Jun 29, 2011

हमारी भूलें : तपस्या का अभाव

आज लोग संघठन बनाकर समाज का कल्याण करना चाहते हे | वे यह भी अभिलाषा संजोते है कि समाज का नेतृत्व प्रदान कर सकेंगे लेकिन वे यह नहीं जानते कि लोगों को अपनी बात सुनाने व उनके विचारों व भावों को गति देने के लिए उन लोगों से ऊपर उठना आवश्यक है |
अपने आप को बदलने के लिए व्यक्ति को अच्छी संगत जिसका तात्पर्य है , अपने से श्रेष्ठ लोगों कि संगत करना आवश्यक है , क्यों कि " कच्ची सरसों को पेलकर कोई भी तेल निकलने कि कल्पना नहीं कर सकता " | अगर तेल चाहिए तो उसके पहले सरसों को पकाना पड़ेगा | इसलिए सबसे पहली आवश्यकता है कि श्रेष्ठ साहित्य का सानिध्य प्राप्त किया जावे , जिसकी संगती से हम परंपरागत कुसंस्कारों से मुक्त रह सके |
आज हम जिसे धर्म समझे हुए है , उसी ने हमारा सर्वनाश किया है | पुराणों में लिखा है कि एक मंदिर बनवा देने पर कई हजार वर्ष तक स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है | मृतक के पीछे अगर उसका पुत्र अमुक प्रकार से दान देदे तो मृतात्मा कि मोक्ष हो जाती है | संसार का कोई भी समझदार व्यक्ति इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण धर्म को अंगीकार नहीं कर सकता किन्तु हमने इस प्रकार के धर्म को अंगीकार करके अपने आपको पतित बना लिया है | अगर बिना तपस्या केये किसी प्रकार कि उपलब्धि संभव होती तो पूर्वगामी लोग इस कठिन मार्ग को क्यों चुनते ? इस बात पर हमने कभी विचार करने का कष्ट नहीं किया |
राम कृष्ण परमहंस कहते है कि जो तोता जीवन पर्यंत " टें , टें " बोलता है , बिल्ली द्वारा गला दबोच लेने पर भी " राम राम "नहीं बोल सकता | हमें पंडावादी धर्म ने यह समझा दिया है कि भगवत भजन वृद्धो का कार्य है | जो राम कृष्ण के वचनानुसार कभी संभव नहीं हो सकता |
अगर हम हमारे पूर्व काल के इतिहास को देखें तो पता चलेगा सभी श्रेष्ठ लोगों ने अपने जीवन के आरम्भकाल में तपस्या कि है व भगवत आदेश प्राप्त कर राज्य का संचालन किया है | " विचार व प्रेरणा " जिनका आज के जगत में बहुत महत्व बताया जा रहा है , वास्तव में पशुगत क्रियाएं है | क्योंकि बुद्धि का जन्म , पूर्व जन्मों के पुण्यों से व अहंकार का जन्म , पूर्व जन्म के पापों से होता है | इस बुद्धि व अहंकार के संयोग से मन कि उत्पति होती है यह मन , बुद्धि व अहंकार द्वारा प्रस्तुत तर्कों को सुनकर संकल्प विकल्प करता है | अतः विचार पूरी तरह से हमारे पूर्व संस्कारों से प्रभावित रहते है | प्रेरणा भी कोई स्वतः उत्पन्न होने वाली क्रिया नहीं है , , उस पर भी संस्कारों का अभाव कायम रहता है | अतः श्रेष्ठ लोग विचार व प्रेरणा का आश्रय लेकर किसी प्रकार का निर्णय नहीं लेते | उन्हें चाहिए आदेश , स्पष्ट रूप से दिव्य शक्ति का संकेत , की तेरे कल्याण के लिए अमुक मार्ग उपयुक्त है | इस प्रकार का संकेत केवल तपस्या के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है |
तपस्या की शीघ्र सफलता के लिए सबसे पहली आवश्यकता है , पूर्वाग्रहों का अभाव | ऐसे होना चाहिए , अथवा ऐसे नही होना चाहिए | इन दोनों ही अभिलाषाओं से मुक्त हुए बिना तपस्या फलीभूत नहीं हो सकती | महर्षि विश्वामित्र ने कई हजार वर्ष तक तपस्या करने के पश्चात जिस स्थिति को प्राप्त किया , उसी स्थिति को बालक ध्रुव ने केवल ६ माह में प्राप्त कर लिया संसार में आज तक इन दोनों जैसा तपस्वी नहीं हुआ , लेकिन ध्रुव की शीघ्र सफलता का जो रहस्य था , वह यह था ही वह किसी प्रकार के दुराग्रह से पीड़ित नहीं था | उसकी अभिलाषा केवल भगवत आदेश प्राप्त करने की थी , लेकिन विश्वामित्र बदला लेना चाहते थे , अतः जब तक उनके मन से बदले की कडुवाहट की मलीनता साफ़ नहीं हुई , उन्हें सफलता नहीं मिली | ध्रुव को भगवान् ने आदेश दिया की तुम १२ हजार वर्ष राज्य करो , उसके बदले तुम मेरे लोक को प्राप्त होगे | इसी प्रकार के एक नहीं , हजारों आख्यान शास्त्रों में हे , की लोगों ने तपस्या कर भगवत आदेश से राज्य किया , लेकिन आज हम तापहीन बने रहकर बिना कष्ट उठाये केवल बोद्धिक तिकड़म बाजी से अपना हित साधन करना चाहते है , तो इससे बढ़कर मुर्खता और कोई नहीं हो सकती |
आज का बुद्धिजीवी जिसने समग्र तंत्रों पर अपना आधिपत्य जमा रखा है , इतना षड्यंत्रकारी है की उसे किसी भी षड्यंत्र से परास्त नहीं किया जा सकता | अगर उसे परास्त करना है तो एक ही मार्ग है , तपस्या , इष्टबल | भगवत आदेश के द्वारा जो शक्ति उपार्जित होती है , उसके सामने किसी भी प्रकार का बुद्धिजन्य षड्यंत्र नहीं चल सकता |अतः आवश्यकता इस बात की है कि संघठनो के निर्माण के साथ साथ प्रत्येक व्यक्ति पाखंडवाद को पीठ देकर सात्विक रूप से भगवत आराधना में लगे , ताकि वह उस आत्मबल को प्राप्त कर सके , जिससे लोगों को एक सूत्र में बांधे रखने कि क्षमता अर्जित हो , साथ ही बुद्धिजीवियों के षड्यंत्र को विशाल किया जा सके |
बिना तपस्या के कोई भी शोर्य से युक्त व पराक्रमी होने कि कल्पना नहीं कर सकता | दुर्योधन के जब अनेक महारथी महाभारत के युद्ध क्षेत्र में मारे गए , तो उसने पितामह भीष्म को उत्तेजित कर उनसे यह प्रतिज्ञा करवाने में सफलता अर्जित कर ली कि " कल अर्जुन का वध कर दिया जाएगा |"
भीष्म की इस प्रतिज्ञा की खबर जैसे ही पांडवों के पड़ाव में पहुंची , तो वहां पर हाहाकार मच गया , क्योंकि सभी जानते थे की भीष्म की प्रतिज्ञा कभी विफल नहीं हो सकती | लोग दौड़े हुए श्री कृष्ण के पास पहुंचे व अपनी व्यथा सुनाई | श्री कृष्ण का उत्तर था -" अब अर्जुन को द्रोपदी के अलावा कोई नहीं बचा सकता " | लोगों को विस्मय हुआ , लेकिन द्रोपदी को बुलाया गया | कृष्ण द्रोपदी को लेकर पितामह भीष्म के डेरे की और रवाना हुए | संध्या का समय था , पितामह अपने ध्यान में मग्न थे | कृष्ण के संकेत पर द्रोपदी ने जैसे ही जाकर पितामह के चरण स्पर्श किये , पितामह के मुख से आशीर्वाद निकला " सौभाग्य वती हो "| पितामह के इन शब्दों को सुनकर श्री कृष्ण हंस पड़े | पितामह को सारे खेल को समझने में एक ही क्षण लगा | उन्होंने श्री कृष्ण को सम्भोधित करते हुए कहा कि " आपने मेरी प्रतिज्ञा छल से भंग कराइ है , लेकिन कल युद्ध क्षेत्र में मै अपने पराक्रम से आपकी प्रतिज्ञा को भंग करूँगा |" कृष्ण ने प्रतिज्ञा कर राखी थी कि वे युद्ध में अस्त्र नहीं उठाएंगे | दुसरे रोज अर्जुन व भीष्म पितामह के बीच घमासान युद्ध हुआ | जब श्री कृष्ण ने देखा कि भीष्म के बाणों कि वर्षा को अर्जुन सहन करने में असमर्थ हो रहा है , तब वे क्रोधित हो गए | वे चक्र लेकर पितामह पर आक्रमण करने दौड़े | यह देखकर पितामह ने धनुष त्याग दिया | उन्होंने कहा " मेरी प्रतिज्ञा पूरी हुई |"
अपने आपको पितामह भीष्म के वंशज कहने वाले लोग यदि अपनी तुच्छ इच्छाओ का परित्याग नहीं कर सकते व तपस्या के मार्ग पर अग्रसर नही हो सकते , तो उन्हें समाज का कल्याण करने कि बात कहने का कोई नैतिक अधिकार नही है | शौर्य का बीज परम्परा से मिल सकता है लेकिन इसका उपार्जन बिना कर्म के नही किया जा सकता | कितना शौर्य व उत्साह उस तपस्वी में होगा जिसने कृष्ण को साक्षात् भवान जानते हुए ललकार कि " कल युद्ध क्षेत्र में मै आपकी प्रतिज्ञा कि भंग करूँगा ," व अपनी कथनी को चरितार्थ करके दिखा दिया |
तापहीन ज्ञानी हमेशा समाज का शोषण करता है | अगर हम तपस्या से रहित रह कर किसी प्रकार से बुद्धिबल का उपार्जन भी कर लें तो समाज का शोषण करने के अलावा और कोई शुभ कार्य करने कि कल्पना नहीं कर सकते |

लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jun 27, 2011

हमारी भूलें : अध्ययन के प्रति रुचि का अभाव

प्रयाग को तीर्थ राज इसलिए कहा जाता है कि वह गंगा , यमुना व सरस्वती का संगम है | इसी प्रकार तप , स्वाध्याय , और सत्संग की त्रिवेणी का जिस व्यक्ति के जीवन में संगम नहीं होता , वह ज्ञान व मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता और न ही इस संसार में अपने कर्म को सिद्ध कर सकता | सत्य पर आधारित होकर भगवद्ध नाम जप कलियुग में सबसे बड़ा तप है | लेकिन जब तक स्वाध्याय चिंतन व मनन के द्वारा मन , बुद्धि व अहंकार की कुटिल गलतियों को समझकर उनका शोधन नहीं किया जाय , तब तक मात्र तप सत्य असत्य का बोध नहीं करा सकता | तप के द्वारा संपन्न हुआ व्यक्ति ज्ञान के अभाव में कुमार्गगामी भी हो सकता है | सत्यसंग व्यक्ति के अनेक जन्मो से बने स्वभाव को शुद्ध कर शुद्ध ज्ञान के उपार्जन में उसकी मदद करता है और पथ भ्रष्ट होने से बचाता है |

अपनी पुस्तक महाभारत की भूमिका लिखते हुए चक्रवर्ती राज गोपालाचार्य ने एक बहुत विलक्षण बात लिखी है | उन्होंने लिखा है की आज के लेखक जो कहानियां लिखते है , वे सुखांत व दुखांत होती है | किन्तु महाभारत व रामायण में जिन कथाओं का वर्णन है , उनको पढ़ने से हृदय द्रवित होता है | तुलसीदास जी लिखते है "द्रवर्हि जानकी कंत , तब छूटे संसार दुःख" व्यक्ति का हृदय जब द्रवित होता है , तब ही भगवान् द्रवित हो सकते है | सद - साहित्य के अध्ययन से व्यक्ति का हृदय द्रवित होता है | उसका अहंकार टूटता है व सन्मार्ग पर आगे बढ़ने की अभिलाषा जागृत होती है |

सदसाहित्य की रचना भी इसी प्रकार हुई है | व्यक्ति जब स्वयं द्वारा उपार्जित ज्ञान से अपने आपको बोझिल अनुभव करता है , तो हल्का करने के लिए व लोक कल्याण हेतु हेतु कुछ बातें कहता है या लिखता है , ताकि आने वाली पीढ़ीयां उसका लाभ उठा सके |
तैत्रियोपनिषद की 'शिक्षा बल्लरी 'में गुरु अपने शिष्य को अंतिम उपदेश देते हुए कहते है , " सत्य बोल , धर्म का आचरण कर , स्वाध्याय में प्रमाद न कर " | स्वाध्याय का इतना महत्व इसलिए है कि व्यक्ति अपनी साधना द्वारा व अपने कर्म द्वारा जो भी अनुभव प्राप्त करता है , शास्त्र से उसका समर्थन मिल जाने पर वह अनुभव , पिष्ट ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है |

जो समाज अध्ययन , चिंतन व मनन में प्रबृत हुए बिना , अपने विकास कि कल्पना करता है वह धीरे धीरे पशुगत संस्कारों कि और बढ़ता चला जाता है | भगवान् राम के काल का उन्नत भील समाज , जो हमारे समाज का अभिन्न अंग है , इसी शिक्षा , अध्ययन व चिंतन , मनन के प्रभाव में आज पूर्ण रूप से पशु संज्ञा में पंहुच चूका है |
आज के युग में जब संसार के समस्त राजनैतिक , आर्थिक सामजिक क्षेत्रों में बुद्धिजीवियों का कुचक्र सफलता पूर्वक उत्पीडन कर रहा है , उस समय अध्ययन ,चिंतन व मनन से विहीन कोई व्यक्ति या समाज अपनी सुरक्षा कि कल्पना नहीं कर सकता |

यदि बुद्धिजीवियों के कुचक्र को तोडना हो , तो अध्ययन चिंतन व मनन के साथ साथ तपस्या कि शक्ति भी अर्जित करनी होगी , जिसके बल से समाज को खतरनाक षड्यंत्र कि जानकारी दी जाय व साथ ही शक्ति द्वारा षड्यंत्र का मुकाबला किया जा सके |

लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा

Jun 26, 2011

हमारी भूलें : संस्कृत भाषा के ज्ञान का अभाव - 2

पुराणों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन ग्रंथों कि रचना क्षत्रियों कि निंदा करने व ब्राह्मणों की श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के लिए ही की गई है | इसी उद्देश्य से मनगढ़ंत ब्राह्मणों की महिमा बताई गई व दान पुण्य को ही सब कुछ साबित करने की चेष्ठ की गई | भगवान् राम , भगवान् शंकर व भगवान् कृष्ण के चरित्रों को भी धूमिल करने की चेष्टा की गई है | जिसका परिणाम यह हुआ की लोग तपस्या के मार्ग से अलग होकर अधर्म - पूर्वक अर्थोपार्जन कर , दान द्वारा मोक्ष की कल्पना करने लगे | जिसके फलस्वरूप समाज चरित्र का निरंतर पतन होता चला गया |

उपरोक्त धार्मिक पाखंड के प्रपंच में क्षत्रिय व अन्य जातीय शिक्षा से विमुख हो गई व संस्कृत शिक्षा पर पंडो ने एकाधिकार कर लिया | ये लोग निकृष्ट तांत्रिक कर्मकांडो का आश्रय लेकर जनता का शोषण करने लगे | क्षत्रिय संस्कृत भाषा के ज्ञान के अभाव में अपने पैतृक ज्ञान से दूर हटकर दान को ही सब कुछ समझने लगे तथा ताप व ज्ञान की महिमा को भूल गए | उन्हें यह भी ज्ञात नहीं रहा कि धर्म के नाम पर कितने व किस प्रकार के पाखंड पूर्ण ग्रंथो कि रचना कि जा चुकी है | धर्म ग्रंथो व ब्राह्मणों कि निन्दा करने वाले को नरक में जाने का भय बताकर उन्हें धर्म भीरु व पंगु बना दिया गया |

