री कृष्ण फिर गोकुल लौट कर गए ही नहीं |अब जब लगभग सभी धर्म शास्त्रों में इस तरह कि घोर मिलावट है तब एक साधारण क्षत्रिय अपने धर्म कर्म को कहाँ से ग्रहण करे ?और इन धर्म शास्त्रों को पूरी तरह से नकार दें तब भी हानि- ही हानि है क्योंकि लाखों करोड़ों वर्षो का क्षत्रिय इतिहास ही तो है यह धर्म शास्त्र |फिर करें तो क्या करें ???इसका एक ही उत्तर है दूध में भरी मात्र में मिले पानी में या तो हंस बन कर पानी छोड़ कर सिर्फ दुग्ध पान किया जाये |या फिर दूध को गर्म करके जमाना पड़ेगा और फिर असली दूध दही बनकर पानी स्वयं अलग होजायेगा |अर्थात धर्म शास्त्रों का अध्यन या तो शोध पूर्ण तरीके से किया जाये ,जिससे हंस कि तरह केवल दूध का ही पान किया जाये | या फिर ईश्वर के नाम स्मरण से अपने विवेक को,और अपने ज्ञान को जागृत करें |जिससे सत्य दही कि तरह आपके सम्मुख होगा |यदि बिना इसके हम उपलब्ध धर्म शास्त्रों का आंख मींच कर विश्वाश करने लगे तो ठगे जायेंगे |और अधिकांश धर्म शास्त्र जो कि हमारा इतिहास मात्र है को इतिहास के तौर पर ही लेना होगा |हमे जानना होगा कि किस रश्ते पर चलकर हमारे पूर्वजों ने अपने धर्म (स्वधर्म)का पालन किया है |
पवित्र ग्रन्थ श्री गीता में चौथे अध्याय के पहले ही श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है

"इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम |

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाक्वे अब्रवीत !!१!!"

अर्थात मैंने सृष्टि के आरंभ में इस निर्विकार योग को विवस्वान आदित्य के लिए कहा था और विवस्वान आदित्य ने मनु को ,मनु ने इक्ष्वाकु को कहा था |

"एवं परंपराप्राप्तिमिम' राजर्षयो विदः !

स कालनेह महता योगोनष्ट : परंतप !!२!!

अर्थात इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को क्षत्रिय ऋषियों ने ने जाना ,वह योग बहुत काल से इस लोक में नष्ट होगया है |अर्थात आज से पहले भी यह गीता का ज्ञान या योग जो परंपरा से प्राप्त क्षत्रिय ऋषियों के पास पहले से ही था किन्तु नष्ट होगया था |उसी ज्ञान योग को श्री कृष्ण ने अर्जुन को पुनः बताया |और या गीता का ज्ञान अर्जुन को तब दिया गया जब अर्जुन क्षात्र-धर्म को बीच रण- क्षेत्र में अकेला छोड़कर ब्रह्मण-धर्म की ओर पलायन करने के लिए आतुर था |इस ज्ञान योग को ग्रहण कर अर्जुन पुनः क्षात्र-धर्म के पालन के लिए उठ खड़ा हुआ और सर्व श्रेष्ट क्षत्रियों की गिनती में आगया |इसका अर्थ यह हुआ कि गीता का यह निष्काम कर्म योग ही तो क्षात्र-धर्म (स्वधर्म) का आधार है |क्योंकि अर्जुन इस क्षात्र-धर्म से पलायन को आतुर था |अतः वह कर्म योग जो श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया वह हुम्क्षत्रियों के पास परम्परा से प्राप्त था |अतः आज जब सभी अर्जुन की तरह क्षात्र-धर्म स्वे पलायन आतुर है तो इस क्षात्र-धर्म के पुनः पालन के लिए हम सभी श्री गीता जी के योग ,ज्ञान और निष्काम कर्म योग की तुरंत और अवश्यंभावी आवश्यकता है |तो हम सभी को अपने आपको अर्जुन के स्थान पर रख कर इस गीता का शोध पूर्ण अध्यन की आवश्यकता है |अक्षरश:इसलिए नहीं की मुझे लगता है की इनकी मिलावट से श्री गीता जी अछूती रह गयी हों संभव नहीं लगता |फिर भी श्री गीता जी में इनकी मिलावट उतनी नहीं होपयी जिंतना कि रामायण एवं महाभरत में है |अतः हम सभी अपने धर्म क्षात्र-धर्म के पालन के आधार को श्री कृष्ण द्वारा दिए गए इस योग को समझे एवं अपने जीवन में उतर कर उसे व्यवहारिक सिद्ध करें |धर्म शास्त्रों का क्षात्र-धर्म पुनरुत्थान में सिर्फ यही योगदान होसकता है |

