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हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना-२

अब हम आधुनिक इतिहास की और दृष्टि डालते है | आमेर राजवंश के सबसे प्रतापी राजा ; बाल्टी यों कहा जाए कि आधुनिक युग के सबसे पराक्रमी योद्धा पंजवनराय जी , अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख सामंत थे , उनका नाम हमको इतिहास में देखने को नहीं मिलता | पंजवनराय ने ६४ बड़े युद्ध लड़े व दो बार अकेले अपनी ही सेना से मोहम्मद गौरी को परास्त कर बंदी बनाया | उस माहन शूरवीर का आज इतिहास में नाम नहीं मिलता | लोगों की जबान पर आज भी प्रचलित है |

"गहत गौरी साह के , भागी सेना और |
आयो वाह लिए तब , फिर कूर्म नागौर ||"


इतिहासकारों का कथन है कि जयपुर राजवंश की वंशावली में पंजवनराय का जो काल अंकित है वह पृथ्वी राज के काल से मेल नहीं खाता जबकि पृथ्वीराज - रासौ का आधे से अधिक भाग केवल पंजवन के युद्धों से भरा पड़ा है | केवल एक छोटी सी विसंगति बताकर इतने बड़े शूरवीर का नाम इतिहास से मिटा दिया गया व हमने उसको स्वीकार कर लिया |

हमने कभी प्राचीन हस्तलिखित लेखों को पढने व संतों से सत्संग करने का श्रम नहीं किया | इसी के कारण बहुत सारी लिखित व प्रचलित बातों को इतिहास से हटा दिया गया | विज्ञान के दास हुए पुण्य हीन लोग यदि संत परंपरा के इतिहास को समझने की सामर्थ्य खो चुके है , तो उनके द्वारा सुरक्षित इतिहास का क्या दोष है ? ऐसे आख्यानो को छिपाना नहीं जाना चाहिए , क्योकि आने वाली पीढ़ियों ने , यदि अपने आप को शिक्षित व दीक्षित करने को चेष्टा की तो वे इन तथ्यों से प्रेरणा नहीं ले पाएगी | इस प्रसंग में प्रसिद्ध दो घटनाओं का वर्णन करना आवश्यक प्रतीत होता है - पहली घटना आमेर के राजा मिर्जा राजा जय सिंह से सम्बंधित है | आमेर के राजाओं का यह संकल्प था कि किसी भी हिन्दू राज्य को जीतकर मुग़ल साम्राज्य में नहीं मिलायेंगे | मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने मिर्जा राजा जय सिंह को शिवाजी पर चढ़ाई करने भेजा था | शिवाजी को सब प्रकार से शक्तिहीन कर देने पर भी जब वे समझोता करने के लिए तैयार नहीं हुए , तो मिर्जा राजा धर्मसंकट में पड़ गए | उन्होंने दौसा के भोमिय सूरजमल जी को याद किया व उनसे अनुरोध किया कि " रात को सोते हुए शिवाजी कि पाग उतार लाये व एक चिट्ठी उनके सिराहने छोड़ दें | भूमिया जी ने ऐसा ही किया "| प्रातः काल शिवाजी ने जब अपनी पाग नहीं देखि तो सिराहने रक्खे हुए पर्चे को पढ़ा | उसमे मिर्जा राजा जय सिंह ने लिखा था , " मेरे से आकर बात करो , वर्ना आज तो पाग मंगवाई है | कल सिर मंगवा लूँगा | " इसके बाद शिवाजी ने जिजाबाई से परामर्श कर मिर्जा राजा से भेंट की | आज के तापहीन लोग यदि सूक्ष्म शरीरों में तपस्या कर रहे संतों व शूरवीरों का साक्षात्कार नहीं कर सकते तो इसमें उन लेखकों का क्या दोष है ? जिन्होंने इन घटनाओं को बड़े यत्न से अंकित कर सुरक्षित रक्खा है |

दूसरी घटना मीरा बाई के इतिहास से सम्बंधित है | संतो में प्रचलित कथा के अनुसार मीरा बाई के विवाह के बाद राणा ने यह अनुभव किया किया कि मीरां आध्यात्मिकता में उनसे बढ़ी चढ़ी है | अतः उन्होंने अपने गुरु के सानिध्य में कुछ समय तक रहकर आध्यात्मिक बल को बढाने का निश्चय किया | राजा जब गुरु के पास जाने लगे तो मिरां बाई ने किसी सेवक को साथ नहीं ले जाने का अनुरोध किया , लेकिन राजा ने उसे अस्वीकार करते हुए एक सेवक को साथ ले गए | कुछ वर्षों तक गुरु के सानिध्य में रहकर , राणा ने साधना की व परकाया प्रवेश की विद्या भी सीखी | राणा का सेवक अत्यंत चतुर था | वह भी राणा के साथ साथ इन सारी विद्याओं को सीखता रहा | कुछ समय बाद जब राणा गुरु से विदा होकर वापस लौट रहे थे , तो मार्ग में जंगल में एक ताज़ा मरे हुए शेर को उन्होंने देखा व उनके मन में परकाया प्रवेश की विद्या का परिक्षण करने की बात उठी | राणा ने अपने सेवक को आदेश दिया कि वह उनके शारीर कि रक्षा करे व स्वयं शेर के शारीर में प्रवेश कर जंगल में भ्रमण के लिए निकल पड़े | इस परिस्थिति को देखकर सेवक के मन में लोभ उत्पन्न हुआ व उसने अपने शरीर को छोड़ कर राणा के शरीर में प्रवेश कर राजमहल का मार्ग अपनाया | राणा के शरीर में सेवक जब राजमहल पंहुचा , तो मीरा को पहचानते देर नहीं लगे | इस घटना के बाद तो मिरां कि भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति और भी बढ़ गई | आज के इतिहास में इन सब घटनाओं को विज्ञान सम्मत नहीं मानकर हटा दिया गया | लेकिन हमे यह नही भूलना चाहिए कि स्थूल विज्ञान से सूक्ष्म विज्ञान हमेशा अधिक प्रभावशाली रहा है | व आज के युग में हम सूक्ष्म विज्ञान की उपेक्षा कर , स्थूल के उपासकों के अनुचर बने जा रहे है |