क्षत्रिय यह भूल गए है कि उनके पूर्वज राजा इश्वाकू ने स्वयं जप करके या जापक ब्राह्मण के जप के प्रभाव से भगवान् के धाम को प्राप्त किया था | उनको यह भी पता नहीं रहा कि उनके वंश में राजा उपरिचर जैसे लोग हुए जिनके ज्ञान में स्वयं भगवान् ने उपस्थित होकर अपना भाग ग्रहण किया था | उनको इस बात का भी बोध नहीं रहा कि राजा पृथु को दंड का अधिकार देकर स्वयं ब्रम्हाजी ने उसको पृथ्वी का राजा बनाया व उसी के नाम से इस धरती का नाम पृथ्वी पड़ा | वे यह भी भूल गए कि राजा ऋषभ देव , आज के जैन जिनको अपना प्रथम तीर्थकर मानते है , ने यह घोषणा की थी कि जिसको हम 'यह मेरा है' कहकर सम्बोधित करते है , वास्तव में 'मै' तत्व उससे भिन्न है |हम आज यह भी नहीं जानते कि राजा रतिन्देव ने चंडाल व उसके कुत्ते को जल पिलाकर , जब उनके प्राणों को तुष्ट होते हुए देखा तो यह घोषणा कि थी कि सारे प्राणियों में प्राण तत्व एक है व इसी तत्व को जान लेने से वे हमेशा के लिए भूख व प्यास से मुक्त हो गए | महात्मा गौतमबुद्ध ने कहा था कि ध्यानपूर्वक जिओ अपनी क्रियाओं पर सतत ध्यान रखने से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है |उन्होंने अपने सैकड़ों जन्म का वर्णन किया है | राजा धृतराष्ट्र ने भी यह कहा था कि मुझे अपने सौ जन्मो का हाल मालुम है | जिन लोगो ने अपने हृदय स्थित प्राण से संसर्ग स्थापित कर लिया , उनके लिए इस कार्य को दुर्लभ नहीं किया जा सकता | आधुनिक इतिहास में भी सिर काटने के बाद मीलों तक योद्ध करते हुए चले जाने कि घटनाओं का वर्णन मिलता है | परम्परा से प्राप्त हृदय गत साधना के कारण ही इस तत्व को क्षत्रिय प्राप्त कर सके थे |

क्षत्रिय शब्द ब्रम्ह का उपासक रहा है | अर्थात बीज रूप में जो तत्व है| उसको वह प्राप्त करता है , किन्तु उसका विश्लेषण नहीं करता , विश्लेषण के आकर्षण में फंसने से प्राणशक्ति क्षीण होती है , जिसका क्षय होने के बाद राज धर्म का पालन नहीं किया जा सकता | अतः इसके विस्तार का वर्णन करना ब्राह्मणों का कार्य था , जिन्होंने पथभ्रष्ट होकर धर्म को रोजी रोटी का साधन बना लिया , तो इसमें क्षत्रियों का क्या दोष है ?

इस प्रकार से स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा के ज्ञान के अभाव में हम क्षात्र धर्म के तत्व से पृथक होते चले गए व अब भी अबाध गति से उसी और आगे बढे जा रहे है | विश्वामित्र जी जब वसिष्ठ जी से पराजित हुए , तो उन्हें अपनी अपनी कमियों का अनुभव करने में केवल कुछ ही क्षण लगे | उन्होंने कहा - धिक्कार है इस क्षात्र धर्म को , ब्रम्ह बल ही वास्तविक बल है | "अर्थात जिस क्षत्रिय में तपस्या का बल नहीं रहा , उसको यहीं शासन मिल जाए तो ऐसे शासन को भोगना दिक्कर योग्य है | भगवान् राम ने भी अनेक स्थलों पर ऐसे क्षात्र धर्म कि निंदा कि है , जो धर्म पर आरूढ़ नहीं है | अतः विश्वामित्र जी ने घोर तपस्या कर दिव्य शक्तियों को प्राप्त किया व उन्हें अपने शिष्य राम लक्ष्मण को प्रदान कर , उस समय के अहंकारी शासक रावण का नाश करवाया | परशुराम जी के दर्प को खंडित किया | इस प्रकार हम देखते है कि संसार के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान के तत्व का आविष्कार व सर्व श्रेष्ठ चरित्र कोधारण करने वाले क्षत्रिय रहे है | बिना तपस्या के कभी भी कोई कुछ प्राप्त नहीं कर सकता | महाभारत के विजेता अर्जुन को भी श्री कृष्ण ने बनवास काल में घोर तपस्या में लगाया , जिसके परिणाम स्वरूप वह उन यथोचित आवश्यक शक्तियों को प्राप्त कर सका , जो विजय के लिए आवश्यक थी

केवल पुरुषों में ही नहीं क्षत्राणियों में भी तपस्या किसी से कम नहीं रही | आज देश में जितनी भी पवित्र सतियाँ है , वे सब क्षत्रिय कन्याओं कि तपस्या कि प्रतीक है | सबसे पवित्र गंगा राजा हिमवान की पुत्री थी | जमना सूर्य की पुत्री है | सरस्वती महाराज गाधी की पुत्री व विश्वामित्र की बड़ी बहन है | नर्मदा इसीलिए पूज्यनीय है कि उसके तट पर बैठकर हिमवान कि पुत्री पार्वती जी ने शंकर भगवान् को वर में प्राप्त करने के लिए भीषण तपस्या कि थी | ओमवती राजा सुदर्शन की प्रतिवार्ता स्त्री थी जिन्होंने अतिथि धर्म का पालन करते हुए श्रेष्ठ गति को प्राप्त किया |
संस्कृत भाषा के अभाव में इन सब इतिहासों या तत्वों से विस्मृत होकर क्षत्रिय पंडावादी पाखंड में फंस कर अपने व समाज का शत्रु बन बैठा | आज हम जो कुछ उपलब्ध , अनुवादित ग्रंथो को पढ़कर किसी नतीजे पर पहुंचना चाहते है | वह फलदायक सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि लेखक सत्य को प्रगत करने की क्षमता नहीं रखता | भाषा व अभिव्यक्ति की अपूरणता के कारण सत्य शब्दों के इर्द गिर्द छिपा रहता है
जिसको अनुवादक नहीं पकड़ सकते | अतः यदि हम प्राचीन धर्म ग्रन्थों के तत्वों को समझने की अभिलाषा रखते है | तो हमे संस्कृत भाषा सीखने की और ध्यान देना पड़ेगा |
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jun 23, 2011

हमारी भूलें : संस्कृत भाषा के ज्ञान का अभाव - 1

महाभारत काल के बाद क्षत्रिय समाज व उसके साथ साथ समाज के अन्य वर्ग भी शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते चले गए |ख़ास तौर से संस्कृत भाषा की और कोई ध्यान नहीं दिया गया | परिणाम यह हुआ कि सामान्य लोग संस्कृत भाषा से दूर हट गए व बुद्धिजीवी पंडावर्ग को धर्म ग्रंथो में मनमाने ढंग से परिवर्तन व रचना करने कि छूट मिल गई |
संस्कृत भाषा के ज्ञान के अभाव में प्रांतीय भाषाओं का अभ्युदय हुआ तथा इनमे रचे गए साहित्य पर भी पंडावादी साहित्य कि कलि छाया पड़ती चली गई | देश कि सम्पर्क भाषा संस्कृत नहीं रही , जिसके कारण देश सांस्कृतिक रूप में एक नहीं रहकर विभिन्न संस्कृतियों में विभाजित होता चला गया | प्रांतीय भाषाओं में रचा गया साहित्य उन आध्यात्मिक मूल्यों व साधना प्रणालियों के मूल को ग्रहण नहीं कर सका , जिसे ऋषिमुनियों ने बड़ी तपस्या के बाद उपार्जित किया था |