"जय क्षात्र-धर्म"

कुँवरानी निशा कँवर
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

Apr 13, 2011

"अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " की ओरसे अहमदाबाद में सामूहिक विवाह .......!

कल १२ अप्रैल के शुभ अवसर पर  अहमदाबाद के निरांत चौकड़ी के पास "अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " की ओरसे सामूहिक विवाह का आयोजन संपन्न हुवा...! विशाल मंडप में ...वैदिक मंत्रनाओं के तथा मुख्य अतिथि के आशीष के साथ १० जोड़े विवाह के बंधन में जुड़ गए..! दूधेश्वर शक्तिपीठ के महंत तथा "अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " के संरक्षक श्री महंत नारायण गिरी जी स्वामी महाराज, भगवान जगन्नाथ मंदिर के प्रमुख महंत ,"अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय राजपूत संघ " के राष्ट्रीय प्रचारक स्वामी शान्तं मोक्षं गिरी तथा कुंवर जितेन्द्रसिंह चौहान, राष्ट्रीय कोशाध्यक्ष श्री बलरामसिंह तोमर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जयपालसिंह गिरासे, राष्ट्रीय महासचिव श्री रत्नदीप सिसोदिया, महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष श्री सुभाषसिंह राजपूत, गुजरात प्रदेश अध्यक्ष श्री महेशसिंह कुशवाह, श्री रामप्रतापसिंह चौहान, श्री साहबसिंह सेंगर ,श्रीमती संतोष सिसोदिया, अहमदाबाद नगराध्यक्ष श्रीमती पुनमसिंह नगर, अहमदाबाद के प्रतिष्ठित नागरिक, वधु-वर पक्ष के रिश्तेदार, भोलासिंह चौहान, कमलसिंह तोमर,श्रीमती रीता सिंह, राष्ट्रीय प्रचारक श्री राजकुमारसिंह गहरवार, श्री राजेन्द्रसिंह गौर, श्री आर.पि.बडगुजर,आर.ए.सिंह, राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष श्री भवानीसिंह शेखावत ,भूमसिंह देवड़ा आदि एवं स्थानिक कार्यकर्ता उपस्थित थे! प्रारंभ में सजी गाड़ियों में वर-वधु की बारात कुलदेवी दर्शन के लिए गयी! वहा से बारात मंडप में उपस्थित हुई.! विवाह समारोह का विधिवत उदघाटन हुवा.....विवाह संस्कार के बाद राजपुताना कलेंडर का विमोचन एवोम अथिति सन्मान का आयोजन किया गया! इस समय कुंवर जयपालसिंह गिरासे, कुवर जितेन्द्रसिंह चौहान ने उपस्थित जन-समुदाय को मार्गदर्शन किया! श्री महंत नारायण गिरिजी महाराज ने समस्त नव-परिणित जोड़ों को अपने आशीर्वाद प्रदान किये! संघटन की ओरसे इस विवाह में सम्मिलित हर जोड़े को संसार के लिए उपयुक्त सामुग्री जैसे कपाट,बर्तन,मंगलसूत्र,साड़ी,कपडे आदि उपहार में दिए गए! समारोह के बाद सभी उपस्थित समुदाय के लिए भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गयी थी! गुजरात प्रदेश के अध्यक्ष श्री महेश सिंह कुशवाह ने कार्यक्रम का सञ्चालन किया!

