Dec 27, 2011

हमारी भूलें : जातिगत व धर्मगत भावनाओं में डूबे रहना

पहले आध्यात्मिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को ही धर्म के नाम से संबोधित किया जाता था| किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है| धर्म के नाम पर कुछ क्रिया-कलाप होने लगे है| तथा इन्हीं क्रिया कलापों को धर्म कहा जाता है| कौन किस प्रकार से जीवन बिताता है,इसको झगड़े व विवाद का विषय बना लिया गया है| व् इसी विषय पर साधारण झगड़े ही नहीं महायुद्धों तक की रचना हुई है|

वर्ण व जातियां भी किसी प्रकार से धर्म का अंग नहीं है| चार युगों में से सतयुग व कलियुग में वर्ण नहीं होती| कलियुग में वह नष्ट हो जाती है और सतयुग में उसकी आवश्यकता ही नहीं रहती| त्रेता के आरम्भ में जब समाज पत्नोमुखी होने लगा, उसकी रोकथाम के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया जाता है| जो कलियुग के आरम्भ होते होते पूरी तरह से विफल हो,नष्ट हो जाती है| इस प्रकार से चार योगों के कार्यकाल को जोड़ा जाय तो आधे भाग में सतयुग व कलियुग होता है, जिसमे वर्णव्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता| फिर भी यदि लोग वर्ण व जाति व्यवस्था को धर्म का आधार बताने की चेष्टा करे तो इसे दुस्साहस ही कहा जायेगा|

आज व्यावसयिक बुद्धि के लोग धर्म व जाति के नाम पर अनेक प्रकार के संगठनों का निर्माण, न केवल सुविधा पूर्वक जीवन बीता रहे है, बल्कि वे समाज के शोषण के हेतु बने हुए है| ऐसे लोग जातिय व धार्मिक कट्टरता फैलाकर समाज को शेष मानवता से अलग-थलग कर देने के लिए दोषी समझे जाने चाहिए|

जातिय व धार्मिक संगठनों कि यदि वास्तव में कोई उपयोगिता है तो वह यही हो सकती है कि अपने पूर्व पुरुषों द्वारा आध्यात्मिक विकास में जो मार्ग खोजे गए थे, उनका अन्वेषण कर, उस पाठ पर चल कर स्वयं का, समाज का व मानवता का कल्याण किया जाए| लेकिन यह करू अत्यंत कठिन है| इसके लिए व्यक्ति को कठोर साधना का आश्रय लेकर अपने तथाकथित भौतिक सुख साधनों का उत्सर्ग करना पड़ता है| इस लिए लोगों ने पूर्वजों के नाम पर,गौरव गाथाओं का बखान कर संगठन बनाने की पद्धति अपना ली है, ताकि समाज व पूर्वजों के नाम पर स्वयं हित का साधन कर सके व लोगों को गुमराह कर, उनके साधनों व शक्तियों का अपने हित में उपयोग कर सकें|

यह निश्चित तथ्य है कि वर्तमान युग में जिस प्रकार से जितने धर्म व जातियां चल रही है उनका अस्तित्व अधिक समय तक चलने वाला नहीं है| अत: जातिय संगठनों को वास्तविकता स्वीकार कर लोगों को स्वयं का विकास करने के लिए परम्परागत आध्यात्मिक प्रणालियों का आश्रय लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए| जो धार्मिक व सामाजिक संगठन यह कार्य नहीं कर सकेंगे, वे कालांतर में स्वयं समाज व धर्म का विनाश करने के लिए दोषी ठहराए जायेंगे|

आज से एक हजार वर्ष पूर्व जब मौखिक विज्ञान अपने विकास को द्रुतगति दे रहा था| उस समय अन्धकार में डूबे हुए लोग अपनी यश गाथाएँ सुनने, भोग विलास करने, व धार्मिक मदान्धता में लिप्त हुए अपने आपको अद्भुत प्राणी समझ रहे थे| लेकिन विज्ञान के चमत्कार ने उनकी सारी बुद्धिमानियों को मूर्खता साबित कर दिया| पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान जिस गति से आगे बढ़ा है, उसने समस्त भौतिक मूल्यों को ही बदल दिया है| पालकियों, रथ, हाथी, घोड़ों व चरसों को किसी ने नष्ट नहीं किया, वे बदले हुए काल चक्र के प्रभाव से अपने आप ही समाज द्वारा भुला दिए गए व स्वत: ही नष्ट हो गए|

पिछले आठ सौ वर्षों से आध्यात्मिक जगत में विलक्षण चमत्कार हो रहे है| संसार की सभी कौमों में व संसार के सभी धर्मों में धार्मिक कट्टरता, मदान्धता व धार्मिक पंडावाद के खिलाफ विद्रोह करने वाले श्रेष्ठ पुरुष पैदा हुए है| उनकी आवाज को बुद्धिमान लोगों ने सुना व ह्रदय गम किया है| व समाज को नए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया है| लेकिन धर्म व जातिगत भावनाओं से लोग अंधे हो गए है, उन्हें यह सब कुछ दिखाई नहीं देता है| वे आज भी बैल गाड़ियों से चंद्रलोक तक पहुँचने की कल्पना लेकर समाज को मुर्ख बनाने की चेष्टा कर रहे है|

आगे आने वाले दो सौ वर्ष संसार में आध्यात्मिक विकास के लिए उतने ही मत्वपूर्ण होंगे जितने महत्वपूर्ण पिछले दो सौ वर्ष भौतिक विज्ञान के विकास के लिए रहे है| मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, मठ व चर्चों की दीवारों में जो लोग धर्म को बाँध कर रखना चाहते है उनके हौसलें इस तरह से पस्त होंगे, जिनकी आज लोग कल्पना भी नहीं कर पा रहे है| इन धर्म के नाम पर ठगी के अखाड़ों को किसी को नष्ट करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी| समाज द्वारा इन्हें सभी प्रकार से परित्यक्त कर दिया जावेगा| जिस प्रकार रथ,हाथी व घोड़े समाज द्वारा छोड़ दिए गए है|

धर्म व जाती के नाम पर चलने वाले अखाड़ों के भीतर घुसकर यदि हम देखने की चेष्टा करें तो न वहां हमें जीवन दिखाई देगा और न ही सौंदर्य| जीवन से विहीन, विशाल भवनों व किलों की दुर्गति आज हम देख रहे है वही गति इन धर्म के नाम पर चलाये जाने वाले संगठनों की होगी| वे स्वत: ही खंडहर बनकर लोगों के द्वारा छोड़ दिए जायेंगे| जिन लोगों में जीवन जीवन है, उन्हें चाहिए कि सम्यक रूप से स्वयं पर व समाज व सामाजिक संगठनों पर दृष्टि डाले| इन खंडहरों को का जो स्वरूप है, उसे बचाया नहीं जा सकता| इस तथ्य को स्वीकार कर लेने के बाद ही नव निर्माण का सूत्रपात होगा|

नव निर्माण का प्रयोजन केवल एक ही हो सकता है| अपनी परम्परागत साधना व आराधना पद्धतियों कि खोज तथा उनका अनुसरण कर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण| जो भी व्यक्ति, समाज या धर्म इस कार्य को कर लेगा, वही आने वाले समय में जीवित रहेगा,विकसित रहेगा व संसार पर छा जायेगा| वह समय दूर नहीं है, जब आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न लोग उसी तरह से छा जायेंगे, जिस प्रकार आज भौतिकवादी छाये हुए है|


लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 21, 2011

हमारी भूलें : भविष्य की कल्पना में दुबे रहना

क्रांतदर्शी होने का तात्पर्य है,आर पार देखने की सामर्थ्य| अर्थात वतमान को छोड़कर भविष्य को देख लेने की सामर्थ्य| यह एक गुण है खास तौर से नेतृत्व् का यह विशिष्ट गुण है| जिस नेता में यह गुण नहीं है व समाज का मार्ग दर्शन करता है तो उसे दोषपूर्ण कार्य ही कहा जाएगा| क्योंकि जिसको स्वयं मार्ग नहीं दिखाई देता वह दूसरों का मार्ग दर्शन करने का दावा किस आधार पर कर सकता है|

भविष्य को देखकर,वर्तमान व भविष्य दोनों का समन्वय करने वाली योजनाओं की रचना तो नेता करता है,वही लोकप्रियता व सफलता दोनों को प्राप्त कर सकता है| जो लोग केवल दीर्घकालिक योजना बनाकर कार्य आरम्भ करते है,उनके कार्यकर्ताओं का वर्तमान इतना बोझिल हो जाता है कि वे लक्ष्य को प्राप्त करने से पूर्व ही थक कर निराश हो जाते है| इसके विपरीत जो केवल वर्मान को देखकर ही परिस्थितियों के निवारण हेतु कार्य करते रहते है,वे अपने जीवन के अंत में इस अनुभव पर पहुँचते है कि वे कुछ भी नहीं कर पाए|

भविष्य को देख पाने कि क्षमता व भविष्य कि कल्पना में डूबे रहना दो अलग अलग बात है| भविष्य कि कल्पना में डूबे रहने से तात्पर्य यह है कि बिना भविष्य को देख,केवल काल्पनिक भविष्य की रचना करते रहना| और आज का समाज व आज का व्यक्ति इसी प्रकार के काल्पनिक भविष्य की रचना करने का अभ्यस्त हो गया है,क्योकि हम पिछले लम्बे समय से केवल कल्पना की दुनियां में जीवित रहे है व अब भी उसी प्रकार की दुनियां में बसे रहना चाहते है|

वर्तमान,जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है| जो वर्तमान को ठीक प्रकार से व्यतीत करता है,उसी को भविष्य की दृष्टि या भविष्य को देखने की सामर्थ्य मिल सकती है| कल्पना,मन ओर बुद्धि की उड़ान है,जिनके पास वास्तविकता कुछ भी नहीं होती| अतः वास्तविकता में स्थित होकर किसी भी प्रकार की उपलब्धि को प्राप्त करना असम्भव है|

हमने व हमारे समाज ने वतमान में स्थित रहना व वर्तमान को ठीक प्रकार से व्यतीत करने की कला को खो दिया है जिसने वर्तमान को खो दिया,उसका भविष्य स्वतः ही खो जाता है,क्योकि भविष्य वर्तमान से अगला कदम है| जिसके कदम अभी जमीन पर स्थित नहीं है,अगले कदम की कल्पना नहीं कर सकता ओर अगर वह कल्पना करता है तो ऐसी कल्पना हमेशा कल्पना ही रहेगी,वह कभी वास्तविकता नहीं बन सकती|

वतमान में जीने का अभीप्राय यह है कि मै हूँ,उसी प्रकार से अपने आपको स्वीकार करूँ| आज लोग अपने आपको प्रतिष्ठित दिखाने व बुद्धिमान साबित करने कि दौड में लगे रहते है| जिसका परिणाम यह होता है कि लोग आडम्बरों में फंस कर अपनी जीवन शक्ति व आर्थिक शक्तियों का विनाश करते रहते है| धीरे धीरे ये प्रतिस्पर्धाएं इस हद तक पहुँच जाती है कि व्यकि व समाज उनके भार को सहन करने में असमर्थ हो जाता है| जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति की अर्थ व्यवस्था व समाज की परम्पराएं नष्ट भ्रष्ट हो जाती है| अपने स्वभाव से विमुख होकर कोई भी कल्याण की कल्पना नहीं कर सकता| स्वाभाविक जीवन हमेशा सरल होता है | संसार द्वारा विज्ञान में अदभुत प्रगति की गई है,इसके बावजूद सौंदर्य की अनुभूति के लिए उन्हें प्रकृति कि गोद से जाने के लिए बाध्य होना पड़ता है,क्योकि रचना पर रचना तथा आविष्कार पर आविष्कार जीवन में जटिलता को पैदा करते है|इस प्रकार उत्पन्न हुई जटिलताओं में जीवन का सौंदर्य खो जाता है|

प्राकृतिक,सहज सुंदरता को खोकर,तब लोग क्रत्रिम साधनों का शारीर में प्रयोग कर अपने बोझिल जीवन को हल्का करने कि चेष्टा करने लगते है| जिससे स्वाभाविकता की निरंतर क्षति होती है व पर निर्भरता का व्यक्ति व समाज अभ्यस्त होता चला जाता है| जिसके परिणामस्वरूप क्षीणता से उत्पन्न अनेक रोगों से घिर कर व्यक्ति विनाश के गर्त में जा गिरता है|
वतमान में जीने का पहला आधार है,अपनी सव्भाविक स्थिति को अक्षुण्य बनाए रखना,दूसरों की देखा देखी प्रतिस्पर्धाओं व अस्वभाविक आयोजनों में नहीं पड़ना| इस स्थिति को प्राप्त करलेने के बाद वर्तमान में जीवित रहने का दूसरा आयोजन सामने प्रगट होता है| वह है “मै कौन हूँ?” “समय कैसा है” “मेरी सामर्थ्य क्या है?” “कौन शत्रु है?” “व कौन मेरे मित्र है?” इन सारी बातों पर विचार कर अपना कार्य क्षेत्र निश्चित करना व अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ कार्य में जुट पड़ना|

हमारे समस्त सामजिक संघटनों की आज व पिछले सैकड़ों वर्षों से एक सी ही स्थिति चली आ रही है| उनका निर्माण बहुत उत्साह के साथ किया जाता है| थोड़े समय तक उत्साहपूर्वक कार्य भी होता है व उसके बाद धीरे धीरे धाराशायी होने लगते है| इस परिस्थिति का क्या कारण है?इस विषय पर यदि हम गंभीरता से विचार करें तो एक ही निष्कर्ष पर पहुंचेंगे ओर वह यह कि,हम संघटन के निर्माण से लेकर उसके पराभवकाल तक केवल भविष्य को सुन्दर व सुखद बनाने कि कल्पना में डूबे रहे थे| हमने लोगों को उज्जवल भविष्य की कल्पना दी थी| अपने स्वयं के मष्तिष्क में भी उसी प्रकार कल्पनाओं को संजोया था| लेकिन अपने वर्तमान को सम्भाल लेने की हमारे में सामर्थ्य नहीं थी,जिसके कारण बालू की भीत की तरह कल्पनाये धाराशाई होती चली गई|

वास्तविक कठिनाई यह है कि वर्तमान में जीने के लिए व्यक्ति को अपने आप को संभालना पड़ता है| अपनी वृतियों को विकासोन्मुख करना पड़ता है व अपनी घिसी पिटी परम्पराओं को तोड़ना पड़ता है| इन सब कार्यों को करने के लिए व्यक्ति को अपने भीतर व बाहर संघर्ष का आव्हान करना पड़ता है| ऐसे संघर्ष को समय की सीमाओं में भी बाँध कर नहीं रखा जा सकता| जीवन पर्यन्त सतत संघर्ष एक डरावनी कल्पना है| उससे बचने के लिए हम चालबाजी व बुद्धि का सहारा लेकर अनेक रास्ते निकालते है व निकालते रहे है| उसी प्रकार के रास्तों पर चलकर हमारे समाज ने अपना सर्वस्व गंवाया|

अब समाज सेवक बनकर सामने आने वाले लोग भविष्य के सुन्दर सपनों की कल्पना दे, तो उन्हें दो काम अवश्य कर लेने चाहिए, पहला तो यह है कि वर्तमान को जीने के बारे में उनके पास क्या धारणा व कार्यक्रम है; उसको ठीक प्रकार से मालूम कर लेना चाहिए| दूसरे वे तथा उनके साथी वर्तमान को किस प्रकार से जी रहे है, इसका ठीक,प्रकार से अध्ययन कर लेना चाहिए, क्योंकि जिनके पास वर्तमान नहीं है, वे जो भी भविष्य की योजना लेकर आवेंगे वह मृग-मरीचिका ही होगी|

इस प्रकार की परीक्षा से बचने के लिए समाज सेवा के नाम पर चलने वाली दुकानों के दुकानदारों ने यह कहना आरम्भ किया है कि लोगों को व्यक्तियों के व्यक्तिगत जीवन के बारे में नहीं सोचना चाहिए| जबकि वास्तविकता यह है कि व्यक्ति का जीवन ही उसका वर्तमान है और जिसके पास वर्तमान नहीं है, उसका भविष्य कभी भी उज्जवल नहीं हो सकता| इतना ही नहीं बल्कि उसका भविष्य निश्चित रूप से अंधकारमय होगा|

लम्बे चौड़े भाषण, लंबी चौड़ी योजनाओं व लम्भी चौड़ी भविष्य की कल्पनाओं से प्रभावित होकर आज तक समाज ने खोया ही खोया है| अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम कल्पनाओं की दुनियां से दूर होकर अपने वर्तमान को देखें, उसे सहज व सुन्दर बनाने का प्रयास करे,आडम्बरों व प्रतिस्पर्धाओं से बचें, तो अपनी भूलों को ठीक करने की ओर अग्रसर हो सकेंगे|
लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 19, 2011

हमारी भूलें : दुनियां का अंधानुकरण करना

हमारा समाज ही नहीं संसार के अधिकांश लोग अंधानुकरण करने के अभ्यस्त होते है| तथा अंधानुकरण को बनाये रखने के लिए उनका सबसे तर्क होता है कि दुनिया क्या कहेगी ?