संस्कृत भाषा के ज्ञान के अभाव में , जिन विद्वान व तपस्वी लोगों ने पंडावाद के विरुद्ध विद्रोह किया था , उनकी परम्परा को निरंतर  समर्थन व सहयोग नही मिला व जिसके कारण यह विद्रोह खंडित व विभाजित रहे तथा निरंतर व गतिशील नहीं रह सके |
 संस्कृत भाषा के ज्ञान के अभाव में क्षत्रियों ने अपनी मूल साधना व आराधना पद्दिती को खो दिया | जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं रहा कि कोई भी व्यक्ति अथवा समाज दुसरे के उपार्जन पर जीवित नहीं रह सकता | बुद्धिजीवियों के षड्यंत्र के पहले शिकार वे तब बने जब क्षत्रियों ने यह स्वीकार कर लिया कि उनका कार्य केवल समाज कि रक्षा करना है | पुराण व अन्य ग्रंथो में ही नहीं वेदों तक में इस आशय के श्लोक समाविष्ट कर दिए गए कि क्षत्र्रियों कि उत्पत्ति भुजाओं से हुई व भुजाओं का कार्य शरीर कि रक्षा करना है  अतः क्षात्र धर्म का अर्थ हे समाज कि रक्षा करना |

वेदों में भुजाओ से राजाओं की उत्पत्ति का उल्लेख है | जिसे भाषा के समुचित ज्ञान के अभाव में लोगों को यह समझा दिया गया की क्षत्रियों की उत्पत्ति भुजाओं से हुई है | लोग यह नहीं जानते की क्षत्रिय केवल मनुष्यों में होते है , जबकि राजा देवताओं , नागों , राक्षसों व दानवों में भी होते है | अतः राजा के गुण ढंग की तुलना क्षत्रियों के गुणों से नहीं की जा सकती | इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है की मनुष्यों में भी हर काल में शासक या राजा क्षत्रिय ही नहीं होते | अतः क्षत्रिय व राजा के भेद को ठीक प्रकार से समझना आवश्यक है
मुखतो ब्राह्मणः जाताः, उरसा क्षत्रियास्तथा |
उरुभयां जज्ञिरे वैश्याः पद्भ्यां शुद्रा इति श्रुतिः ||
बाल्मीकि रामायण


मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए और हृदय से क्षत्रिय | दोनों उरुओं से (जघाओं से ) वेश्यों का जन्म हुआ और दोनों पैरो से शूद्रों का ऐसी प्रसिद्धि है | बाल्मीकि रामायण के उक्त श्लोको से स्पष्ट है कि क्षत्रियों की उत्पत्ति हृदय से हुई है | हृदय व उसकी भूमिका को नहीं समझने वाले लोग आसानी से यह मत प्रगट कर सकते  है कि क्षत्रियों की उत्पत्ति भुजाओं से हुई हो , चाहे उदय से , उसमे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता , क्योंकि क्षात्र धर्म भी राजा के धर्म का ही अंग है | ऐसे लोगों का ध्यान इस तथ्य की और आकर्षित करना आवश्यक है कि क्षत्रिय शासको व अन्य शासको की जीवन व व्यवहार में बहुत बड़ा अंतर रहा है उसका कारण केवल यही था कि दुसरे राजा लोग  नीति व धर्म शास्त्रों से राजा के धर्म की शिक्षा तो प्राप्त कर लेते थे , लेकिन उसे हृदयगंम कर अपने जीवन को बदल देने की क्षमता , उनमे नही थी | जिसके परिणाम स्वरूप वे क्षत्रिय शासकों द्वारा स्थापित उच्च आदशो तक नहीं पंहुच सके |

हृदय दाहिने फेफड़े के निचले भाग के निचे सीने के मध्य से तीन अंगुल दाहिनी और स्थित सूक्ष्म अंग है | जिसे भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता |इस हृदा में प्राण व आत्मा निवास करते है | क्षत्रिय हृदय को अपनी साधना का केन्द्र बनाकर अपने प्राण से सम्पर्क स्थापित करता है  तथा इस प्राण से साथ सदा निवास करने वाले के प्रकाश से ओतप्रोत हो , उस ज्ञान को कुछ ही क्षणों में अर्जित करने की क्षमता रखता है , जिस ज्ञान के लिए ज्ञानमार्गी जीवन पर्यन्त साधना करते रहे है |

महर्षि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को संकल्प द्वारा बला व अति बला नाम की विधाएं प्रदान की गई जिनके द्वारा कभी नष्ट न होने वाला ज्ञान व कभी कलांत न होने वाला शारीरिक बल उन्हें मिला | इसके अलावा और भी अनेक प्रकार शास्त्र व अस्त्र - शास्त्र की विधाएं संकल्प द्वारा विश्वामित्र जी ने श्री राम व लक्ष्मण को प्रदान की | भगवान् कृष्ण द्वारा भी अर्जुन की रणक्षेत्र की मध्य में कुछ ही समय में वह दिव्य ज्ञान प्रदान किया ,जिससे अर्जुन शोक मुक्त होकर क्षात्र धर्म का पालन करने को तैयार हो सका | हृदय के उदघाटन व प्राण के द्वारा प्राण से संसर्ग , ज्ञान का बीजारोपण व विद्याओं का आदान प्रदान , यह क्षत्रिय परम्परा रही है | जिसको केवल हृदयगत साधना द्वारा प्राप्त किया जा सकता है |
पंडावादी तत्वों द्वारा अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने व क्षत्रियों को उनके परम्परागत ज्ञान से विमुख करने के उद्देश्य से पुराणवादी ग्रंथों द्वारा यह प्रचार किया गया कि क्षत्रियों कि उत्पत्ति भुजाओं से हुई है | जिस हृदय में परमात्मा का स्वरूप स्वयं आत्मा निवास करी है | उससे मुख कभी श्रेष्ठ नहीं हो सकता | अतः अगर मुख से उत्पन्न होने वाले तत्वों को अपने आपको जगदगुरु सिद्ध करना हो तो उसके लिए यह आवश्यक था कि वे क्षात्र तत्व की श्रेष्ठता को लोगों की आँखों से ओझल करे | इसलिए सारे पुराणवादी ग्रन्थ व आधुनिक पंडावादी विद्वान तक एक स्वर से यह घोषणा करते है कि बाल्मीकि रामायण झूंठी है ! झूंठी है ! झूंठी है !!! जिन लोगों ने इतने धार्मिक ग्रंथो को नष्ट किया व उनमे परिवर्तन किया | उनकी नजरों से व कारगुजारियों से बाल्मीकि रामायण किस प्रकार से अछूती रह गई ; यह भी आश्चर्यजनक बात है |

इस संदर्भ में बाल्मीकि रामायण के बाद हमे श्रेष्ठ ग्रन्थ महाभारत के बारे में भी थोड़ा विचार करना होगा | यद्यपि यह ग्रन्थ पंडावादी कार गुजारियो से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा | इसमें जो थोड़े पतिवर्तन किये गए है , उनकी उपेक्षा कर दी जाए तो इस ग्रन्थ को भी बाल्मीकि रामायण कि तरह संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में माना जायेगा | महाभारत ग्रन्थ कि रचना महर्षि वेदव्यास ने कि है , जबकि पंडों का कथन यह है कि पुराणों कि रचना भी व्यास जी द्वारा ही की गई है | जिसे कोई भी व्यक्ति , जिसने इन ग्रंथों को पढ़ा है , उसे स्वीकार नहीं कर सकते , बाल्मीकि रामायण में जितनी कथाओं का वर्णन आता है , पुराणों में उन कथाओं में  उलट दिया गया है  , जिससे रामायण को झूंठा साबित कर सके | इसके अतिरिक्त महाभारत व पुराणों के विचार व तर्क भी एक दुसरे से मेल नहीं खाते | इससे यह स्पष्ट हे की पंडावादी पुराणों के रचनाकारों ने व्यास जी के नाम का दुरुपयोग करने की चेष्टा हे , जो अक्षम्य अपराध है |

