Dec 30, 2008

दानवीर महाराज रघु

उदयपुर से भूपेंद्र सिंह चुण्डावत

महाराज रघु अयोध्या के सम्राट थे। वे भगवान श्रीराम के प्रपितामह थे। उनके नाम से ही उनके वंश के क्षत्रिय रघुवंशी कहे जाते हैं। एक बार महाराज रघु ने एक बडा भारी यज्ञ किया। जब यज्ञ पूरा हो गया, तब महाराज ने ब्राह्मणों तथा दीन-दुखियों को अपना सारा धन दान कर दिया। महाराज इतने बडे दानी थे कि उन्होंने अपने आभूषण, सुंदर वस्त्र और सारे बर्तन तक दान कर दिए। महाराज के पास साधारण वस्त्र ही रह गए। वे मिट्टी के बर्तनों से काम चलाने लगे। यज्ञ में जब महाराज रघु सर्वस्व दान कर चुके, तब उनके पास ऋषि कौत्सनाम के एक ब्राह्मण कुमार आए। महाराज ने उनको प्रणाम किया, आसन पर बैठाया और मिट्टी के पात्र वाले जल से उनके पैर धोए। स्वागत-सत्कार हो जाने पर महाराज ने पूछा- आप मेरे पास कैसे पधारे? मैं क्या सेवा करूं?

कौत्सने कहा-महाराज मैं आया तो किसी काम से ही था, किंतु आपने तो पहले ही सर्वस्व दान कर दिया है। मैं आप जैसे महादानी उदार पुरुष को संकोच में नहीं डालूंगा। महाराज रघु ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की, आप अपने आने का उद्देश्य जरूर बता दें। कौत्सने बताया कि उनका अध्ययन पूरा हो गया है। अपने गुरुदेव के आश्रम से घर जाने से पहले गुरुदेव से उन्होंने गुरु दक्षिणा मांगने की प्रार्थना की। गुरुदेव बडे स्नेह से कहा- बेटा तूने यहां रहकर जो मेरी सेवा की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरी गुरु दक्षिणा तो हो गई। तू संकोच मत कर। प्रसन्नता से घर जा। लेकिन कौत्सने जब गुरु दक्षिणा देने का हठ कर लिया, तब गुरुदेव को थोडा क्रोध आ गया। वे बोले-तूने मुझसे चौदह विद्याएं पढी हैं, अतःप्रत्येक विद्या के लिए एक करोड सोने की मोहरें लाकर दे। गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड सोने की मोहरें लेने के लिए ही कौत्सअयोध्या आए थे।

महाराज ने कौत्सकी बात सुनकर कहा- जैसे आपने यहां तक आने की कृपा की है, वैसे ही मुझ पर थोडी-सी कृपा और करें। तीन दिन तक आप मेरी अग्निशालामें ठहरें। रघु के यहां से एक ब्राह्मण कुमार निराश लौट जाए, यह तो बडे दुःख एवं कलंक की बात होगी! मैं तीन दिन में आपकी गुरु दक्षिणा का कोई-न-कोई प्रबंध अवश्य कर दूंगा। कौत्सने अयोध्या में रुकना स्वीकार कर लिया। महाराज ने अपने मंत्री को बुलाकर कहा-यज्ञ में सभी सामंत नरेश कर दे चुके हैं। उनसे दुबारा कर लेना न्याय नहीं है। लेकिन कुबेरजीने मुझे कभी कर नहीं दिया। वे देवता हैं, तो क्या हुआ? कैलाश पर्वत पर रहते हैं, इसलिए पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को उन्हें कर देना चाहिए। मेरे सब अस्त्र-शस्त्र मेरे रथ में रखवा दो। मैं कल सबेरे कुबेर पर चढाई करूंगा। आज रात मैं उस रथ पर ही सोऊंगा। जब तक ब्राह्मण कुमार को दक्षिणा न मिले, राजमहल में पैर नहीं रख सकता। उस रात महाराज रघु रथ में ही सोए। लेकिन बडे सवेरे उनका कोषाध्यक्ष उनके पास दौडा आया और कहने लगा-महाराज खजाने का घर सोने की मोहरों से ऊपर तक भरा पडा है। रात में उसमें मोहरों की वर्षा हुई है। महाराज समझ गए कि कुबेरजीने यह मोहरों की वर्षा की है। महाराज ने सब मोहरों का ढेर लगवा दिया और कौत्ससे बोले-आप इस धन को ले जाएं। कौत्सने कहा, मुझे तो गुरु दक्षिणा के लिए चौदह करोड मोहरें चाहिए। उससे अधिक एक मोहर भी मैं नहीं लूंगा। महाराज ने कहा, लेकिन यह धन आफ लिए ही आया है। ब्राह्मण का धन हम अपने यहां नहीं रख सकते। आपको ही यह सब लेना पडेगा। कौत्सने बडी दृढता से कहा-महाराज मैं एक ब्राह्मण हूं। धन का मुझे करना क्या है! आप इसका चाहे जो करें। मैं तो एक भी मोहर अधिक नहीं लूंगा। कौत्सचौदह करोड मोहरें लेकर चले गए। शेष मोहरें महाराज रघु ने दूसरे ब्राह्मणों को दान कर दिया।

Dec 25, 2008

परमवीर मेजर पीरु सिंह शेखावत

6 राजपुताना रायफल्स के हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत झुंझुनू के पास बेरी गांव के लाल सिंह शेखावत के पुत्र थे जिनका जन्म 20 मई 1918 को हुआ था | जम्मू कश्मीर में तिथवाल के दक्षिण में इन्हे शत्रु के पहाड़ी मोर्चे को विजय करने का आदेश मिला | दुश्मन ने यहाँ काफी मजबूत मोर्चा बंदी कर रखी थी ज्योही ही ये मोर्चे की और अग्रसर हुए दोनों और से शत्रु की और भयंकर फायरिंग हुयी व भारी मात्रा में इन पर बम भी फेंके गए | पीरु सिंह आगे वाली कंपनी के साथ थे और भारी संख्या में इनके साथी मारे गए और कई घायल हो गए ये अपने साथियों को जोश दिलाते हुए युद्ध घोष के साथ शत्रु के एम एम जी मोर्चे पर टूट पड़े और बुरी तरह घायल होने बावजूद अपनी स्टेनगन और संगीन से पोस्ट पर मौजूद दुश्मनों को खत्म कर एम एम जी की फायरिंग को खामोश कर दिया लेकिन तब तक उनकी कम्पनी के सारे साथी सैनिक मारे जा चुके थे वे एक मात्र जिन्दा लेकिन बुरी तरह घायल अवस्था में बचे थे चेहरे पर भी बम लगने के कारण खून बह रहा था लेकिन जोश और मातृभूमि के लिए बलिदान की कामना लिए वे शत्रु के दुसरे मोर्चे पर हथगोले फेंकते हुए घुस गए दुसरे मोर्चे को भी नेस्तनाबूत कर वे अपने क्षत-विक्षत शरीर के साथ दुश्मन के तीसरे मोर्चे पर टूट पड़े ,रास्ते में सिर में गोली लगने पर ये १९ जुलाई १९४८ को वीर गति को प्राप्त हुए |
भारत सरकार ने इन्हे मरणोपरांत इनकी इस महान और अदम्य वीरता के लिए वीरता के सबसे उच्च पदक परमवीर चक्र से सम्मानित किया |

गणतंत्र दिवस परेड समारोह में रणथम्भौर के दुर्ग के रूप में सजेगी राजस्थान की झांकी

जयपुर।(भूपेंद्र सिंह चुण्डावत) नई दिल्ली के राजपथ पर 26 जनवरी, 2009 को आयोजित होने वाले गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य समारोह में इस वर्ष राजस्थान की झांकी को रणथम्भौर के दुर्ग के रूप मे सजाया जाएगा। राजस्थानी लोक कला, गौरवशाली इतिहास और समृद्घ संस्कृति को समेटे राजस्थान की यह झांकी गणतंत्र दिवस परेड में लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र रहेगी। इस शानदार झांकी की डिजाईन राजस्थान ललित कला अकादमी के श्री हर शिव शर्मा द्वारा तैयार की गई है।

राजस्थान ललित कला अकादमी के प्रदर्शनी अधिकारी श्री विनय शर्मा ने बताया कि राजस्थान की झांकी के अग्रिम भाग में ग्यारहवीं शताब्दी के राव राजा हमीर सिंह की छतरी दिखाई गई है। झांकी के पश्च भाग को पहाडियों पर स्थित दुर्ग के रूप में सजाया गया है जहाँ टाईगर, हिरण, लंगूर व अन्य वन्य-प्राणियों को विचरण करते हुए दिखाया गया है। उन्होंने बताया कि झांकी के सबसे अग्र भाग में पच्चीस लोक नृत्य कलाकार प्रदेश के प्रसिद्घ ‘‘गैर-नृत्य’’ की जीवन्त प्रस्तुति देगें। उन्होंने बताया कि रक्षा मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी की हाल ही में दिल्ली में हुई बैठक में राजस्थान की उक्त झांकी के मॉडल को अनुमोदित कर दिया गया है।

श्री विनय शर्मा ने बताया कि ‘‘रणथम्भौर’’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’ इन दो शब्दों के मेल से हुई है। ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’ दो पहाडियां है। थम्भौर वह पहाडी है जिस पर रणथम्भौर का विश्व प्रसिद्घ किला स्थित है और ‘‘रण’’ उसके पास ही स्थित दूसरी पहाडी है। रणथम्भौर का किला लगभग सात किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जहां से रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क का विहंगावलोकन किया जा सकता है।

उन्होनें बताया कि रणथम्भौर दुर्ग भारत के सबसे पुराने किलों में से एक माना जाता है। इस किले का निर्माण सन् 944 ए.डी. में चौहान वंश के राजा ने करवाया था। इस दुर्ग पर अल्लाउदीन खिजली, कुतुबुद्दीन ऐबक, फिरोजशाह तुगलक और गुजरात के बहादुरशाह जैसे अनेक शासकों ने आक्रमण किये। यह मान्यता रही है कि लगभग 1000 महिलाओं ने इस किले में ‘जौहर’ किया था। ‘‘जौहर’’ (जिसके अंतर्गत किलों को अन्य शासक द्वारा जीत लेने पर वहां की निवासी राजपूत महिलाएं अपने ‘शील’ की रक्षा के लिए जलती आग में कूद कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लिया करती थी।)

उन्होंने तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि ग्यारहवीं शताब्दी में राजा हमीर ने और सन् 1558-59 में मुगल बादशाह अकबर ने इस दुर्ग पर अपना अधिकार जमाया था। अंततः यह दुर्ग जयपुर के राजाओं को लौटा दिया गया था, जिन्होंन दुर्ग के आस पास के जंगल को शिकार के लिए सुरक्षित रखा। जंगल के संरक्षण की यही प्रवृत्ति बाद में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के अभ्युदय का कारण बनी और आज देश-विदेश से सैलानी यहां बाघ और अन्य वन्य प्राणियों को देखने आते हैं।

उन्होंने प्रदेश के प्रसिद्घ गेर नृत्य के संबंध में बताया कि ‘‘गेर’’ का मूल अर्थ गोले या घेरे से है। चूंकि इस नृत्य का निष्पादन गोले में घूम कर किया जाता है इस लिए इसका नाम ‘‘गेर’’ नृत्य पडा। यद्यपि यह नृत्य सभी समुदायों द्वारा किया जाता है किन्तु मेवाड व मारवाड में यह ज्यादा प्रसिद्घ है। इसे गेर घालना, गेर रमना, गेर खेलना और गेर नाचना भी कहा जाता है।

श्री शर्मा ने बताया कि प्रदेश में सभी जगहों का गैर नृत्य एक जैसा नही होता बल्कि हर स्थान की अपनी अनोखी ताल, घेरा डालने की विशिष्ट शैली व अपनी विशिष्ट वेशभूषा होती है। इस नृत्य के दौरान नृत्यकार सीधी व उल्टी दोनों दिशाओं में धूमर लेते हैं।

रंगीली वेशभूषा में सजे नर्तक चुन्नटों वाला खुला लम्बा स्कर्ट पहनते है। फाल्गुन के महीने में ढोल, थाली और मृदाल की ध्वनि सुनी जा सकती हैं और लोक नर्तक लम्बी छडियों को लिए इनकी ताल में ताल मिलाते हुए परस्पर टकराते देखे जा सकते हैं। जब वे नृत्य करते ह तो युद्घ के मैदान जैसा परिदृश्य दिखाई देता है। लोक मान्यता है कि इस नृत्य का सम्भावित रूप से युद्घों से कोई अनोखा सम्बन्ध रहा होगा।

उन्होंने बताया कि गैर नृत्य की इस अनुपम छटा को प्रदेश के लोक कलाकार प्रदेश की झाँकी के आगे प्रकट करेंगे।