भौतिकवादियों में समय समय पर अधिक लोग ऐसे निकलते है, जो धनोपार्जन के रुढिवादी तर्कों व व्यवस्थाओं को बदल देते है| लेकिन उनको भी यथास्थिति वादियों से कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ता है| जब तक नया काम करके नहीं देखा दो, उसकी उपयोगिता को सिद्ध नहीं कर दो, तब तक लोग उसको अपनाने को तैयार नहीं होते|

वर्तमान शताब्दी में भारतवर्ष में भौतिक क्षेत्र में अनेक रूढिवादियों को ध्वंस किया व उसके अग्रणी लोगों ने आर्थिक क्षेत्र में बेतहासा लाभ भी प्राप्त किया| तब हमारा समाज बोतल के नशे में, अज्ञान के अंधकार में व निष्क्रियता के गर्त में पड़ा, यह सब देखता रहा|

अब समाज के समझदार कहे जाने वाले लोग कहने लगे है कि हम पिछड़ गए है| हमको शहरों की ओर दौडना चाहिए, ताकि इस आर्थिक प्रगति की दौड में हम भी शामिल हो सकें| भौतिक प्रगति व विज्ञापन के आविष्कारों में भारत स्वयं दुनिया के देशों से एक हजार वर्ष पीछे चल रहा है| हमको इस बात का बोध नहीं है कि विज्ञान अपने विनाश के लिए बेताबी से तडफ़ रहा है| इतने विनाशकारी हथियारों का अविष्कार हो चूका है कि किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व का विज्ञानं राख की ढेरी बन सकता है| जब बढ़ने व लाभ उठान एके दिन थे, तब हम सोते रहे और अब जब विनाश के दिन आने लगे है, हम उस और दौड पड़ना चाहते है|
संसार के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व व समाज परिवर्तन की है| जो भी व्यक्ति या समाज इस कार्य को कर सकेगा,वही समाज में जीवित रह सकेगा| आज सारा संसार धर्मों,राष्ट्रों व आर्थिक वादों के झंझटों में फंस कर इस प्रकार भया-क्रांत है,कि उसे चारो और अपने विनाश के अलावा कुछ नहीं दीखता| यह आश्चर्यजनक बात है कि विनाश को कोई भी पसंद नहीं करता,फिर भी विनाश से सब भयभीत है| इसलिए है कि वे धर्म,राष्ट्र व आर्थिक वादों के,अपने रूढिगत बंधनों को छोड़ नहीं सकते और यही रूढ़ियाँ नहीं चाहते हुए भी संसार के लोगों को विनाश के कगार पर पंहुचा देगी,इस बात को संसार के लोग अच्छी तरह समझने लगे है|
ऐसी परिस्थिति में लोग चमत्कारों की खोज में लगे हुए है| आज से पचास या सौ वर्ष पहले जिन भविष्य वाणियों व आध्यात्मिक शक्ति को लोग पिछड़ापन व रूढीग्रस्तता कहते थे|उनकी बात लोग सुनने लगे है| इसी के परिणाम स्वरूप ऐसी खबरों को इस समय अखबारों में प्रमुखता दी जा रही है|लोग अन्धकार में किसी प्रकाश की किरण खोज लेने के लिए आतुर है| ऐसा समय ही श्रेष्ठ लोगों को नेतृत्व की और आगे बढ़ने के लिए उपयुक्त होता है| गोरखनाथ कहते है "रात गई मध्यरात्रि गई,तब एक बालक चिल्लाता है,है कोई शूरवीर इस संसार में" घोर कलियुग समाप्त हुआ,नवयुग के निर्माण की बेला सामने खड़ी है| संसार का असहाय मनुष्य बालक की भांति चिल्ला रहा है,है कोई शूरवीर इस संसार में,जो आये और हमें बचाए|
एक कहावत है,'समय का सर पीछे से गंजा है ',तथा वह अपने बाल चेहरे पर डाले रखता है|इसलिए समय आता है तो लोग पहचान नहीं पाते,जब वह आगे बढ़ जाता है,तब उसके सर की गंज को पहचानते है और पकड़ने को दौड़ते है,किन्तु पकड़ नहीं पाते| वाही विडम्बना आज क्षत्रिय समाज के समक्ष है| लोग शक्ति संपन्न,श्रेष्ठ पुरुषों की तलाश में है और हम दुर्गुणों व भ्रष्टाचार की दौड़ में शरीक हो रहे है| अपनी गति को और बाधा लेना चाहते है कि दुनियां से कही पिछड़ न जाय|
व्यक्ति आसानी से बुराई व भ्रष्टाचार में पड़ना नहीं चाहता|उसकी स्वाभाविक वृत्ति सतत विकास की और आगे बढ़ते रहना है,लेकिन वह दुनियां जो उसके चारों और फ़सी हुई है,उसे बाध्य कर देती है इस बात के लिए कि,वह अपने अनोभावों को दबाये| अपनी मौलिक स्वतंत्रता को खोकर दुनियां की दासता को स्वीकार करले|
एक व्यक्ति के लिए समाज के विरुद्ध लड़ना बहुत ही दुष्कर कार्य प्रतीत होता है| यदि अमुक रीति रिवाज़ का पालन नहीं किया तो दुनियां क्या कहेगी?अगर अमुक प्रकार से आचरण किया तो दुनियां क्या कहेगी?अगर अमुक प्रकार से विचारों को व्यक्त किया तो दुनिया क्या कहेगी?दुनिया के ही लोग दुनियां की दुहाई देकर,व्यक्ति को दुनियां का गुलाम बना लेने के लिए आतुर है|और दुर्बल व्यक्ति चहरे पर अप्राकृतिक मुस्कान लिए हुए बोझिल दिल के साथ इस गुलामी को स्वीकार कर लेता है|

संसार में एक भी श्रेष्ठ व्यक्ति या महापुरुष ऐसा नहीं हुआ, जिसने दुनियां की गुलामी को स्वीकार किए हो| और दुनियां में ऐसा कोई भी व्यक्ति महापुरुष नहीं बन सका, जिसने अपने जीवन में दुनियां की गुलामी को अंगीकार किया हो| दुनियां में किसी भी श्रेष्ठ पुरुष के वचनों को इस दुनियां के लोगों ने कभी भी आसानी से स्वीकार नहीं किया और न ही किसी भी महापुरुष के कार्यों में सक्रीय योगदान दिया| लेकिन जब उनके कार्य पुरे हो गए वे ही दुनियां के लोग, उनको पूजने व उनके नाम पर दूकान दारियां चलाने के लिए सबसे आगे हो गए|

भगवान राम, बन्दर व भालुओं की सेना लेकर लंका विजय कर आये| जब वापस अयोध्या लौटे तो ३०० राजा लंका पर चढाई करने के लिए उपस्थित थे| दुनियां का यह रिवाज कोई नया नहीं है| राम को भगवान मानकर पूजने में गौरव समझने वाली दुनियां, उनका साथ नहीं दे पाई|

महान तपस्वी व ज्ञानी पितामह भीष्म, नीतिज्ञ विदुर, विद्वान द्रोणाचार्य, धनुर्धर कर्ण में से किसी के भी कान ने कृष्ण की पुकार को नहीं सुनी| लेकिन पुरुषार्थी पांडवों की कृष्ण जि ने जब विजय करादी तो वही दुनियां श्री कृष्ण को भगवान के रूप में पूजने को आतुर हो गयी|

बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद आदि कितने लोग इस संसार में ऐसे हुए जिन्होंने इस संसार को नई ज्योति व नया मार्ग दिया| लेकिन दुनियां के लोगो ने कभी उनका साथ नहीं दिया| इतना ही नहीं उनके जीवन के आरंभकाल में दुनियां के लोगों ने, उनका कठिनतम विरोध किया|
हम और हमारा समाज आज उसी दुनियां की दुहाई देकर पतन के गर्त में पड़े रहना चाहते है| हम कायरतावश इतना साहस नहीं जुटा पाते कि आत्मचिंतन कर, वास्तविकता को समझे और सत्य पर आधारित होकर उस मार्ग की खोज करें जिससे स्वयं का, समाज का व संसार का कल्याण हो|

संसार में क्षात्र धर्म को छोड़कर एक भी धर्म ऐसा नहीं है जो संसार के कल्याण के कल्पना करता हो, अथवा जिससे आत्मकल्याण तक पहुँचने की क्षमता हो| संसार के सबसे बड़े वैभव, व सबसे बड़ी संपदा के स्वामी होकर भी आज हम दुनियां के फरेब में फंसकर, दीन हीन व दरिद्र है तथा इसी दरिद्रता को बनाये रखने व भोगते रहने का उपक्रम कर रहे है|

समाज चरित्र, व्यक्ति के निर्माण में यदि सहायक है तो उसे स्वीकार करना चाहिए| यदि वह समाज के चरित्र को गिराने की चेष्टा करता है,तो ऐसे समाज चरित्र के विरुद्ध विद्रोह अनिवार्य है| आज समाज के सुधार की आवश्यकता नहीं, विद्रोहियों की आवश्यकता है, जो अस्वीकार कर सके, इस सब पंडावादी व परम्परावादी पाखंड को|

वह समाज, समाज नहीं है जो लोगों को पतित करना चाहता है| लोगों के विकास को रोक देना चाहता है| अबोध बालकों में कुसंस्कार पैदा कर देना चाहता है| ऐसा समाज बूचड़खाना है जहाँ इंसानों की सरे आम हत्या की जाती है|

ऐसे समाज को बदलना ही पड़ेगा| उसकी मान्यताओं व परम्पराओं को ठुकराना पड़ेगा| सारा सामजिक पाखंड, धर्म के नाम पर खड़ा किया गया है| इसके लिए हमको समझ लेना चाहिए कि मानव, मानव के बीच केवल तीन ही आध्यात्मिक सम्बन्ध है| यदि लोगों के बीच में तीन सम्बन्ध नहीं हो तो समाज किसी भी सूरत में धार्मिक समाज नहीं है| और ऐसे अधार्मिक समाज को तौड देना, उसके विरुद्ध विद्रोह करना सच्चा धर्म है|

पहला आध्यात्मिक सम्बन्ध है, पिता व पुत्र का| पिता का उसका पुत्र बारह वर्ष का तो उससे पूर्व सिद्ध मन्त्र प्रदानकर संस्कारित करना चाहिए| इस प्रकार पिता व पुत्र एक ही मन्त्र का जो सिद्ध किया जा चूका है, जप करते है तो वे एक दूसरे की इस संसार के कर्मों में ही नहीं, मृत्यु के पश्चात भी अधोगति होने से बचा सकते है|

दूसरा आध्यात्मिक सम्बन्ध है पति व पत्नी का| यदि पति अपने जीवन में पत्नी के अलावा किसी दूसरी स्त्री को अपने मन में स्थान नहीं देता व इसी प्रकार यदि पत्नी अपने मन में पति के अलावा अन्य किसी पुरुष को स्थान नहीं दे तो वे एक दूसरे की रक्षा करने में समर्थ होते है| यही क्रम जब सात जन्मों तक पहुँचता है तो पत्नी महासती की श्रेणी में आ जाती है|

तीसरा आध्यात्मिक सम्बन्ध अहि गुरु व शिष्य का| जिसके नाम पर आज दुनियां में सबसे ज्यादा ठगी हो रही है| लोग गुरु बनकर कल्याण का ठेका ले रहे है| जबकि उन्हें यह भी पता नहीं है कि गुरु का चयन बुद्धि से नहीं किया जा सकता| और न ही अंधाधुंध शिष्यों की भर्ती की जा सकती है| यदि पिता समर्थ है व उसने मन्त्र देकर पुत्र को दीक्षित कर दिया है तो वही गुरु है| लेकिन आज के गिरे हुए समाज में इस प्रक्रिया के लोप हो जाने पर, बाजारों में कान में फूंक देकर बनने वाले गुरु बनने लगे है| जिनके फरेब से लोगों को बचाना चाहिए| व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी मार्ग दर्शन की चाह रखे जैसी भी उसकी रूचि हो, उसी प्रकार की साधना में लगा रहे | एक रोज उसको अचानक गुरु की प्राप्ति हो जायेगी| बनाने से गुरु नहीं बनते| कोई भी तुच्छ बुद्धि से संत की खोज नहीं कर सकता|

इसीलिये दादूजी ने कहा है-“ गैब माहि गुरु देव मिल्या” गुरु प्रयत्न करने से या खोने से नहीं मिलते| जब पात्र में पात्रता उत्पन्न होती है टी वे करुणा करके स्वयं मार्गदर्शन देने को तैयार होते है|

अत: स्पष्ट है कि जो लोग समाज सेवा के संगठन की बात करते है, उनको दुनियां के विरुद्ध कमर कसनी होगी| उनके द्वारा किये जाने वाले विरोध व अत्याचारों को सहन करना पड़ेगा| जो लोग ऐसा करने को तैयार नहीं है, उनके लिए यही हितकर है कि वे कम से कम समाज कल्याण की बात करना बंद करदे|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 16, 2011

हमारी भूलें : जीवन मे जटिलता को अपना लेना

भगवान ने सृष्टि की रचना बहुत सरल रूप से की है| इसकी हर चीज सहज रूप से पैदा होती है, विकसित होती है व विनाश को प्राप्त होती है|उसमे कहीं भी जटिलता की कोई आवश्यकता का अनुभव नहीं प्राप्त होता, लेकिन व्यक्ति ने अपने आप को दूसरे लोगों के सामने विशिष्ट व ज्ञानवान साबित करने के लिए जीवन में इतनी जटिलताएं उत्पन्न करली है है कि अब उनसे निकलना व स्वतंत्र होना कठिन हो गया है|

समाज कल्याण की बात तो करते है, लेकिन समाज जिन जटिलताओं में उलझा हुआ है, उनसे न तो स्वयं बाहर निकलने का सहारा बटोर पाते है और उन दूसरे लोगों को जो बाहर निकलना चाहते है, थोड़ी मदद देने को तैयार है| यदि अवस्था यही रही तो सामाजिक संगठनों की ओर लोग आँख उठाकर देखना भी पसंद नहीं करेंगे|

एक तरफ हम सामजिक विकास के साथ साथ व्यक्तिगत विकास व उद्दर्वगामी साधना की बात करते है, दूसरी ओर टीका,शराब,वैभव का प्रदर्शन आदि महानतम सामाजिक बुराइयों से अपने आपको बचा लेने का साहस तक नहीं जुटा पाते| क्योंकि इनका परित्याग करने से हमारी बुरी आदतों व गौरखनाथ जैसे महान संत क्या कहते है, उनपर भी हम विचार करने को तैयार हो तो हमें हमारी बुरी आदतों से मुक्त होना पड़ेगा|
अवधू मान भषन्त दया धर्म का नास|
मद पीवतं तहां प्राण निरास|
भांगी भखंत ज्ञानं ध्यानं षोवतं|
जम दरबारी ते प्राणी रोवतं|
गोरखनाथ


मांस भक्षण करने से दया व धर्म का विनाश होता है| मदिरा पीने से प्राण शक्ति पर आघात लगता है, वह अंत समय में रोता है| लोगों के कल्याण की अभिलाषा रखने वाले संत इससे अधिक स्पष्ट ओर क्या कह सकते है? फिर भी यदि हम सुनने को तैयार नहीं हों व समाज सेवा की बातें करते रहे तो हमारी कथनी वृथा प्रवचना ही साबित होगी|

सत्य,धर्म का आधार है, चाहे क्षात्रधर्म हो या संसार का अन्य धर्म हो| बिना उसका आश्रय लिए कोई भी अपने धर्म को प्राप्त नहीं कर सकता| यदि आज कोई व्यक्ति सत्य पर आधारित हो जाय तो क्या समज उसको जीवित रहने देगा| विवाह शादियों के बड़े बड़े आडम्बर, बिकाऊ पुत्र के लिए टीके की थैलियाँ व अन्य सैकड़ों नहीं हजारों ऐसे रिवाज है, जिनको ईमानदारी से जीवनयापन कर सत्या-चरित हो कर कोई भी व्यक्ति पूरा नहीं कर सकता|

इस प्रकार हम देख रहे है कि जहाँ समाज को व्यक्ति का रक्षक होना चाहिए, वहीँ आज समाज व्यक्ति का भक्षक बन गया है| व्यक्ति का परिवार व्यक्ति के सगे,सम्बन्धी,व्यक्ति के भाई बंधू, उस व्यक्ति को खा जाने को तैयार हो जाते है, जो इमानदारी से जीवन यापन करना चाहता है| इन्हीं कारणों से समाज पहले खंडित हुआ है| जिनकी हम आज बात नहीं करना चाहते कि हमारे काले कारनामों को देखें तो मुसलमानों की अनेक खांपें जैसे पीरजादे,कायमखानी, लुहार, नीलगर, आदि तथा हिंदुओं की बहुत सारी जातियां जैसे गुजर,दरोगे,जाटों की कई खांपें, राणा,बड़वा,कलाल आदि राजपूतों से बनी है|

ये लोग समाज से पृथक क्यों कर दिए गए या पृथक हुए ? क्योंकि समाज ने अपने जीवन का जितना आडंबरपूर्ण बना रखा था, उसकी पूर्ति करने के लिए आर्थिक साधन इनके पास नहीं रहे, यदि हम इन आडम्बरों के आधार पर व्यक्ति को प्रतिष्ठा देते रहे होते तो वह दिन दूर नहीं, जब समाज का निचला वर्ग अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लेगा|

हम जिस लोभ व लालच में पड़कर अधिक धनवान लोगों से सामाजिक बंधन बनाकर गरीबों को ठुकरा रहे है, अमीर लोग लोग जिन्होंने धन को ही अपना लक्ष्य समझा है, कभी भी विश्वनीय नहीं रहे है| जब इन लोगों के पास दौलत कुछ ओर बढ़ जायेगी तो ये लोग स्वत: ही तुम्हारे समाज को छोड़कर व्यवसायी वर्ग के साथ चले जायेंगे| इतिहास में महावीर के अनुयायी इसके प्रमाण है| ये समाज के धनवान लोग महावीर के अनुयायी लोगों के साथ जितने जल्दी चलें जाए, उतना ही समाज का कल्याण है|
इस प्रकार हमने देखा कि समाज का अल्प संख्यक धनीवर्ग पैसे के लोभ में माध्यम वर्ग को प्रभावित कर गरीब वर्ग को पहले समाज से पृथक कर देगा व बाद में स्वयं ही पृथक हो जायेगा| इस भयावह घटना की ओर यदि समाज सेवक के नाम पर काम करने वाले लोग घ्यान नहीं देंगे तो न समाज बचेगा ओर न ये सेवक| ऐसी समाज में अनेक जातियां है,जिन्होंने समय पर अपने आप को सुधारने की चेष्टा नहीं की और वे हमेशा के लिए समाप्त हो गई| ऐसा नहीं है कि हमने सानाजिक क्षेत्र में ही जीवन को जटिल बनाया है,हम धार्मिक क्षेत्र में भी उसी प्रकार की जटिलताओं में फंसे हुए है,जिससे हमको वास्तविकता को समझने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है|जैसा कि पहले कहा जा चूका है,धर्म सरलता का ही दूसरा नाम है| यदि व्यक्ति को भगवान के अस्तित्व में विशवास है तो उसे किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं है| वह स्वयं सात्विक रूप से भगवान का भजन करता हुआ,अपने जीवन को इतना सरल व साधारण बनाले कि जिन लोगों के बीच में वह रह रहा है,उनको किसी प्रकार की असाधारण गतिविधि का पता ही नहीं चले| लेकिन हम ऐसा करना नहीं चाहते,क्योंकि हमको भजन नहीं करना है| हमको मात्र भक्ति का प्रदर्शन करना है|तो फिर मंदिर चाहिए,मठ चाहिए,पंडे पुजारी चाहिए,तीर्थयात्राएं चाहिए व दान पुण्य चाहिए| अगर यह सब नहीं हो तो समाज का गरीब वर्ग हमसे पृथक कैसे हो सकता है| व यह सब वही कर सकता है, इसलिए वह पापी है और हम पाप से कमाए धन से यह सब कर रहे है| इसलिए धर्मात्मा है| अगर समाज के जीवन में ये जटिलताये इसी प्रकार से ही कायम रही, और हमने इस पाखंड का परित्याग कर सहज व सरल जीवन को नहीं अपनाया तो समाज कभी जीवित नहीं रह सकता| सामज के जीवित रहने की आवश्यक शर्त है, जीवन के प्रत्येक अंग से जटिलताएं व आडम्बरों को निकाल फैंकना| सात्विक सरल व स्वाभाविक जीवन को व्यतीत करना, आडंबबरियों का तिरस्कार करना, व गरीबों का सत्कार करना|

आडम्बर जीवन की वास्तविकता को भुला ही नहीं देता, उसे ठुकराता है| लोग इस परिस्थिति को अधिक समय तक देख सकेंगे व बर्दास्त कर सकेंगे, ऐसे कल्पना हमें नहीं करनी चाहिए| पहले लोग कल्पनाओं पर जीवित रहने के अभ्यस्त थे| तब परलोक की कल्पनाओं में लोग उलझकर धार्मिक व सामाजिक आडम्बरों को सहन कर लेते थे| लेकिन अब प्रत्यक्ष का युग है, विज्ञान का युग है व्यक्ति विश्वासों पर नहीं जीना चाहता| औरों के जीवन में क्या होगा, क्या मिलेगा| इससे सरोकार नहीं| आज के व्यक्ति को प्रत्येक्ष चाहिए, जो कुछ है उसे आज देखना चाहता है| यदि समाज व्यक्ति को सुख नहीं दे सकता, सम्मान नहीं दे सकता, आध्यात्मिक मार्ग नहीं बतला सकता, ईश्वर से साक्षात्कार नहीं करा सकता तो वह अगले जीवन तक इंतजार नहीं करेगा| उसे जो आज देगा, उसके साथ वह चला जायेगा|