इस बात को आधुनिक विद्वान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपनी पुस्तक में स्वीकारा है की महाभारत की कुछ ऋचाओं को बदला गया है और कुछ कथाएं जोड़ दी गई है | रामायण के रचनाकार बाल्मीकि जी के आश्रम में बनवास के समय श्री राम , लक्ष्मण व सीताजी दस वर्ष तक रहे | इसके बाद कम से कम १६ वर्ष तक सीताजी लव कुश के साथ , उनके आश्रम में रही लेकिन बाल्मीकि जी ने अपने साथ वार्तालाप का कोई प्रसंग रामायण में नहीं दिया | इससे स्पष्ट हे की महाभारत में व्यास जी के कथन के रूप में जो कथाएं कही गई है | वह बाद में जोड़ी गई है | इसी प्रकार वैशम्पायन जी व जनमेजय के बीच के संवाद भी बाद में जोड़े गए है | पंडावादी ग्रन्थों में विश्वामित्र जी के बारे में अनेक मन जठंत कथाएं उनके चरित्र को आवश्यकता से अधिक उभारने की चेष्टा की है | अतः इस ग्रन्थ में परशूराम जी से सम्बन्धित जो भी प्रसंग आये है , उन्हें प्रमाणित नहीं माना जा सकता |
क्रमश :
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jun 19, 2011

हमारी भूलें : अपने आपको विधर्मी स्वीकार कर लेना

महाभारत काल के पूर्व के धार्मिक ग्रन्थों को देखने से ज्ञात होता है की पहले धर्म शब्द का की प्रयोग हुआ है उसके आगे हिन्दू , बौद्ध , जैन , मुस्लिम व ईसाई जैसे नाम वर्णित नहीं है | इससे स्पष्ट होता है कि संसार के सभी धर्मों का उदय महाभारत के बाद ही हुआ है |
क्षत्रियों में कभी भी धार्मिक या एतिहासिक ग्रन्थों कि रचना करने कि प्रवर्ती नहीं थी और उन्होंने अपने शासन काल में कभी भी इस प्रकार कि रचनाओं को प्रोत्साहित नहीं किया , इसी का परिणाम था कि प्राचीनकाल में लिखित धर्म शास्त्र या इतिहास नहीं था | लोग धर्म व इतिहास कि बातें सुनने के लिए संत वृति वाले वृद्ध लोगों के पास जाया करते थे |

महाभरत के भीषण युद्ध में जब पराक्रमी व विद्वान क्षत्रियों का सर्वनाश सा ही हो गया | तो अवसरवादी लोगों ने मनगढंत तरीको से इतिहास व धार्मिक ग्रन्थों कि रचना प्रारंभ करदी | क्षत्रियों कि शक्ति क्षीण होने के साथ ही शुद्ध ब्राम्हण तत्व सुरक्षा के प्रभाव में लुप्त होता चला गया व अवसरवादी पंडा तत्व का प्रादुर्भाव हुआ , जिन्होंने धर्म व इतिहास के नाम पर पुराणों कि रचना कर अपने आपको संसार का सर्वपूज्य व सर्वश्रेष्ट व्यक्ति साबित करने कि चेष्टा कि | महाभारत जैसे ग्रन्थ में भी इन लोगों ने , स्थान स्थान पर मंत्र गढ़ंत प्रसंग जोड़कर उसको विकृत करने की चेष्टा की व वाल्मीकि रामायण जैसे पवित्र ग्रंथो में उल्लेखित कथाओं को असत्य साबित करने के लिए पुराणों में मन गढ़ंत एतिहासिक प्रसंग लिखकर सारे देश व धर्म के इतिहास को दूषित कर दिया |
आज हम व हमारी आने वाली पीढियां जिस इतिहास को पढ़ रही है व सम्पूर्ण इतिहास हमारे वर्ग शत्रुओं , इन पंडो , आक्रान्ता मुसलमानों व ईसाईयों द्वारा लिखा गया है , जिनका उद्देश्य सर्वदा ही यह रहा है की वे हमे अयोग्य , अदूरदर्शी व बुद्धिहीन साबित करे | इन इतिहासों को पढ़कर यदि हम अपनी भूलों का विश्लेषण करना चाहेंगे तो यह भी एक भूल ही साबित होगी इसलिए हम अपने विश्लेषण में इन आधुनिक इतिहास के तथ्यों से दूर रहकर अपना विवेचन करना चाहेंगे |

क्योंकि ऊपर पंडा शब्द का प्रयोग हो चूका है इस शब्द की व्याख्या कर देना आवश्यक होगा | जो व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग अपने व्यक्तिगत हित साधन के लिए करता है , उसे ही पंडा कहा गया है| इस बात को दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि पंडा वह हे जिसने अपनी बुद्धि को व्यवसाय का साधन बना लिया है | तथा व्यावसायिक बुद्धि वह है जो केवल एक दिशा में चलती है और वह केवल अपने ही लाभ के बारे में सोचती है | प्राचीन काल का ब्राह्मण ब्रह्म का उपासक था | परब्रह्म अर्थात ब्रह्मतत्व के विस्तार कि हर दिशा को उसने खोज निकाला था | उसकी बुद्धि व्यावसायिक नहीं थी | वह तत्व का अन्वेषक था | तत्व को खोजता था | वह उसी में प्रतिष्ठित रहता था | पूछने पर सद्पात्र को वह अपना अनुभव बताता था | इसलिए उस तत्वेता को लोग पूजते थे | लेकिन आज का पथभ्रष्ट पंडा अपने आप को उन श्रेष्ठ पुरुषों से जोड़कर कुचक्र रचकर , यदि समाज को दिशा भ्रमित करने कि चेष्टा कर रहा है तो देश व समाज के हर श्रेष्ठ व्यक्ति का उत्तरदायित्व है कि वह उसके षड्यंत्रों को पर्दाफास करे व समाज को कायरता से मुक्त करे |

महाभारत कालीन के संसार के अनेक श्रेष्ठ लोगों ने इस पंडावाद के विरुद्ध जेहाद किया है | महाभारत में केवल राम और कृष्ण दो को अवतार बताया गया है | किन्तु इन पंडों ने अपने पुराणों में अवतारों कि संख्या बढाकर २४ कर दी | बढ़ाकर शब्द का प्रयोग यहाँ पर इसलिए किया गया हे कि विभिन्न पुराणों में अवतारों कि संख्या भिन्न भिन्न दी गई है | अंतिम पुराण भागवत में इनकी संख्या चौबीस कर दी है | जिनका उद्देश्य केवल यह था कि कुछ ब्राह्मणों को अवतारों कि श्रेणी में लाकर उनकी श्रेष्टता प्रतिपादित कि जावे | इस प्रकार के घिनोने प्रयास जब लोगों के लिए असहाय हो गए तो उन्होंने पंडावाद के विरुद्ध जेहाद प्रारम्भ किया | महात्मा गौतम व महावीर स्वामी आदि इस पंडावाद के विरुद्ध बिगुल बजाने वालों में अग्रणी थे | केवल बोद्ध या जैन धर्म ही पंडावाद के विरोध में बने हो ऐसी बात नहीं है | यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि इस्लाम व इसाई धर्मों कि स्थापना भी पंडावाद के विरोध के कारण ही हुई है |

जिन लोगों ने इस पुराणपंथी पंडावाद का विरोध किया , उनको पंडो ने विधर्मी घोषित कर दिया | विद्रोही जिनमे अधिकांश क्षत्रिय थे उनकी भूल यह रही है कि उन्होंने अपने आपको विधर्मी स्वीकार कर लिया | इस प्रकार विद्रोहियों के अग्रणी नेताओ के नाम से नए धर्मो का उदय होता चला गया | इस भूल के दो दुष्परिणाम सबसे भयानक हुए | पहला यह कि पंडावाद कि विरोधी पंक्तियाँ विभाजित हो गई , तथा दूसरा परिणाम जो इस से भी बयानक था वह यह हुआ कि नए धर्म करोडों वर्ष कि अपने पूर्वजों कि संचत ज्ञान शक्ति से पृथक हो गया | एक व्यक्ति द्वारा साधित एक साधना पद्दति को सम्पूर्ण रूप से धर्म स्वीकार कर लिया व इस प्रकार पूर्वजो द्वारा आविष्कृत अनन्य मार्गो व धाराओं से वे पृथक हो गए | जिसके परिणाम स्वरूप समय बीतने पर यह धर्म स्वयं पंडावाद से ग्रसित होकर जीवन की संजीवनी शक्ति भी खो बैठे |