Dec 19, 2008

राजपुताना समाज की आम वार्षिक बैठक

राजपुताना समाज की आम वार्षिक बैठक निम्न कार्यक्रम अनुसार रखी गई है --
स्थान:- महाराणा प्रताप भवन
B-4 केशवपुरम,लाल साईं मन्दिर के पास,
लोरेंस रोड (नजदीक केशवपुरम मेट्रो स्टेशन )
नई दिल्ली -110035
दिनांक :- 28 दिसम्बर 2008
समय :- प्रात: 11 बजे
बैठक के कार्य बिन्दु निम्न प्रकार है -
1- स्वगत भाषण
2- नए चुने गए प्रतिनिधियों का अभिनन्दन
3- नई कार्यकारिणी का गठन (चुनाव द्वारा)
4- कार्य प्रगति एवं आर्थिक लेखे का ब्यौरा
5- भविष्य की योजनाओं पर विचार
6- अध्यक्ष की अनुमति से अन्य कार्य बिन्दु
इस बैठक में आप सभी की उपस्थिति परिवार व मित्रों सहित प्रार्थनीय है | बैठक के पश्चात श्री भारत सिंह राठौड़ के माध्यम से भोजन की व्यवस्था रखी गई है
जय सिंह राठौड़,अध्यक्ष

डा.लक्ष्मण सिंह राठौड़ ,महामंत्री

गिरधारी सिंह शेखावत,खजांची

भवदीय

श्रवण सिंह शेखावत

ph-9313501171

Dec 14, 2008

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ

राजस्थान के पांच पीर हुये है । जिनका नाम पाबूजी,हङबू जी,रामदेवजी,मंगलिया जी और मेहा जी है पाबूजी वीर थे उन्होनें गायों की रक्षार्थ अपने प्राणो की आहुती दी । यह वीडियो इस श्रंखला की शुरुआत है ।

video

Dec 6, 2008

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें
1-राजस्थान रा पिछोला - पिछोला को अंग्रेजी में Elegy कहते है और उर्दू में मरसिया | मर्त्यु के उपरांत मृतात्मा के प्रति उमड़ते हुए करूँ उदगारों के काव्य रूप को ही पिछोला कहतें है | पिछोले म्रत्यु की ओट में गए प्रेमी की मधुर स्मृति पर श्रद्धा व प्रेम के भाव-प्रसून है |इस पुस्तक से करुण रस का रसास्वादन करके हम राजस्थानी साहित्य की सम्पन्नता प्रमाणित करने में समर्थ हो सकतें है |
2- समाज चरित्र - समाज जागरण के निमित केवल आन्दोलन ही उचित मार्ग नही है | आन्दोलन तो संगठन शक्ति का प्रदर्शन मात्र है | वह जनमत की अभिव्यक्ति है | किंतु स्वयम जनमत का निर्माण करना एक कठिन काम है | अनेक सामाजिक संस्थाएं सामाजिक शक्ति को उभारने का कार्य करती है,किंतु निर्बल की नैसर्गिक शक्ति बार -बार उभर कर अपने विनाश का कारण ही बनती है जब तक की शक्ति को उभारने वाले स्वयम शक्ति के उत्पादक न बन जाय | संस्थाएं स्वयम अपने और अपने उदेश्य के प्रति स्पष्ट नही होती तब तक सामाजिक चरित्र गोण ही बना रहता है |
इसी कमी को पुरा करने के लिए एक व्यवसायिक शिक्षण और मार्ग दर्शन की आवश्यकता महसूस करके यह पुस्तक लिखी गई | जो साधना की प्रारम्भिक अवस्था में साधकों का मार्ग दर्शन करने में उपयोगी सिद्ध हो रही है |
3-बदलते द्रश्य- इतिहास के इतिव्रतात्मक सत्य के अन्दर साहित्य के भावात्मक और सूक्ष्म सत्य के प्रतिस्ठापन की चेष्ठा ही समाज में चेतना ला सकती है | समाज में आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावनाओं का सर्जन करना इस पुस्तक का लक्ष्य है |
4- होनहार के खेल -पु.तनसिंहजी के पॉँच रोचक हिन्दी निबंदों से सृजित होनहार के खेल राजस्थान की संस्कृति,योधा समाज के जीवन दर्शन,और जीवन मूल्यों से ओत-प्रोत है इसमे राजपूत इतिहास और राजपूत सस्कृति मुखरित है | क्षत्रिय समाज के सतत संघर्ष,अद्वितीय उत्सर्ग,और महान द्रष्टि का शाश्वत सत्य गुंजित है | पु.तनसिंहजी की पीडा,तड़पन,उत्सर्ग की महत्ता और उत्थान की लालसा पुस्तक के प्रत्येक शब्द में संस्पदित है | हमारे लिए एतिहासिक आधार भूमि को ग्रहण कर एक जीवन संदेश है |
5-साधक की समस्याएं- साध्य प्राप्ति के लिए साधक के पथ में क्या समस्याएं व कठिनाईयां क्या है ? और कब-कब सामने किस रूप में बाधक बन कर आती है तथा उन्हें कैसे पहचाना जाय और उनका किस प्रकार सामना किया जाय इन सब पहलुओं का विस्तार से इस पुस्तक समाधान किया गया है |
6-शिक्षक की समस्याएं- सच्ची शिक्षा का अभिप्राय अपने भीतर श्रेष्ठ को प्रकट करना है | साधना के शिक्षक को प्राय: यह भ्रम हो जाता है कि वह किसी का निर्माण कर रहा है | सही बात तो यह है कि जो हम पहले कभी नही थे,वह आज नही बन सकते | हमारा निर्माण,किसी नवीनता की सृष्टी नही है,बल्कि उन प्रच्छन शक्तियों का प्रारम्भ है जिनसे हमारे जीवन और व्यक्तित्व का ताना बना बनता है | साधना पथ में स्वयम शिक्षक एक स्थान पर शिक्षक है और उसी स्थान पर शिक्षार्थी भी है | इसलिय शिक्षण कार्य में आने वाली समस्याएं शिक्षक की समस्याएं होती है | वे समस्याएं क्या है और किस रूप में सामने आती है,उनका समाधान क्या है ? यही इस पुस्तक का विषय है |
7- जेल जीवन के संस्मरण- भू-स्वामी आन्दोलन समय श्री तनसिंह जी को गिरफ्त्तार कर टोंक जेल में रखा गया था | जेल में जेलर और सरकार का उनके साथ व्यवहार व जेल में रहकर जो घटा और जो अनुभव किए उनके उन्ही संस्मरणों का उल्लेख इस पुस्तक में है |
8- लापरवाह के संस्मरण- इस पुस्तक में पु.तनसिंह जी के अपने अनुभव है तो उनके संघ मार्ग पर चलते उनके अनुगामियों का चित्रण भी है जिसे रोचक और मनोरंजक भाषा में पिरोकर पुस्तक का रूप दिया गया है |
9-पंछी की राम कहानी- संघ कार्य की आलोचना समय-समय पर होती रही है | तन सिंह जी की आलोचना और विरोध भी कई बार विविध रूपों में होता रहा है | विरोध के दृष्टीकोण से ही देखकर संघ के बारे में जिस प्रकार की आलोचना की गई या की जा सकती है उसे ही मनोविनोद का रूप देकर पु.तनसिंह जी ने एक लेखमाला का रूप दिया,जो इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है |
10-एक भिखारी की आत्मकथा- श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित एक भिखारी की आत्मकथा बहु-आयामी संघर्षों के धनी जीवन का लेखा-जोखा है और यह लेखा-जोखा स्वयम श्री तनसिंह जी के ही जीवन का लेखा-जोखा है |वास्तव में आत्मकथा श्री तनसिंह जी की अपनी ही है |
11-गीता और समाज सेवा - गीता श्री तनसिंह जी का प्रिय और मार्गदर्शक रही है | गीता ज्ञान के आधार पर ही उन्होंने श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना की थी | धेय्य निष्ठां और अनन्यता का मन्त्र भी उन्होंने गीता से ही पाया | क्षात्रशक्ति और संघ की आवश्यकता और महत्व भी उन्होंने गीता पढ़कर ही महसूस की |गीता का व्यवहारिक ज्ञान जिसमे कर्म,ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है, को संघ में उतारने का बोध भी उन्हें गीता से ही हुआ-इसी से प्रेरणा मिली | एक सच्चे समाज सेवक के लिए गीता का क्या आदेश है और किस प्रकार सहज भाव से किया जा सकता है और क्या करना आवश्यक है,इन्ही महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख "गीता और समाज सेवा " पुस्तक में किया गया है |
12- साधना पथ- गीता के आध्यात्मवाद के आन्दोलन पथ पर बढ़ते योगेश्वर श्री कृष्ण ने योग का जो मार्ग सुझाया है उसी लक्ष्य को सम्यक रूप से आत्मसात करने तक हर साधना को गतिमय होना चाहिय | सर्वांगीण साधना वही है जिसमे व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को जागृत कर सके स्वधर्म पालन एक महान कार्य है |महान कार्यों की पूर्ति के लिए ईश्वर से एकता स्थापित करना परमाव्यस्क है, किसी अनुष्ठात्मक भक्ति से ईश्वर को छला नही जा सकता |
श्री तन सिंह जी ने सम्पूर्ण योग योग मार्ग के आठ सूत्र सुझाएँ है वे हैं -
1- बलिदान का सिद्धांत 2- समष्टि योग 3- श्रद्धा 4- अभिप्षा 5- शरणागति 6- आत्मोदघाटन 7- समर्पण भाव
8- योग
14- झनकार- श्री तनसिंहजी द्वारा लिखे गए 166 गीतों,कविताओं आदि के संकलन को "झनकार" नाम देकर पुस्तक का रूप दिया गया है झनकार के एक-एक गीत एक-एक पंक्ति अपने आप में एक काव्य है |
उपरोक्त पुस्तकें " श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास A / 8, तारा नगर झोटवाडा, जयपुर -302012 से प्राप्त की जा सकती है |
संदर्भ - श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास द्वारा प्रकाशित " पूज्य श्री तनसिंहजी-एक परिचय " पुस्तक से

स्व.पु.श्री तनसिंह जी: एक अद्भभुत व्यक्तित्व का परिचय

मैंने स्व.श्री तनसिंहजी के लिखे कई लेख इस चिट्ठे पर प्रस्तुत किए है आज मै श्री तनसिंहजी का संक्षिप्त परिचय आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ हालाँकि उनके अद्भुत व्यक्तित्व पर एक पुरी पुस्तक ही लिखी जा सकती है फ़िर भी मै अपने इस छोटे से लेख के माध्यम से स्व.पु.तनसिंहजी का परिचय कराने की कोशिश कर रहा हूँ |

वि.सं.१९८० में बाड़मेर जिले के गांव रामदेरिया के ठाकुर बलवंत सिंह जी महेचा की धर्म पत्नी मोतिकंवरजी के गर्भ से तनसिंह जी का जन्म अपने मामा के घर बैरसियाला गांव में हुआ था वे अभी शैशवावस्था में अपने घर के आँगन में चलना ही सीख रहे थे कि उनके पिता मालाणी के ठाकुर बलवंत सिंघजी का निधन हो गया और चार वर्ष से भी कम आयु का बालक तनैराज अपने सिर पर सफ़ेद पाग बाँध कर ठाकुर तनैराज हो गया | मात्र ९०रु वार्षिक आय का ठाकुर | भाग्य ने उनको पैदा करके पालन-पोषण के लिए कठिनाईयों के हाथों सौप दिया |
घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद भी श्री तनसिंह जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बाड़मेर से पुरी कर सन १९४२ में चौपासनी स्कूल जोधपुर से अच्छे अंकों के साथ मेट्रिक परीक्षा पास कर सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त किया,और उच्च शिक्षा के लिए पिलानी चले आए जहाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद नागपुर से उन्होंने वकालत की परीक्षा पास कर सन १९४९ में बाड़मेर आकर वकालत का पेशा अपनाया,पर यह पेशा उन्हें रास नही आया | 25 वर्ष की आयु में बाड़मेर नगर वासियों ने उन्हें बाड़मेर नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया और 1952 के विधानसभा चुनावों में वे पहली बार बाड़मेर से विधायक चुन कर राजस्थान विधानसभा पहुंचे और 1957 में दुबारा बाड़मेर से विधायक चुने गए | 1962 व 1977 में आप बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए | 1962 में तन सिंघजी ने दुनिया के सबसे बड़े और विशाल बाड़मेर जैसलमेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव मात्र एक जीप,कुछ साथी,सहयोगी स्वयम सेवक,कार्यकर्त्ता,किंतु अपार जन समूह के प्यार और समर्थन से मात्र 9000 रु. खर्च कर सांसद बने |
1979 में मध्यावधि चुनावों का फॉर्म भरने से पूर्व अपनी माताश्री से आशीर्वाद लेते समय 7 दिसम्बर 1979 को श्री तनसिंह जी ने अपनी माता की गोद में ही अन्तिम साँस ली |
पिलानी के राजपूत छात्रावास में रहते हुए ही श्री तनसिंह जी ने अपने भविष्य के ताने-बाने बुने | यहीं उनका अजीबो-गरीब अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ और समाज की बिखरी हुयी ईंटों से एक भव्य-भवन बनाने का सपना देखा | केवल 22 वर्ष की आयु में ही उनके हृदय में समायी समाज के प्रति व्यथा पिघली जो " श्री क्षत्रिय युवक संघ" के रूप में निश्चित आकार धारण कर एक धारा के रूप में बह निकली |
लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह फॉर्म भरना,सदस्यता लेना,फीस जमा करना,प्रस्ताव पारित करना,भाषण,चुनाव,नारेबाजी,सभाएं आदि करना श्री तन सिंह जी को निरर्थक लगी और 22 दिसम्बर 1946 को जयपुर के मलसीसर हाउस में नवीन कार्य प्रणाली के साथ "श्री क्षत्रिय युवक संघ " की विधिवत स्थापना की और उसी दिन से संघ में वर्तमान संस्कारमयी मनोवैज्ञानिक कार्य प्रणाली का सूत्रपात हुवा | इस प्रकार क्षत्रिय समाज को श्री तनसिंह जी की अमूल्य देन "श्री क्षत्रिय युवक संघ " अपनी नई प्रणाली लेकर अस्तित्व में आया |
राजनीती में रहकर भी उन्होंने राजनीती को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया | क्षत्रिय युवक संघ के कार्यों में राजनीती भी उनकी सहायक ही बनी रही | सन 1955-56 में विवश होकर राजपूत समाज को राजस्थान में दो बड़े आन्दोलन करने पड़े जो भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से विख्यात हुए,दोनों ही आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में क्षत्रिय युवक संघ की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी |
स्व.श्री तनसिंह जी की ख्याति एक समाज-संघठक,कर्मठ कार्यकर्त्ता,सुलझे हुए राजनीतीज्ञ,आद्यात्म प्रेमी,गंभीर विचारक और दृढ निश्चयी व्यक्ति के रूप में अधिक रही है किंतु इस प्रशिधि के अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है जिसे विस्मृत नही किया जा सकता | यह एक तथ्य है कि एक कुशल प्रशासक,पटु विधिविज्ञ,सजग पत्रकार और राजस्थानी तथा हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के लेखक भी थे | पत्र लेखन में तो उनका कोई जबाब ही नही था अपने मित्रों,सहयोगियों,और सहकर्मियों को उन्होंने हजारों पत्र लिखे जिनमे देश,प्रान्त,समाज और राजपूत जाति के अतीत,वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है | अनेक सामाजिक,राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने साहित्य,संस्कृति और धार्मिक विषयों पर लिखने के लिए समय निकला |
श्री क्षत्रिय युवक संघ के पथ पर चलने वालों पथिकों और आने वाली देश की नई पीढियों की प्रेरणा स्वरूप स्व.श्री तनसिंह जी एक प्रेरणादायक सबल साहित्य का सर्जन कर गए | उन्होंने अनेक पुस्तके लिखी जो जो पथ-प्रेरक के रूप में आज भी हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए पर्याप्त है |
1-राजस्थान रा पिछोला
2-समाज चरित्र
3- बदलते द्रश्य
4- होनहार के खेल
5- साधक की समस्याएं
6- शिक्षक की समस्याएं
7- जेल जीवन के संस्मरण
8- लापरवाह के संस्मरण
9-पंछी की राम कहानी
10- एक भिखारी की आत्मकथा
11- गीता और समाज सेवा
12- साधना पथ
13- झनकार( तनसिंहजी द्वारा रचित 166 गीतों का संग्रह)
श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकों पर पुरा विवरण अगले लेख में |
कैसा लगा स्व.तनसिंह जी का व्यक्तित्व अपनी राय जरुर दे |