ठाकुर रविंद्रनाथ टेगौर के दादा अपने जमाने के बहुत धार्मिक व्यक्ति गिने जाते थे| उनके मकान के पास से एक नदी बहती थी| सर्दी के दिन, मध्यरात्रि का समय, एक युवक नदी में कूदा, वह भीगे कपड़ों से उनके सामने आकार पूछने लगा, क्या आपने भगवान को देखा है ? बहुत ही अजीब सवाल था| वे कुछ सोचने लगे| इतने में युवक पीछे मुड़ा और नदी में फिर कूद गया| यह युवक ओर कोई नहीं, स्वामी विवेकानंद थे| जिसने देखा है, उसके लिए सोचने का क्या कारण हो सकता है| यही सवाल स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से किया और उनका उत्तर था, हाँ देखा है, वह अभी दिखा सकता हूँ|

आज का समाज राम-कृष्ण व विवेकानंद को प्राप्त करना चाहता है| वह आज में जीवित रहने को तैयार है| कल की व्यर्थ कल्पना ने फंसे नहीं रहना चाहता| जो संगठन समाज का कल की व्यर्थ कल्पनाओं में दीर्घ सूत्री योजनाओं के नाम पर उलझाए रखना चाहते है, समाज उनका परित्याग कर देगा| जो आज की बात करेगा चाहे वह बात कितनी ही छोटी क्यों न हो, समाज उसका साथ देगा, क्योंकि उसके द्वारा कुछ तो प्राप्त किया जा सकता है|

वैज्ञानिक युग का व्यक्ति व्यर्थ की कल्पना के आधार पर जीने को तैयार नहीं है| इसलिए जो धर्म आडम्बरों में फंसे रहेंगे, उनका इस जमाने में अवश्य नाश होगा| तथा जो लोग अपने सामाजिक व धार्मिक जीवन को बहुत सरल व सीधा बना लेंगे, उनका विकास अवश्य होगा|

परम्पराओं व संस्कृति के नाम पर आज तक हम आडम्बरों व जटिलताओं से बंधे है व अपने जीवन को उलझा दिया है| अब भी समय है कि हम समझें इन आडम्बरों व जटिलताओं का परित्याग करें व् उत्साह पूर्वक अनुसरण करें| कल्याण का यही एक मात्र मार्ग ही हो सकता है|

लेखक : श्री देवीसिंह,महार

Dec 15, 2011

हमारी भूलें : मात्र भूलों को खोजते रहना

अपनी भूलों को खोजना, उनकी चर्चा, उनका प्रचार करना, यह आत्मनिंदा की परिभाषा में आता है व आत्म निंदा आर्यों का धर्म नहीं है| श्रेष्ठ लोग अपनी निंदा नहीं करते, क्योंकि आत्म निंदा करने से स्वयं का व समाज के दूसरे लोगों का मनोबल टूटता है, प्राण शक्ति पर आघात लगता है|

आत्मचिंतन व आत्म मनन श्रेष्ठ लोगों का धर्म है| अपने बारे में विचार किये बिना व अपने गुण दोषों के सम्यक ज्ञान के अभाव में कोई भी विचार के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता|

इसलिए ऐसे समाज, जो मात्र अपने दोषों का वर्णन करते है, प्रचार करते है व एक दूसरे को दोषी ठहराने में गौरव अनुभव करते है, वे विग्रह व विनाश के गर्त में पड़कर हमेशा के लिए नष्ट हो जाते है| लेकिन ऐसे लोग व समाज को अपनी त्रुटियों व अपनी भूलों को खोजते है, उनको अपने व्यक्तिगत व समाज के जीवन से जीवन से निकालने की चेष्टा करते है, वे अपने खोये हुए गौरव को पुन: प्राप्त कर यश के भागी होते है|

अब जो लोग अपने व समाज के बारे में चिंतनशील है वे स्वयं अपने व समाज के आज के चरित्र को देखें उसके बाद उनकी अंतरात्मा स्वयं जबाब दे देगी कि उनका व समाज का क्या भविष्य है ? भविष्य वर्तमान में छिपा है, भविष्य को बनाना है तो वर्तमान को उज्जवल बनाना ही होगा| इसके अलावा अन्य कोई उपचार नहीं है|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 8, 2011

हमारी भूलें : उत्साह व उत्सव विहीन जीवन

क्षात्र-धर्म वीरों का है| हिंदी साहित्य का जिन्होंने अध्यन किया है, वे जानते है कि वीर रस का स्थाई भाव उतशाह है| अर्थात जिस काव्य में आदि से अंत तक निरंतर उतशाह बना रहे,उसी रचना को विर रस से परिपुर्र्ण कहा जायेगा|

आज लोग अपने आप को क्षात्र धरम के अनुयाई या धारणा करने वाले कहते है, लेकिन उनके जीवन में कही बी इस जीवन कि झलक नजर नहीं आती है| मुरझाये हुए चेहरे,टूटे हुए दिल वे लड्खडाते कदम क्षत्रिय कि पहचान नहीं है |यदि उन लक्षणों से युक्त लोग अपने आप को क्षात्र धर्म के प्रचारक या क्षत्रियोचक विचारों के साधक कहते है तो ये मात्र उनके मन का धोका है| ऐसे लोग मात्र अपने अपने अहंकार कि तुस्टी के लिए अपने आपको व् समाज को धोके में डाले हुए है|

कहावत है “भावित व् राजपूती किसी के बाप कि नहीं है|” वास्तविकता तो यहे है कि राजपूती और भक्ति दो अलग अलग वस्तुवें है ही नहीं| भक्ति कि पराकाष्ठा का नाम ही राजपूती या क्षत्रियत्व है|
उनके प्राप्त करने के लिए निरास व् हताश साधको कि आवशकता नहीं है| क्यूंकि ऐसे लोग इस लक्ष्य को जीवन में कभी नहीं प्राप्त नहीं कर सकेंगे |इस मार्ग पर चलने कि लिए हक़दार तो वे ही लोग हो सकते है जिन्होंने जीवन को सदेव एक उत्सव के रूप में बिताने का अभ्यास कर लिया है|

मुग़ल काल के आरंभ तक हमारे समाज के पास वह संजीवनी शक्ति थी,जिस से लोगो के जीवन में उत्साह भंग ही नहीं होता था| यही कारण था कि एक हजार वर्ष तक लगातार आकराअंताओं से व् बार बार पराजित होने के बाद भी, हमने पराजय सुविकार नहीं कि | अंतिम हिंदू सम्राट प्रथ्वीराज चोहान के प्रमुख सामंत पंजवनराय को जब नागौर में समाचार मिला कि मोहमद गौरी अपनी विशाल सेना के साथ दिल्ली कि और बढ़ रहा है तो उन्होंने मात्र पांच हजार सैनिकों के साथ गौरी पर आक्रमण किया गौरी कि सेना भाग कड़ी हुई और उनको बंदी बना किया गया

आई समर साकेत में,पीड करी पज्जौन|
गोरी सम गोरी अनि,गई लजत भजि भौन||


उत्साह वीरता की पराकाष्टा है| परिस्थितियों की विषमता या परिणामों का भय उसे रोक नहीं सकता| लोग आज अपने आपको अधिक बुद्धिमान समझने लगे है| हर चीज के परिणाम के बारे में आश्वस्त होना चाहते है| यही से कायरता का जन्म होता है| सुरक्षा की गारंटी मांग कर, न तो आज तक संसार में किसी ने महान उद्देश्यों की प्राप्ति की है न ही ऐसे लोग भविष्य में कोई उपलब्धि कर सकेंगे|

पितामह भीष्म के अनुसार फल की इच्छा रखने वाला ही कृपण है| कृपणता व कायरता समान गुण धर्म वाले शब्द है| फल की अभिलाषा से ही अथवा फल की और ध्यान देने पर ही कायरता का उदय होता है| अर्जुन ने युद्ध से उत्पन्न होने फल को देखकर ही धनुष डाल दिया था| जब कृष्ण ने उसे लताड़ा, तो उसने कहा था, “मैं कृपणता जन्य दोष से ग्रसित हो गया हूँ| अत: आप मुझे शिष्य की तरह स्वीकार कर मेरा मार्गदर्शन करें|” जहाँ फल की अभिलाषा है, वहां उत्साह निरंतर नहीं रह सकता, क्योंकि परिस्थितियों के वेग में जब फल में विध्न उपस्थित होता दिखाई देता है, तो उत्साह भंग होता दिखाई देता है| फल की इच्छा से मुक्त हुए बिना कोई भी स्थायी रूप से उत्साह को अपने अंदर स्थापित नहीं कर सकता| कहावत है कि- “ सदा दिवाली संत के आठों पहर उछाह”, जिसने इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, उसका ही जीवन सर्वदा उत्साह व उत्सव से परिपूर्ण रह सकता है| कर्मयोगी क्षत्रिय के लिए आसक्ति से रहित होकर कर्म करना ही फल का सर्वोत्तम त्याग बताया गया है| इस तत्व को पुन: उपार्जित करने का जब तक हम प्रयास नहीं करेंगे, निराशा हमारा पीछा नहीं छोड़ सकती|

जब समाज ने जीवन में उत्साह को उपार्जित करने व उत्सवमय जीवन बिताने की कला खो दी तो उसे पुन: प्राप्त करने की चेष्टा के बजाय, कृत्रिम तरीके खोजने लगे व इसी भूल के कारण जन्म हुआ नशीले पदार्थों का सेवन का व बिडदावली गाने का| ऐसे लोग हो गए जिनका वंश परम्परागत यही कार्य रहा कि वे युद्धों के अवसर पर वीर रस से परिपूर्ण कवितायेँ सुनाकर, सैनिकों को युद्ध के लिए प्रेरित करते थे| ऐसे आयोजनों के आविष्कारकों ने यह नहीं सोचा कि कोई भी शक्ति जब शरीर में कृत्रिम रूप से आरोपित की जाती है, तो उसका अंतिम परिणाम यह होता है कि उसकी अवधि समाप्त हो जाने पर शरीर व जीवन में शिथिलता व घोर निराशा का जन्म होता है| तथा ऐसे उपाय बार बार किये जाये तो उनसे शरीर पूरी तरह से निकम्मा बन जाता है|

हमारे समाज ने का, से कम पांच सौ वर्षों तक इसी प्रकार के कृत्रिम उपायों का आश्रय ले, अपने आपको वीर साबित करने की चेष्टा की, जिसके फलस्वरूप समाज शरीर का प्रत्येक अंग शिथिल व हृदय निराशायुक्त हो गया|
आज लोग सभाओं व संगठनों के द्वारा इस निष्क्रिय शरीर में जीवन फूंकने की चेष्टा कर रहे है| लोग समझते है कि पूर्वजों के गीत व गाथाएँ सुनाने पर, इस शरीर में पुन: जीवन जागृत होगा, क्योंकि वे नहीं जानते कि जो प्रयोग वे आज करना चाहते है, उसी प्रयोग ने आज समाज की शक्ति को नष्ट किया है| कृत्रिम उपाय कभी दीर्घजीवी नहीं हो सकते| अत: यदि हम वास्तविक रूप में अपना व अपने समाज का कल्याण चाहते है तो हमें पुन: उसी उत्साह व उत्सवपूर्ण जीवन को उपार्जित करना पड़ेगा| यह कार्य कठिन अवश्य है , लेकिन यही एक मात्र उपचार है| इसलिए जो लोग कल्याण चाहते है, उन्हें इस मार्ग पर और केवल इसी मार्ग पर आगे बढ़ना होगा|

प्राण शक्ति को जागृत करने व जीवन में उत्साह का संचार करने के कई साधन है, जैसे प्रकृति के साथ एकता व सामंजस्य स्थापित करना| इसको और स्पष्ट किया जावे तो यों कहा जा सकता है कि ईश्वर की सृष्टि से समीपता स्थापित करना व व्यक्ति द्वारा निर्मित सृष्टि से दुरी को अनुभव करना होगा| पहाड की छोटी या बालू रेत के टीबे पर बैठकर, प्रकृति की गोद में झूमकर, हम जीवन को उत्साह से भर सकते है| समुद्र की लहरें व चाँद की चांदनी, हमारे हृदयों में स्नेह की धारा बहा सकती है| इसीलिए मनुस्मृति में उल्लेख है कि जब क्षत्रिय का राज्य नष्ट हो जाए तो उसे खेती को अपनाना चाहिए ताकि वह प्रकृति के निकट रहे व अपने स्वाभाविक गुणों को खो न दे| ऐसे ही और भी अनेक साधन हो सकते है, लेकिन यह साधन मात्र स्फूर्तिदायक है| जीवन में सतत उत्साह की धारा प्रवाहित हो व जीवन एक उत्सव बन जाए, उसके लिए हमको इससे भी आगे बढ़ना होगा, तब ही हम उस मूल तत्व को उपार्जित कर सकेंगे, जिसको हम खो चुके है|

क्षत्रियों की साधना सबसे सरल व पूरी तरह से परीक्षित है| सृष्टि की उत्पत्ति "शब्द" से हुई है| इसलिए इसके रहस्यों को समझने के लिए सबसे पहले 'शब्द' का ही आश्रय लेना पड़ेगा,जिसको आज की भाषा में हम 'जप' कहते है| इस प्रक्रिया के आरम्भ व स्थिर हो जाने के बाद हमको आत्म परिचय करना होगा| आत्म परिचय से प्रायोजन है "मै कौन हूँ" इस विषय पर बार बार व निरंतर विचार करते रहना,जिससे हमे यह विश्वास हो जाए कि न तो यह संसार ही निरर्थक है और न ही हमारी मुसीबतें| जो कुछ हो रहा है,यह सब हमारे कल्याण के लिए है| जब इतनी अनुभूति हो जाए तो हम दृष्टा बनने की सामर्थ्य अर्जित कर सकेंगे| 'मै कर नहीं रहा हूँ' मात्र ऐसे विचार से कर्तापन की भावना का लोप नहीं हो सकता| इसका लोप तब ही होगा,जब आत्मपरिचय के द्वारा हमारा,हमारे 'प्राण' से सम्बन्ध जुड़ेगा व हम यह समझने लगेंगे कि जो लोग हमारे साथ है,वे अकारण नहीं है|उनका पहले से सम्बन्ध चला आ रहा है| यह जीवन एक धरा है,जिसमे स्वभावतः सब लोग आगे बढ़ रहे है| इस कार्य के सम्पादन में मनुष्य की भूमिका नगण्य है| इस समझ के उदय होने पर ही व्यक्ति दृष्टा बनकर जीवन के समस्त कर्मों को कर सकेगा|लेकिन यहाँ पर पहुंचकर भी जीवन में कभी नष्ट होने वाले उत्साह की उत्पत्ति नहीं होती| इसलिए भक्त जहाँ इस स्थिति को पराकाष्टा समझता है,वहीँ क्षत्रिय उसको नकारता है| वह कहता है, 'अभी कार्य पूरा नहीं हुआ'| अर्जुन की तरह मुझे आदेश चाहिए श्री कृष्ण का 'तुम युद्ध मै प्रवृत हो जाओ'

व्यक्ति जो अपने जीवन के समस्त कर्म भगवान के आदेश प्राप्त कर संपादित करता है,उसके जीवन में क्या कभी उत्साह भंग हो सकता है? इस भौतिक संसार में भी यदि कोई उद्योगपति अपने छोटे श्रमिक को,अथवा एक अच्छा अधिकारी अपने छोटे कर्मचारी को,किसी छोटे कार्य करने के लिए कहता है तो वह उसे अपना अहोभाग्य समझता है तथा कृतज्ञता व उत्साह से भर जाता है| आदेश की इतनी महिमा जब भौतिक जगत में हो,तो आध्यात्मिक जगत में विचरण करने वाला तुच्छ प्राणी सर्वशक्तिमान से आगेश प्राप्त कर ले तो क्या वह कृतज्ञता से भर नहीं जायेगा? क्या उसके जीवन में उत्साह का उदभव नहीं होगा?जो जीवन पर्यंत कभी क्षीण नहीं हो| क्या उसका जीवन उत्सव नहीं बन जाएगा?अवश्य बनेगा,इसी प्रकार के उत्सवमय जीवन को जब क्षत्रिय भोगते थे,तभी उनकी यश पताकाएं संसार पर लहराती थी| यदि आज भी किसी को अपनी वंश परम्पराओं पर गौरव है और यदि कोई समझता है कि उस गौरवमयी परम्परा को नष्ट होने से बचाना है,तो उसे अपनी भूल सुधार कर जीवन से पुनः उत्साह का उपार्जन करना ही होगा|

यह साधना की लम्भी प्रक्रिया है| अतः इसमें लगे रहने के साथ व्यक्ति को सुकर्मों में प्रवृत होकर व प्रकृति के साथ सम्बन्ध रखकर अपने उत्साह को पुनर्जीवित करने की चेष्टा भी सतत रूप से करते रहना चाहिए,जिससे न केवल उसको कठिनाइयों को पार करने में सहायता मिलेगी,बल्कि मूल लक्ष्य की प्राप्ति में भी सहायता मिलेगी|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Dec 3, 2011

हमारी भूलें : काल धर्म की उपेक्षा करना

युगधर्म के नाम पर आज संगठन की शक्ति की बात की जाती है| हम देख भी रहे है कि संसार के अधिकांश देशों में राजतंत्र, संगठनों की शक्ति द्वारा संचालित हो रहे है| लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है कि संगठनों के ऊपर से भी व्यक्ति व उसके व्यक्तित्व की छाया हट नहीं पा रही है| व्यक्ति के महत्व को कम करने के लिए, संगठनों ने कठोर से कठोर नियमों का सृजन किया, फिर भी व्यक्ति को संगठन दबा नहीं सका| स्टालिन व माओत्से तुंग इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है| संसार में कठोरतम नियमों वाले संगठन मरने के बाद स्टालिन की कब्र खोद सकते है| लेकिन जीतेजी उसके सामने चूं नहीं कर सकते|
व्यक्ति गरिमा के विकास के लिए काल धर्म को समझना आवश्यक है|