इस प्रकार निरंतर विखंडित व क्षीण होते हुए धर्म को देखकर भारत के संतो ने एक नई शुरुआत की | पंडावादी ग्रन्थ पुराणों की उपेक्षा कर उन्होंने सरल अ आम जनता की भाषा में अपने उपदेश प्रारंभ किये व संत तत्व की महिमा का बखान करते हुए उनसे ही मार्गदर्शन समाज प्राप्त करे,एसा अनुरोध किया | इसका समाज पर व्यापक असर हुआ |
गोरखनाथ व मछन्दरनाथ द्वारा प्रारंभ की गयी इस संत परम्परा को नानक,कबीर व दादूदयाल जैसे संतो ने इस प्रकार आगे बढाया कि पंडावाद का झमेला लोगों की आँखों से ओझल हो गया | इस तरह नए धर्मों का उदय होना समाप्त हुआ ,लेकिन नए पंथों का गुरुओं के नाम पर निर्माण चालु हो गया |

इस भूल को स्वीकार करते हुए हमें विषाक्त इतिहास का विरोध करते समय इतना कहर नहीं होना चाहिए कि हम सम्पूर्ण धर्म से ही अपने आपको अलग करलें बल्कि आज की आवश्यकता यह है कि सम्पूर्ण धर्मों का मूलधर्म से उदय हुआ समझ कर उनकी अच्छाइयों को ग्रहण किया जावे व उनसे जीवनदायिनी नई ज्ञान धाराओं को प्राप्त कर पुन: जोड़ा जाय तथा पुरातन बुराइयों से अपने आपको मुक्त कर रूढीग्रस्तता से छुटकारा पाया जाये | नए धर्मों व पन्थो की सृष्टि न तो आवश्यक थी और न आवश्यक है | सारे संसार का सत्य एक है | वह पूजनीय व उपासनीय है,उसकी उपासना की जनि चाहिए |
क्रमश :
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jun 17, 2011

हमारी भूलें-2 : देवीसिंहजी महार

विचारशील व्यक्ति अपने आपको कभी पूर्ण नहीं मानता | वह यह भी दावा नहीं करता , कि जो कुछ कहा है वही सत्य है , क्योंकि वह जानता है , कि इस क्षेत्र में हर क्षण आगे बढ़ने व नए अनुभवों को ग्रहण करने कि संभावना विद्यमान है | जी लोग केवल विचारक है कर्म के प्रति जिनकी रुचि नहीं है , उनसे समाज को अधिक प्राप्त  करने कि आशा नहीं लगनी चाहिए | क्योंकि विचार को पूर्णता प्रदान करने के लिए अध्यन , मनन , कर्म का अनुभव तथा अनुभवी व सत्य पर स्थित लोगों का संग आवश्यक है | इनमे से किसी एक का भी अभाव विचार पूर्णता को प्राप्त नहीं करता | अतः यह  आवश्यक है कि समाज चिंतन को जागृत करने व उसे आगे बढ़ाने के लिए लोगों को उपरोक्त सभी साधनों का आश्रय लेना चाहिए , उसके बिना जो लोग समाज जागरण या समाज को संगठित करने कि कल्पना करते है , उनकी चेष्टाएँ हमेशा निष्फल ही सिद्ध होंगी |

समाज के अधिकांश लोग आज समाज के संघठन कि बात करते है व अपनी कार्य शैली को इस कार्य के निमित्त लगा देने का दावा करते है | ऐसे लोगों के होते हुए भी आज समाज में कोई भी संघठन न तो वास्तविक रूप में संघठित ही है , और न ही गतिशील ही है | सभी संघठनो के लोग निराशा के गहरे गर्तों में गोते लगाते दिखाई दे रहे है व इसके लिए वे एक दुसरे को दोषी ठहरा रहे है | इस सब के पीछे कारण क्या है ? कारण स्पष्ट है लोग बिना अपने आपको बदले समाज को बदलना चाहते है | लोग बिना कष्ट उठाये सुख भोगने कि कल्पना में डूबे हुए है | शारीरिक कर्म से मानसिक कर्म अधिक कष्ट दायक व दुष्कर है | लोगों को जब विचार चिंतन , व मनन , कि बात कही जाती है तो उसका उत्तर होता है कार्यकर्ता को कार्य चाहिए , विचार करना नेताओं का धर्म है | ऐसे लोगों को विचार के लिए तैयार करना एक कठिन कार्य है , जिसमे फंसे बिना लोग संघठन के कार्य में जुट पड़ते है व समय व्यतीत होने पर देखते  है कि उनके कार्यकर्ताओं का उत्साह भंग हो चूका है |
कार्य में आरम्भ से लेकर अंत तक एकरूपता व सामान रस बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि कार्यकर्ताओं में उत्साह निरंतर बना रहे | भावनाओं को उभार कर या परिस्थितियों का भय दिखाकर समय विशेष पर लोगों को उत्साहित कर कार्य को सिद्ध किया जा सकता है , किन्तु जीवन पर्यन्त साधना के लिए , यह पर्याप्त सिद्ध नही हो सकते | क्योंकि कामनाओ को आघात पंहुचाते ही उत्साह के स्थान पर शोक उपस्थित होता है | परिणामतः लोग एक दूसरे में दोष दृष्टि की स्थापना कर कर्म विमुख होने लगते है |

अतः आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है विचार क्रान्ति | सारे समाज को विचारशील बनाकर उसको आगे बढाने के लिए तैयार करना पड़ेगा | विचार व कर्म के सामंजस्य से उत्पन्न होने वाले नवीन अनुभव ही कार्यकर्ता के लिए संजीवनी शक्ति का कार्य कर सकते है | इस क्रम के चालु रहने पर लोगों की निरंतर नवीन प्रेरणा का सहारा मिलता रहेगा | जिससे उनका उत्साह कभी भंग नहीं होगा | अतः यहीं से हम आत्म चिंतन के अध्याय को आरम्भ करते है | पहले हम हमारी भूलों को देखने व समझने का प्रयास करेंगे | उसके बाद उस संजीवनी शक्ति की खोज करेंगे , जिसको प्राप्त कर हमारे पूर्वजों ने अमरत्व व अक्षय यश प्राप्त किया था | यही होगा हमारी विचार क्रान्ति का पहला चरण |
क्रमश :
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |


Jun 16, 2011

हमारी भूलें : देवीसिंहजी महार

संसार का इतिहास अनेक व्यक्तियों, जातियों धर्मो व राष्ट्रों के उत्थान-पतन के लेखों- जोखों से भरा पड़ा है | उसके अध्यन से जो बात सबसे स्पष्ट रूप से उभर के सामने आती है , वह यह है कि पतन के बाद जिन्होंने आत्म चिंतन का आश्रय लिया , अपनी कमियों को स्वीकार किया व अपनी भूलों को सुधारने के लिए जो तैयार हुए , उन्होंने समय पाकर अपनी समृधि को पुनः प्राप्त कर लिया | इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज अथवा राष्ट्र पराभव के बाद शोक मग्न हुए अपने भाग्य को कोसते रहे तथा अपने पूर्वजों कि गौरव गाथाओं को मात्र गाकर ही संतोष करते रहे , उनका नामो निशान ही उठ गया |
आज हम हमारी भूलों पर विचार करने के लिए तैयार है | उस कार्य को आत्मनिंदा या परनिंदा के द्रष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए , क्योंकि आत्मचिंतन करते समय व्यक्ति व समाज को उन समस्त परिस्थितियों पर विचार करना पड़ता है , जिनके अंदर से गुजरने का समाज को अवसर मिला , उस समय जो भी त्रुटियाँ रही उनका विवेचन आत्म चिंतन ही कहा जायेगा और इस कार्य को किये बिना कोई भी पुनरोत्थान कि कल्पना नहीं कर सकता |