Nov 16, 2008

भारत का मान बिन्दु

भारत का मान बिन्दु ,तिरंगा यह झंडा हमारा |
मर के अमर हो जाना, पर ये झंडा ना झुकाना ||
लाखों चढ़े थे शमा पर किंतु बुझने न दी ये ज्योति |
बलिदानों की ये कथाएँ बातों में ना तुम भुलाना ||
बूंदी की शान कुम्भा ने, मेवाड़ में लड़कर बचायी |
उसने नकली किला बचाया, तुम असली निशां ना झुकाना ||
हाथी से टक्कर दिला कर,छाती से किला तुड़वाया |
वीरों की अमर कहानी, चुल्लू पानी में ना तुम डूबना ||
पच्चीस वर्ष कष्टों के,प्रताप ने वन में सहे थे |
स्वतंत्रता के दीवानों का भी यही था तराना ||
ओ भारत के वीर सपूतो,ओ राष्ट्र के तुम सितारों |
जननी की लाज कभी तुम,अपने ना हाथों लुटाना ||
अपमान औ" ठोकर की अग्नि अश्रु बूंदों से ना तुम बुझाना |
बुझाना हो तुम्हे कभी तो, खून की नदी से बुझाना ||
स्व.श्री तानसिंह जी द्वारा मार्च १९४६ में लिखित और क्षत्रिय युवक संघ द्वारा प्रकाशित पुस्तक झंकार से

Nov 10, 2008

भाजपा से नाराज राजपूतों का फैसला 12 को

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत,उदयपुर

भारतीय जनता पार्टी का परंपरागत वोट समझा जाने वाला राजपूत समाज विधानसभा चुनावों में इस बार साथ छोड़ सकता है। भाजपा से टिकटों में उपेक्षा के अंदेशे को भांपकर राजपूतों के सबसे बड़े संगठन श्री प्रताप फाउंडेशन ने 12 नवंबर को नई रणनीति के लिए प्रबुद्ध नेताओं की जयपुर बैठक बुलाई है। पता चला है कि फाउंडेशन के संयोजक भगवान सिंह रोलसाहबसर ने हाल ही कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह व पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात की है। इसे सियासी हलके में नए संकेत माना जा रहा है। बदली परिस्थितियों में प्रदेश में नए सियासी समीकरणों की संभावना प्रबल हो गई है। बताया जा रहा है कि भाजपा की ओर से जाति विशेष को ही महत्व दिए जाने से राजपूत समाज में नाराजगी है। समाज के प्रबुद्ध नेताओं के भारी दबाव के चलते भगवान सिंह रोलसाहबसर ने यह बैठक बुलाई है। संभावना जताई जा रही है कि फाउंडेशन विधानसभा चुनावों को लेकर कोई बड़ा निर्णय ले सकता है। श्री प्रताप फाउंडेशन ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एंव भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर को प्रदेश में 42 सीटों पर राजपूत प्रत्याशियों की सूची सौंपकर टिकट देने की मांग रखी। भाजपा की ओर से उत्साहजनक आसार नहीं मिलने एवं उपेक्षापूर्ण रवैये को देखकर फाउंडेशन से जुड़े पदाधिकारी नाराज हो गए है। टिकट नहीं मिलने पर राजपूत प्रभाव वाली सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी उतारकर चुनाव लड़ने पर भी विचार किया जा सकता है।

कन्या छात्रावास बनाएगी क्षत्रिय महासभा

भूपेन्‍द्रसिंह चूण्‍डावत,उदयपुर

उदयपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने राज्य के प्रत्येक जिले में समाज के भवन व बालिका छात्रावास बनाने के लिए शनिवार को कवायद शुरू कर दी है।
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा राजस्थान प्रदेश की कार्यकारिणी की बैठक शनिवार को प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष दुल्हा सिंह चूंडावत की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महेंद्र सिंह तंवर कुरूक्षेत्र, मुख्य वक्ता जयेंद्र सिंह जाडेजा, अध्यक्ष गुजरात राजपूत युवा संघ विशेष रूप से मौजूद थे। विशिष्ट अतिथि पूर्व विधायक राव कमलेंद्र सिंह बाठेडा एवं आगरा के रामनाथ सिंह सीकरवार और राष्ट्रीय अध्यक्ष लक्ष्मण सेना थे।

बैठक में सर्वसम्मति से राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल से मांग की गई कि भारतीय संविधान से प्रतिबंधित नाम व पदों, पदवियों के अलावा क्षत्रिय समाज में परम्परा से चले आ रहे नाम व आदर्शसूचक पदनामों का प्रयोग जो समाज की विशिष्ट पहचान है उसे इरादतन बिना वजह व कानूनी अधिकार के शासन प्रणाली के विभिन्न अंगों द्वारा जो प्रहार किया जा रहा है उसे तुरंत रोका जाए और भारतीय संस्कृति की पहचान ही जो राजपूत है उनके प्रति उन्हें सम्मान देने के लिए कहा जाए। बैठक में यह भी मांग की है कि राजपूत समाज की असहाय महिला (विधवा, तलाकशुदा) को 2 हजार रुपए मासिक की सहायता उपलब्‍ध करवाई जाए।

बैठक में यह भी निर्णय लिया कि राज्य के प्रत्येक जिले में राज्य के भवन व बालिका छात्रावास बनाए जाए जो एक जिले से शुरू कर आगे बढा जाए। राज्य में बालिका छात्रावास के लिए गुजरात की ओर से प्रत्येक कन्या छात्रावास के लिए दस-दस लाख रूपए के सहयोग देने की डॉ. जयेद्र सिंह जाडेजा ने घोषणा की तथा इसे उदयपुर में मेवाड क्षत्रिय महासभा के निर्माणाधीन उदयपुर भवन से शुरू करने का निश्चय किया।

इसके अलावा डॉ. जाडेजा ने यह भी घोषणा की कि राज्य के प्रत्येक जिले में जब तक कन्या छात्रावास नहीं बन जाए तब तक प्रतिवर्ष दस कन्याओं की निशुल्क पढाई, रहना, खाना आदि सहित गुजरात के क्षेत्रीय गुजरात में दस कन्याओं को शिक्षा देने की वचनबद्घता करता है।

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की कार्यकारिणी की बैठक राज्य में अतिशीघ्र राज्य के कार्यकर्ताओं के सम्मेलन के साथ प्रदेश अध्यक्ष महारानी जोधपुर श्रीमती हेमलता राजे द्वारा तय स्थान पर आयोजित की जाएगी तथा राज्य में विभिन्न क्षेत्रों में पारिवारिक यात्रा आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया। बैठक के अंत में कार्यकारिणी की दिवंगत सदस्य श्रीमती प्रेम कंवर को श्रधांजलि अर्पित की गई। बैठक का संचालन मंत्री निरंजन सिंह शक्तावत एवं धन्यवाद जगन्नाथ सिंह भाटी ने किया।

Nov 5, 2008

हम भूल चुके है हाँ

हम भूल चुके है हाँ
हम भूल चुके है जिस पीड़ा को उसको फ़िर उकसानी है |
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||
ऋषि मुनियों की जन्म भूमि यह भारत इसका नाम
देवों की अवतार भूमि यह सतियों का प्रिय धाम
दूर देश से भिक्षुक आते थे विद्या के काम
इतिहास बताते हाँ ---
इतिहास बताते भारत के वेदों की अमर कहानी |
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||
यवनों का अधिकार हुवा रिपुओं की सब कुछ बन आई
धर्म त्याग जो नही किया तो खाले उनकी खिचवाई
वेद जलाये देवालय तोडे मस्जिद वहां पे बनवाई
भारत का जर्रा हाँ ---
भारत का जर्रा -जर्रा कहता वीरों की नादानी |
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||
नादिरशाही हुक्म चला था कट गए थे सिर लाखों
देश धर्म की बलिवेदी पर शीश चढ़े थे लाखों
दिल्ली के तख्त पलटते हमने देखे थे इन आंखों
नही सुनी तो हाँ --
नही सुनी तो फ़िर सुनले हम वीरों की कुर्बानी |
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||
मुगलों ने जब किया धर्म के नाम अनर्थ अपार
चमक उठी लाखों बिजली सी राजपूती तलवार
और सुनो हल्दी घाटी में बही रक्त की धार
हर -हर की ध्वनी में हाँ--
हर-हर की ध्वनी में सुनते है वह हुँकार पुरानी |
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||

काबुल को फतह किया पर नही मस्जिद तुडवाई
अत्याचारी गौरी की भी गर्दन कहाँ कटाई
अरे विदेशी शत्रु को भी हमने माना भाई
बुझते दीप शिखा की हाँ---
बुझते दीप शिखा की हमको फ़िर से ज्योति जगानी
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||
याद हमें है दुर्गादास और वह सांगा रणधीर
याद हमें है सोमनाथ भी और बुंदेले वीर
याद हमें है हल्दी घाटी और हठी हमीर
याद हमें है हाँ--
याद हमें है रण में जूझी वह हाड़ी महारानी |
केसरिया झंडा सुना रहा है हमको अमर कहानी ||
पु.स्व.श्री तन सिंह जी,बाड़मेर
मार्च 1946 पिलानी