सतयुग में समाज पूरी तरह से बंधनों से मुक्त होता है, क्योंकि वह केवल “शब्द” को ही अपने विकास का आधार बनाता है| जिसके उच्चारण के लिए, किसी प्रकार के प्रतिबंधित जीवन की आवश्यकता नहीं होती| धीरे-धीरे उस महिमा को खो देने पर, जब व्यक्ति अपना पराभव देखने लगता है, तो त्रेतायुग में वह दूसरी भौतिक शक्तियों से मदद की अपेक्षा कर, यज्ञादि व कर्मकांडो की सृष्टि कर, उनके द्वारा व्यक्ति की शक्ति को बनाए रखता है| लेकिन इन सबके लिए इतने प्रतिबंधित जीवन की आवश्यकता होती है कि दीर्घकाल तक उन प्रतिबंधों का निर्वाह भी नहीं कर पाने के कारण पुन: गिरावट की और चला जाता है, जिसको रोकने के लिए द्वापर में वह आराधना पद्धति को विकसित कर्ता है, जिसके लिए प्रतिबन्धों की आवश्यकता तो है, लेकिन कर्मकांडी नियमों के समान कठोर प्रतिबंधों से बचा जा सकता है| इससे पतनोन्मुख व्यक्ति को कुछ समय तक राहत अवश्य मिलती है, लेकिन धीरे-धीरे वह उन प्रतिबंधों को भी सहन करने की क्षमता खो देता है, तब प्रादुर्भाय होता है कलियुग का, जिसके आरम्भ में व्यक्ति तंत्रादी निकृष्ट क्रियाओं का आश्रय ले, पुन: शक्तिशाली बनने की चेष्टा करता है| क्योंकि इस पद्धति में प्रतिबन्धों की आवश्यकता तो है लेकिन अल्पकालिक| इस प्रकार जब अल्पकाल में घटिया साधनों से अर्जित शक्ति से लोग शोषण में प्रवृत होते है,तब उनसे पीड़ित जनता आत्मरक्षा के लिए सोचने को विवश हो जाती है|

इस समय तक सामाजिक व जीवन पद्धतियाँ इतनी दूषित व पराश्रित हो जाती है कि उनके रहते किसी प्रकार की प्रतिबंधित साधना की सम्भावना ही समाप्त हो जाती है| तब एक मार्ग शेष रह जाता है, अपनी मूल स्वाभाविकता की और वापस लौटना| प्रतिबंधित जीवन जीवन व साधना पद्धतियों की नकार देना| इस अस्वीकृति के पीछे जो स्वीकृति छिपी है, वह “शब्द” साधना को स्वीकार कर लेने की| केवल साहित्यक रूप से मन्त्र जप की पद्धति को अंगीकार कर लेना| इसके लिए न तो किसी पद्धति की आवश्यकता है न बाहरी शक्ति की मदद की, क्योंकि शब्द सृष्टि में ही विचरण करने वाली जो सात्विक शक्तियाँ है, वे इस मार्ग पर चलने वालों का स्वत: ही अपने स्वभाव के वशीभूत हो कर मार्गदर्शन आरम्भ कर देती है| इस प्रकार कलियुग की पुन: सतयुग की और अग्रसर करने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है|

वर्तमान काल का इस दृष्टि से अध्ययन किया जावे, तो काल धर्म यही कहेगा कि वह समय आ गया है, जब समस्त प्रपंचों एवं प्रतिबंधों से मुक्त होकर सहज व सरल नाम स्मरण का आश्रय ले, व्यक्ति अपनी शक्ति को पुनर्जीवित करे| इसी पद्धति से समाज, राष्ट्र, व विश्व धीरे-धीरे स्वत; ही परिवर्तित होते चले जायेंगे| व्यक्ति की गरिमा बढ़ेगी| मानवता का पुनरोदय होगा| समाज को शोषण से मुक्ति मिल सकेगी| यही समय की पुकार है, काल धर्म है व युग धर्म है|
लेखक : श्री देवीसिंह महार


Rajput Matrimonial Service

Nov 20, 2011

हमारी भूलें : गुण दोषों के सम्यक ज्ञान का अभाव

जीवन के विकास के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने आपको सहज सरल बनाये रखे| नियंत्रणों के माध्यम से व्यक्ति पर यदि बोझ ढोया जाएगा, तो वुक्ति अपनी स्वाभाविकता को खो देगा| इस समझ को खोकर व्यक्ति ने अपने आप पर अत्यधिक धार्मिक, सामाजिक व राजनैतिक बंधन थोप लिए है| यह बंधन जैसे जैसे बढते गए, मनुष्य का जीवन अधिक जटिल व कलुषित होता चला गया| बंधनों से मुक्ति हेतु प्रयत्न करना जीव का स्वभाव है| जब अस्वाभाविक तरीकों से उसके विकास का प्रयत्न किया जाएगा, परिणाम निश्चित रूप से विपरीत निकलेगा| हमने समाज व व्यक्ति के पतन को रोकने के लिए प्रतिबंधों को दिन प्रतिदिन कठोर करना प्रारंभ कर दिया, जिससे पतन की गति रुकी नहीं बल्कि और बढती गयी| अत: अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रतिबंधों के चक्कर से बचकर जीवन को पुन: सरल व हल्का होने की अनुमति प्रदान की जाय| यह तभी हो सकता है, जब गुण-दोषों के बारे में सम्यक ज्ञान हो|

भगवान में छ: गुणों का विकास बताया गया है| इन गुणों को विकसित करने के लिए छ: दोषों का दमन नहीं,उन पर नियंत्रण करना आवश्यक है| प्रत्येक दोष पर नियंत्रण प्राप्त करने पर एक गुण का विकास का स्वत: हो जाता है| व्यक्ति व समाज के विकास की जितनी सहज व सरल यह प्रक्रिया है, जिसका विस्मृत कर हम जटिलताओं में फंसकर बोझिल होते जा रहे है|
(१) पहला दोष है “काम”- प्रचलित भाषा में काम का अर्थ लोग स्त्री प्रसंग ही समझते है| जबकि इसका प्रयोजन कामना से है| जो वास्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को काम कहते है| काम की उत्पत्ति संकल्प से होती है व सेवन करने से यह निरंतर बढ़ता रहता है| आसक्ति रहित होने से व सेवन का त्याग करने से यह तत्काल नष्ट हो जाता है| काम से उत्पन्न होने वाले दोष है, शिकार खेलना, जुआ खेलना,शराब पीना, स्त्री प्रसंग, दिन में सोना, पर निंदा करना, नाचना, गाना व बजाना व व्यर्थ घूमना| इन दोषों से रहित होने पर मनुष्य में एश्वर्य रूपी गुण का विकास होता है| शास्त्रों के अनुसार दंड को धारण करना व नीति के अनुसार प्रजा का पालन करना ही एश्वर्य है| शील,धर्म,सत्य,सदाचार,बल व लक्ष्मी इसके अंग है|

(२) दूसरा दोष है “क्रोध”- क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है व दूसरे के दोष देखने से बढ़ता है| क्षमा से इसका बढ़ाव रुकर यह धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है| क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोष है वाणी की कटुता, उग्रता, मारपीट करना, शरीर को कैद कर देना, त्याग देना, आर्थिक हानि पहुँचाना, चुगली, अति साहस, द्रोह ईर्ष्या व दोष दर्शन| इन दोषों पर जो विजय प्राप्त कर लेता है, उसमे गुण, रूप, धर्म की स्थापना होती है| धर्म की परिभाषा करना संभव नहीं| पितामह भीष्म ने कहा है कि मिटटी को लगातार पीसते रहने पर वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती चली जाती है, उसी प्रकार तपस्या व धर्म पर आरूढ़ रहने से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्व निरंतर विकसित होते चले जाते अहि, फिर भी यह कहा जा सकता है कि शील को धारण करने पर धर्म का तत्व स्वत: ही समझ में आने लगता है| मन, वाणी व शरीर से किसी भी प्राणी के साथ दोह न करे, सब पर दया करें व उत्तम पात्र को दान से, यही शील है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख मिलता है|

(३) तीसरा दोष है “मद”- उत्तम कुल, अधिक जानकारी व एश्वर्य के अभिमान से, मद मनुष्य पर सवार हो जाता है| वास्तविकता अर्थात अपने आपको मात्र निमित जानने से मद तुरंत उतर जाता है| यश की व्याख्या करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि यह स्वत: विकसित होने वाली क्रिया है| शास्त्रकारों ने यश के विषय में लिखा है, “फूलों की पवित्र एवं मनोहर सुगंध बिना बोले ही महक कर अनुभव में आती है तथा सूर्य भी बिना कुछ कहे ही आकाश में सबके समक्ष प्रकाशित हो जाता है| इसी प्रकार संसार में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ है; जो बोलती नहीं, किन्तु अपने यश से प्रकाशित होती रहती है|”

(४) चौथा दोष है “लोभ”- प्राप्त हुई वास्तु की अधिक से अधिक संख्या में पाने की इच्छा को लोभ कहते है| प्राणियों में भोगों के प्रति जो लोभ देखा जाता है, वह अज्ञान ही के कारण है, लोभ से ही पाप, अधर्म व दुःख का जन्म होता है| भोगों की क्षणभंगुरता को देखने व जानने से उसकी निवृति हो जाती है| पूर्वजन्मों के पुण्यों के क्षीण हो जाने पर व्यक्ति में जब मानसिक व बौद्धिक दरिद्रता व्याप्त होती है, तो वह भूख के भय से घबराकर लोभ का आश्रय लेने लगता है| इस लोभ पर विजय प्राप्त करने पर “श्री” नामक गुण का विकास होता है| लक्ष्मी व कांटी “श्री” के ही स्वरुप है| पितामह भीष्म के अनुसार “श्री” धर्म शील पुरुषों के भेष में, नगर में व घर में तथा युद्ध में पीठ न दिखाकर विजय से सुशोभित न होने वाले सुर वीरों के शरीर में सदा प्रतिष्ठित रहती है|

(५) पांचवा दोष है “ मोह”- मोह अज्ञान से उत्पन्न होता है| व पाप के अभ्यास से बढ़ता है| महात्मा पुरुषों के सत्संग से यह धीरे धीरे नष्ट हो जाता है| स्वभाव, जिसके वसीभूत होकर व्यक्ति मोह पाश में बंधता चला जाता है| केवल संत पुरुषों के संग से ही बदला जा सकता है| इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है| मोह पर विजय प्राप्त करने पर ही ज्ञान रूपी गुण का उदय होता है| ज्ञान व प्रकाश तप का फल है| भीष्म कहते है , “ जैसे आकाश में चिडियाओं के व जल में मछलियों के चलने के चिन्ह दिखाई नहीं पड़ते, उसी प्रकार ज्ञानियों की मति का भी किसी को पता नहीं चलता|” हृदय की गहराई से उत्पन्न होने वाले ज्ञान तत्व को पूरी तरह प्रकट करना व्यक्ति की सामर्थ्य के बाहर है| अत: ज्ञान का केवल अनुभव किया जा सकता है| वास्तव में जिसे ज्ञान कहा जाता है वह ज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञान के नजदीक की कोई वास्तु है जिसके आश्रय से व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त कर सकता है|

(६) छटा दोष है “मात्सर्य”- सत्य का त्याग व दुष्टों का संग करने व ईर्ष्या भाव से इसकी उत्पत्ति होती है| तथा सत्पुरुषों का संग अथवा सेवा करने से इसकी नवरीति संभव है| “मात्सर्य” पर विजय प्राप्त करने पर वैराग्य रूपी गुण की उत्पत्ति होती है| योग से जिन ऐश्वर्यों अथवा सिद्धियों की प्राप्ति होती है| उनकी अवहेलना करके पूर्ण विरक्त हो जाना अथवा पूर्णरूप से आसक्ति का त्याग कर देना ही वैराग्य है|
इन छ: दोषों पर विजय प्राप्त कर, छ: गुणों को उपार्जित करना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है| इस कार्य में जो जितने अंशों तक सफल होता है, उसको संसार में उतने ही अंश में मान, सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्ति होती है| फिर भी यदि लोग प्रतिबंधों को ही धर्म का अंग समझने लगें तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Nov 18, 2011

हमारी भूलें : गरीब जनता को ठुकरा देना

लोग कहते है कि इस्लामिक आक्रांताओं ने इस देश के धर्म ग्रंथों का जबरदस्त विनाश किया| इन ही आक्रांताओं पर वेदों को नष्ट करने का आरोप लगाया जाता है| वेदों की एक सौ से अधिक शाखाओं में से आज केवल सोलह शाखाएं उपलब्ध है वे भी मैक्समुलर की कृपा से| विचारणीय विषय यह कि जिन वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदीय, चतुर्वेदियों ने वेदों को कंठस्थ याद कर कर कीर्ति अर्जित की थी, उनके रहते ये वेद कैसे नष्ट हो गए? क्योंकि आक्रांता ग्रंथों को जला सकते थे, व्यक्ति की स्मृति को शस्त्र से नष्ट नहीं किया जा सकता|

दूसरा विचारणीय विषय यह कि सभी पुराण सुरक्षित है, उनमे से न तो कोई पुराण नष्ट हुआ और न ही उसका कोई भाग| इन परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि वेद आक्रांताओं द्वारा नष्ट नहीं किये गए बल्कि जिनके हित साधन में वे बाधक बन गए थे, उन्होंने ही वेदों को नष्ट किया होगा|

पुराणवाद द्वारा सृजित पंडावाद के विरुद्ध जो भयानक विद्रोह हुआ, उसे शांत करने के लिए सभी श्रेष्ठ लोगों ने, जब यह व्यवस्था दी कि पुराणों का वही अंश मान्य होगा, जो वेद सम्मत है, तो पुराण-जन्य पाखण्ड को बचाने का एक मात्र तरीका यही बचा कि वेदों को ही नष्ट कर दिया जाए, ताकि पुराणों को मिथ्या साबित करने का कोई आधार ही शेष नहीं रहे|
उपरोक्त तथ्य को समझ लेने के बाद हम निकट भूतकाल के इतिहास पर नजर डालते है| इस देश पर लगातार वर्षों तक इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमण हुए, जिनसे देश को बचाने के लिए एक एक इंच भूमि के लिए क्षत्रियों के कड़े व निरंतर संघर्ष में जो बलिदान हुए, उसकी तुलना में संसार का कोई बलिदान टिक नहीं सकता|

विचारणीय विषय यह है कि इन संघर्षों के दौर में किन लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर युद्धरत क्षत्रियों का साथ दिया व बाद में अमनकाल में उनके साथ क्या सलूक किया गया ?

आज जो पंडा-पूंजीपति गठबंधन अपने आपको देश और धर्म का रक्षक बतलाता है, वह उस समय भी आनंद में व् अपने व्यवसाय व जनता के शोषण में आज की तरह ही संलग्न था जबकि गरीब जनता ने देश व धर्म की आवाज को सुना था व संघर्ष क्षत्रियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर त्याग व बलिदान में बराबरी का हिस्सा लिया| यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि कोई भी समय ऐसा नहीं रहा, जब गरीब जनता त्याग व बलिदान करने वालों के साथ सहयोग करने से पीछे हटी हो|
इस्लामिक आक्रांताओं के आक्रमण के पश्चात जैसे व्यवस्था स्थिति उत्पन्न होती गयी, वैसे वैसे बुद्दिजीवी वर्ग ने अपने पर फैलाना आरम्भ कर दिया| क्षत्रिय शिक्षा के क्षेत्र में तो पहले ही बुरी तरह पिछड़ चुके थे, अब वे साधना के क्षेत्र में भी मार्गदर्शन का अभाव अनुभव कर रहे थे| क्योंकि एक हजार वर्ष तक लगातार युद्ध करने व एक-एक युद्ध में ही घर की कई पीढ़ियों के काम आ जाने के कारण वंशानुगत साधना व आराधना पद्धति छिन्न-भिन्न हो गयी थी| इस परिस्थिति का बुद्धिजीवी वर्ग ने पूरा-पूरा लाभ उठाया व यह वर्ग यह प्रदर्शित करने में सफल हो गया कि अगर उनके बताए मार्ग पर चला जाय तो कल्याण निश्चित है|

परिणाम जो होना चाहिए था, वही हुआ| स्वयं के मार्ग से भ्रमित ज्ञान से विहीन हुआ क्षत्रिय पंडावाद के फरेब में बुरी तरह फंस गया| जगह जगह मंदिरों व मठो के निर्माण होने लगे| इन संस्थाओं के लिए भूमिदान, अन्नदान व द्रव्यदान आमतौर पर प्रचलित हो गए| क्योंकि क्षत्रिय स्वयं अपने कल्याण के मार्ग से विमुख हो चुके थे, अत: उन्हें इन पंडावादी हथकंडो में अपना कल्याण दृष्टिगोचर होने लगा| सम्यक मार्गदर्शन के अभाव में, यह मर्ज दिन प्रतिदिन व पुश्तदर –पुश्त इस तेजी से बढ़ा कि उनके पास धन का अभाव होने लगा, जिसकी पूर्ति के लिए गरीब जनता का शोषण आरम्भ हुआ| उस गरीब का शोषण जिसने हर कठिन समय में उच्चतम त्याग कर, सहयोग प्रदान किया था, स्वर्ग व मोक्ष के भूखे क्षत्रिय कृतज्ञता को भूलकर कृतध्न बन गए|

बाल्मीकीय रामायण में लिखा है “गोहत्यारे,शराबी,चोर और वृत्त भंग करने वाले पुरुष के लिए सत्य पुरुषों ने प्रायश्चित का विधान किया है| किन्तु कृतध्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं है|”

उपकार का बदला नहीं चुकाया जा सकता| कठिन समय में मदद करने वाला उपकारी होता है| उसके प्रति कृतध्न का भाव बनाये रखना ही उसका प्रत्युतर हो सकता है, लेकिन हुआ इसके बिलकुल विपरीत| कृत्यज्ञता का भाव रखने के बजाय, शोषण प्रारंभ कर दिया गया| गरीब किसान व मजदुर के तन पर कपड़ा नहीं रहा| सेठों की दुकानें व मंदिरों के भवन स्वर्ण आभूषणों से भर गए| इस प्रकार जब यह देख लिया गया कि हम हमारी हित चिन्तक गरीब जनता से पूरी तरह बिछुड़ चुके है, तब उनके दिलों में प्रति घृणा व प्रतिशोध की भावना का बीजारोपण शैने: शैने: किया जाने लगा|

ऐसा नहीं था कि यह सब कुछ इतना चुचाप हुआ हो कि किसी को कानों कान खबर भी न लगी हो| यह सारा षड्यंत्र सरे आम चल रहा था| उधर क्षत्रिय समाज दिन प्रतिदिन पतन की और अग्रसर था| सारे कुकर्म करते हुए दान करने पर स्वर्ग व मोक्ष की गारंटी पण्डों ने उन्हें दे रखी थी| मदिरा और कामिनी में आसक्त हुए क्षत्रिय पूर्णरूप से मदहोश व अंधे हो चुके थे| समय-समय पर अनेक संतों ने उन्हें जगाने, समय गति को पहिचानने व कुमार्ग को छोड़ने का आग्रह किया था| किन्तु पाप से ग्रसित व्यक्ति कभी भी पुण्यात्मा की बातों पर ध्यान नहीं देता| क्षत्रिय समाज अपने कुमार्गों पर चलता रहा व समाज का शोषण जारी रहा|

अब विद्रोह का बिगुल खुल्लम-खुल्ला बजने लगा| वही पंडा-पूंजीपति गंठबंधन जिसने क्षत्रियों को कुमार्ग पर डालने का षड्यंत्र रचा था, इस विद्रोह का अग्रणी था| सभी प्रकार से शक्तिहीन हुए क्षत्रिय ऐसी परिस्थिति में क्या कर सकता था| जब उन्होंने अपने परम्परागत हित चिंतकों की और नजर डाली तो वे भूखी नंगी अवस्था में विरोधी खेमे में खड़े थे| व्यक्तिगत शक्ति का आभाव व समूह की शक्ति को खोकर शस्त्र डाल देने के अलावा, क्या उपलब्धि प्राप्त की जा सकती थी|