आत्म चिंतन कर अपनी भूनों को निकलना , उन्हें स्वीकार करना व भविष्य में उनसे बचे रहने की चेष्टा करना अत्यंत दुष्कर कार्य है | मानव स्वभाव अपने आपको दोषी स्वीकार करने का अभ्यस्त नहीं है | दोष को स्वीकार करने से उसके अहंकार पर आगात लगता है | समय के साथ व्यक्ति व समाज कुछ मान्यताओं में अपने आपको बाँध लेता है , जिनमे सदा सदा के लिए व अपने आपको दंधे रखने में सुख का अनुभव करता है , व इन मान्यताओं के विरुद्ध यदि कोई व्यक्ति कुछ बोलता है या कहता है तो ऐसा व्यक्ति उसे शत्रु-वत प्रतीत होता है | इस प्रकार आत्म चिंतन का मार्ग अत्यंत कठोर कार्य है |

आत्म चिंतन का आरम्भ करते हुवे विचारक को सबसे पहले अपने ही विचारों से संघर्ष करना पड़ता है | उन पर विजय प्राप्त करने के बाद जैसे ही वह अपना मुख समाज के सामने खोलने की चेष्टा करता है | उसको समाज के विद्रोह का सामना करना पड़ता है | क्योंकि लम्बे समय तक चले आने वाले कार्य संस्कारों का रूप धारण कर लेते है , तथा कमजोर व विकृत विचार भी संस्कारों का बल पाकर अपने आप को बलवान समझने लगते है | यद्यपि ऐसे विचार समय के द्वारा तिरस्कृत होकर सर्वथा त्यागने के योग्य सिद्ध होते है फिर भी व्यक्ति व समाज केवल रूढ़ी ग्रसिता के कारन उनको छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता |
वर्तमान काल में जब हम समाज व उनके नेतृत्व की और दृष्टि डालते है | तो समाज को पूर्ण रूप से पंगु व नेतृत्व की और दृष्टि डालते है | तो समाज को पूर्ण रूप से पंगु व नेतृत्व से विहीन पाते है | क्षत्रिय व क्षत्र धर्म का नारा देकर समाज को एकत्रित व संघठित करने का अनीक बार , अनेक प्रकार से , अनेक लोगों ने प्रयास किया है , किन्तु सामजिक परिस्थितियों , समाज के अभावों , व पतन करने के कारणों का विवेक सम्मत विश्लेषण करने का प्रयास लगभग नगण्य रहा है |

सन् १९४७ में क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना समाज चिंतन के दृष्टिकोण से इस युग की एक एतिहासिक घटना है | जहाँ पर बैठ कर लोगों ने सामजिक दृष्टिकोण से सोचने व अपनी कमियों को देखने का कार्य आरम्भ किया | स्वर्गीय तनसिंह जी व आयुवान सिंह जी ने समाज चिंतन को जागृत करने व उसे आगे बढ़ाने में जो महत्वपूर्ण योगदान किया , उसके लिए समाज को उनका कृतज्ञ रहना चाहिए | किन्तु खेद का विषय यह है की समाज चाहे कठिनाई से ही तैयार हों लेकिन नए विचारों को स्वीकार कर उनको पीछे चलने के लिए तो तैयार हो जाता है लेकिन आत्म चिंतन का मार्ग अपनाने से हमेशा कतराता रहता है | इसी का परिणाम आज हमारे सामने है |
जिन नवीन विचारों ने नई दिशा दृष्टि को उन विचारों को सृजित किता था , उसको आगे बढ़ना तो दूर रहा , उन्ही विचारों को विचार क्रान्ति के रूप में परिवर्तित करने में समाज के कार्यकर्ता पूर्ण रूप से असफल रहे है |

विचार एक धारा है | धारा का धर्म सतत गतिशील रहना है | इस धर्म को जो स्वीकार नहीं करते उसे हम धारा नहीं कह सकते | इसीलिए विचार से अधिक महत्व विचार धारा को दिया जाता है | एक विचार को स्वीकार कर , उस पर स्थिर हो जाना किसी समय विशेष में उपयोगी सिद्ध हो सकता है | किन्तु समय बीतने पर ऐसे लोग रूढ़िवादी ही कहे जायेंगे | विचार का प्रायोजन ही निरंतर विकास की और आगे बढ़ना है | यदि विचार में गति नहीं है तो वह विचार , उसको धारण करने वाले व्यक्ति के विनाश का हेतु होगा | पितामह भीष्म का मत है , कि जिस प्रकार मिट्टी को पीसते रहने पर उसके बारीक होने का क्रम जारी रहता है , उसी प्रकार विचार को गतिशील बनाये रखने से ज्ञान सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता चला जाता है | इस क्रम का कहीं अंत नहीं होता |
क्रमश:.................
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jun 11, 2011

मन री बात...!