Oct 21, 2008

भगवान की गोद

पु.स्व.श्री तनसिंह जी की कलम से (बदलते द्रश्य)
छविग्रह में जब में पहुँचा तब चित्र शुरू हो गया था देखने वालों की कमी नही थी किंतु उनमे भी अधिक वे लोग थे जो द्रश्य बनकर लोगों की आंखों में छा जा जाते थे,मै तो आत्मविभोर सा हो गया |
चित्रपट चल रहा था और द्रश्य बदल रहे थे |
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राजा उत्तानपाद का पुत्र ध्रुव अपने पिता की गोद के लिए ललचाने लगा किंतु सौतेली माँ सुरुचि की डाह का शिकार बन कर तिरस्कृत हो अपनी माँ सुनीति के पास गया और पूछने लगा,माँ ! क्या मेरे पिता भी है जिनकी गोद में दो क्षण बैठकर स्नेह का एक आध कटाक्ष भी प् सकूँ ?
सुनिती कहती है -हाँ बेटा ! तेरे पिता भगवान है जिनके लिए इस संसार की कोई गोद खाली नही होती उन्हें प्रभु की गोद सदेव आमंत्रित किया करती है | और ध्रुव पड़ा घर से घोर जंगलों में,अपने छिपे हुए पिता की खोज में,अकड़ते हुए तूफान उसे झुकाने आए किंतु स्वयम झुक कर चले गए,उद्दंड और हिंसक जंतु आए उसे भयभीत करने के लिए किंतु स्वयम नम्रतापूर्वक क्षमा मांगते हुए चले गए,घनघोर वर्षा प्रलय का संकल्प लेकर आई उसकी निष्ठा को बहाने,किंतु उसकी निर्दोष और भोली द्रढता को देखकर अपनी झोली से नई उमंगें बाँट कर चली गई,कष्ट और कठिनाईयों ने सांपो की तरह फुफकार कर उसे स्थान भ्रष्टकरना चाहा किंतु वे भी पुचकारते हुए उत्साहित कर चले गए | उसे बालक समझ कर नारद लौट जाने का उपदेश देने आए थे मगर गागर में सागर की निष्ठा देखकर भावमग्न हो अपनी ही वीणा के तार तोड़ कर चले गए |
एक दिन ऐसा उगा कि पहाड़ पिघलने लग गए,नदियों का प्रवाह ठोस होकर सुन्न पड़ गया,उसकी तपस्या के तेज से स्वयं सूर्य निस्तेज होकर व्याकुल हो उढे,स्रष्टि के समस्त व्यापार विस्मयविमुग्ध हो हतप्रभ से ठिठक कर रुक गए,और तो और स्वयम जगतपिता का अडिग सिंहासन डगमगाने लगा,क्षीरसागर वेदना से खौल उठा |ब्रह्मा जी ने वेदपाठ बंद कर भगवान कि और देखा और भगवान अपनी गोदी का आँचल पसार कर गरुड़ की सवारी छोड़ पैदल ही दौडे पड़े - "बेटा ! रहने दे | में तेरा पिता हूँ |मुझे नींद आ गई थी | आ,मेरी गोद में बैठ- देख,यह कब से सुनी पड़ी है |"
परन्तु सुरुचि माता के कहने पर आप मुझे धक्का तो नही देंगे ?
नही बेटा,मेरी गोद में तेरा अटल और अचल स्थान रहेगा,जो जन्म-जन्मान्तरों की तपस्या के बाद योगियों और तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ है |
पुजारी ने अपने पूज्य को ही पुजारी बना कर छोड़ा | मोह रहित भी मोहित हो गए | निराकार साकार हो गए | मायारहित होकर भी जगत पिता की आंखों में स्नेह के बादल उमड़ आए |
ध्रुव अपने घर लौट रहा था और राह के पेड़ पौधे,लता-गुल्म और पशु पक्षी कह रहे थे -"ध्रुव तुम निश्चय ही एक क्षत्रिय हो |"


उपरोक्त लेख क्षत्रिय युवक संघ द्वारा प्रकाशित और स्व.पूज्य तन सिंह जी,बाड़मेर द्वारा लिखित पुस्तक "बदलते द्रश्य" से आप तक पहुचाने व पु.तन सिंह जी की लेखनी से परिचित कराने के उधेश्य से लिखा गया है

Oct 19, 2008

चुनौती


स्व. पु.श्री तन सिंह जी की कलम से
भाग्य और पुरुषार्थ में विवाद उठ खड़ा हुवा उसने कहा में बड़ा दुसरे ने कहा में बड़ा | विवाद ने उग्र रूप धारण कर लिया,यश ने मध्यस्था स्वीकार कर निर्णय देने का वचन दिया दोनों को यश ने आज्ञा दी कि तुम मृत्यु लोक में जावो | दोनों ने बाहें तो चढा ली पर पूछा 'महाराज हम दोनों एक ही जगह जाना चाहते है पर जायें कहाँ ? हमें तो ऐसा कोई दिखाई नही देता ' यश कि आँखे संसार को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हमीर पर आकर ठहर गई |
वह हठ की चुनौती थी |

हमीर ने कहा स्वीकार है |
एक मंगलमय पुन्य प्रभात में हठ कि यहाँ शरणागत वत्सलता ने पुत्री के रूप में जन्म लिया,वह वैभव के मादक हिंडोली में झूलती,आँगन में घुटनों के बल गह्कती,कटि किंकन के घुन्घुरुओ कि रिमझिम के साथ बाल सुलभ मुक्त हास्य के खजाने लुटातीएक दिन सयानी हो गई | स्वयंबर में पिता ने घोषणा कि 'इस अनिन्ध्य सुंदरी को पत्नी बनाने वाले को अपना सब कुछ देना पड़ता है यही इसकी कीमत है |'
वह त्याग कि चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |
त्याग कि परीक्षा आई सोलह श्रंगार से विभूषित,कुलीनता के परिधान धारण कर गंगा कि गति से चलती हुयी शरणागत वत्सलता सुहाग रात्रि के कक्ष में हमीर के समक्ष उपस्थित हुयी -
नाथ ! में में आपकी शरण में हु परन्तु मेरे साथ मेरा सहोदर दुर्भाग्य भी बाहर खड़ा है ,क्या फ़िर भी आप मुझे सनाथ करेंगे ?
वह भाग्य कि चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |

अलाउद्दीन कि फौज का घेरा लगा हुवा था बीच में हमीर कि अटल आन का परिचायक रणथम्भोर का दुर्ग सिर ऊँचा किए इस प्रकार खड़ा था जेसे प्रलय से पूर्व तांडव मुद्रा में भगवान शिव तीसरा नेत्र खोलने के समय कि प्रतीक्षा कर रहें हों,मीरगमरू और मम्मुश कह रहे थे -,इन अदने सिपाहियों के लिया इतना त्याग राजन ! हमारी शरण का मतलब जानते हो ?हजारों वीरों कि जीवन कथाओं का उपसंहार,हजारों ललनाओ कि अतृप्त आकाँक्षाओं का बाल पूर्वक अपहरण,हजारों निर्दोष मानव कलिकाओं को डालियों से तोड़ कर,मसल कर आग में फेंक देना,इन रंगीले महलों के सुनहले यौवन पर अकाल मृत्यु के भीषण अवसाद को डालना |'
वह परिणाम कि चुनौती थी |
हमीर ने कहा स्वीकार है |'
भोज्य सामग्री ने कहा -" में किले में नही रहना चाहती,मुझे विदा करो |"
वह भूख मरी की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |
रणचंडी ने कहा - "में राजपूतों और तुम्हारा बलिदान चाहती हूँ ,इस चहकते हुए आबाद किले को बर्बाद कर प्रलय का मरघट बनाना चाहती हूँ |"
वह मर्त्यु की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |"
शाका ने आकर कहा केसरियां वस्त्र की भेंट दी और कहा ' मुझे पिछले कई वर्षों से बाँके सिपाहियों का साक्षात्कार का अवसर नही मिला | मै जिन्दा रहूँगा तब तक पता नही वे रहेंगे या नही |'
वह शोर्य की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |"
हमीर के हाथो में लोहा बजने लगा अन्तर की प्यास को हाथ पिने लगे | उसके पुरुषार्थ का पानी तलवार में चढ़ने लगा खून की बाढ़ आ गई और उसमे अलाउद्दीन की सेना डूब गई मानवता की सरल -हृदया शान्ति ने हमीर की तलवार पकड़ ली और फ़िर उसे छोड़कर चरणों में गिर पड़ी |
वह विजय की चुनौती थी
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |'
अप्रत्याशित विजय पर हमीर के सिपाही शत्रु सेना के झंडे उछालते,घोडे कुदाते,रणथम्भोर के किले की तरफ जा रहे थे | दुर्भाग्य ने हाथ जोड़कर रह रोक ली - " हे नृप श्रेष्ठ ! मै जन्म जन्म का अभागा हूँ जिस पर प्रसन्न होता हूँ उसका सब कुछ नष्ट हो जाता है में जनता हूँ मेरी शुभकामनायों का परिणाम क्या हुवा करता है परन्तु आप जेसे निस्वार्थी और परोपकारी क्षत्रिय के समक्ष न झुकाना भी कृतध्नता है | आप जेसे पुरुषार्थी मेरा सिर भी फोड़ सकते है,फ़िर भी मेरा अन्तः करण आपकी प्रसंशा के लिए व्याकुल है | क्या में आपकी प्रसंशा प्रकट करूँ ?
वह विधाता की चुनौती थी |
हमीर ने कहा - स्वीकार है |
शत्रु पक्ष के झंडों को उछलते देख दुर्ग के प्रहरी ने परिणाम का अनुमान लगा लिया,बारूद के ढ़ेरी में भगवान का नाम लेकर बती लगादी गई आँख के पलक एक झपके के साथ धरती का पेट फुट गया | चहचहाती जवान जिंदगियां मनहूस मौत में बदल गई | हजारों वीरांगनाओं का अनूठा सोंदर्य जल कर विकराल कुरूपता से एंठ गया, मंद मंद और मंथर मंथर झोंकों द्वारा बीलोडित पालनों में कोलाहल का अबोध शिशु क्षण भर में ही नीरवता का शव बन चुका था |गति और किलोले करते खगव्रन्द ने चहचहाना बंद कर अवसाद में कुरलाना शुरू कर दिया जिंदगी की जुदाई में आकाश रोने लगा | सोती हुयी पराजय मुंह से चादर हटाकर खड़ी हो गई कुमकुम का थाल लेकर हमीर के स्वागत के लिए द्वार पर आई - "प्रभु ! मेरी सौत विजय को तो कोई भी स्वीकार कर सकता है परन्तु मेरे महलो में आप ही दीपक जला सकते है |"
वह साहस की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है|"
हमीर ने देखा,कारवां गुजर चुका है और उसकी खेह भी मिटने को है , बगीचे मुरझा गए है और खुसबू भटक रही है | जीवन के अरमान मिटटी में धूमिल पड़ गए है और उनकी मनोहर स्मर्तियाँ किसी वैरागी की ठोकर की प्रतीक्षा कर रही है,म्रत्यु ने आकर कहा -नर श्रेष्ठ ! अब मेरी ही गोद तुम्हारे लिए खाली है |
वह निर्भीकता की चुनौती थी |
हमीर ने कहा -"स्वीकार है |"
महाकाल के मन्दिर में हमीर ने हाथों अपना अनमोल मस्तक काट कर चढा दिया | पुजारी का लौकिक जीवन समाप्त हो गया |परन्तु उसके यश्वी हठ द्वारा स्थापित अलौकिक प्रतिष्ठा ने इतिहास से पूछा -"क्या ऐसा कोई हुवा है ? " फ़िर उसने लुटे हुए वर्तमान की गोदी में खेलते हुए भविष्य से भी पूछा -"क्या ऐसा भी कोई होगा ? प्रश्न अब भी जिघासु है और उत्तर निरुत्तर | रणथम्भोर लुटी हुयी कहानी का सुहाग अभी तक लौट कर नही आया, उसका वैधव्य बीते दिनों की याद में आंसू बहा रहा है |
यह शरणागत वत्सलता की चुनौती है |
परन्तु इस चुनौती को कोंन स्वीकार करे ? हमीर की आत्मा स्वर्ग पहुँच गई,फ़िर भी गवाक्षों में लौट कर आज भी कहती है -"स्वीकार है |"
यश पुरुषार्थ की तरफ हो गया | भाग्य का मुंह उतर गया | नई पीढी आज भी पूछती है -
"सिंह गमन सत्पुरुष वचन,कदली फ़लै इक बार |
तिरया तेल हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार ||
जिसके लिए यह दोहा कहा गया वह रणथम्भोर का हठीला कौन था ? तब अतीत के पन्ने फड फड़ा कर उतर देतें है -"वह भी एक क्षत्रिय था |"
चित्रपट चल रहा था द्रश्य बदलते जा रहे थे |
उपरोक्त लेख क्षत्रिय युवक संघ द्वारा प्रकाशित और स्व.पूज्य तन सिंह जी,बाड़मेर द्वारा लिखित पुस्तक "बदलते द्रश्य" से आप तक पहुचाने व पु.तन सिंह जी की लेखनी से परिचित कराने के उधेश्य से लिखा गया है

Oct 10, 2008

महाराव शेखा जी की 576 वीं जयंती

जयपुर,गुरुवार :शेखावाटी और शेखावत वंश के प्रवर्तक वीर वर महाराव शेखा जी की 576 वीं जयंती महाराव शेखा सर्किल सीकर रोड पर सांप्रदायिक सदभाव व सामजिक एकता दिवस के रूप में मनाई गई,समारोह की शुरुआत महाराव शेखा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष जालम सिंह आसपुर ने की, भगवान सिंह जी,प्रताप फाउन्डेशन के महावीर सिंह सरवडी,कांग्रेस के पूर्व विधायक जीवराज सिंह ,संपत सिंह धमोरा ,पार्षद भवंर कँवर व भवानी निकेतन के सचिव दिलीप सिंह छापोली ने समारोह को संबोधित किया | इस अवसर पर भजनों की आकर्षक प्रस्तुति भी की गई |