बिना संघर्ष किये सत्ता परिवर्तन संसार का एक अनोखा आश्चर्य भारतवर्ष में देखा गया| और यह उन लोगों ने कर दिखाया, जिनके पास इतनी समृद्ध विचार धारा व आराधना पद्धति थी, जिसका सारा संसार कभी लोहा मानता था|

ऐसा नहीं है कि पंडा-पूंजीपति गठबंधन के हाथों फंस कर गरीब जनता संतुष्ट हों| उसे कुछ राहत अवश्य मिली है, किन्तु वह शांति के बजाय एक अजीब बेचैनी का अनुभव कर रही है| बेचैनी का कारण अविश्वसनीयता है| गरीब, बुद्धिजीवी पर विश्वास करने का अभ्यस्त नहीं है| और ऐसे वर्ग पर विश्वास किया भी नहीं जा सकता| क्योंकि बुद्धि को नित्य प्रति नई वस्तु चाहिए| वह कभी भी किसी का परित्याग कर सकती है| ऐसी परिस्थिति में गरीब जनता को फिर से साथ लेना व उनके हृदय को जीतना कठिन कार्य नहीं है| किन्तु आज के कर्णधारों के लिए यह कार्य असंभव प्रतीत होता है|

जो कार्य वास्तव में कठिन नहीं है, उसके असम्भव दिखने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य निहित होना चाहिए| पाप व्यक्ति का छाया की तरह पीछाकरता है| गरीब वर्ग अपने प्रति किये हुए अन्याय को भूल जाने के लिए तैयार है| वह हमेशा अत्याचारों को भूल ही जाता है| उसका स्वाभाव है, किन्तु कर्णधारों को अपने पीछे पाप का भूत खड़ा नजर आ रहा है| वे अपने भूत से भयभीत हुए चिल्ला रहे है, यह असम्भव है वे षड्यंत्रकारी पंडा-पूंजीपति गठबंधन का चरण स्पर्श कर कल्याण की अभिलाषा रखते है, जो नितांत असंभव है|

इस व्याधि का एक मात्र इलाज यही हो सकता है कि परम्परागत साधनों व आराधना पद्धति का आश्रय लें| आत्मबल को विकसित किया जावे, जिसको देखते ही भय का भूत अपने आप पलायन कर जाएगा| तब गरीब जनता के साथ आनंद प्रेम मिलन संभव हो सकेगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

Nov 17, 2011

हमारी भूलें : अपने आपको सीमित कर लेना

कोई व्यक्ति हो अथवा धार्मिक, सामाजिक या राजनैतिक संगठन, सबका यह रिवाज हो गया है कि वे सबसे पहले अपने आपको सीमाओं में बांधकर रखना चाहते है| उद्देश्य और विधान क्या है? यह स्वयं द्वारा निर्मित वे सीमा रेखाएँ है जिन्होंने हमको संकुचित व सीमित बना दिया है तथा इन सीमाओं में बंधकर हम नित्यप्रति और अधिक संकुचित व सीमित होते चले जा रहें है|

एक ही समाज में कार्यरत एक संगठन के लोग दूसरे संगठन द्वारा संचालित अच्छे कार्यक्रमों में भाग लेने से क्यों कतरातें है? क्योंकि उन्होंने स्वयं ही अपने चरों और सीमा रेखाएँ खीच ली है, जिनमे वे अपने आपको बंधा हुआ अनुभव करते है| जीन लोगों में बुद्धि द्वारा लोगों का उत्पीडन कर स्वार्थ साधन करने की क्षमता अधिक है, वे इन बंधनों को आस्था, विश्वास व श्रद्धा की संज्ञा देकर अपने पक्ष में लोगों की शक्ति का उपयोग करने में सफलता अर्जित कर लेते है| जो लोग इस प्रकार के उत्पीडन में सहायक सिद्ध होते है वे यह जानते हुए भी कि हम बुरे काम में सहायक रहे है कुछ कर पाने में अपने आपको असमर्थ अनुभव करते है, क्योंकि वे स्वयं द्वारा निर्मित जाल में खूद ही फंस गए है|

अत: यदि किसी समाज को उन्नत होना है तो उसे संस्थानों, विधानों, नियमों आदि से ऊपर उठकर केवल श्रेष्ठता उपार्जित करने वे श्रेष्ठ कार्यों में सहयोग करने के दृष्टिकोण से सोचना व समझना पड़ेगा| फिर चाहे ऐसे कार्य किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा चलाये जा रहें हो| व्यक्ति पहले बंधनों का निर्माण स्वयं के कल्याण की कल्पना करके करता है, लेकिन बाद में स्वयं उसमे बंधकर दूसरों के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह जाता है| सतत चिंतन और मनन द्वारा यदि व्यक्ति इस बात की खोज कर्ता रहे कि उसे क्या करना चाहिए तो कोई भी बंधन उसके विकास को रोक नहीं सकेगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता

Nov 16, 2011

हमारी भूलें : श्रेष्ठता स्थापित करने की चेष्टा

महाभारत काल व उसके बाद जब ब्राह्मणों ने नवीन ग्रंथों की रचना कर व पुराने ग्रंथों में मिश्रण कर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की चेष्टा की तो प्रतिक्रिया स्वरुप क्षत्रियों ने भी अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया| आध्यात्मवाद के नाम पर रचे गए इस घटिया खेल के परिणाम स्वरुप पहले अनेक धर्मों व बाद में अनेक संप्रदायों का जन्म हुआ | परिणामत: लोग धर्म के नाम पर इतने भ्रमित हो गए कि धर्म का मूल तत्व ही उनकी आँखों से ओझल हो गया| जातियां व वर्ण धर्म के प्रतीक बन गए|

जब पंडावाद की आलोचना की जाती है तो उसका तात्पर्य ब्राह्मणों की आलोचना से नहीं है, बल्कि उस समस्त वर्ग की आलोचना से है, जो धर्म के नाम पर धर्म की जड़ों पर कुठाराघात कर, अपने व्यक्तिगत या वर्ग गत हित साधन में लगा हुआ है|

इस देश में वर्णों की स्थापना वंश परम्परा के आधार पर कभी नहीं हुई, बल्कि वर्णों की स्थापना उनकी साधना पद्धति के आधार पर निर्मित थी| ब्राहमण उस वर्ग का नाम था जिनके पास मनोगत साधना व मनोनिग्रह की श्रेष्ठ साधना पद्धति थी| इसी प्रकार क्षत्रिय का वह वर्ग था, जिसके पास “हृदयगत साधना” या प्राण से संपर्क साधने की श्रेष्ठ साधना पद्धति थी|
लोग, कौन श्रेष्ठ है, इसको सिद्ध करने के लिए लड़ रहे है, क्यों कि वे नहीं जानते कि श्रेष्ठता का कोई माप-दंड नहीं हो सकता| जो पूर्ण है, बस केवल पूर्ण ही है| न वह इससे कम हो सकता है और न ही इससे अधिक| लेकिन जैसे जैसे ब्राहमण व क्षत्रियों का स्तर गिरता गया, वे पूर्णता को परित्याग कर अपूर्णता की गर्त में जा गिरे| उन्होंने अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की चेष्टाएं आरम्भ की और इन चेष्टाओं ने उन्हें ईर्ष्या, द्वेष, व अहंकार से पीड़ित कर और भी नीचे गिरा दिया| आज का ब्राह्मण और क्षत्रिय जो अपनी आराधना पद्धतियों को पूरी तरह से भूल चूका है, कृत्रिम मदिरा के नशे में मद मस्त गटर की नाली में पड़ा हुआ, मैं श्रेष्ठ हूँ, चिल्ला रहा है व् लोग इस पागलपन को देखकर हंस रहे है| क्योंकि वे जानते है कि न तो ये ब्राहमण या क्षत्रिय है और न ही श्रेष्ठ है|

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हमारी वास्तविक साधना व आराधना पद्धति को खोजकर उसके साधन से अपने आप में श्रेष्ठता अर्जित करें| आज विभिन्न धर्मों के लोग अपने धर्म ग्रंथों के आधार पर अपने धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने में लगे हुए है| क्या वे नहीं जानते कि आज सभी देशों व सभी धर्मावलंबियों के पास सभी धारों के धर्म ग्रन्थ उपलब्ध है| यही ग्रंथों में ही श्रेष्ठता होती तो आज सारा संसार ही श्रेष्ठ हो गया होता| श्रेष्ठता समाज का धर्म नहीं है| यह व्यक्ति का धर्म है| व्यक्ति ही श्रेष्ठता का उपार्जन कर सकता है| जिस समाज में श्रेष्ठ व्यक्ति है, वही समाज श्रेष्ठ समाज कहलाता है| अत: यदि कोई समाज बिना श्रेष्ठता का उपार्जन किये ग्रंथो या पुरखों के आधार पर अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की चेष्टा करता है, तो इसे उसकी निरी मूर्खता कहा जायेगा|

मैक्समुलर ने वेदों को छपवाया जो आज समस्त संसार में उपलब्ध है, लेकिन इससे संसार का कोई विकास तो नहीं हुआ और न ही जर्मनी के लोग जगद्गुरु कहलाने की क्षमता अर्जित कर सके|

संसार के लोग आज भी आध्यात्मिक क्षेत्र में मार्ग दर्शन के लिए भारत की और देखते है, जिसका कारण यहाँ के धर्म ग्रन्थ नहीं है बल्कि वे गिने चुने श्रेष्ठ पुरुष है जो गली कूचों में बैठे श्रेष्ठ ब्राहमण व क्षत्रिय आराधना पद्धतियों को जीवित रखे हुए है| उनको इस बात की कतई चिंता नहीं है कि कोई उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर रहा है या नहीं अथवा कोई उन्हें श्रेष्ठ स्वीकार करता है या नहीं क्योंकि श्रेष्ठता का कोई माप दंड नहीं हो सकता| श्रेष्ठता को केवल श्रेष्ठता ही पहचान सकती है|

आज लोग धर्म की रक्षा करने व धर्म ग्रंथों की रक्षा करने की बात कहकर अपनी दुकानदारियां चलाना चाहते अहि, लेकिन जो लोग धर्म के तत्व को जानते है, उनके मुख से एसी कोई बात कभी नहीं सुनी गयी| क्योंकि वे जानते है कि प्रत्येक तत्व व बीज की रक्षा का कार्य प्रकृति स्वयं करती है| जिसे व्यक्ति द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता| अत: यह कहना भी भ्रान्ति फैलाना है कि मार्ग दर्शन का अभाव हो गया है| जिसके पास आँखें है, वह उनका उपयोग कर स्वत: ही मार्ग को देख सकता है, मार्ग की खोज कर सकता है, लेकिन जिनमे खोज करने की चाह ही नहीं है, उनका कोई मार्ग दर्शन करना भी चाहे तो नहीं कर सकता|

इस प्रकार स्पष्ट है कि श्रेष्ठता स्थापित करने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही कोई उपयोगिता| आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम श्रेष्ठता का उपार्जन करें|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |


Nov 15, 2011

हमारी भूलें : हठवादिता

संसार का कोई भी व्यक्ति या समाज नहीं, कोई भी भौतिक पदार्थ या विचारधारा तक भी अगर यह हाथ धारण करले ले कि वह जैसे है, वैसे ही बने रहेंगे तो यह असंभव बात होगी| परिवर्तन व विकास सृष्टि के आवश्यक अंग है| संसार में कोई भी इस से बचकर नहीं रह सकता| इस सनातन सत्य की उपेक्षा कर हम हठवादी विचारधारा व हठवादी सामाजिकता पर कायम रहना चाहते है, जसका परिणाम विनाश के अलावा और कुछ नहीं हो सकता| क्योंकि जो स्वयं बदलने के लिए तैयार नहीं है, उसको प्रकृति स्वयं नष्ट कर देती है|

जिस प्रकार उद्यान में माली नित्य सफाई,कांट छांट करता है, उसी प्रकार सामाजिक कार्यकर्ताओं का दायित्व है कि वे समाज में जो भी अनावश्यक चीजें उत्पन्न हो गयी है, उनको समय-समय पर निकाल कर बाहर करते रहे है| अगर इस परम्परा का निर्वाह नहीं किया जाए तो उद्या भी जंगल में बदल जायेगा तथा विकसित समाज भी समय पाकर जंगली जातियों में बदल जायेगा|

मजबूत पकड़ तथा श्रद्धा किसी भी व्यक्ति व समाज के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, जिसका प्रयोजन है कि जिस वस्तु का परिक्षण किया जा रहा है, उसके सिद्धांत पर दृढ़ता पूर्वक विश्वास करके कार्य क्षेत्र में मजबूती के साथ आगे बढ़ना| नवीन कार्य के संपादन व नवीन उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए इन गुणों की आवश्यकता है| लेकिन आज लोग हठवादिता को, इन गुणों का बाना पहनाकर, आपकी दुष्प्रवृतियों व सामाजिक बुराइयों को नहीं छोड़ने के लिए सैद्धांतिक आधार तैयार कर लेते है|

नया विचार व्यक्ति के मष्तिक में तब ही प्रवेश कर सकता है, जब वह अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर किसी भी बात को पूर्ण रूचि के साथ सुनने को तैयार हो| अगर यह विचार उचित प्रतीत हो तो उसे इस विचार को अपने मस्तिष्क में स्थान देने के लिए जगह देनी होगी| अत: यह आवश्यक हो जायेगा कि मस्तिष्क में से उन अनावश्यक विचारों को बाहर निकाला जावे, जिनकी अब कोई आवश्यकता नहीं है| विचारधारा के विकास का यही क्रम है|

समाज में जो भी रीती-रिवाज प्रचलित है, उनमे से जब तक अनुपयोगी रीतिरिवाजों को छोड़ा नहीं जायेगा तब तक नए उपयोगी रिवाजों को ग्रहण करने के लिए जगह नहीं बन सकेगी| अत: सामाजिक कार्यकर्ता का यह परम दायित्व है कि वे केवल संगठन के बवंडर में ही नहीं फंसे रहे, बल्कि समाज में जो कुरीतियाँ व्याप्त हो गयी है, उनको खोजें तथा उनको मिटाने के लिए यत्नपूर्वक प्रयास करें| इस प्रकार खाली हुई जगह को नवीन विचारों, जो समयानुकूल व उपयोगी हो, उनसे भरने का प्रयास करे| ऐसा नहीं कर पाने के कारण ही, जब सामाजिक कार्यकर्ता व उनके स्वयं परिवारों को ही सामाजिक कुरुतियों से भरा हुआ देखते है तो उनके विचारों को ग्रहण करने के प्रति पर्याप्त रूचि उत्पन्न नहीं हो पाती|

आज आवश्यकता है कि व्यक्तिगत विकास अर्थात स्वयं का विकास व सुधार,समाज के निर्माण यां उसके विकास व सुधार के साथ साथ चलाया जावे| अगर दोनों क्रमों में से एक भी पिछड़ा तो वह विकास की और बढ़ने वाले को खा जाएगा| एक चत्रिवान व्यक्ति व ईमानदार व्यक्ति सामाजिक कुरुतियों से पीटकर समाज में अपमानित होने व मुर्ख कहलाने के लिए बाध्य कर दिया जायेगा| इसी प्रकार अगर सामाजिक संगठन उच्च आदर्शों की केवल बातें करते रहे व व्यक्तियों के चरिते-निर्माण विचारधारा के अनुकूल नहीं हुए, तो एक दिन घटिया लोग अपने ही नेताओं को खा जायेंगे, वे स्वयं तो निकम्में है ही| इसलिए सब कुछ बना बनाया ढांचा कुछ ही समय में नष्ट हो जायेगा|

यह सब तभी संभव है, जबकि व्यक्ति व समाज अपनी हठवादिता का परित्याग कर समय की आवश्यकता व अपनी आवश्यकताओं को समझे| प्रकाश की हर नई किरण को उत्सुकता के साथ देखें| उसे तुरंत ग्रहण करने के लिए प्रति क्षण तैयार रहें| जिस समाज में ऐसा हो सकता है, उसके विकास को कोई भी नहीं रोक सकता| इसी भाव को दूसरे शब्दों में उदारता कहते है, जो क्षत्रिय में सबसे अधिक आवश्यक है|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |



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Nov 14, 2011

हमारी भूलें : विस्तारवादी नीति

नीति व व्यक्तिगत चरित्र अथवा समाज चरित्र में बहुत भेद है| नीति का उपयोग हमेशा दूसरों के लिए किया जाता है| नीति के एक श्लोक का अर्थ है - " ब्राहमण के असंतुष्ट होने पर व क्षत्रिय के संतुष्ट होने पर उसका नाश हो जाता है|" इसका अर्थ हमने यह समझ लिया की क्षत्रिय में विस्तारवाद की प्रवृति हमेशा बनी रहनी चाहिए, जबकि उसका वास्तविक प्रयोजन यह है कि क्षत्रिय को कभी अपनी शक्ति व सामर्थ्य से कभी नहीं रहना चाहिए| भौतिक, मानसिक व अध्यात्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों को बढाने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए|

जिन्होंने बाल्मिकिय रामायण पढ़ी है, वे जानते है कि जब श्री राम लंका विजय कर वापस अयोध्या लौटे, उस समय जनक सहित तीन सौ राजा अपनी अपनी सेनाओं के साथ अयोध्या में लंका पर चढ़ाई कारनमे के लिए तैयार थे| कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय तीन सौ राज्य थे| अयोध्या के राजा राम के राज्य का क्षेत्रफल कितना रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है कि तीन सौ राज्यों के अलावा भी इस देश का बहुत बड़ा भाग उजाड़ पड़ा था, जिन प्रदेशों को विजयकर श्री राम ने अपने पुत्रों व भाइयों के पुत्रों को राज्य दिए| इन छोटे राज्यों में अगर देवासुर संग्राम में भाग लेने वाले राजा दशरथ, रावण, व मेघनाथ का वध करने वाले राम तथा महान तपस्वी विश्वामित्र व जनक हो सकते है तो फिर राज्यों के विस्तार की व विस्तारवादी निति की क्या आवश्यकता है, जिसके कारन विघटन व विनाश का बीजारोपण होता है? महाभारत के पश्चात् का हमारा इतिहास इस विस्तारवादी निति का ही इतिहास रहा है|

आज राज्य नहीं होने पर भी हमने इस प्रवृति का परित्याग नहीं किया है| एक संगठन दुसरे संगठन को तथा एक नेता दुसरे नेता को हड़प लेने के प्रयत्न में लगा रहता है| जिसके परिणाम स्वरूप समाज में प्रतिभाओं का विकास अवरुद्ध हो जाता है तथा सामाजिकता भी विकसित नहीं हो पाती है|

अगर हम गंभीरता से विचार करें तो संगठन को हड़पने व दुसरे नेतृत्व को गिराने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है| आज तक जिन संस्थाओं ने भी दूसरी संस्थाओं को हड़पा है, वे हड़पी गई संस्थाओं द्वारा संचालित कार्यक्रमों को कहीं भी सुचारू रूप से नहीं चला सकी| जबकि हडपते समय उन्होंने आरोप यह लगाया था कि इस संस्था के लोग कार्य करने में असमर्थ है तथा सच्चे व इमानदार नहीं है| अत: (हडपने वाले लोग) इस संस्था को सुचारू रूप से चलाएंगे| होता क्या है कि दुसरे के विकास को देखकर हम अपने आपको संशय में डाल लेते है कि कहीं यह संगठन हमको छोटा साबित नहीं करदे| इस आत्म लघुत्व की हीन भावना से ग्रसित होकर हम दुसरे संगठनों पर कब्ज़ा करने के लिए प्रेरित होते है क्योंकि हम नहीं जानते कि समाज इतना विशाल कार्यक्षेत्र है कि एक नहीं हजारों संगठन व लाखों कार्यकर्ता भी जीवन पर्यंत बिना एक दुसरे से टकराए कार्य करते रहें, तो भी कार्य का कभी अंत नहीं आएगा|