Apr 7, 2011

क्षात्र-धर्म के पालन से ही भौतिक और अध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति संभव है |

कुँवरानी निशा कँवर नरुका
जिस प्रकार हर नदी का एक ही भाव है की वह सागर की अथाह गहराईयों में समां जाये उसी प्रकार प्रत्येक जीव का एक ही एक भाव है कि वह परम तत्त्व (आत्मा ) में अपने को समां दे,विलीन कर दे |किन्तु मनुष्य जीवन या मानव योनी के बगेर यह बहन ही नहीं रहता कि आखिर जीव का लक्ष्य है क्या ?क्योंकि मानवेत्तर योनी में तो विवेक और ज्ञान की उपस्थिति ही नहीं होती जानवर तो केवल प्रेरणा से कार्य करते है "जैसे भूंख लगी तो भोजन की तलाश शुरू,यह भूंख की प्रेरणा से कार्य करते है |जबकि मनुष्य योनी में हमारे पास विवेक और ज्ञान जैसे चीजों के बल पर हमे हमारा यानि जीव का वास्तविक भाव ,धर्म और लक्ष्य को पहिचानने का अवसर मिलता है |किन्तु हम इन्द्रियों के वशीभूत हुए अपने मन की कुचालो में फंश जाते है |और यह मन जो स्वयं इन्द्रियों के वशीभूत होचुका होता है इन्द्रियों के सुख के लिए प्राण के मूल स्वभाव (अपना भाव) यानि "अध्यात्म" के विपरीत आचरण करने लगता है |अब सवाल उठता है की यह अध्यात्म क्या है ? गीता के ८ वे अध्याय के पहले ही श्लोक में अर्जुन ने प्रश्न किया है की अध्यात्म क्या है और श्री कृष्ण ने उन्हें बताया की "स्व-भाव" ही अध्यात्म है |यानि की आत्मा की अधीनता ,या यों कहें कि जीव या प्राण द्वारा आत्मा की और भावना को ही अध्यात्म कहते है |प्राण इन्द्रियों के वशीभूत हुए मन के दुष्चक्र को छोड़ आत्मा की और उन्मुख होता है उसे अध्यात्म कहते है | जब यह प्राण (जीव) मन के अनुसार सुख की खोज में निकल पड़ता है तो चलिए सुख या आनंद के लिए ही सही |अब मानव अपने पुरे जीवन को केवल सुख के लिए समर्पित कर देता है |वह प्रातः काल उठने से लेकर रात्रि काल विश्राम तक केवल बाहरी सुख को प्राप्त करने के लिए अपने आपको समर्पित कर देता है |किन्तु क्या यहाँ भी उसका एक प्रकार से लक्ष्य सुख,फिर और सुख और फिर सबसे अधिक सुखी या दुसरे शब्दों में स्थायी सुख जिसे परम सुख या परम आनंद कहते है को प्राप्त करना नहीं होजाता है |अब सवाल यह उठ खड़ा होता है की स्थायी सुख या परम आनंद आखिर है क्या ?क्या भोतिक सुख सुविधाए ,और आमोद-प्रमोद के साधन स्थायी सुख पैदा कर सकते है ? निश्चित रूपसे यह स्थायी सुख नहीं बल्कि क्षणिक सुख और फिर दुःख के दायक होते है |तो फिर स्थायी सुख या परम आनंद कहाँ मिएगा और कैसे मिलेगा और कौन उस सुख को प्राप्त कर सकता है ?