किसी राजपूत नेता या व्यक्ती द्वारा महाराज,महाराणी,कुंवर,ठाकूर,भंवर,श्रीमंत आदी विशेषणों का प्रयोग अगर होता हो तो वह तुरंत बन्द कर देना चाहिए...ऐसा युवराज राहुल गाँधी ने कहा है! (माफ़ कीजिये हमने न चाहते हुए भी उन्हें युवराज कह दिया...!)  क्योंकि यह अधिकार केवल गाँधी-नेहरु परिवार तक ही अब सिमित रह गया है! उन्हें  ही केवल पंडित जी, प्रियदर्शिनी आदि से नवाजा जा सकता है!  राजपूत अब राजा नहीं है...उनके पास कोई रियासत नहीं है इसलिए उनका यह अधिकार{?} अब समाप्त कर दिया गया है ऐसी उद्घोषणा राहुल ने कर दी है....इस बात से हमें अब बेखबर रहने की कोई जरुरत नहीं है!
अब कुछ दिनों के बाद यह भी आदेश जनपथ से दिया जा सकता है .....की अब कोई अपने नाम के आगे अप्पा साहेब, नाना साहेब, दादा साहेब, आदरणीय,माननीय, श्रीमान जैसे शब्दों का विनियोग ना करे....क्योंकि जनता के पास इतना सन्मान नहीं होता है जो सिर्फ सियासत की बागडोर संभालने वाले नेताओं के ही पास होता है! आगे चल के कोई पगड़ी,साफा ना बांधे ....सिर्फ गाँधी टोपी पहने ऐसा भी आदेश (फतवा} निकल सकता है....हमें सावधान ही रहना होगा! (जब तक फैसला नहीं आ जाता तब तक कोई नई ना ख़रीदे...पैसा व्यर्थ हो जायेगा....!) आम आदमी के लिए जल्द ही एक ड्रेस कोड होगा....ताकि क्लासेस और मासेस में फर्क नजर आये! देश में महंगाई इतनी कर दी जाएगी की आम आदमी कोई गाड़ी ना खरीद सके....अगर खरीद हो ही गयी हो तो वह उसे चला ना सके.....यहाँ के रास्ते पर सिर्फ नेता या अमीरों की ही गाड़िया चलनी चाहिए....! अब संविधान ने जो आजादी हमें दी है, उसे भी रोक लगा दी जा सकती है, क्यों की सरकार के खिलाफ बोलना भी गलत  माना जायेगा! (बाबा रामदेव का उदाहरण हमारे सामने है ही!)
चाहे हमारी परंपरा, सन्मान,इतिहास,रीती-रिवाज कुछ भी हो, गणतंत्र में आपकी दाल गलनेवाली नहीं है!  यह जनता ने दिए हुए...बहाल किये हुए सन्मान जनक विशेषण है ....फिर भी हम उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते है ...क्योंकि अब जनता वोट सिर्फ नेता को देती है! और नेता महान है....! नेता इस देश का भविष्य है! इस देश की रक्षा नेता के पुर्वजोने अपना खून बहाकर की है! राजपुतोंको जो सन्मान बिना कुर्सी का मिलता है...जो उन कुर्सिवाले नेताओं को नहीं मिलता है...इसलिए यह लोग हमारे विशेषणों को लेकर भी राजनीती कर सकते है! कभी इतिहास को लेकर,कभी राम को लेकर ,कभी महाराणाप्रताप या शिवाजी महाराज को लेकर उन लोगोने राजनीती भी कर ली! समाज में आपसी फुट भी डाल दी! देश को लुट भी लिया...राजपूतों के तमाम संस्थान विलीन कर दिए.....सीलिंग कानून लगाकर जमींदारों की भूमि निकाल ली गयी.......अब हमारे विशेषणों को हटाकर हमारी वह पहचान भी मिटा रहे है! शायद हमारे मुख ज्यादा तेजस्वी है...हमारी मुछे--दाढ़ी ज्यादा अच्छी दिखती है...इस वजह से नेता का प्रभाव कम हो जायेगा......पाबन्दी आ सकती है!
क्षत्रिय समाज ने इस राष्ट्र के लिए जो त्याग किया है...वह केवल शब्दों में लिखा  नहीं जा सकता.. इतना महान है! क्षत्रिय राजाओ ने इस विश्व में अनगिनत आदर्श निर्माण किये.....उनके त्याग या योगदान के सामने आज के तथाकथित नेता धुल के समान है! हम उन नेतागिरी  करनेवाले लोगों से अपील करना चाहते है की वे हमारे निम्नलिखित सवालों के जबाब दे.......!
क्या आज के राजनेता अपनी निजी(?) संपत्ति राष्ट्र के नाम समर्पित कर सकते है?
क्या आज के राजनेता अपनी जमीं भूमिहीन लोगों में बाट सकते है?
क्या आज के राजनेता क्षत्रिय राजाओं के भाती केवल ५ साल सत्ता के बाद वानप्रस्थ का स्वीकार कर समाज सेवा में जुट सकते है?
क्या आज के राजनेता अपने ख़राब चरित्र के लिए प्रायश्चित ले सकते है? 
क्या आज के राजनेता किसी मामले में दोषी अपने ही परिवार के लोगों को सजा दिलवाने में आगे आ सकते है?
अगर इन सामंतवादी विशेषणों से आपको आपत्ति है तो क्या आप इस राष्ट्र में रहने वाले भिन्न-भिन्न समुदाय के लोगों के पोशाख....प्रार्थना....भाषा....व्यवहार...संस्कृति.....श्रद्धा .....स्वागत पर प्रयोग होनेवाले शब्द के प्रति भी आपत्ति जाता सकते है...?
अगर ऐसा करते है तो इस देश के तमाम नेता लोगों की तसबीर जनता अपने दिल के पास रखेगी और उनके आदर्श पर चलेगी!  यह राष्ट्र में सही स्वरुप में रामराज्य का निर्माण हो जायेगा! उन विशेषणों के बारे में इतनी अस्पृश्यता मानने की जरुरत नहीं है! अगर कोई किसी से ठाकुर साहब कह पुकारे तो देश पर कोई आपत्ति नहीं आ जाती ! इससे देश का कोई नुकसान नहीं होता है! नेता की यह सोच भी उसकी अपरिपक्वता दिखलाती है!
यह बिलकुल ही संभव नहीं! क्षत्रिय राजा ने कभी सूर्योदय से पहले और सूर्योदय के बाद आक्रमण नहीं किया है! इन्होने तो बाबा रामदेव के साथ रात के वक्त जो व्यवहार किया है वह निंदा के पात्र है!
ठाकुर जयपालसिंह गिरासे
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन

Jun 6, 2011

बगङ कस्बे में मनाई महाराणा प्रताप जयंती...................................नरेश सिंह राठौड़

जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के कुलपति श्री लोकेश सिंह जी शेखावत अपने व्विचार वुक्त करते हुए मंच पर बांये से श्री विजेन्द्र सिंह इन्द्रपुरा ,आसू सिंह सूरपुरा ,श्याम सिंह मेडतिया ,विक्रम सिंह शेखावत,दशरथ सिंह शेखावत ,आनंद सिंह

     इतिहास महान कार्यो से बनता है ओर  महान व्यक्तियों की ही जयंती मनाई जाती है।कसबे बगड़ के नागरिक  सदन में क्षत्रिय यूथ फेडरेशन झुंझुनूं  की ओर से  महाराणा प्रताप जयंती समारोह व राजपूत समेलन में बोलते हुए जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपती  डा.लोकेशसिंह शेखावत ने ये बात कही। उन्होंने कहा की इतिहास सुरक्षित रहेगा तो संस्कृति कायम रहेगी।अपनी कमजोरियों को समाप्त कर गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेते हुए सकारात्मक  सोच के साथ आगे बढ़े।
     
         भाजपा जिलाध्यक्ष डा.दशरथसिंह शेखावत,प्रदेश कांग्रेस कमेटी सचिव विजेंद्रसिंह इंद्रपुरा, जोधपुर विश्वविद्यालय के  पूर्व कुलपती  डा.लोकेशसिंह शेखावत, पूर्व विधायक  डा.मूलसिंह शेखावत,   पूर्व पालिकाध्यक्ष विक्रम सिंह शेखावत, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट बिरजूसिंह शेखावत, राजपूत महासभा .के जिलाध्यक्ष श्यामसिंह राठौड़, आशूसिंह सूरपुरा, महेंद्रसिंह शेखावत, महिपालसिंह , आनंदसिंह धमौरा व शिक्षाविद्‌ मुकुंद सिंह शेखावत कालीपहाड़ी मंचस्थ अतिथि थे।
       महाराणा प्रताप के चित्र पर श्रद्धासुमन से शुरू हुए कार्यक्रम में विक्रम सिंह नेवरी ने स्वागत भाषण दिया। तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रो में पिछड़ने के कारणों पर प्रकाश डालते हुये समाज सुधार हेतु समाज के लोगो को आगे आने का आव्हान किया |पूर्व पालिकाध्यक्ष विक्रमसिंह ने महाराणा प्रताप कि जीवनी से प्रेरणा लेते हुए धर्म एवं संस्कृति को कायम रखने पर बल दिया।  पूर्व विधायक डा.मूलसिंह शेखावत व एडवोकेट बिरजूसिंह ने कहा कि महाराणा प्रताप ने धर्म कि रक्षा के लिए स्वाभिमान व आत्म समान को बनाए रखने के लिए संकट झेले।। महेंद्र सिंह ने समाज उत्थान के लिए महिला शिक्षा पर बल दिया। उन्होंने जयंती जिला मुखयालय पर एक जगह मनाने कि बात कही । आशुसिंह सूरपुरा ने जिले में समाज कि  परिस्थितियों से जुझ रही पांच विधवा महिला के लिए वार्षिक पांच हजार रूपये  व पांच बच्चों कि शिक्षा के लिए पूरा खर्चा देने की घोषणा की | कार्यक्रम में श्यामसिंह व मुकुंद सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये |भाजपा जिलाध्यक्ष डा.दशरथसिंह शेखावत ने कहा कि समाज में कुछ करने वालो को ही समाज याद करता है । महाराणा प्रताप हिंदूस्तान के गौरव थे। ।
        प्रदेश कांग्रेस कमेटी सचिव विजेंद्रसिंह इंद्रपुरा ने कहा कि वीर पुरूष सभी जातियों के लिए समान प्रेरणा दायक होते है। प्रताप को  दूनिया के हर कोने में बसा हर हिंदूस्तानी याद करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा से ही समाज कि उन्नति संभव है शिक्षा के साथ वर्तमान समय में आगे बढ़ने केलिए अग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान होना बहुत जरूरी है।   आभार जयसिंह कालीपहाड़ी ने जताया व संचालन  तपेंद्रसिंह शेखावत झुंझुनूं ने किया ।