यही स्थिति नेताओं के टकराहट के सम्बन्ध में है| हमको अधिक दूर जाने की जरुरत नहीं है| निकट के भूतकाल के इतिहास को देखें, समाज में कितने नेतृत्व उभरे, उनको किन-किन ने गिराने की चेष्टा की और क्या गिराने कि चेष्टा करने वाला व्यक्ति एक भी ऐसे व्यक्ति को पैदा कर सका जिसमे समाज को नेतृत्व देने की क्षमता हो? एसा क्यों नहीं हुआ कारण स्पष्ट है एसा हो ही नहीं सकता| व्यक्ति यह समझता है कि मैं कार्यकर्ताओं को तैयार कर रहा हूँ और इनमे से नया नेतृत्व तैयार होगा| लेकिन हकीकत में वह कभी भी नेता तैयार करने का प्रयत्न ही नहीं करता| वह तो हमेशा ही अनुचरों का ही निर्माण चाहता है| जिस किसी कार्यकर्ता में भी नेतृत्व के गुण विकसित होते नजर आते है, वह उसे शत्रु प्रतीत होने लग जाता है, क्योंकि उसमे अपने प्रतिद्वंदी की शक्ल नजर आने लगती है|

वास्तविकता यह है कि नेताओं का निर्माण नेता नहीं कर सकता| जो लोग समाज के लिए नेतृत्व देने वाले लोगों का निर्माण करना चाहते, उन्हें सबसे पहले स्वयं को नेतृत्व से हटा लेना चाहिए ताकि कार्यकर्ता में उन्हें अपना प्रतिद्वंदी नजर नहीं आये| विश्वामित्र ने राज्य व शस्त्र का परित्याग करके ही समाज को श्रीराम जैसे नेता तथा इसी पद्धति का अनुसरण कर श्री कृष्ण ने अर्जुन जैसा नेता प्रदान किया था| इस परम्परा से पृथक होकर अगर आज हम समाज कल्याण की कल्पना करते है, तो यह वृथा सिद्ध होंगी|

विस्तारवादी प्रवृति व्यक्ति व समाज का सामाजिक विकास दोनों के लिए घटक है| इससे व्यक्ति का विकास व समाज का सामाजिक विकास दोनों ही अवरुद्ध होता है, अत: इसका परित्याग कर व्यक्ति को आत्मनिष्ठ होकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति स्वयं के विकास के लिए लगानी चाहिए, ताकि वह न तो दुसरे को अपने से अधिक शक्तिशाली होता हुआ देखेगा और न ही उसके सामने ईर्ष्या करने का अवसर उपस्थित होगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |




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Nov 13, 2011

हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता : अंतिम भाग

भाग-१भाग- २ से आगे............
अब हम मुख्य विषय पर आते है| एक ब्राह्मण अध्ययन के लिए दूर देश जा रहा था| मार्ग में एक प्रेत मिला व ब्राह्मण बालक को मारने का भय दिखाया| जब बालक ने यह कहा कि तू मेरी अभी ह्त्या मत कर, मैं शिक्षित होकर इसी मार्ग से लौटने का वचन देता उन,उस वक्त तूं मुझे मार देना| प्रेत ने इसे स्वीकार कर लिया| वर्षों बाद जवान ब्राह्मण जब उस मार्ग से वापस लौटा तो प्रेत उसे एक मकान में ले गया जहाँ मदिरा व मांस रखे थे तथा एक स्त्री व एक बालक था| प्रेत ने ब्राह्मण से कहा तू मदिरा पान, मांस भक्षण, स्त्री के साथ भोग या बालक की हत्या इन चारों में से एक भी कर्म कर लेगा तो मैं तुझे छोड़ दूंगा| यह कहकर प्रेत लुप्त हो गया| ब्राह्मण ने पर स्त्री गमन व बाल हत्या को महापाप समझा तथा मांस भक्षण में उसे हिंसा दिखाई दी अत: उसने सबसे कम दोषयुक्त दिखाई देने वाली शराब का सेवन कर लिया| शराब के सेवन से जाग्रत होने वाली भूख को तृप्त करने के लिए उसने मांस भक्षण किया व काम से पीड़ित होकर स्त्री के पास पहुंचा तो उसने कहा कि पहले बालक की हत्या कर ताकि हमें देखने वाला कोई नहीं रहे| युवक ने बालक की हत्या कर पर स्त्री गमन भी कर लिया| इस प्रकार जिस शुद्ध ब्राहम्ण बालक व शुद्ध ब्राह्मण युवक का प्रेत कुछ नहीं बिगाड़ सका था, उसके दोष युक्त होने पर प्रेत ने उसकी हत्या कर दी|

यह कथा चाहे सत्य हो अथवा प्रतीकात्मक- हमारे लिए यह समझने के लिए पर्याप्त है कि स्थूल जगत में हम निवास कर रहे है से पृथक एक प्राण सृष्टि भी है| जिसमे ऐसे प्राण निवास करते है जो या तो जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर पूर्णरूप से भगवत लीं होने के लिए तपस्या कर रहे है जैसे संत, भोमिया जुझार आदि| दुसरे वे प्राण है जो अकाल मृत्यु को प्राप्त होने के कारण दूसरा जन्म प्राप्त होने तक सूक्षम शरीर सूक्षम जगत में विचरण कर रहे है व भोगों की अभिलाषा से मुक्त होने के कारण जिन लोगों के प्राण मन, बुद्धि, व अहंकार से दबे हुए क्रियाहीन हो रहे है, उनके शरीर में प्रवेश कर भोग भोग रहे है|

आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने वाले प्राणगत साधना के साधक, जो प्राण के माध्यम से ही अपना मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहता है, के ऊपर ऐसे दुष्ट प्राण जिन्हें हम प्रेत आदि की संज्ञा देते है, जाने अनजाने में शरीर में प्रवेश कर साधक के प्राण को आघात पहुंचाने की नियत से उसे दुष्ट कर्मों को करने के लिए प्रेरित करते है| लेकिन अगर साधक का आहार व्यवहार पवित्र है तो ये दुष्ट प्राण उस पर किसी प्रकार का आघात नहीं कर सकते|

जो श्रेष्ठ "प्राण" सूक्षम जगत में तपस्या में लीन है उनकी भी एक विशिष्ठ भूमिका है| जो सात्विक लोग साधना पथ पर अग्रसर हो रहे है उनका वे मार्ग दर्शन करते है व दुष्ट शक्तियों के आघात से उन्हें बचाते है|

अत:यदि हम आहार व्यवहार में पवित्रता नहीं रख पाते तो एक तरफ हम अपने आपको दुष्ट शक्तियों द्वारा आघात करने के लिए खुला छोड़ देते है, दूसरी और श्रेष्ठ लोगों के मार्ग दर्शन व सहयोग से वंचित होह जाते है क्योंकि श्रेष्ठ शक्तियां पवित्र पात्र पर ही अवतरित होती है |

अध्ययन के प्रति रूचि के अभाव से हमको आज इस बात का बोध नहीं रहा कि प्राचीन काल में मदिरा-मांस का भक्षण श्रेष्ठ लोगों के लिए वर्जित था| बहुत से पंडावादी ग्रंथों में तांत्रिक क्रियाओं के लिए बलिदान आदि की प्रथा बताकर मांस मदिरा के प्रयोग को उचित ठहराने की चेष्टा की गयी है| लेकिन हमें बाल्मिकीय रामायण व महाभारत के समान, अन्य ग्रंथों को स्वीकार नहीं करना चाहिए| यधपि महाभारत के अंतिम भाग अनुशासन पर्व को प्रमाणित कहना कठिन है, फिर भी शेष महाभारत ग्रन्थ एक अद्भुत रचना है, जिसका लाभ सबको उठाना चाहिए| यह दुर्भाग्य कि बात है कि आज हमारे घरों में महाभारत व बाल्मिक रामायण जैसे ग्रन्थ नहीं है| पंडों ने यह प्रचारित कर दिया कि महाभारत ग्रन्थ जो कोई पढ़ेगा, व जिसके घर में यह ग्रन्थ रहेगा उस घर में कलह होगा| यह साड़ी बातें उस बुद्धिजीवी षड्यंत्र का अंग है, जो हमको हमारी परम्पराओं से अलग कर देना चाहते है| जिन्होंने महाभारत ग्रन्थ पढ़ा है, वे शुक्राचार्य के इन वचनों को कभी नहीं भूल सकते-

" जो मंद बुद्धि अपनी ना समझी के कारण मदिरा पीता है, धर्म उसी क्षण उसका साथ छोड़ देता है, वह सभी की निंदा व अवज्ञा का पात्र बन जाता है| यह मेरा निश्चित मत है| लोग आज से इस बात को शास्त्र मान लें और उसी पर चलें|"

इसी प्रकार बाल्मिकिय रामायण में अनेक स्थलों पर मधु मांस भक्षण का निषेध किया है| इन सब तथ्यों की अवहेलना कर आज हमने अपने आहार व व्यवहार को इतना अशुद्ध बना लिया है जिससे हमारे विकास की समस्त संभावनाएं क्षीण हो गयी है|

अत: यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यदि हम अपने आपका व समाज का कल्याण चाहते है तो कुछ सौ वर्षों से आरम्भ हुई आहार व्यवहार की अपवित्रता को हमें समाप्त करना पड़ेगा तथा शुद्ध व सात्विक आहार व्यवहार को अपनाना पड़ेगा| अन्यथा जिन लोगों के मन व बुद्धि पर स्वयं अधिकार नहीं हो उन लोगों से समाज कल्याण की अभिलाषा कौन संजोयेगा तथा अगर कोई ऐसी अभिलाषा रखता है तो वह दुराशा ही सिद्ध होगी|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | |

Nov 12, 2011

हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता - 2

आहार व्यवहार की अपवित्रता भाग - १ से आगे..............

व्यवहार में पवित्रतता लाने के लिए आहार की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है| कहा गया है कि – “ जैसा अन्न वैसा मन”| जिस प्रकार का हम आहार करते है उसी प्रकार का मन बनने का आशय है कि यदि हमारा आहार तामस है तो मन उससे प्रभावित होकर अहंकार के पक्ष में निर्णय करेगा व यदि आहार सात्विक है तो मन सदा बुद्धि के अनुकूल रहकर हमको तर्क संगत विकासशील मार्ग अग्रसर करता रहेगा|

आज मदिरा व मांस जैसे तामसिक आहार का समाज में आम प्रचलन ही नहीं हुआ ,बल्कि हम इस प्रकार के आहार को अपनी परम्परा का एक अंग समझने लगे है| क्योकि हम नहीं जानते कि हमको पथ भ्रष्ट व शक्तिहीन बनाने क लिए मुगलकाल में षड्यंत्र रचा गया| देवताओ क मंदिरों में बली देकर मांस भक्षण को नैमितिक कर्म बताकर कहा गया की देवी के प्रसाद के रूप में मांस मदिरा का भक्षण करने से पाप नहीं लगेगा|

हमने कभी इस विषय पर विचार करने की चेष्टा नहीं की कि देवियों के मंदिर में बलिदान कि परम्परा कब व क्यों आरम्भ हुई? एक हज़ार वर्ष से अधिक प्राचीन एक देवी का मंदिर ऐसा नहीं मिलेगा जहाँ पर पशुओ कि बली दी जाती हो या मूर्ति पर मदिरा चढाई जाती हो| कच्छवाहों की कुल देवी जमवारामगढ़ की "जमवाय माता",जम्मू की वैष्णव देवी,संभार की शाकम्भरी देवी के मन्दिर इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण है लेकिन जिव्हा के स्वाद के चक्कर में फंसे लोग यदि वास्तविकता की उपेक्षा कर हठधर्मी पर आमादा रहें तो फिर उन्हें स्वयं अपने आप के व समाज के उत्थान की कल्पना नहीं करनी चाहिए|

वैज्ञानिक दृष्टि से भी यदि आहार क संबंद में विचार किया जावे तो हम पायेंगे की मांसाहारी पशुओ के नाख़ून नुकीले तथा बगल के दांत लम्बे व दाढो के बीच में जगह पाई जाती है|उनकी आंते अन्य पशुओ से चौड़ी होती है व आहार किये हुए भोजन की उल्टी कर उसे दुबारा खाने की उनकी आदत होती है|इन सब प्राक्रतिक लक्षणों से मनुष्य युक्त नहीं है फिर भी वह केवल स्वाद का परित्याग नहीं सकते के कारण अपने स्वास्थे के लिए हानिकारक इस आहार को ग्रहण करता है
मांस मदिरा भक्षण के विरोधी तीसरे प्रबल तथ्य पर आने से पूर्व इसके पक्ष में कहे गए एक वचन पर विचार कर लेना आवश्यक होगा |

एक पंडितो की सभा में चेतन्य महाप्रभु की उनकी आहार की अशुद्धता के लिए निंदा की जा रही थी |महाप्रभु जिन्हें उनमे से कोई पहचानता नहीं था ,एक कोने में बेठे यह सब सुन रहे थे |जैसे ही भाषण समाप्त हुए,उन्होंने खड़े होकर एक प्रश्न किया कि कबूतर जो चुगा व अन्न का सात्विक आहार करता है,हमेशा काम वासना से पीड़ित रहता है ,लेकिन शेर जो मांसहारी है एक वर्ष में केवल एक बार सम्भोग करता है |फिर आहार की पवित्रता का क्या महत्व है?पंडित इसका तर्कसंगत उत्तर नहीं दे सके |लेकिन हमे ये नहीं भूलना चाहिये की चेतन्य महाप्रभु इतने उच्च कोटि के संत थे की वे साधना पथ पर आने वाली कठिनाइयों की स्थिति को भली प्रकार समझने तथा नियंत्रित करने में सक्षम थे|ऐसे महान लोगो तथा जो लोग आध्यात्मिक विकास के लिए उत्सुक थे,उनके लिए आहार की शुद्धता अर्थहीन है|इसके अलावा हमे ये भी नहीं भूलना चाहिए है की प्रत्येक प्राणी में अपने विशिष्ट गुण होते है |किसी भी प्रकार की सांसारिक परिस्थियाँ उन गुणों को नष्ट नहीं कर सकती|

क्रमश:..........


लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |


Nov 10, 2011

हमारी भूलें : आहार व्यवहार की अपवित्रता - 1

आज संसार का वातावरण इतना दूषित हो चूका है कि मानव के नैतिक मूल्यों की समाज के सामने कोई कीमत नहीं रही| इस वातावरण का हमारे समाज पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा है तथा सत्य,निष्ठां व उदारता जैसे आवश्यक व्यक्तिगत गुणों को खोकर हमने हमारे निर्माण के आधार को खंडित व क्षय विक्षत कर दिया है|
पाखण्ड व फरेब को आज दुनिया में सफलता के लिए आवश्यक उपकरण समझा जाने लगा है जिसके परिणाम स्वरूप वचन की गरिमा व परस्पर विशवास की भावना का लोप होता जा रहा है| लोग नहीं जानते कि घटिया माल बाजार में अच्छे माल के अभाव की स्थिति में ही खपता है| पाखण्ड व फरेब का अस्तित्व तब तक है जब तक लोग सत्य निष्ठा की और उन्मुख नही होते|

घर्म की जड़ सत्य है,जो उदारता के जल से सिंचित होने पर बढ़ता है| आज लोग वचन की गरिमा को खोकर तथा पाखण्ड व फरेब का आश्रय लेकर मात्र धर्म के पालन की बात करते है,तो इसे विडंबना ही कहा जाएगा|

अकारण,बिना किसी हेतु के झूंठ बोलना व प्रत्येक कार्य में अपने हित की बात ढूँदना आज लोगों की सामान्य आदत हो गई है| यही सामजिक संगठनों में विग्रह व विवाद का मुख्या कारण है|लोगों ने आज परस्पर विश्वास को खो दिया है क्योंकि हमारे वचनों ने अपनी विश्वशनीयता खो दी है| राजनैतिक ही नहीं सामाजिक संघठन भी आज हमारे लिए लोक कल्याण या समाज कल्याण के हेतु नहीं रहे क्योंकि उदारता को खोकर हमने स्वार्थपरता का पाठ सीख लिया है जिसके परिणाम स्वरुप संगठनों के माध्यम से भी हम उदारता खोकर स्वार्थ सिद्धि या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने में लग जाते है| जब तक समाज के लिए कार्य करने वाले कार्यकर्त्ता,पहले स्वयं अपने व्यवहार को सत्यनिष्ठ व उदार नहीं बनायेंगे तब तक समाज के अन्य लोगों को इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित नहीं क्या जा सकता| व्यवहार की पवित्रता को खोकर कोई भी व्यक्ति समाज और अपने कल्याण की कल्पना नहीं कर सकता| यदि इस मार्ग की उपेक्षा कर कोई थोड़े समय तक लोकप्रियता अर्जित भी करले तो उससे साधक का पथ भ्रष्ट नहीं होना चाहिए क्योंकि कुछ समय बाद ऐसे लोगों को समाज उस समय स्वत: ही ठुकरा देगा, जब वास्तविकता प्रगट हो जायेगी|

व्यवहार में पवित्रतता लाने के लिए आहार की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है| कहा गया है कि – “ जैसा अन्न वैसा मन”| जिस प्रकार का हम आहार करते है उसी प्रकार का मन बनने का आशय है कि यदि हमारा आहार तामस है तो मन उससे प्रभावित होकर अहंकार के पक्ष में निर्णय करेगा व यदि आहार सात्विक है तो मन सदा बुद्धि के अनुकूल रहकर हमको तर्क संगत विकासशील मार्ग अग्रसर करता रहेगा|

क्रमश:...................


लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Nov 2, 2011

सवाई जय सिंह जी की ३२४ वी जयंती : करणी सेना मनाएगी गौरव दिवस

महाराजा सवाई जय सिंह जी की ३२४ वी जयंती
श्री राजपूत करणी सेना करेगी श्रधासुमन अर्पित

जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह जी की ३२४ वी जयंती को श्री राजपूत करणी सेना गौरव दिवस मनाने जा रही है ! सेना के जयपुर जिला अध्यक्ष नारायण सिंह दिवराला ने बताया की कल दिनांक ३ नवम्बर को झोटवाडा स्थित जिला कार्यालय मे प्रात ९ बजे श्र्धासुमन अर्पित करेंगे ! दिवराला ने बताया की विश्व प्रसिद्ध शहर गुलाबी नगर की स्थापित्य कला व इसकी बसावट मे सवाई जय सिंह जी का बहुत बड़ा योगदान है , उनकी दूरदर्शिता ने ही जयपुर को एक अलग पहचान दिलाई ! जयपुर वासियों को उन पर गर्व है इसी लिए उनकी जयंती को करणी सेना गौरव दिवस के रूप मे मनाने जा रही है ! समारोह मे सेना के प्रदेश संयोजक श्याम प्रताप सिंह इटावा , प्रदेश उपाध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना सहित सेना के जिला पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे !
दिवराला ने बताया की साय ७ बजे स्टेचू सर्किल पर करणी सेना की ओर से घी के दीपक जलाये जायेंगे !