यह प्रशन हर जेहन में जरुर उभरेगा |आज चारो ओर मिडिया से लेकर साधू-संतो तक में भोली जनता को इस गूढ़ विषय के बारे में भरमाये जारहा है |प्रातः काल बड़े सवेरे से लेकर गहरी रात्रि तक ज्यादा-तर टी० वि० चेनलों पर जो अपने आपको धार्मिक और अध्यात्मिक न जाने किन किन नामो से नवाजते रहते है पर चिल्ला-चिल्ला कर अपने उत्पादनों को धर्म और आध्यात्मिकता के पेपर में लपेट कर बेचने की प्रक्रिया चल पड़ी है |सभी सत्य को खोज लेने का दावा कर रहे है और "परम आनंद " को प्राप्त करने के अनेक रश्ते बताये जारहे है |यह अलग बात है की उन राष्टो पर शायद वे स्वयं न कभी चले है और न ही चल सकते है |किन्तु भोली जनता जरुर ठगी जारही है |अब सवाल यह उठता है की परम आनंद कहाँ मिलेगा ,कैसे मिलेगा और कौन उसे प्राप्त कर सकता है ?पहले हम इस बात पर चर्चा करते है की परम आनंद कहाँ मिलेगा और कैसे मिलेगा ?तो इस बात में तो सभी एक मत है की परम आनंद तो केवल "निर्विकल्प समाधि" यानि परम तत्त्व में सम्मिलन ,यानि मोक्ष में ही मिल्सकता है |किन्तु कैसे मिलेगा ,में सभी अलग अलग मत रखते है ,किन्तु यह अटल सत्य है कि इन्द्रियों से मन को स्वतन्त्र कराना होगा और प्राण का स्वस्थ मन पर शासन स्थापित करना होगा | चूँकि इन्द्रियों के विषयो से युद्ध कर उने परास्त कर मन को अपने नियंत्रण में लेना होगा |यानि मन जो कि इन्द्रियों के विषयो से विवश है कि रक्षा प्राण(जीव) को करनी होगी |और जहाँ विवश कि रक्षा की बात हो तो क्षात्र-धर्म के पालक की आवश्यकता होगी |अतः परम आनंद तो क्षात्र-धर्म के पालन के द्वारा ही प्राप्त किया जासकता है | इसीलिए ज्ञात इतिहास में आज तक क्षत्रिय के अतिरिक्त किसी को भगवत-पद या मोक्ष नहीं मिल सकी है |यह अलग बात है कि शास्त्रों में जोड़-तोड़ कर घपला बजी कर कुछ क्षत्रिय ऋषियों को ब्रह्मण सिद्ध करने का सफल प्रयास किया गया है |अब मै यहाँ छान्दोग्य उपनिषद का एक उदहारण प्रस्तुत करना चाहूंगी जिसमे वास्तविक क्षत्रिय यानि असली क्षत्रिय कि पहिचान बताई गयी है |
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" वास्तविक क्षत्रिय कौन है ?असली क्षत्रिय वही है जो मन से आंतरिक युद्ध लड़े,इन्द्रियों के विषयों से विवेक और दृढ इच्छा शक्ति के द्वारा लड़े और मन को पूरी तरह से नियंत्रण में कर ले |असली क्षत्रिय वह है जी रज,तम ,कुत्सित विचार और कुत्सित संस्कारों से लड़े,अपने अन्दर सतो गुण का विकास करे और उसे जागृत करे |असली क्षत्रिय वह है जिसका शास्त्र है उसकी दृढ इच्छा शक्ति और अस्त्र है उसका विवेक :उसका युद्ध-क्षेत्र उसी के भीतर है |विवेक,वैराग्य और मुमुक्षत्व जैसे गुण उसकी ढाल है| -छान्दोग्य उपनिषद