वर्तमान इतिहास में नीतिज्ञ लोगों को कलंकित करने की कम चेष्टाएं नहीं की गई है | जिसके पीछे प्रयोजन यही रहा है कि हठवादिता में फंसे रहकर हमारा समाज परिस्थितियों से पिटता रहे , जिसका लाभ हमारे शत्रुओं को मिले | आधुनिक शास्त्रों से सज्जित यवनों के दल अरब देशों से भारत की तरफ कूच कर रहे थे | आज का अफगानिस्तान है जहाँ पर उस समय पांच मुस्लिम राज्य थे , उनको शास्त्र प्रदान करते थे व उसके बदले में वे भारत से जो धन लूट कर ले जाते थे , उसका आधा भाग प्राप्त करते थे | इस प्रकार काबुल का यह क्षेत्र उस समय बड़ा भारी शास्त्र उत्पादक केंद्र बन गया था | जिसकी मदद से यवनों ने भारत में लूट कीव बाद में राज्य स्थापना करने की चेष्टा में संलग्न हुए | इतिहास कारों ने इस बात को छिपाया है कि बाबर के आक्रमण से पूर्व बहुत बड़ी संख्या में हिंदू शासकों के परिवारजन व सेनापति राज्य के लोभ में मुसलमान बन गए थे व यह क्रम बराबर जारी था | ऐसी परिस्थिति में आमेर के शासक भगवन्तदास व उनके पुत्र मान सिंह ने मुगलों से संधि कर अफगानिस्तान के उन पांच यवन राज्यों पर आक्रमण किया व उन्हें इस प्रकार तहस नहस कर दिया कि वे भविष्य में उठ नहीं सके | इस कार्यवाही के परिणाम स्वरूप ही यवनों के भारत पर आक्रमण बंद हुए व बचे कुचे हिंदू राज्यों को भारत में अपनी शक्ति एकत्रित करने का अवसर प्राप्त हुआ | मान सिंह की इस कार्यवाही को तत्कालीन संतों ने पूरी तरह संरक्षण दिया व उनकी मृत्यु के बाद हरिद्वार में उनकी स्मृति में हर की पीडियों पर , उनकी विशाल छतरी बनवाई | लेकिन आधुनिक इतिहास के लेखकों ने मान सिंह के इतिहास में से उन घटनाओं को इस प्रकार से ओझल कर दिया गया है , जिससे तद्कालीन परिस्थिति में उनके द्वारा किया गया कार्य महत्वहीन हो जाए | नाथ सम्प्रदाय के लोगों के द्वारा " गंगामाई " का एक भजन अब भी गया जाता है , जिसमे भारत के धर्म रक्षक अनेक वीरों का उल्लेख आता है | इस भजन में रजा भागीरथ से क्रम शुरू होता है व भजन की अंतिम कड़ी राजा मान के यश गान के साथ समाप्त होती है |

इन सब तथ्यों को जनता की आखों से ओझल कर क्षत्रिय इतिहास को कलंकित करना व क्षत्रियों के गुण धर्म को नष्ट करना इन आक्रांताओं द्वारा लिखे गए इतिहास का मुख्या उद्देश्य रहा है , जिसको नहीं समझकर इस इतिहास को सही मानकर , हम आपस में लड़ते गए व एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे | अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हमारे विरोधियों द्वारा लिखे गए , इस इतिहास को स्वीकार नहीं करें तथा प्राचीन से लेकर आज तक के इतिहास व ग्रंथों में जहाँ कहीं भी क्षात्र तत्व के दर्शन होतें हो उनको ग्रहण कर अपने अंदर क्षमताओं का विकास करने का प्रयत्न करे |

क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Comments :

4 comments to “हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना-२”
DR. ANWER JAMAL said... Hindi Blog
on 

आपकी यह रचना देखि जा रही है ब्लॉगर्स मीट वीकली में .
हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें।
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।
बेहतर है कि ब्लॉगर्स मीट ब्लॉग पर आयोजित हुआ करे ताकि सारी दुनिया के कोने कोने से ब्लॉगर्स एक मंच पर जमा हो सकें और विश्व को सही दिशा देने के अपने विचार आपस में साझा कर सकें। इसमें बिना किसी भेदभाव के हरेक आय और हरेक आयु के ब्लॉगर्स सम्मानपूर्वक शामिल हो सकते हैं। ब्लॉग पर आयोजित होने वाली मीट में वे ब्लॉगर्स भी आ सकती हैं / आ सकते हैं जो कि किसी वजह से अजनबियों से रू ब रू नहीं होना चाहते।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said... Hindi Blog
on 

जन्मदिन मुबारक हो!
अनन्त शुभकामनाएँ!!!

ताऊ रामपुरिया said... Hindi Blog
on 

जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

रामराम

नरेश सिह राठौड़ said... Hindi Blog
on 

सार्थक विचारों का आभार |

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