Sep 25, 2008

दुर्घटना में करणी सेना नेत्री की मौत

Bhupendra Singh, Udaipur Kiran

जयपुर। शाहपुरा स्थित भाबरू में राजपूत करणी सेना के दिल्ली जा रहे पदाधिकारियों की कार साइकिल सवार को बचाने के प्रयास में डिवाइडर से टकरा पलट गई। दुर्घटना में कार सवार राजपूत करणी सेना (महिला मोर्चा) की प्रदेश अध्यक्ष प्रेम कंवर शेखावत की मौत हो गई और प्रदेश अध्यक्ष अजीत सिंह मामडोली, संगठन प्रभारी विक्रम सिंह व भंवर सिंह घायल हो गए।

जानकारी के मुताबिक बुधवार अपराह्न सभी पदाधिकारी अजीत सिंह की कार से राजपूत करणी सेना के प्रधान संरक्षक लोकेन्द्र सिंह कालवी से मिलने दिल्ली जा रहे थे। शाम 4 बजे भाबरू के पास सडक पर अचानक एक साइकिल सवार आ गया। उसको बचाने के प्रयास में कार अनियंत्रित हो गई और डिवाइडर से टकरा पलट गई।

सूचना पर पहुंची पुलिस ने घायलों को शाहपुरा अस्पताल पहुंचाया। हालत गम्भीर होने पर प्रेम कंवर व विक्रम सिंह को सवाई मानसिंह अस्पताल रैफर कर दिया अन्य को प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी। एसएमएस अस्पताल में शाम को ही प्रेम कंवर की मौत हो गई।

वहीं विक्रम सिंह की हालत गम्भीर है। हादसे की सूचना मिलने पर देर रात कालवी भी जयपुर के लिए रवाना हो गए थे। मरुधर महिला विकास संस्थान सचिव देवी सिंह नरूका ने बताया कि गुरुवार दोपहर 12 बजे रामनगर (सोढाला) शमशान घाट पर प्रेम कंवर का अंतिम संस्कार किया जाएगा।

सीएम को शोक

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर सडक हादसे का शिकार बनीं श्रीमती प्रेम कंवर शेखावत के निधन पर शोक प्रकट किया है। उन्होंने अपने संदेश में कहा है कि श्रीमती प्रेम कंवर राजपूत समाज की प्रखर महिला थीं और उन्होंने राज्य सरकार के महिला सशक्तीकरण अभियान में योगदान दिया था।

Sep 16, 2008

राजस्थानी ग्रन्थागार

राजस्थानी ग्रन्थागार ,जोधपुर एक प्रकाशक है जहाँ राजपूत इतिहास की प्राय: सभी पुस्तकें हिन्दी व अंग्रेजी मिल जाती है |पुस्तकों व लेखकों की जानकारी के लिए इस पुस्तक भंडार से "पुस्तक सुची" मंगवाई जा सकती है तत्पश्चात अपनी चाहत व पसंद की कोई भी पुस्तक डाक द्वारा मंगवाई जा सकती है | यहाँ प्रायः सभी राजपूत वंशों के अलावा जाट इतिहास व अन्य विषयों जेसे राजस्थानी लोक गीत ,कहावतें ,दोहे सोरठे ,चित्रकला ,कहानियाँ ,उप्न्याश ,संत साहित्य ,राजस्थानी सब्दकोश ,निबंध साहित्य ,लोक साहित्य के साथ विभिन्न एतिहासिक पुस्तकें उपलब्ध है
पता :- राजस्थानी ग्रन्थागार
सोजती गेट , जोधपुर-342001
phone-9414243804 Email - info@rgbooks.net

Sep 15, 2008

शेखावाटी का राजनैतिक इतिहास

श्री रघुनाथ सिंह जी शेखावत ,काली पहाड़ी द्वारा लिखित " शेखावाटी का राजनैतिक इतिहास " एक अच्छी पुस्तक है जिसमे शेखावाटी की आदि काल से लेकर अब तक की राजनैतिक स्थिति , समय - समय पर इस भू भाग पर शासन करने वाले शासकों व उनके वंसजों एवम उनके द्वारा शासित ठिकानो के इतिहास पर अच्छा प्रकाश डाला गया है | पुस्तक के कुल 52 अध्याय व 11 परिशिस्ट है जिनमे इस प्रदेश की आदि काल से लेकर महाभारत तक की स्थिति का वर्णन है | इसके साथ ही शेखावाटी पर शासन करने वाले प्राचीन राजवंशों ,कायमखानी नबाबों व महाराव शेखा जी के 12 पुत्रों से चली उनकी विविध शाखा - उपशाखाओं सहित उनके ठिकानो व वंशजों का क्रमबद्ध विवरण है जो संभवत : इस पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है जिसमे प्रायः सभी शेखावत शाखाओं प्रशाखाओं का व उनके ठिकानो का वर्गीकृत रूप से एकत्र परिचय मिल जाता है साथ ही शेखावत शासकों का केन्द्रीय सत्ता व जयपुर के शासकों के साथ सम्बन्ध ,शेखावाटी के प्रशिध युद्ध ,स्वतन्त्रता संग्राम में शेखावाटी का योगदान व शेखावाटी में किसान -जागीरदार संघर्ष आदि पर अच्छी जानकारी है जो इतिहास में रूचि रखने वालों के व इतिहास के शोध कर्ताओं के लिए उपयोगी है |

७५० प्रष्टों की यह पुस्तक " राजस्थानी ग्रंथागार , सोजती गेट जोधपुर फोन न. 9414243804 पर उपलब्ध है

कांग्रेस के खिलाफ हरियाणा के राजपूत एकजुट

भिवानी | राजपूत समुदाय की ३६ बिरादरियों की यहाँ खाप पंचायत में राज्य में कांग्रेस का विरोध करने का फेसला लिया गया | केरु गावं में हुई इस महापंचायत के बाद पारित प्रस्ताव में कहा गया कि राज्य सरकार ने समुदाय के विकास और कल्याण के लिए कुछ भी नही किया | समुदाय के नेताओं ने कहा कि सत्ताधारी नेताओं के इशारे पर राज्य में राजपूतों के खिलाफ झूटे मामले दर्ज किए गए | हरियाणा राजपूत एसोसिअशन के अध्यक्ष रामफल सिंह ने लोगों का आव्हान करते हुए कहा कि वे किसी भी राजनेता को भाव न दें | हरियाणा राजपूत सभा के अध्यक्ष गजराज सिंह ने कहा कि हरियाणा कि कांग्रेस सरकार द्वारा किए जा रहे अन्याय के साथ लडाई करने के लिए २१ सदस्यीय कमेटी गठित कि गई | उन्होंने आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मुहतोड़ जबाब दिया जाएगा |राज्य कि जनसँख्या में कुल तेरह फीसदी राजपूत है |

Sep 7, 2008

अरे घास री रोटी ही

महाराणा प्रताप पर कन्हेया लाल सेठिया कि रचना "पाथल और पीथल "
video

Aug 23, 2008

आपकी वंशावली आस्ट्रेलियन वेबसाइट पर

जी हां आस्ट्रेलिया की एक वेबसाइट पर आप राजपूत बंधु अपने परिवार की वंशावली देख सकते है जो अभी तक रावों , बङवो, बहिभाटों व हरिद्वार के पंडितों के पास ही उपलब्ध होती थी , लेकिन अब यह आपको इंटरनेट पर आस्ट्रेलिया की वेबसाइट इंडियन प्रिंसली स्टेटस पर उपलब्ध हे जहाँ आप देख सकते है  व अपने परिवार की वंशावली अपडेट करा  सकते है |
 
वेबसाइट खुलते ही a to z तक लिखा है , अपने ठिकाने , गाँव आदि का पहले अक्षर के हिसाब से जैसे khandela के लिए आप k पर क्लिक करें | k से शुरू होने वाले ठिकानो की सूचि खुलेगी अब आप वहाँ अपने ठिकाने का नाम ढूंढ़ कर उस पर क्लिक करे आप के सामने होगी  पुरी जानकारी |
यदि जानकारी नही है  तो पेज के नीचे corrections, additions, suggestions पर क्लिक करे व अपनी जानकारी अपडेट करें |

उदाहरण के लिए मेरी वंशावली देखने के लिए इस पर क्लिक करें
   

Aug 8, 2008

राजपूत कौन

विविधायुध वान रखे नितही , रण से खुश राजपूत वही |
सब लोगन के भय टारन को ,अरी तस्कर दुष्टन मारन को |
रहना न चहे पर के वश में ,न गिरे त्रिय जीवन के रस में |
जिसके उर में शान्ति रही ,नय निति रखे राजपूत वही |
जननी भगनी सम अन्य त्रिया, गिन के न कभी व्यभिचार किया |
यदि आवत काल क्रपान गहि ,भयभीत न हो राजपूत वही |
धर्तिवान से धीर समीप रखे , निज चाकर खवासन को निरखे |
जिसने न रिपु ललकार सही , राजपूत रखे राजपूत वही |
पर कष्टं में पड़ के हरता ,निज देश सुरक्षण जो करता |
जिसने मुख से कही न नहीं ,प्रण पालत सो राजपूत वही |
अज्ञात कवि
(श्री सोभाग्य सिंह शेखावत के संकलन से )
Rajul Shekhawat

मेवाड के आराध्‍य सगसजी बावजी

Bhupendra Singh Chundawat
बलिदानों की धरती मेवाड में वीरों के पूजन की परंपरा रही है। उदयपुर में सगसजी सुल्तानसिंहजी से लेकर अन्य कई क्षत्रिय वीरों को सगसजी के रूप में पूजा जाता है। ये लोक देवता के रूप में मान्य हैं। श्रावण के शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार को एक साथ सगसजी के जन्मोत्सव मनाया जाता है। सगसजी के स्थान आस्था के केंद्र तो हैं ही, मानवीय स्वार्र्थों, धोखाधडी, षडयंत्रों बिना सोचे-समझे किए गए जानलेवा फैसलों के घातक परिणामों से नसीहत लेने की बात भी कहते हैं। उदयपुर में सगसजी का सबसे प्राचीन व बड़ा स्थान सर्वऋतु विलास है। यहां सगसजी सुल्तानसिंह हैं। वे महाराणा राजसिंह (1652-1682) के ज्येष्ठ पुत्र थे जिनकी झूठी शिकायत, एक षडयंत्र के कारण खुद राजसिंह ने ही उनकी हत्या कर दी। सर्वऋतुविलास में प्रत्यक्ष में तो सुल्तानसिंह ही सगसजी के रूप में पूजे जाते हैं, किन्त अप्रत्यक्ष रूप में तीन भाई बिराजित है। इन तीनों के चबूतरे महासतिया में पास-पास बने हैं। सगसजी सरदारसिंह की स्थापना मंडी स्थित जोगपोल के दाताभवन में है। गुलाबबाग स्थित बावड़ी के समीप विराजित अर्जुनसिंह महाराणा जयसिंह के साले थे जिन्हें उदयपुर की एक गणगौर सवारी के दौरान नाव में शराब के साथ जहर देकर षडयंत्रपूर्वक मारा गया। करजाली हाउस स्थित स्थानक के सगसजी भैरूसिंह
की गोखड़े से गिराकर हत्या की गई। कंवरपदा स्कूल स्थित स्थानक के सगसजी कारोई ठिकाने से संबध्द हैं, जिनकी कवंरपदा की हवेली में धोखे से हत्या की गई। वारियों की घाटी स्थित रणसिंह, अस्थल मंदिर के पीछे वाले सगसजी, आयड़ तथा रामदास कॉलोनी वाले सगसजी भी मेवाड़ के मान्य ठिकानों से जुड़े हुए हैं। पीछोली स्थित सगसजी सर्वऋतुविलास वाले सगसजी है। सगसजी शब्द सगत या शख्स का तद्भव रूप है। शौर्य एवं शक्ति से जीवंत प्रतीक होने के कारण ही नाम सगत हुआ। सगत का अर्थ शक्ति से है। आदरसूचक 'जी' लगाने के कारण ही इन्हें सगसजी कहा जाने लगा। वे लोकदेव के रूप में लोक जीवन के दु:ख-दर्दों का निवारण करते हुए कल्याण कार्यों में लगे हुए हैं।

Jul 29, 2008

समर चढै़ काठां चढै़, रहै पीव रै साथ

समर चढै़ काठां चढै़, रहै पीव रै साथ।
एक गुणा नर सूरमा, तिगुण गुणा तमय जात॥

चन्द ऊजाळै एक पक, बीजै पख अंधिकार।
बळ दुंहु पाख उजाळिया, चन्द्रमुखी बळिहार॥

खाटी कुळ रो खोयणां, नेपै घर घर नींद।
रसा कंवारी रावतां, वीर तिको ही वींद॥

ऊंघ न आवै त्रण जणां, कामण कहीं किणांह।
उकडू थटां बहुरिणां, बैर खटक्के ज्यांह॥

एक्कर वन वसंतड़ा, एकर अंतर काय।
सिंघ कवड्डी ना लहै, गँवर लक्ख विकाय॥

संकलित काव्य Rajul Shekhawat

~*~ जय चितोड़ ~*~

Rajul shekhawat
मांणक सूं मूंगी घणी जुडै़ न हीरां जोड़।
पन्नौं न पावै पांतने रज थारी चित्तौड़॥
आवै न सोनौं ऒळ म्हं हुवे न चांदी होड़।
रगत धाप मूंघी रही माटी गढ़ चित्तोड़॥
दान जगन तप तेज हूं बाजिया तीर्थ बहोड़।
तूं तीरथ तेगां तणौ बलिदानी चित्तोड़॥
बड़तां पाड़ळ पोळ में मम् झुकियौ माथोह।
चित्रांगद रा चित्रगढ़ नम् नम् करुं नमोह॥
जठै झड़या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।
कमधज कट बणिया कमंध गढ थारै चित्तोड़॥
गढला भारत देस रा जुडै़ न थारी जोड़।
इक चित्तोड़ थां उपरां गढळा वारुं क्रोड़॥