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Shyam Prarap Singh Etawa
Pradesh Sanyojak
Shri Rajput Karni Sena
9887380511

Aug 21, 2011

हमारी भूलें : काल चक्र से मार्ग दर्शन प्राप्त नहीं करना

बुद्धिमान व्यक्ति यदि यह नहीं देख पाता है कि किस मार्ग पर अग्रसर होने से मेरा कल्याण संभव है ; तो भी वह संसार में घटित होने वाली घटनाओं व समय के स्वरूप को समझकर अपना मार्ग खोज निकालता है,लेकिन हमने इस आधार पर कभी अपना मार्ग खोजने की चेष्टा नहीं की|

हमारे धर्म के प्रचारक लोग,जिनका धर्म पर एकाधिकार है,यह प्रचारित कर लोगों का मनोबल गिरा रहे है कि अभी कलयुग आरम्भ हुआ है व घोर कलयुग अभी आने वाला है,अतः मनुष्य का नैतिक पतन उत्तरोत्तर होता चला जाएगा| हम इस कथन को यथावत स्वीकार करते हुवे अपने आप को भाग्य भरोसे छोड़ने को उतारू हो जाते है| हम यह भी नहीं जानते कि समय कि गणना का शास्त्र ज्योतिष है,व ज्योतिष की जिस प्रकार गणना होती है उस हिसाब से कलयुग में कलयुग का अंतर व कलयुग का ही प्रत्यंतर जो ४३२० वर्ष का घोर कलयुग का समय था,वह बीत चूका है|
इस घोर कलयुग के समय में संसार में धर्म के नाम से पचाने जाने वाले चरित्र-निर्माण की आधारशिला खंडित हुई| बोद्ध,जैन,इसाई,यहूदी,इस्लाम व सिक्ख आदि धर्मो का उदय हुआ| धर्म खंड खंड हो गया| हम अपने आप को हिन्दू या वैष्णव कहने लगे,यह भी भूल गए कि कलयुग के आगमन से पूर्व,संसार में धर्म केवल धर्म के ही नाम से जाना जाता था| उसके आगे हिन्दू या मुसलमान आदि किसी प्रकार की उपाधि नहीं लगाई जाती थी|

आज जगह जगह दीवारों पर जब हम लिखा देखते है कि सतयुग का आगमन हो रहा है तो हमें पाखण्ड सा नज़र आता है,क्योंकि हम नहीं जानते की पिछले ८०० वर्षों से कलयुग में कलयुग का अंतर तथा उनमे सतयुग का प्रत्यंतर चल रहा है,जो १७,००० से अधिक वर्ष तक चलेगा| इस अवधि में जितने भी धर्मों का उदय हुआ है,उनका नाश होना व पुनः मूल धर्म का उदय होना अवश्यम्भावी है| क्या हम यह कल्पना करते है| की एक रोज हम कलयुग में सोयेंगे व दुसरे रोज जब उठेंगे तो सतयुग हो?ऐसा कभी होने वाला नहीं है क्योंकि कलयुग के बाद सतयुग आता है अतः समाज अभी से मूल धर्म की और अग्रसर होगा व सतयुग के आगमन तक मनुष्य का चरित्र पूरी तरह से विकसित हो चुकेगा,जिस पर किसी भी प्रकार के सामजिक या राजनैतिक नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होगी|

पिछले ८०० वषों में क्या हुआ? धर्म के नाम पर युद्ध व एक धर्म के विरूद्ध दुसरे धर्म के युद्ध समाप्त हो गए| सभी धर्मों में ऐसे संतों का प्रादुर्भाव हुआ,जिन्होंने लोगों का ध्यान धार्मिक कट्टरता से हटाकर,मूल धर्म की और खेंचने की चेष्टा की है| ऐसे संतों का साहित्य धार्मिक सीमाओं को लांघ कर आज संसार के सभी भागों में पढ़ा जा रहा है| इस्लाम धर्म के सूफी संत व भारत के भक्ति मार्गी व वेदांती संतों ने संसार में एक ऐसी धूम मचा दी है कि भोतिकतावाद से त्रस्त लोग,आज संतों कि खोज में लगे हुए है| यह दूसरी बात है कि इस परिस्थिति का फायदा उठाकर अनेक ढोंगी साधू जनता के साथ ठगी कर रहे है| लेकिन यह ठगी भी अधिक समय तक चलने वाली नहीं है क्योंकि संतों कि आवाज़ अपने अपने धर्म के पंडावाद के विरुद्ध उठी है| अगर कोई इसी पंडावाद को अपनाने के लिए साधुवेश का उपयोग करेगा,तो वह भी नष्ट हुए बिना नहीं रहेगा|

जहाँ चीन के महान संत लाओत्से व उनकी परम्परा के अनेक संतों ने बोद्धों को धर्म के मूल की खोज के लिए प्रेरित किया,वहीँ पर खलील जिब्रान जैसे संतों ने गिरजाघरों द्वारा किये जाने वाले शोषण को लोगों के सामने प्रस्तुत करते हुए,धर्म की वास्तविकता व सेवा के महत्व को स्वीकार करने के लिए उन्हें प्रेरित किया है|

आज इस्लाम धर्म के अनुयायियों का जिन राष्ट्रों में बाहुल्य है,उनमे हम क्या देख रहे है? इस्लामिक क्रांतियाँ हो रही है| किस लिए? इस्लाम के प्रचार के लिए नहीं, इस्लामिक पंडावाद को बचा लेने के लिए| इस्लाम धर्म को मानने वाले 'बाबा'नामक एक व्यक्ति हुए जिन्होंने यह घोषणा की कि 'रसूल मोहम्मद साहब से यह कहा था कि मेरा चलाया हुआ धर्म एक हजार वर्ष तक चलेगा अतः इससे आगे जो करना है उसका सन्देश लेकर मै आ गया हूँ'| उन्होंने कहा संसार के सभी धर्मों का आदर करो| धर्म के नाम पर लड़ना मनुष्यता नहीं है| विज्ञान को जीवन में अपनाओ| समाज को शिक्षित करो तथा भोतिकवाद व 'आध्यात्मवाद' दोनों का साथ साथ विकास करो|

इन बाबा महाशय का मदीना में क़त्ल कर दिया गया लेकिन अपनी मृत्यु के पूर्व उन्होंने घोषणा की थी कि ४० वर्ष बाद मेरे विचारों का प्रचारक फिर आएगा| तदनुसार इतने ही समय बाद 'अब्दुल बहा' ने उन्ही विचारों को अपनाने की घोषणा कर दी,जिनको 'बाबा' ने प्रगट किया था| अब्दुल बहा को जेल में डाला गया,यातनाएं दी गई,लेकिन अंत में उन्हें रिहा कर दिया गया| परिणामस्वरूप वे अपनी मृत्यु से पूर्व अपने बहुत सारे अनुयायी छोड़ गए जिन्होंने 'बहाई धर्म' की स्थापना कर सब धर्मों को आदर देने की विचारधारा को फैलाने का कार्य अपने हाथ में ले रखा है|इन्ही उदारवादियों से भयभीत होकर इस्लामिक क्रांतियां की जा रही है व उदारवादियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है| जेल से छूटने के बाद बहाउल्ला जिस स्थान पर रहे वहां इज़राइल नाम का देश बन गया है जो इस्लामिक देशों को तहस नहस कर रहा है|

मनुष्य यह नहीं जानता कि उसमे काल चक्र को बदलने की क्षमता नहीं है| इसीलिए बुद्धिमान लोग सबसे पहले चारों तरफ दृष्टि फैला कर समय की गति को पहचानने की चेष्टा करते है|
संसार में घटित होने वाली उपरोक्त व ऐसी ही हजारों अन्य घटनाओं को देखते हुए भी हमने अपने आपको नए सिरे से बनाने व युगानुकूल बनने की कभी चेष्टा नहीं की| हमारे सभी शास्त्रों में उल्लेख है कि वर्ण व आश्रम प्रणाली केवल त्रेत्रा व द्वापर युग में स्थापित रहती है| कलयुग में यह नष्ट हो जाति है व सतयुग में इनकी कोई आवश्यकता ही नहीं होती| क्योंकि यह तो जब समाज विकृत होने लगता है,तो उसे पतन से रोकने के साधन मात्र है|

आवश्यकता इस बात की है किसमाज के भौतिक स्वरूप को बनाए रखने के बजाय हमारे धर्म के मूल की खोज की जानी चाहिए क्योकि वास्तविकता तो धर्म का मूल है न कि उसका भौतिक स्वरूप| क्षात्र तत्व की खोज व उसे उपार्जित करना ही युगधर्म है|
क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Aug 2, 2011

हमारी भूलें : स्वयं अपने इतिहास का सिंहावलोकन न करना

हम समाज के इतिहास को पढना चाहते है,इसलिए नहीं की हम उसमे से हमारी भूलों को खोजे व भविष्य में उन भूलों को न करें,और न ही इसलिए कि हम हमारी महानताओं को खोजे व उन महानताओं को अपने में स्थापित करे| बल्कि आज हम इतिहास का केवल इसलिए अध्ययन करना चाहतें है कि अपने पुरखों के नाम पर कुछ डींगे हांक सके| बिना कोई श्रेष्ठता अर्जित किये अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ साबित कर सके|

हम समाज जागरण व समाज कल्याण के हेतु इतिहास के अध्ययन की बात भी कहते हे,लेकिन कटु वास्तविकता यह हे कि आज क्षत्रिय समाज नाम कि कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं है| समाज पूर्ण रूपेण छिन्न भिन्न होकर व्यक्तियों में विभाजित हो चूका है| आज प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को अमाज समझता है व समाज का ठेकेदार बनता है| जो कोई व्यक्ति उसके अनुकूल रहने कि बात करता है,समाज सेवी है,तथा जैसे ही उसके आचरण में व्यक्ति के प्रति अनुकूलता आती है,उसे हम समाज द्रोही घोषित कर देते है| सम्माज के सामने व्यक्ति यदि समर्पित नहीं हो तो समाज कि रचना संभव नहीं है|

आज हमारे व्यक्तिगत अहंकार ने समाज को छिन्न भिन्न कर दिया है| अतः वास्तविकता यह रह गई है कि न कोई समाज है और न समाज चरित्र| ऐसी अवस्था में हम को समाज के इतिहास का अध्ययन करने के बजाय हमारे व्यक्तिगत इतिहास का अध्ययन करना चाहिए |ताकि हम कुछ समझ सके|

अपने आप के इतिहास को देखना,उसे पढना,व उस पर मनन करना अत्यंत कठिन कर्म है| इस कर्म को यदि हम निरंतर बढाते चले तो यह कार्य और अधिक कठिन होता चला जाता है| फिर भी कठिनाई कि परवाह किये बिना इस मार्ग पर यदि हम निरंतर बढ़ते चले तो एक रोज व्यक्तिगत इकाइयां समाप्त हो जायेगी व समाज चरित्र का निर्माण अवश्य होगा|
आखिर व्यक्ति का इतिहास है क्या? हम प्रत्येक क्षण को व्यतीत करते जा रहे है| यह बिता हुआ क्षण ही हमारा इतिहास है|

क्या हम विचार करने के लिए तैयार है कि इस बीते हुए क्षण में हमने किसे व क्यों नीचा दिखाने कि चेष्टाएँ कि थी?क्या हम यह भी सोचने के लिए तैयार है कि इस बीते हुए क्षण में हमने जिन आदर्शों की बात की,उनका निर्वाह हमने पिछले क्षणों में किया है,व भविष्य में आने वाले क्षणों में करेंगे? अगर इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो उत्तर नकारात्मक मिलेगा|

मनुष्य मौत से डरता क्यों है? निर्भयता,जो क्षत्रिय के लिए आवश्यक हे,का उपार्जन कैसे किया जा सकता है? जो मौत से डरता है,वह इंसान भयमुक्त नहीं हो सकता| मौत से डरने का कारण हमारा व्यक्तिगत इतिहास है| मौत की कल्पना आते ही हमारे सामने वे सारे कुकर्म आकर खड़े हो जाते है,जिनको हमने समाज से छिपाकर किया है| अगर किसी व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत इतिहास का अध्ययन किया हो व वास्तव में वह निर्दोष रहा हो तो मौत से उसे भय क्यों होगा? सच्चे व्यक्ति को सच्ची अदालत में जाने से क्या भय हो सकता है?

हम अपने आप से व एक दुसरे से भयभीत है| क्योंकि हम जानते है की हम आदर्शों की बात कर उनके विरुद्ध एक दुसरे पर आघात करने की चेष्टा करते है| त्याग के स्थान पर हमने स्वार्थ साधन किया है| समाज को अधिक देने के नाम पर हम सबसे अधिक प्राप्त करने की चेष्टा करते रहे| तब फिर निर्भरता व क्षत्रियोचित गुणों का विकास आखिर कैसे होगा?

इस जीवन के हमारे व्यक्तिगत इतिहास का हम स्मरण कर सकते है| वह सम्पूर्ण नहीं तो प्रमुख घटनाएं हमे अवश्य याद है, जिनके आधार पर हम अपना विश्लेषण कर अपनी कमियों को पहचान सकते है,उन्हें हटाकर उनके स्थान पर अच्छाइयों का सृजन कर सकते है|

लेकिन अपने इतिहास का अध्ययन यहीं समाप्त नहीं होता| इससे भी हमे आगे बढ़ना होगा| यदि हम हमारे वास्तविक शत्रुओं व मित्रों की खोज करना चाहते है,तो हमे विचार करना होगा कि इस जीवन से पहले भी क्या यह स्थूल शारीर हमारे साथ था? तो उत्तर मिलेगा नहीं? तब हमे विचार आएगा कि क्या हमारा सूक्ष्म शारीर यानी मन,बुद्धि,अहंकार भी इस जीवन से पूर्व हमारे साथ था? तो भी उत्तर मिलेगा नहीं| क्योंकि सूक्ष्म शारीर का निर्माण प्रारब्ध के आधार पर होता है| उन पाप पुण्यों के आधार पर जिनका हमे इस जीवन में भोग करना है| तब फिर सवाल उठता है कि जब में स्थूल शारीर भी नही हूँ , यह सूक्ष्म शारीर भी नहीं तो फिर अपने आप को मई कहने वाली वह कोंसी चीज है जो इस जन्म से पहले से चली आ रही है?

वह शक्ति जो इस जन्म से पहले से ही नही,बल्कि न मालुम कितने जन्मों के साथ चली आ रही है, 'प्राण' है| इस जन्म के हमारे व्यक्तिगत इतिहास को बुद्धि के द्वारा जान सकते है,लेकिन इसके पहले के इतिहास को बिना प्राण की मदद के हम नहीं जान सकते| और जब तक हम हमारे पहले के इतिहास को नही जानते,तब तक हमारे संपर्क में आने वाले प्रमुख व्यक्तियों के हेतु को भी हम नहीं जान सकते कि कौन मित्रता वश हमारा कल्याण करने के लिए हमारे पास आ रहा है|व कौन शत्रुता वश हमसे कुछ छीन कर ले जाने के लिए हमारे पास आ रहा है|
प्राण के इस महत्व व प्राण की इस भूमिका को स्वयं के इतिहास को समझने के लिए समझना आवश्यक होगा| और यही क्षत्रियों की परम्परागत साधना का मार्ग है|

जब हम किसी बार को दावे के साथ कहते है तो अपने दाहिने हाथ को सीने पर ठोकते है| हमारे हाथ का कलाई वाला भाग जिस स्थान पर पडता है,उसी स्थान पर सूक्ष्म अंग,जो सामान्य आँखों से नहीं दिखाई देता,'हृदय,स्थित है| और इस हृदय में प्राण निवास करता है,जिसका सतत विकास करने के लिए आत्मा सदा उसकी रहती है| इस प्रकार व्यक्ति स्वभाविक रूप से धीरे धीरे स्वतः ही विकसित हो रहा है| लेकिन हम प्रयास करें,व अपने प्राण से सम्पर्क साधने की चेष्टा करे,अपनी स्मृति को प्राण की खोज में लगा दें-जो हमारे व्यक्तिगत इतिहास को जानता है तो,निश्चित रूप से हम प्राण की मदद से अपने शत्रु व मित्रो की खोज कर सकते है|

अनंत जन्मों से चला आने वाला प्राण यह भी जानता है कि हमारी किसी बोद्धिक व आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ती कौन कर सकता है व उनमे मार्ग दर्शन कैसे प्राप्त किया जा सकता है| अतः निश्चित यह हुआ कि अगर हम अपने आपके इतिहास की खोज करने में जुट जाएँ तो हमे न केवल आपसी खिचातन व तनाव से मुक्ति मिलेगी बल्कि हम हमारे वास्तविक साधनापथ व साधनापथ के सहयोगियों को भी पहिचान सकेंगे| जिससे हमारे जीवन के संचालन में सुविधा होगी तथा जो लोग पहले हमारे से पीड़ित रहे है| अगर वे बदले की भावना से हमारे ऊपर आक्रामक कार्यवाही भी करते है तो हमारे मन में प्रतिरोध व प्रतिशोध की भावना पैदा नहीं होगी? क्योंकि हम जान जायेंगे कि यह सब हमारी गलती का परिणाम है,जिसका प्रतिकार नहीं करके ही हम अनावश्यक संघर्ष को हमेशा के लिए समाप्त कर सकते है|

अतः आवश्यक यह है कि हम अपने आप के इतिहास को देखने व समझने की चेष्टा करें| इस जन्म के इतिहास को मनन द्वारा,व पूर्व जन्म के इतिहास को ध्यान के द्वारा ही समझा जा सकता है| अगर इस प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया गया तो हमारी यह भूल कभी सुधरने वाली नहीं है| व्यक्तियों में विभाजित हमारा आज का समाज बिना इस प्रक्रिया को अपनाए कभी भी वास्तविक समाज नहीं बन सकेगा|

क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Aug 1, 2011

हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना-२

अब हम आधुनिक इतिहास की और दृष्टि डालते है | आमेर राजवंश के सबसे प्रतापी राजा ; बाल्टी यों कहा जाए कि आधुनिक युग के सबसे पराक्रमी योद्धा पंजवनराय जी , अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख सामंत थे , उनका नाम हमको इतिहास में देखने को नहीं मिलता | पंजवनराय ने ६४ बड़े युद्ध लड़े व दो बार अकेले अपनी ही सेना से मोहम्मद गौरी को परास्त कर बंदी बनाया | उस माहन शूरवीर का आज इतिहास में नाम नहीं मिलता | लोगों की जबान पर आज भी प्रचलित है |
"गहत गौरी साह के , भागी सेना और |
आयो वाह लिए तब , फिर कूर्म नागौर ||"


इतिहासकारों का कथन है कि जयपुर राजवंश की वंशावली में पंजवनराय का जो काल अंकित है वह पृथ्वी राज के काल से मेल नहीं खाता जबकि पृथ्वीराज - रासौ का आधे से अधिक भाग केवल पंजवन के युद्धों से भरा पड़ा है | केवल एक छोटी सी विसंगति बताकर इतने बड़े शूरवीर का नाम इतिहास से मिटा दिया गया व हमने उसको स्वीकार कर लिया |