इससे यह बात साबित होती है कि जीवन का चाहे भोतिक सुख हो ,या वास्तविक सुख परम आनंद यानि मोक्ष यह क्षात्र-धर्म के बगेर संभव ही नहीं है |फिर हम क्यों धर्म के नाम पर खुली अलग-अलग दुकानों के चक्कर काट कर अपना शारीर,श्रम ,समय और धन का अपव्यय करते फिरते है |श्री कृष्ण से बड़ा गुरु किसे खोजते फिर रहे हो ?श्री गीता से श्रेष्ट किस ग्रन्थ की तलाश है ?और इन दोनों में पुरजोर तरीके से कहा गया है कि



"श्रेयानाम स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्टितात !

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह : !! 35!! तीसरा अध्याय

भली प्रकार आचरण किये गए दूसरे के धर्म ,गुण रहित अपना कल्याणकारी है |अपने धर्म का पालन करते हुए तो मरना भी कल्याणकारक है ,जबकि दूसरे का धर्म तो भय को देने वाला होता है |

"श्रेयानाम स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्टितात !

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम !!४७!!अठारहवा अध्याय

भली प्रकार आचरण किये गए दूसरे के धर्म ,गुण रहित अपना कल्याणकारी है |स्वभाव से नियत किये हुए कर्म अर्थात वर्नाधार्मानुसार नियत कर्म कर्ता हुआ ,मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता है |

"सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत !

सर्वारम्भा हि दोषेण धुमेनाग्निरिवावृता !!४८!!अठारहवा अध्याय

हे अर्जुन दोषयुक्त भी जन्म के साथ उत्पन स्वधर्म को नहीं त्यागना चाहिए !,निश्चित ही धुवाँ से अग्नि की भांति सभी कर्मो का आरंभ तो दोष से ढका हुआ है !

यदि हम आस्तिक है और यह मानते है कि ईश्वर या प्रकृति का कोई नियंत्रक है तो निश्चित रूपसे किसी प्राक्रतिक और अध्यात्मिक कारण से ही हमारा जन्म हमारे माता-पिता के घर हुआ है |जिस प्रकार हमें अपनी जननी और जनक को स्व-माता और स्व-पिता मानने में हर्ष और अनुकूलता महशूश होती है |वैसे ही स्वधर्म में अपने को समर्पित करने में अनुकूलता प्राप्त होती है | इसलिए गीता में उल्लेखित उस क्षात्र -धर्म के पालन में ही हमे भौतिक और अध्यात्मिक दोनों ही लक्ष्य पूरे हो सकेंगे |


"जय क्षात्र-धर्म "
कुँवरानी निशा कँवर नरुका
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

Apr 6, 2011

राजपूत का उत्थान बिना क्षत्रित्त्व के संभव ही नहीं है

Kunwarani Nisha Kanwar
राजपूत के उत्थान की कल्पना भी नहीं की जासकती यदि वो क्षत्रित्त्व को पुनः धारण ना करे तो ,,,,,,,,,,

आज कुछ लोग राजपूत उत्थान (विकास) के लिए तड़फ रहे है, किन्तु मानसिक दासत्व से दूर होना नहीं चाहते है |दासत्व और क्षत्रित्व का भला कभी साथ होसकता है ????

पतन और दासत्व एक ही अर्थ वाले दो शब्द मात्र है |इसलिए मानसिक दासत्व से दूर हुए बगेर ,उत्थान जैसे शब्दों का क्या अर्थ रह जायेगा |भला कोई किसी कारागार मै सुविधाओ की मांग से कोई कैदी स्वतंत्रता का रस लेसकता है ??

क्या कारागार के स्वर्ण भवन या स्वर्ण लंका में माता सीता प्रशन्न थी ???

क्षत्रित्व के बगेर राजपूत के उत्थान की परिकल्पना ठीक उसी तरह है जैसे कि कोई कैदी सोचे कि इस कारागार में यदि वातानुकूलित कक्ष आवंटित होजाय तो हमारा जीवन का कल्याण होजायेगा |शारीरिक दास और मानसिक दास में एक विशेष अंतर है,वो यह कि शारीरिक दास तो अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत रहता है जबकि मानसिक दास तो दासत्व को ही धर्म,और अपना आदर्श मान लेता है,,,,,

मानसिक दासता तो स्थायी रूपसे आपके ह्रदय में अपना डेरा जमा लेती है ,,,,,,और आपके विवेक को बिना मोल किसी को भी गिरवी(रहन) रख देती है|

इसलिए इसका असर तो भावी पीढ़ीयां विरासत में लेकर अति-प्रशन्न होती है | इसलिए मानसिक दासता तो शारीरिक दासता से कहीं अधिक खतरनाक है |किन्तु यह निष्कर्ष भी तो वही निकल पायेगा, जो स्वयं विवेक-शील(बुद्ध) होगा , यानि मानसिक-दास नहीं होगा |