संकलित काव्य

Jul 26, 2008

~*~ राजपूतों से अर्ज करूँ ~*~

Rajul Shekhawat


तन-मन से है नारा मेरा , बोलो जय भवानी |

धिक्कार है उन राजपूतों को ,खोदी जिन्होंने अपनी जवानी ||

तन-मन से है नारा मेरा , बोलो जय भवानी |

कायर नही आज हम , दुनिया को यह आज बतानी ||

हम जन रक्षक रहे सदा से , क्षात्र धर्म का यह नारा है |

दुष्टों को हम मार भगाए , यही फर्ज हमारा है ||

कठिनाइयों के बीहड़ पथो में , हमने जीवन गुजारा है |

जन हित की रक्षा खातिर , दुश्मन को ललकारा है ||

त्याग बलिदान के पुंज हम है , सबको यह बात बतानी |

तन मन से है नारा मेरा , बोलो जय माँ भवानी ||

|| जय माँ भवानी ||





Jul 25, 2008

महाराणा प्रताप के बारे में एक भ्रांती

Bhupendra Singh Chundawat

राजपूताने में यह जनश्रुति है कि एक दिन बादशाह ने बीकानेर के राजा रायमसिंह के छोटे भाई पृथ्वीराज से, जो एक अच्छा कवि था, कहा कि राणा प्रताप अब हमें बादशाह कहने लग गए है और हमारी अधीनता स्वीकार करने पर उतारू हो गए हैं। इसी पर उसने निवेदन किया कि यह खबर झूठी है। बादशाह ने कहा कि तुम सही खबर मंगलवाकर बताओ। तब पृथ्वीराज ने नीचे लिखे हुए दो दोहे बनाकर महाराणा प्रताप के पास भेजे-
पातल जो पतसाह, बोलै मुख हूंतां बयण।
हिमर पछम दिस मांह, ऊगे राव उत॥
पटकूं मूंछां पाण, के पटकूं निज जन करद।
दीजे लिख दीवाण, इण दो महली बात इक॥
आशय : महाराणा प्रतापसिंह यदि अकबर को अपने मुख से बादशाह कहें तो कश्यप का पुत्र (सूर्य) पश्चिम में उग जावे अर्थात जैसे सूर्य का पश्चिम में उदय होना सर्वथा असंभव है वैसे ही आप के मुख से बादशाह शब्द का निकलना भी असंभव है। हे दीवाण (महाराणा) मैं अपनी मूंछों पर ताव दूं अथवा अपनी तलवार का अपने ही शरीर पर प्रहार करूं, इन दो में से एक बात लिख दीजिये।
इन दोहों का उत्तर महाराणा ने इस प्रकार दिया-
तुरक कहासी मुख पतौ, इण तन सूं इकलिंग।
ऊगै जांही ऊगसी, प्राची बीच पतंग॥
खुसी हूंत पीथल कमध, पटको मूंछा पाण।
पछटण है जेतै पतौ, कलमाँ तिस केवाण॥
सांग मूंड सहसी सको, समजस जहर स्वाद।
भड़ पीथल जीतो भलां, बैण तुरब सूं बाद॥
आशय : भगवान एकलिंगजी इस शरीर से तो बादशाह को तुर्क ही कहलावेंगे और सूर्य का उदय जहां होता है वहां ही पूर्व दिशा में होता रहेगा। हे वीर राठौड़ पृथ्वीराज जब तक प्रतापसिंह की तलवार यवनों के सिर पर है तब तक आप अपनी मूछों पर खुशी से ताव देते रहिये। राणा सिर पर सांग का प्रहार सहेगा, क्योंकि अपने बराबरवाले का यश जहर के समान कटु होता है। हे वीर पृथ्वीराज तुर्क के साथ के वचनरूपी
विवाद में आप भलीभांति विजयी हों।
यह उत्तर पाकर पृथ्वीराज बहुत ही प्रसन्न हुआ और महाराणा की प्रशंसा में उसका उत्साह बढ़ाने के लिये उसने नीचे लिखा हुआ गीत लिख भेजा-
नर जेथ निमाणा निलजी नारी,
अकबर गाहक बट अबट॥
चौहटे तिण जायर चीतोड़ो,
बेचै किम रजपूत बट॥
रोजायतां तणें नवरोजे,
जेथ मसाणा जणो जाण॥
हींदू नाथ दिलीचे हाटे,
पतो न खरचै खत्रीपण॥
परपंच लाज दीठ नह व्यापण,
खोटो लाभ अलाभ खरो॥
रज बेचबा न आवै राणो,
हाटे मीर हमीर हरो॥
पेखे आपतणा पुरसोतम,
रह अणियाल तणैं बळ राण॥
खत्र बेचिया अनेक खत्रियां,
खत्रवट थिर राखी खुम्माण॥
जासी हाट बात रहसी जग,
अकबर ठग जासी एकार॥
है राख्यो खत्री धरम राणै,
सारा ले बरतो संसार॥
आशय : जहां पर मानहीन पुरूष और निर्लज स्त्रियां है और जैसा चाहिये वैसा ग्राहक अकबर है, उस बाजार में जाकर चित्तौड़ का स्वामी रजपूती को कैसे बचेगा। मुसलमानों के नौरोज में प्रत्येक व्यक्ति लूट गया, परन्तु हिन्दुओं का पति प्रतापसिंह दिल्ली के उस बाजार में अपने क्षत्रियपन को नहीं बेचता। हम्मीर का वंशधर अकबर की लाानक दृष्टि को अपने ऊपर नहीं पड़ने देता और पराधीनता के सुख के लाभ
को बुरा तथा अलाभ को अच्छा समझकर बादशाही दुकान पर राजपूती बेचने के लिए कदापि नहीं आता। अपने पुरुखाओं के उत्तमर् कत्तव्य देखते हुए आप ने भाले के बल से क्षत्रिय धर्म को अचल रक्खा, जबकि अन्य क्षत्रियों ने अपने क्षत्रियत्व को बेच डाला। अकबररूपी ठग भी एक दिन इस संसार से चला जाएगा और उसकी यह हाट भी उठ जाएगी, परन्तु संसार में यह बात अमर रह जायेगी कि क्षत्रियों के धर्म में रहकर
उस धर्म को केवल राणा प्रतापसिंह ने ही निभाया। अब पृथ्वी भर में सबको उचित है कि उस क्षत्रियत्व को अपने बर्ताव में लावें अर्थात राणा प्रतापसिंह की भांति आपत्ति भोग कर भी पुरुषार्थ से धर्म की रक्षा करें।

Jul 21, 2008

ज्रयपुर के मेजर भानुप्रतापसिंह शहीद

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
जम्मू.एलोसी के समीप आतंकवादियों से मुठभेड़ में आर्मी का एक मेजर और जम्मू-कश्मीर पुलिस का एक सिपाही शहीद हो गए हैं। वहीं, तीन अन्य सिपाही गंभीर रूप से घायल हुए हैं। मेजर का नाम भानू प्रताप था और वह श्याम नगर, जयपुर का रहने वाला था। मेजर भानू प्रताप इन दिनों 43 आरआर में डेपुटेशन पर थे। शहादत पाने वाले जम्मू-कश्मीर पुलिस के सिपाही का नाम संजीव कुमार था।
मिली जानकारी के मुताबिक राजौरी जिले के थानामंडी क्षेत्र में शहादरा शरीफ के समीप आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी। इस पर 43 आरआर और जेएंडके पुलिस के जवानों ने शनिवार रात को इस क्षेत्र को घेर लिया। वहां जंगल में एक पुराने मकान में आतंकवादी छुपे हुए थे।जैसे ही जवानों ने मकान का दरवाजा तोड़ा, भीतर से आतंकवादियों ने जबरदस्त फायरिंग शुरू कर दी। मेजर भानू प्रताप और संजीव कुमार की मौके पर ही मौत हो गई। अभी बाकी जवान कुछ सोच पाते इससे पहले ही आतंकवादियों ने मकान के भीतर से एक ग्रेनेड फैंक दिया जिससे अफरतफरी मच गई। इस बीच आतंकवादी वहां से फरार हो गए। इस हमले में तीन जवान जावेद जाफर, ज्ञान प्रकाश और रविंद्र सिंह भी गंभीर रूप से घायल हो गए। हालांकि सुरक्षा बलों ने रात को ही इस पूरे क्षेत्र को घेर कर तलाशी अभियान शुरू कर दिया था लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

Jul 20, 2008

प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
मेवाड वीर सपूत महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 154॰ को हुआ। उस समय ज्येष्ठ शुक्ला तीज संवत् 1597 का समय मुगलों का आंतक व अत्याचारों का युग चल रहा था। चारों तरफ मेवाड में मानवता रो रही थी। लोग अपने-अपने धर्म व कर्म से हताश हो गए थे, चारों ओर घोर अंधकार और निराशा के बादल छा चुके थे। बडे-बडे शक्तिशाली राजा-महाराजाओं तक ने उस समय के मुगल शासकों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। जन-जन को निराशा हो चुकी थी मूक रूप से जन-जन अपने जीवन रक्षक से रक्षा की आशाएंे संजोये बैठे हुए देख रहे थे। ऐसे विकट दासता के समय में जन-जन में चेतना जाग्रत करने व वीरता की भावना भरने तथा मेवाड भूमि की रक्षा करने के लिए परमात्मा ने इस वीरभूमि एक देशभक्त सपूत दिया जिसका नाम था। महाराणा प्रताप मेवाड भूमि का कौन जन तानता था कि आगे चलकर यही वीर सपूत प्रताप मेवाड की स्वतंत्रता का अग्रदूत बनकर मेवाड की रक्षा व मान-सम्मान बनाये रखने के लिये जंगलों की राहों में घुमता फिरेगा। इसके जन्म पर ऐसा प्रतीत हुआ मानों सृष्टि सरोवर में मानवता का शतदल खिल उठा हो, मानो पीडित, उपेक्षित, दासता वद्व जन-जन की निराशा आशा का सम्बल पा गई हो। पहली सन्तान होने के कारण उदयसिंह ने उसके बडे लाड प्यार से पाल पोषकर बडा किया तथा माता-पिता द्वारा इसको वीरता की शिक्षा मिली। बचपन में ही इसको अस्त्रों-शस्त्रों से खेलने तथा शिकार करने का बडा शौक था। इन पर मेवाड की जनता अपना बलिदान दकने तथा सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर थी अपने पिता की मृत्यु के बाद मेवाड राज्य का उत्तराधिकारी होकर इन्होंने राजसिंहासन सुशोभित किया। इस समय दिल्ली में सम्राट अकबर राज्य कर रहा था। वह सभी राजा महाराजाओं के राज्यों को अपने अधीन करके पूरे भारत पर मुगल साम्राज्य का ध्वज फहराना चाहता था। परन्तु इस देशभक्त वीर ने मेवाड भूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अपने को तथा अपने पूरे परिवार को जंगल में भटकते रहने को मजबूर कर संकट झोलकर भी अकबर की अधीनता सम्बन्धी बातों को कभी स्वीकार नहीं किया और समय-समय पर मुगल सेना व मुगलशासकों से लोहा लेते रहे। मुगलों को लोहे के चने चबवाते रहे। परन्तु मेवाड भूमि के एक भी कण को गुलामी की जंजीरों में जकडने नहीं दिया। इन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड आजाद नहीं होगा, तब तक महलो को छोडकर जंगलों में निवास करूंगा। सोने के पलंग को छोडकर तृण शैया पर शयन करूंगा। स्वादिष्ट भोजन को त्यागकर जंगली कन्द मूलों का आहार ग्रहण करूंगा। चांदी के बरतनों को छोडकर वृक्षों की पत्तियों से बनी पत्तलों में भोजन करूंगा। परन्तु जीते जी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं करूंगा और अपने प्रण की प्रतिज्ञा का पालन करता रहूंगा। अकबर तथा महाराणा प्रताप के बीच 1576 में हल्दीघाटी नामक स्थान पर युद्ध हुआ वह अविस्मरणीय है। इस युद्ध में प्रताप ने अपनी वीरता से शत्रु सेना के दांत खट्टे कर दिए तथा अपनी वीरता का अपूर्व व अनोखा परिचय दिया। सैकडों मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। परन्तु भाग्य की विडम्बना इस युद्ध का कोई परिणाम न निकल सका। उसके कारण इनके मन में
निराश की भावना जाग्रत हो गई और धन के अभाव के कारण चिंतित होने लगे। ऐसे समय में भामाशाह ने अपना धन देकर इनको सहायता देकर अपना नाम भामाशाह दानी बनाया। इस तरह महाराणा प्रताप अपने सम्पूर्ण जीवन को संघर्ष में बिताकर मुसीबतों का सामना करके संकटों को झेलते रहे, लेकिन अन्याय के पथ पर कभी आगे नहीं बढे। जिस तरह महाराणा प्रताप ने अपने देश की आन-बान-मान आदि की रक्षा के लिए अपने पूरे जीवन को बलिदान कर दिया, उसी तरह हम भी अपने देश की रक्षा तथा सुरक्षा के लिये बलिदान व त्याग की भावना अपनावे।