हमने कभी प्राचीन हस्तलिखित लेखों को पढने व संतों से सत्संग करने का श्रम नहीं किया | इसी के कारण बहुत सारी लिखित व प्रचलित बातों को इतिहास से हटा दिया गया | विज्ञान के दास हुए पुण्य हीन लोग यदि संत परंपरा के इतिहास को समझने की सामर्थ्य खो चुके है , तो उनके द्वारा सुरक्षित इतिहास का क्या दोष है ? ऐसे आख्यानो को छिपाना नहीं जाना चाहिए , क्योकि आने वाली पीढ़ियों ने , यदि अपने आप को शिक्षित व दीक्षित करने को चेष्टा की तो वे इन तथ्यों से प्रेरणा नहीं ले पाएगी | इस प्रसंग में प्रसिद्ध दो घटनाओं का वर्णन करना आवश्यक प्रतीत होता है - पहली घटना आमेर के राजा मिर्जा राजा जय सिंह से सम्बंधित है | आमेर के राजाओं का यह संकल्प था कि किसी भी हिन्दू राज्य को जीतकर मुग़ल साम्राज्य में नहीं मिलायेंगे | मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने मिर्जा राजा जय सिंह को शिवाजी पर चढ़ाई करने भेजा था | शिवाजी को सब प्रकार से शक्तिहीन कर देने पर भी जब वे समझोता करने के लिए तैयार नहीं हुए , तो मिर्जा राजा धर्मसंकट में पड़ गए | उन्होंने दौसा के भोमिय सूरजमल जी को याद किया व उनसे अनुरोध किया कि " रात को सोते हुए शिवाजी कि पाग उतार लाये व एक चिट्ठी उनके सिराहने छोड़ दें | भूमिया जी ने ऐसा ही किया "| प्रातः काल शिवाजी ने जब अपनी पाग नहीं देखि तो सिराहने रक्खे हुए पर्चे को पढ़ा | उसमे मिर्जा राजा जय सिंह ने लिखा था , " मेरे से आकर बात करो , वर्ना आज तो पाग मंगवाई है | कल सिर मंगवा लूँगा | " इसके बाद शिवाजी ने जिजाबाई से परामर्श कर मिर्जा राजा से भेंट की | आज के तापहीन लोग यदि सूक्ष्म शरीरों में तपस्या कर रहे संतों व शूरवीरों का साक्षात्कार नहीं कर सकते तो इसमें उन लेखकों का क्या दोष है ? जिन्होंने इन घटनाओं को बड़े यत्न से अंकित कर सुरक्षित रक्खा है |

दूसरी घटना मीरा बाई के इतिहास से सम्बंधित है | संतो में प्रचलित कथा के अनुसार मीरा बाई के विवाह के बाद राणा ने यह अनुभव किया किया कि मीरां आध्यात्मिकता में उनसे बढ़ी चढ़ी है | अतः उन्होंने अपने गुरु के सानिध्य में कुछ समय तक रहकर आध्यात्मिक बल को बढाने का निश्चय किया | राजा जब गुरु के पास जाने लगे तो मिरां बाई ने किसी सेवक को साथ नहीं ले जाने का अनुरोध किया , लेकिन राजा ने उसे अस्वीकार करते हुए एक सेवक को साथ ले गए | कुछ वर्षों तक गुरु के सानिध्य में रहकर , राणा ने साधना की व परकाया प्रवेश की विद्या भी सीखी | राणा का सेवक अत्यंत चतुर था | वह भी राणा के साथ साथ इन सारी विद्याओं को सीखता रहा | कुछ समय बाद जब राणा गुरु से विदा होकर वापस लौट रहे थे , तो मार्ग में जंगल में एक ताज़ा मरे हुए शेर को उन्होंने देखा व उनके मन में परकाया प्रवेश की विद्या का परिक्षण करने की बात उठी | राणा ने अपने सेवक को आदेश दिया कि वह उनके शारीर कि रक्षा करे व स्वयं शेर के शारीर में प्रवेश कर जंगल में भ्रमण के लिए निकल पड़े | इस परिस्थिति को देखकर सेवक के मन में लोभ उत्पन्न हुआ व उसने अपने शरीर को छोड़ कर राणा के शरीर में प्रवेश कर राजमहल का मार्ग अपनाया | राणा के शरीर में सेवक जब राजमहल पंहुचा , तो मीरा को पहचानते देर नहीं लगे | इस घटना के बाद तो मिरां कि भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति और भी बढ़ गई | आज के इतिहास में इन सब घटनाओं को विज्ञान सम्मत नहीं मानकर हटा दिया गया | लेकिन हमे यह नही भूलना चाहिए कि स्थूल विज्ञान से सूक्ष्म विज्ञान हमेशा अधिक प्रभावशाली रहा है | व आज के युग में हम सूक्ष्म विज्ञान की उपेक्षा कर , स्थूल के उपासकों के अनुचर बने जा रहे है |

वर्तमान इतिहास में नीतिज्ञ लोगों को कलंकित करने की कम चेष्टाएं नहीं की गई है | जिसके पीछे प्रयोजन यही रहा है कि हठवादिता में फंसे रहकर हमारा समाज परिस्थितियों से पिटता रहे , जिसका लाभ हमारे शत्रुओं को मिले | आधुनिक शास्त्रों से सज्जित यवनों के दल अरब देशों से भारत की तरफ कूच कर रहे थे | आज का अफगानिस्तान है जहाँ पर उस समय पांच मुस्लिम राज्य थे , उनको शास्त्र प्रदान करते थे व उसके बदले में वे भारत से जो धन लूट कर ले जाते थे , उसका आधा भाग प्राप्त करते थे | इस प्रकार काबुल का यह क्षेत्र उस समय बड़ा भारी शास्त्र उत्पादक केंद्र बन गया था | जिसकी मदद से यवनों ने भारत में लूट कीव बाद में राज्य स्थापना करने की चेष्टा में संलग्न हुए | इतिहास कारों ने इस बात को छिपाया है कि बाबर के आक्रमण से पूर्व बहुत बड़ी संख्या में हिंदू शासकों के परिवारजन व सेनापति राज्य के लोभ में मुसलमान बन गए थे व यह क्रम बराबर जारी था | ऐसी परिस्थिति में आमेर के शासक भगवन्तदास व उनके पुत्र मान सिंह ने मुगलों से संधि कर अफगानिस्तान के उन पांच यवन राज्यों पर आक्रमण किया व उन्हें इस प्रकार तहस नहस कर दिया कि वे भविष्य में उठ नहीं सके | इस कार्यवाही के परिणाम स्वरूप ही यवनों के भारत पर आक्रमण बंद हुए व बचे कुचे हिंदू राज्यों को भारत में अपनी शक्ति एकत्रित करने का अवसर प्राप्त हुआ | मान सिंह की इस कार्यवाही को तत्कालीन संतों ने पूरी तरह संरक्षण दिया व उनकी मृत्यु के बाद हरिद्वार में उनकी स्मृति में हर की पीडियों पर , उनकी विशाल छतरी बनवाई | लेकिन आधुनिक इतिहास के लेखकों ने मान सिंह के इतिहास में से उन घटनाओं को इस प्रकार से ओझल कर दिया गया है , जिससे तद्कालीन परिस्थिति में उनके द्वारा किया गया कार्य महत्वहीन हो जाए | नाथ सम्प्रदाय के लोगों के द्वारा " गंगामाई " का एक भजन अब भी गया जाता है , जिसमे भारत के धर्म रक्षक अनेक वीरों का उल्लेख आता है | इस भजन में रजा भागीरथ से क्रम शुरू होता है व भजन की अंतिम कड़ी राजा मान के यश गान के साथ समाप्त होती है |

इन सब तथ्यों को जनता की आखों से ओझल कर क्षत्रिय इतिहास को कलंकित करना व क्षत्रियों के गुण धर्म को नष्ट करना इन आक्रांताओं द्वारा लिखे गए इतिहास का मुख्या उद्देश्य रहा है , जिसको नहीं समझकर इस इतिहास को सही मानकर , हम आपस में लड़ते गए व एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे | अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हमारे विरोधियों द्वारा लिखे गए , इस इतिहास को स्वीकार नहीं करें तथा प्राचीन से लेकर आज तक के इतिहास व ग्रंथों में जहाँ कहीं भी क्षात्र तत्व के दर्शन होतें हो उनको ग्रहण कर अपने अंदर क्षमताओं का विकास करने का प्रयत्न करे |

क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक



श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |

Jul 30, 2011

पुर्व केन्‍दीय मंत्री स्‍व श्री कल्‍याण सिंह कालवी को 19 वी पुण्‍य तिथि पर याद किया करणी सेना ने किया रक्‍तदान

पुर्व केन्‍दीय मंत्री स्‍व श्री कल्‍याण सिंह कालवी की19 वी पुण्‍य तिथि को श्री राजपूत करणी सेना ने प्रदेश भर में स्‍मति दिवस के रूप मे मनाया । सेना के प्रदेश संयोजक श्‍याम प्रताप सिंह इटावा ने बताया कि प्रात 8 बजे सेना के जिला कार्यालय मे स्‍म्रति सभा रखी गयी जंहा स्‍व कालवी को श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद कार्यालय स्थित उघान मे वक्षारोपण किया गया ।। सेना के प्रदेश उपाध्‍यक्ष महीपाल सिंह मकराना व जिलाध्‍यक्ष नारायण सिंह दिवराला ने कहा कि स्‍व कालवी सक्रिय राजनेता होते हुए भी सदेव समाज के साथ खडे नजर आए चाहे वह भु स्‍वामि आन्‍दोलन हो , चाहे जोधपूर मे चोपासनी बचाओ आन्‍दोलन , चाहे दिवराला सती हो या भवानी निकेतन पर समाज के अधिकार कि लडाई । युवा वर्ग उनके दिखाए रास्‍ते पर चलने की श्‍ापथ ली ।

सेना की जिला ईकाइ के मंजीत सिंह चौहान व झब्‍बर सिंह राठौड के नेतत्‍व मे खातीपुरा स्‍ितथ मरूधर हास्पिटल मे विशाल रक्‍तदान शिविर का आयोजन रखा गया युवाओ ने अति उत्‍साह दिखाते हुए 186 युनिट रक्‍तदान किया जिसे जरूरत मंदो को दिया जाएगा । शिविर मे मुख्‍य तौर पर काग्रेस नेता विक्रम सिंह शेखावत , श्री प्रताप फाउडेश्‍न के सयोजक महावीर सिंह सरवडी , श्री राजपूत सभा के अध्‍यक्ष गिर्राज सिंह लोटवाडा , सचिव बलबीर सिंह हाथोज कग्रेस नेता देवेन्‍द्र सिंह बुटाटी व युवा भाजपा नेता अभिमन्‍यु सिंह राजवी पधारे ।





स्व.कालवी साहब को शत शत नमन

Jul 17, 2011

हमारी भूलें : आक्रांताओं व राजनैतिक विरोधियों द्वारा लिखे इतिहास को स्वीकार कर लेना

यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि जिस समाज को गिराना हो उसके इतिहास को पहले विकृत कर देना चाहिए| इस सिंद्धांत का आश्रय ले बुद्धिजीवियों ने महाभारत काल से लेकर अब तक निरंतर हमारे इतिहास को विकृत किया ह| यह ठीक है कि क्षत्रियों ने हमेशा इतिहास लेखन की पद्दति को हतौत्साहित किया है , क्योंकि इतिहास जातियों व धर्मों के बीच स्थाई द्वेष का कारण बन जाता है| लेकिन दुसरे लोग इतिहास लिखने लगे व उनका उद्देश्य जब हमारे इतिहास को कलंकित करना हो तो ऐसे प्रयासों का विरोध किया जाना चाहिए , व इस प्रकार विद्वेष की भावना से लिखे गए इतिहास को स्वीकार नहीं करना चाहिए| इस सिद्धांत की उपेक्षा कर हमारे मौन ने लोगों को यह समझा किया कि वास्तव में जो कुछ लिखा गया है , वाही सत्य है| धीरे - धीरे हमारी पीढियां भी इस विकृत इतिहास को सही समझने लगी| जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग वास्तविकता को समझने पर भी समझने को तैयार नहीं है| भावना लेखक कि भाषा से प्रकट हुए बिना नहीं रह सकती| महाभारत के युद्ध के बारें में महाभारत ग्रन्थ में लिखा है कि पुण्यात्मा क्षत्रियों को स्वर्ग में पहुचाने के लिए इस महान संग्राम कि रचना हुई , जबकि भागवत पुराण का लेखक लिखता है कि नीच व पापी क्षत्रियों के बोझ से धरती दबी जा रही थी| इया धरती का कल्याण करने के लिए यह संग्राम हुआ|

भावनाओं के बाद हम तथ्यों पर आते है| तथ्यों के आधार पर भी बुद्धिजीवियों द्वारा द्वेष भावना से रचे इन पुराणों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता| भागवत पुराण में उल्लेख है कि राम के वंशज क्षत्रियों का राज्य नष्ट हो जाएगा| अन्य किसी क्षत्रिय वंश के बारे में ऐसी भविष्यवाणी पुराण में नहीं कि गयी है| हम देख रहे है कि इस पुराण कि यह भविष्यवाणी पूर्णतया मिथ्या साबित हुई है| समस्त क्षत्रिय वंशो का राज्य नष्ट हो जाने के बाद भी राम के वंशजों का नेपाल में राज्य अब तक कायम है| भागवत पुराण में राम के वंशजों का राज्य नष्ट हो जाएगा , ऐसे भविष्यवाणी करते हुए इस वंश के अंतिम राजाओं के नाम भी दिए गए है | ये नाम नेपाल के राजवंश से कही भी मेल नहीं खाते| इतने सारे पाखंड के स्पष्ट दिखाई देने के बाद भी इतिहास कहे जाने वाले इन पुराणों को यदि हम स्वीकार करते हे , तो इससे बड़ी भूल और कोई नहीं हो सकती|

क्षत्रिय " शब्द ब्रह्म " अर्थात बीज तत्व के उपासक है , जब कि ब्राह्मण " पर ब्रह्म " अर्थात विस्तृत ज्ञान पद्दति के उपासक है| इसी प्रकार क्षत्रिय निष्काम कर्मयोग को स्वीकार करते है , जबकि ब्राह्मण केवल ब्रह्म के उपासक है व " ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या " के सिद्धांत को मानते है| संसार में केवल दो ही तत्व है एक " ब्रह्म " तत्व दूसरा " क्षात्र " तत्व| इन तत्वों कि अलग अलग साधना व उपासना पद्दति है| इस प्रकार सिद्धांत के अनुसार ब्राह्मण अपनी ही पद्दति के जानकार व गुरु हो सकते है| क्षत्रिय पद्दति का जानकार व गुरु भी केवल क्षत्रिय ही हो सकता है | व्यवहार में में यदि हम देखें तो श्री राम को समस्त ज्ञान व शक्ति उनके गुरु विश्वामित्र जी ने प्रदान की थी व अर्जुन को ज्ञान श्री कृष्ण ने दिया था| अतः यह स्वतः सिद्ध है कि क्षत्रिय की अपनी ज्ञान परंपरा हमेशा अलग रही है , लेकिन पुराणों में लिख दिया गया है कि ब्राह्मण के घर में जन्म लेने वाला प्रत्येक बालक संसार का गुरु है| इस प्रकार उन मिथ्या ग्रंथों के सहारे ये बुद्धिजीवी समाज के गुरु बन बैठे व हम धीरे धीरे अपनी ज्ञान परम्पराओं को खो बैठे|

पुनीत ग्रन्थ महाभारत के शान्ति पर्व में उल्लेख है कि " ब्राह्मण को राज सेवा , खेती के धन , व्यापार कि आजीविका , कुटिलता , परस्त्रीगमन और ब्याज इनसे दूर रहना चाहिए| जो ब्राह्मण दुश्चरित्र , धर्महीन , कुलटा का स्वामी , चुगलखोर , नाचने वाला , राज्य सेवक अथवा और कोई विकर्म करने वाला होता है , वह अत्यंत अधर्म है , उसे तो शुद्र ही समझो और उसे शूद्रों कि पंक्ति में बिठा कर ही भोजन करना चाहिए|" फिर आगे लिखते है , जिन्होंने अपने जातीय कर्मों को छोड़ दिया है , तथा जो कुत्सित कर्मों में प्रवृत होकर ब्राह्मणत्व से भ्रष्ट हो चुके है ,वे ब्राह्मण शुद्र के तुल्य है| इसी तरह जिन्होंने वेद नहीं पढ़ें , जो अग्रिहोत्र नहीं करते , वे भी शुद्र के तुल्य है| इन सब से धार्मिक राजा को कर और बेगार लेने का अधिकार है| न्यायालय में अभियुक्तों को पुकारने का काम करने वाले , वेतन लेकर देव मंदिर में पूजा करने वाले ये पांच प्रकार के ब्राह्मण चांडाल के सामान है|"

उक्त कथनों का मनन करने के बाद यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आज के युग में ब्राह्मण नगण्य है | फिर इन पंडावादी तत्वों को गुरु कि पदवी देने का जघन्य पाप कर्म क्षत्रिय समाज ने किया है जिसका परिणाम इस समाज ने न केवल अब तक भोग है बल्कि भविष्य में भी भोगना पड़ेगा| इन्ही तथ्यों व परिस्थितियों को देखकर पिछले डेढ़ हजार वर्षों से संतों ने केवल संत परंपरा के लोगों को व केवल संतों को ही गुरु रूप में स्वीकार करने कि बात कही | लेकिन इस और हमने कोई ध्यान नहीं दिया व पुराणवाद के चक्कर में फंसकर निरंतर पतन के गहरे गर्त की और अग्रसर होते गए|

अब हम आधुनिक इतिहास की और दृष्टि डालते है| आमेर राजवंश के सबसे प्रतापी राजा ;बल्कि यों कहा जाए कि आधुनिक युग के सबसे पराक्रमी योद्धा पंजवनराय जी , अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान के प्रमुख सामंत थे , उनका नाम हमको इतिहास में देखने को नहीं मिलता| पंजवनराय ने ६४ बड़े युद्ध लड़े व दो बार अकेले अपनी ही सेना से मोहम्मद गौरी को परास्त कर बंदी बनाया| उस माहन शूरवीर का आज इतिहास में नाम नहीं मिलता| लोगों की जबान पर आज भी प्रचलित है|
"गहत गौरी साह के , भागी सेना और|
आयो वाह लिए तब , फिर कूर्म नागौर||

"इतिहासकारों का कथन है कि जयपुर राजवंश की वंशावली में पंजवनराय का जो काल अंकित है वह पृथ्वी राज के काल से मेल नहीं खाता जबकि पृथ्वीराज - रासौ का आधे से अधिक भाग केवल पंजवन के युद्धों से भरा पड़ा है | केवल एक छोटी सी विसंगति बताकर इतने बड़े शूरवीर का नाम इतिहास से मिटा दिया गया व हमने उसको स्वीकार कर लिया|
क्रमश:...........
लेखक : श्री देवीसिंह महार
क्षत्रिय चिन्तक


श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ | इस चिंतन और उन भूलों के बारे में क्यों चर्चा की जाय इसका उत्तर भी आपके द्वारा लिखी गयी इस श्रंखला में ही आपको मिलेगा |