"हमारी भूले" में आदरणीय श्री देवी सिंह जी महार साहब ने ठीक ही तो सिद्ध किया हैकि , यह "राजपूत,हिन्दू,और सिंह जैसे सम्बोधन तो हमारे राजनितिक और परंपरागत वर्ग-शत्रुओं ने एक षड़यंत्र के तहत हमें दिए है ताकि हम क्षत्रिय होने पर गर्व करने के बजे राज-कुल ,राजकुमार, और किसी जानवर से अपनी तुलना करने में ज्यदा गौरव महसूस करने लगे,और दुर्भाग्य से हमारे शत्रुओं का यह षड़यंत्र पूर्ण सफल रहा है |

हमने इन शब्दों को स्वीकार कर अपने अस्तीत्व को प्राणघातक खतरे में डाल दिया, जबकि क्षत्रिय से श्रेष्ट कोई शब्द आज तक किसी शब्द कोष में उपलब्ध ही नहीं है क्योंकि ,ईश्वर के गुण जिसमे न्यूनतम आवश्यकता हो उस शब्द कि तुलना केवल,किसी राजकुल ,और किसी जानवर के केवल एक गुण शौर्य मात्र से तुलना कर अपनी मुर्खता को गौरव का भी नाम दे दिया गया |वह री मानसिक दासता ,,,,इसलिए दास कभी क्षत्रिय नहीं हुआ करते |और उनका विनाश निश्चित होता है चाहे वो इस समस्त भूमंडल के चक्रवृति सम्राट ही क्यों ना रहे हो,,,,,इसलिए यदि राजपूत का उत्थान करना है तो उसे स्वधर्म क्षात्र-धर्म को पुनःअंगीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प हो ही नहीं सकता है |इसलिए राजपूत का उत्थान केवल और केवल क्षत्रित्त्व में ही निहित है,,,,,

"जय क्षात्र-धर्म "
Kunwarani Nisha Kanwar
shri kshatriya veer jyoti

Apr 5, 2011

जयपुर में राजपूत समाज को समर्पित अतिथि भवन

राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में प्रत्‍येक दिन देशभर से राजपूत समाज के लोग किसी न किसी कार्य से पधारते है । चाहे वह उनका व्‍यक्तिगत कार्य हो या सामाजिक । कोई अपने बच्‍चो को परिक्षा दिलाने आते है तो कोई नोकरी की तलाश में । कोई राजनैतिक कार्य से तो कोई स्‍थानान्‍तरण हेतु , कोई रिश्‍तेदार की शदी मे तो कोई बच्‍चो का रिश्‍ता ढूढने । काम चा‍है कुछ भी रहै जयपुर मे ठहरने के लिए उपयोगि व सस्‍ते स्‍थान की आवश्‍यकता महसूस हो रही है।
देशभर के लगभग सभी बडे शहरो मे ऐसे भवन है जहां आम राजपूत रूक सकता है इसी तर्ज पर देश की अग्रणी राजपूत वैवाहिक सस्‍था जोग संजोग डाट काम ने जयपुर मे समाज के प्रत्‍येक वर्ग को समर्पित अतिथि भवन जोग संजोग राजपूत भवन खोलने का निण्रय किया । शहर की पाश कालोनी वैशाली नगर स्थित इस भवन मे 13 कमरे मय कूलर , दो बडे हाल , 20 बाथरूम मय गीजर की सुविधा है । शहर के सभी प्रमुख स्‍थानो के लिए सीधी बस सेवा उपलब्‍ध है । इस भवन मे परिवार सहित रूकने के लिए पूर्णत अलग व सुविधातनक व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करने का प्रयास किया गया है । डाईक्‍लीन किए हुए बिस्‍तर उपलब्‍ध कराऐ जाऐगें ।
सभी वर्गा को ध्‍यान में रखते हुए अन्‍य होटलो या गेस्‍ट हाउस के मुकाबले अत्‍यन्‍त ही सामान्‍य शुल्‍क मे व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध कराई जाएगी । इस व्‍यवस्‍था को सुचारू रूप से चलाने हेतु आवश्‍यक न्‍यूनतम शुल्‍क ही लिया जायेगा ।
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175 रू प्रति व्‍यक्ति प्रति रात
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