Jul 19, 2008

शौर्य शक्र विजेता शहीद सुबेदार गुमान सिंह बैजूपाडा की मूर्ति का अनावरण

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
शहीद सुबेदार गुमान सिंह बैजूपाडा की प्रतिमा का अनावरण बुधवार दौसा में आबकारी एवं पर्यटन मंत्री श्री देवी सिंह भाटी ने किया गया। प्रतिमा अनावरण के बाद उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुये श्री भाटी ने कहा कि शहीद गुमान सिंह ने शाहदत देकर न केवल अपने गाᆳव बैजूपाडा का बल्कि पूरे प्रदेश और राष्टᆭ का सिर गौरव से マᆳचा कर दिया। उन्होंने राजस्थान के वीर सपूतों की हजारों साल पुरानी परम्परा को शहीद गुमान सिंह ने निभाया है, जिसके लिए समाज व देश चिरकाल तक उन्हें याद रखेगा। आबकारी एवं पर्यटन मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार वीर शहीदों के सम्मान में कोई कसर नहीं छोडे+गी तथा शहीदों के परिवार को नियमानुसार सहायता प्रदान की जा रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश के विकास के लिए संकल्पबद्ध है। देश के पढे - लिखे बच्चों को पढाई के लायक काम नहीं मिलने पर कई बार वे असामाजिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते है। जिसे रोकने के लिए राज्य सरकार बेरोजगार युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर जुटाने के लिए प्रयासरत है। श्री भाटी ने कहा कि राज्य सरकार ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए हर सभंव कोशिश कर रही है। समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष श्रीमती सरोज कॅवर ने कहा कि यह वीर धरती महान है, जिसने शहीद गुमान सिंह जैसे बहादुरों को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि शहीदों की माᆳ बहुत भाग्यशाली होती है। मातृभूमि की रक्षा के लिए जान न्यौछावर करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। पर्यटन मंत्राी ने शहीद गुमान सिंह की माᆳ तथा पत्नी को शॉल भेंट कर उनका सम्मान किया।
उल्लेखनीय है कि २ जुलाई २००५ को जम्मू कश्मीर राज्य के राजोरी सैक्टर में थाना मण्डी इलाकें में आतंकवादियों से मुठभेड में मातश् भूमि की रक्षा के पुनीत कार्य में शहीद हो गये थे। बीसवीं राष्टᆭीय राइफल्स बेल्ट नम्बर ४३ धारक श्री गुमान सिंह को २१ मार्च २००७ मरणों परान्त राष्टपति द्वारा शौर्य चव् प्रदान किया गया जिसे इनकी धर्मपत्नी श्रीमती रमादेवी ने ग्रहण किया था।

Jul 15, 2008

शहीद मेहताबसिंह की राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि

भूपेंद्र सिंह चुण्डावत, उदयपुर किरण
ऱ्णबाकुंरों की धरती सीकर का एक और लाल देश के लिए शहीद हो गया। शहीद मेहताबसिंह की 10 जुलाई को जम्‍मूत्रकश्‍मीर के जनरल एरिया में शहीद हो गए थे। वे 13 राजरिफ के 44 वर्षीय शहीद सूबेदार मेहताब सिंह की रविवार को उनके पैतृक गांव बृजपुरा में राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि की गई। रविवार सुबह शव पहुंचा तो बृजपुरा सहित निकटवर्ती गांवों में शोक की लहर दौड़ गई। जब तक सूरज चांद रहेगा-मेहताब तेरा नाम रहेगा, भारत माता की जय, शहीदों की जय... जैसे गगनभेदी नारे गूंज उठे। इससे पहले जयपुर से आए 12 ग्रेनेडियर व राजस्थान पुलिस के जवानों ने कैप्टन राहुल कोहली की अगुवाई में शहीद की पार्थिव देह को सम्मान स्वरूप तिरंगा ओढ़ाया और बिगुल बजाकर सलामी दी। दोपहर 12. 30 बजे शहीद की अंतिम यात्रा शुरू हुई। शहीद की अर्थी को सेना के जवानों ने कंधा दिया। शहीद के येष्ठ पुत् संदीप व प्रदीप ने मुखाग्नि दी। उनकी तीन बेटियां व दो पुत्र है। उन्होंने दानोें बेटियों की शादी मई 2008 में ही की थी। एक पुत्र नेवी में है। शहीद का पूरा परिवार सेना से जुड़ा हुआ है। शहीद के चारों भाइयों में से तीन सेना से रिटायर्ड हैं तथा एक भाई सेवारत है।

Jul 12, 2008

क्षत्रिय

क्षत्रियों की छतर छायाँ में ,क्षत्राणियों का भी नाम है |
और  क्षत्रियों की छायाँ में ही ,पुरा हिंदुस्तान है |
क्षत्रिय ही सत्यवादी हे,और क्षत्रिय ही राम है  |
दुनिया के लिए क्षत्रिय ही,हिंदुस्तान में घनश्याम है |
हर प्राणी के लिए रहा,शिवा का कैसा बलिदान है |
सुना नही क्या,हिंदुस्तान जानता,और सभी नौजवान है |
रजशिव ने राजपूतों पर किया अहसान है |
मांस पक्षी के लिए दिया ,क्षत्रियों ने भी दान है |
राणा ने जान देदी परहित,हर राजपूतों की शान है |
प्रथ्वी की जान लेली धोखे से,यह क्षत्रियों का अपमान है |
अंग्रेजों ने हमारे साथ,किया कितना घ्रणित कम है |
लक्ष्मी सी माता को लेली,और लेली हमारी जान है |
हिन्दुओं की लाज रखाने,हमने देदी अपनी जान है |
धन्य-धन्य सबने कही पर,आज कहीं न हमारा नाम है |
भडुओं की फिल्मों में देखो,राजपूतों का नाम कितना बदनाम है |
माँ है उनकी वैश्याऔर वो करते हीरो का कम है |
हिंदुस्तान की फिल्मों में,क्यो राजपूत ही बदनाम है |
ब्रह्मण वैश्य शुद्र तीनो ने,किया कही उपकार का काम है |
यदि किया कभी कुछ है तो,उसमे राजपूतों का पुरा योगदान है |
अमरसिंघ राठौर,महाराणा प्रताप,और राव शेखा यह क्षत्रियों के नाम है ||
.                "जय क्षात्र धर्म"    
                                                                                                                          संकलन : राजुल शेखावत

Jul 11, 2008

उदयपुर किरण अब क्षत्रिय वेबसाइट पर


उदयपुर से भूपेंद्र सिंह चुण्डावत द्वारा प्रकाशित क्षत्रिय अख़बार उदयपुर किरण अब क्षत्रिय वेब साईट
पर उपलब्द है सभी क्षत्रिय महानुभाव क्षत्रिय वेबसाइट पर जाकर उदयपुर किरण अख़बार
डाउनलोड कर पढ़ सकते है
For Download udaipur Kiran click to http://rajputworld.co.in

Jul 9, 2008

क्षत्रिय समाज में शोक की लहर

जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ महादेव की सुरक्षा व्यवस्था में तैनाती के दौरान दिवंगत हुए बीएसएफ जवान स्वदेशसिंह चूंडावत (मान्यास) की पार्थिव देह बुधवार दोपहर महाराणा प्रताप एयरपोर्ट लाई जाएगी। एयरपोर्ट पर अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी चूंडावत को श्रध्दांजलि देंगे। महासभा के जिलाध्यक्ष चंद्रगुप्तसिंह चौहान के अनुसार एयरपोर्ट पर श्रध्दांजलि के बाद स्वदेशसिंह व ऋतुकंवर की पार्थिव देह पैतृक गांव मान्यास (राशमी) ले जाई जाएंगी। वहां सैनिक सम्मान से अंत्येष्टि की जाएगी। उन्होंने बताया कि स्वदेशसिंह के निधन की खबर मिलते ही क्षत्रिय समाज में शोक की लहर दौड़ गई।

बीएसएफ कमांडेंट स्वदेशसिंह व पत्नी का जम्मू में निधन





उदयपुर। बीएसएफ में असिस्टेंट कमांडेंट मान्यास (राशमी) निवासी स्वदेशसिंह (43) पुत्र स्व. चंद्रसिंह चूंडावत व उनकी पत्नी ऋतुकंवर (38) का कश्मीर में हुए हादसे में निधन हो गया। हादसे में तीन बच्चे, गनमैन और ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हो गए। बीएसएफ की 143वीं बटालियन में बालटाल में तैनात स्वदेशसिंह छह जुलाई की दोपहर अमरनाथ के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गए। स्वदेशसिंह के चचेरे भाई मान्यास सरपंच अजयपालसिंह ने बताया कि इलाके की पेट्रोलिंग के दौरान 6 जुलाई को अमरनाथ के पास उनकी जिप्सी करीब एक हजार फीट गहरी खाई में गिर गई।  जिप्सी में पत्नी ऋतुकंवर (38), बेटी कनुप्रिया (13), निहारिका (5), बेटा क्षितिज (5) और दो गनमैन, एक ड्राइवर भी थे। घायलों का कश्मीर के अस्पताल में इलाज चल रहा है। इधर, सैनिक सम्मान देने के लिए बीएसएफ की कंपनी उदयपुर पहुंच गई है। शवों को उनके पैतृक गांव मान्यास ले जाया जाएगा। जहां बुधवार शाम करीब पांच बजे स्वदेशसिंह का सैनिक सम्मान से अंतिम संस्कार किया जाएगा।





बच्चों की हालत गंभीर : स्वदेशसिंह के साथ हादसे का शिकार हुए तीनों बच्चों कनुप्रिया, निहारिका व क्षितिज का कश्मीर के अस्पताल में इलाज चल रहा है। तीनों की हालत गंभीर बनी हुई है। बीएसएफ अधिकारियों के परिवार उनकी देखभाल में जुटे हुए हैं।

स्वदेशसिंह का जीवन परिचय : स्वदेशसिंह ने स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई उदयपुर में ही पूरी की थी। 1987 में स्थानीय आट्र्स कॉलेज से ग्रेज्यूएशन के बाद वे बीएसएफ में भर्ती हो गए। पहली बार सब इंस्पेक्टर के पद पर उनकी नियुक्ति पंजाब प्रांत में हुई। इसके बाद उन्होंने कश्मीर, आसाम, मणिपुर, बंगाल में भी डयूटी की। स्वदेशसिंह ने चार वर्ष तक राष्ट्रीय परेड में बीएसएफ की मोटरसाइकिल टीम का नेतृत्व किया। वे स्वभाव से बहादूर थे।


Jul 8, 2008

श्री सोभाग्य सिंह शेखावत : संक्षिप्त परिचय

प्राचीन राजस्थानी साहित्य के मर्मघे विद्वान् एवं मूर्धन्य साहित्यकार श्री सोभाग्य सिंह जी का जन्म
२२ जुलाई १९२४ को सीकर जिले के भगतपुरा गाँव में हुआ राजपूत परिवार में जन्मे श्री शेखावत
के पैत्रिक गाँव के समीपस्त खूड आपके पूर्वजों का बड़ा ठिकाना रहा है श्री शेखावत पिछले पॉँच
दशक से राजस्थानी प्राचीन साहित्य के उद्धार और अनुशीलन के लिए शोध कर्म से जुड़े हुये है इस क्षेत्र में अपनी उत्क्रष्ट एवं सुदीर्घ सेवाओ से श्री शेखावत राजस्थानी शोध जगत का पर्याय बन चुकें है आपने राजस्थानी साहित्य को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने में अहम् भूमिका निभाई है राजस्थान ,राजस्थानी भाषा और सस्कृति पर शोध और इतिहास लेखन करने वाले विद्धवानो के प्रकाशित ग्रंथों के सन्दर्भ लेखों में श्री शेखावत का जगह जगह प्रकाशित नाम और उनके सन्दर्भ
उन्हें राजस्थानी मनीषी के रूप में प्रतिष्ठापित करते है शोध लेखन के साथ ही आपने राजस्थानी
भाषा की डिंगल शैली की अनेक महत्वपूर्ण पांडुलिपियों को संपादित कर उनका उद्धार किया

1-आपकी प्रकाशित कृतियाँ
१-राजस्थानी निबंध संग्रह (१९७४) २- राजस्थानी साहित्य संपदा (१९७७) ३- पूजां पाँव कविसरा (१९७७)

४-राजस्थानी साहित्य संस्कृति और इतिहास (१९९१) ५- जीणमाता ६- राजऋषि मदन सिंह दांता

७- भक्तवर रघुवीर सिंह जावली जीवन परिचय ८- राजस्थानी वार्ता भाग -३ (१९५७)

९-राजस्थानी वार्ता भाग -४ १०- राजस्थानी वार्ता भाग -५ ११-राजस्थानी वार्ता भाग -७

१२-राजस्थानी वीर गीत संग्रह प्रथम भाग १३- विन्हे रासो (१९६६) १४- बलवन विलास (१९७२)

१५- राजस्थानी वीर गीत द्वितीये भाग १६- राजस्थानी वीर गीत संग्रह तृतीये भाग

१७- राजस्थानी वीर गीत संग्रह चतुर्थ भाग १८- जाडा मेह्डू ग्रन्थावली

१९- डून्गरसी रतनु ग्रंथावली (१९७९) २०- स्वतंत्रता सेनानी डुंगजी जवाहर जी (१९७२)

२१- कविराज बाँकीदास आशिया ग्रंथावली प्रथम खंड (१९८५)

२२- कविराज बाँकीदास आशिया ग्रंथावली द्वितीय खंड (१९८७) २३- मारवाड़ रा उमराव ऋ बारता

२४- इसरदान नामक विभिन्न चारण कवि २५- चारण साहित्य की मर्म परीक्षा

२६-राजस्थानी शोध संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथों की सूची भाग -३

२७- राजस्थानी साहित्य और इतिहास सम्बन्धी प्रकाशित ग्रंथों की सूची

२८- शेखावाटी के वीर गीत २९- मालाणि के लोक गीत ३०- कहवाट विलास

३१- कविराज बाँकीदास ३२- वीर भोग्या वसुंधरा ३३- गज उद्धार ग्रन्थ

३४- राजस्थानी हिन्दी शब्दकोष प्रथम खंड संशोधन परिवर्धन -संपादन

३५- रसीले राज रा गीत (सहयोग) ३७- राजा उमेद सिंघ सिसोदिया रा वीर गीत (सहयोग)

३७-एतिहासिक रुके परवाने (सहयोग) ३८- अजीत विलास (सहयोग) ३९-माता जी रि वचनिका (सहयोग)

४०- डा. टेसीटोरी का राजस्थानी ग्रन्थ सर्वेक्षण (सहयोग) ४१- सुर्येमल्ल मिषण विसेषांक (सहयोग)

४२-वीर सतसई राजस्थानी टीका (सहयोग) ४३- राजलोक साहित्य (सहयोग) ४४-मोहणोत नेणसी (सहयोग)

४५- रणरोल काव्य ४७- अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा नई दिल्ली सताब्दी समारोह स्मारिका संपादन

४७-पत्र दस्तावेज (महाराज कुमार रघुवीर सिंह जी एवं सोभाग्ये सिंह का पत्र व्यवहार )

४८ - पत्र प्रकाश ( इतिहासकार सुरजन सिंह एवं सोभाग्य सिंह के पत्र )

४९- ठिकाना खूड एवं दांता का इतिहास

आपकी अन्य ग्रंथों की भूमिका लेखन
१- राव शेखा - (सुरजन सिंह शेखावत ) २- मीरां बाई - (डा. कल्याण सिंह शेखावत )

३- जोबन म्हारा देश रो (राम सिंह सोलंकी ) ४- होनहार के खेल - (तन सिंह जी )

५- स्वतंत्रता के पुजारी महाराणा प्रताप सिंह -( कुंवर देवी सिंह मंडवा )

६- चांपवातों का इतिहास -( ठाकुर मोहन सिंह कानोता) ७- राणा रासो -(दयालदास राव )

८- केसरी सिंह गुण रासो ९- मारवाडी व्याकरण - (पंडित रामकरन शर्मा आसोपा )

१०- राजपूत शाखाओं का इतिहास - ठाकुर देवी सिंह मंडवा ११- हिये रा हरफ -डा. प्रकाश उम्रावत

१२- हम्मीरदे के कछवाह - ठाकुर मोहन सिंघ कानोता १३-मरुधर री मठोठ - गिरधरदान रतनु

१४- शार्दुल प्रकाश एवं करवाड राज्य का संक्षिप्त इतिहास - गिरवर सिंह १९९५

आपने निम्न पदों पर कार्य किया

१- संपादक सुप्रभात (मासिक हस्तलिखित ) १९४४-४५

२-संपादक मासिक "संघर्ष" - जयपुर १९४७-५२

३- शोध साक्षर, साहित्य संस्थान (राजस्थान विद्यापीठ) उदयपुर १९५७-६३

४- सहायक निदेशक , राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी ,जोधपुर १९६३-८०

५-संपादक राजस्थानी शब्दकोष (राजस्थानी हिन्दी व्रहद कोश ) १९८२-८४

६-सदस्य संचालिका ,राजस्थानी साहित्य अकादमी ,उदयपुर

७-सदस्य कार्यकारणी , राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ,बीकानेर

८- परामर्शी सदस्य , श्री शार्दुल शेखावाटी शोध संस्थान ,काली पहाड़ी , झुंझुनू

९- सदस्य श्री खिंची शोध संस्थान ,इन्द्रोका , जोधपुर

१०-अवरफेलो संस्कृति एवं शिक्षा मंत्रालय , भारत सरकार ,नई दिल्ली १९७९-८१

११-सचिव शेखावाटी अनुसन्धान समिति श्री सार्दुल एजुकेशन ट्रस्ट , झुंझुनू

१२- चेयरमैन , राजस्थानी भाषा उनयन एवं संवेधानिक मान्यता समिति (राजस्थान सरकार द्वारा गठित १९९०)

१३-चेयरमैन , राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी , बीकानेर

१४-राज्य प्रतिनिधि एवं सदस्य ,राजस्थानी परामर्श मंडल , साहित्य अकादमी ,नई दिल्ली १९९८-२००२

१५-सर्वेक्षण जयपुर मंडल The Indian National Trust and Cultural Heritage (1984-86)

१६- संपादक एवं परामर्शी सदस्य (त्रेमासिक शोध पत्रिकाएं ) - वरदा बिसाऊ ,शेखावाटी, मरुभारती पिलानी,

अनवेष्णा , लोकनिधि-उदयपुर , राजस्थान रत्नाकर ,मज्झिमिका ,वैचारिकी ,वरदाई, विश्वम्भरा,

जागतिजोत आदि



लेख क्षत्रिय वेबसाइट पर

Jun 30, 2008

राजपूत वेबसाइट



राजपूत वेबसाइट " क्षत्रिय " नए रूप में जारी हो चुकी है ,इसमे सदस्यों के आपसी विचार विमर्श के जहाँ फौरम है
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Jun 29, 2008

क्षत्रिय राजपूत वेबसाइट नये रूप में


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झांसी की रानी लक्ष्मी बाई

सन अट्ठारह सौ पैंतीस में रानी झांसी ने था जन्म लिया
भारत की सोई जनता को उसने स्वतंत्रता पाठ पढ़ा दिया
दिखला दिया उसने फ़िरंगी को, है सिंहनी भारत की नारी
जिसे देख के वो तो दंग हुए, पर गद्दारों ने मार दिया



अकसर बालक बचपन में हैं खेलते खेल खिलौनों से
पर शुरु से ही इस कन्या ने ऐसा अपने को ढाल लिया
वो खेलती थी तलवारों से, तोड़ती नकली महलों को
और साथ में उसके नाना थे, जिनसे युद्ध का ज्ञान लिया

बचपन का नाम मनु उसका, सब कहते उसे छबीली थे
वो चिढ़ती, सब हँसते थे, यूँ यौवन देहरी को पार किया
झांसी के राजा गंगाधर से जब पाणिग्रहण संस्कार हुआ
मनु से बनी लक्ष्मी बाई, नया नाम सहर्ष स्वीकार किया

हुआ एक पुत्र, पर उसने जल्दी अपनी आँखें बन्द करीं
दामोदर राव को रानी ने पुत्र मान कर गोद लिया
थे सदा ही उसकी सेवा में सुन्दर, मुन्दर और काशी भी
जिनके हाथों की चोटों ने, शत्रु को पानी पिला दिया

कुछ समय बाद राजा ने भी इस जग से नाता तोड़ा
फिर रानी गद्दी पर बैठी, सत्ता को अपने हाथ लिया
सागर सिंह डाकू को उसने और मुन्दर ने यूँ जा पकड़ा
वो वीर थी जैसे दुर्गा हो, सब ने यह लोहा मान लिया

अब अंग्रेज़ों ने सोचा झांसी बिल्कुल ही लावारिस है
उसे घेर हथियाने का कपट, उन्होंने मन में धार लिया
बढ़ा रोज़ सोच यह आगे, झांसी बस अब अपने हाथ में है
पर धन्य वो रानी जिसने युद्ध चुनौती को स्वीकार किया

रानी कूदी रणभूमी में, हज़ारों अंग्रेज़ों के आगे
दो दो तलवारें हाथ में थीं, मुँह से घोड़े को थाम लिया
बिछ जाती दुशमन की लाशें जिधर से वो निकले
अंग्रेज़ भी बहुत हैरान हुए, किस आफ़त ने आ घेर लिया

मोती बाई की तोपों ने शत्रु के मुँह को बन्द किया
सुन्दर मुन्दर की चोटों ने रण छोड़ दास को जन्म दिया
शाबाश बढ़ो आगे को जब रानी ऐसा चिल्लाती थी
मुठ्ठी भर की फ़ौज ने मिल, अंग्रेज़ों को बेहाल किया

जब कुछ भी हाथ नहीं आया, रोज़ दिल ही दिल घबराया
इक अबला के हाथों से पिटकर सोचने पर मजबूर किया
छल, कपट और मक्करी से मैं करूँ इस को कब्ज़े में
पीर अली और दुल्हाज़ू ने, गद्दारी में रोज़ का साथ दिया

दुल्हाजू ने जब किले का फाटक अंग्रेज़ों को खोल दिया
फिर टिड्डी दल की भाँती उस शत्रु ने पूरा वार किया
रानी निकली किले से अपने पुत्र को पीठ पे लिए हुए
सीधी पहुँची वो कालपी कुछ सेना को अपने साथ लिया

फिर घमासान युद्ध हुआ वहाँ थोड़ी सी सेना बची रही
इक दुशमन ने गोली मारी, दूजे ने सिर पर वार किया
पर भारत की उस देवी ने दोनों को मार नरक भेजा
और साथ उसने भी अपने प्राणों का मोह त्याग दिया

रानी तो स्वर्ग सिधार गई पर काम अभी पूरा न हुआ
स्वतंत्रता संग्राम के दीपक को अगली पीढ़ी को सौंप दिया
तुम तोड़ फेंकना मिलकर सब ग़ुलामी की इन ज़ंज़ीरों को
और भारत को स्वतंत्र करने का सपना सभी पर छोड़ दिया

संकलन :

Jun 27, 2008

क्षत्रिय वंदना

क्षत्रिय कुल में जन्म दिया तो ,क्षत्रिय के हित में जीवन बिताऊं |
धर्म के कंटकाकीर्ण मग पर ,धीरज से में कदम बढ़ाऊँ ||
भरे हलाहल है ये विष के प्याले ,दिल में है दुवेष के हाय फफोले |
जातीय गगन में चंद्र सा बन प्रभु, शीतल चांदनी में छिटकाऊँ ||
विचारानुकुल आचार बनाकर ,वास्तविक भक्ति से तुम्हे रिझाऊँ || १ ||
उच्च सिंहासन न मुझे बताना,स्वर्ग का चाहे न द्वार दिखाना |
जाति की फुलवारी में पुष्प बनाना , ताकि में सोरभ से जग को रिझाऊँ ||
डाली से तोडा भी जाऊँ तो भगवन, तेरा ही नेवेधे बन चरणों में आऊं || २ ||
साधन की कमी है कार्य कठिन है , मार्ग में माया के अनगिनत विध्न है |
बाधाओं दुविधावों के बंधन को तोड़के , सेवा के मार्ग में जीवन बिछाऊँ ||
पतों से फूलों से नदियों की कल कल से ,गुंजित हो जीवन का संदेश सुनाऊँ || ३ ||

पु. स्व. श्री तन सिंह जी द्वारा रचित

Jun 26, 2008

चार बांस चोवीस गज, अंगुळ अष्ट प्रमाण।




चार बांस चोवीस गज, अंगुळ अष्ट प्रमाण।


ईते पर सुळतान है, मत चूकैं चौहाण॥


ईहीं बाणं चौहाण, रा रावण उथप्यो।


ईहीं बाणं चौहाण, करण सिर अरजण काप्यौ॥


ईहीं बाणं चौहाण, संकर त्रिपरासुर संध्यो।


सो बाणं आज तो कर चढयो, चंद विरद सच्चों चवें।


चौवान राण संभर धणी, मत चूकैं मोटे तवे॥


ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो गोकुळ में कानह।


ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो हथह भीम कर॥


ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो राम रावण संतावणईसो राज पृथ्वीराज, जिसो अहंकारी रावण॥


बरसी तीस सह आगरों, लछन बतीस संजुत तन।


ईम जपे चंद वरदाय वर, पृथ्वीराज उति हार ईन॥


संकलन


Jun 17, 2008

राणा प्रताप के प्रन की जेय.....

दूग दूग दूग रन के डंके, मारू के साथ भ्याद बाजे!
ताप ताप ताप घोड़े कूद पड़े, काट काट मतंग के राद बजे!

कल कल कर उठी मुग़ल सेना, किलकर उठी, लालकर उठी!
ऐसी मायाण विवार से निकली तुरंत, आही नागिन सी फुल्कर उठी!

फ़र फ़र फ़र फ़र फ़र फेहरा उठ, अकबर का अभिमान निशान!
बढ़ चला पटक लेकर अपार, मद मस्त द्वीरध पेर मस्तमान!!

कॉलहाल पेर कॉलहाल सुन, शस्त्रों की सुन झंकार प्रबल!
मेवाड़ केसरी गर्ज उठा, सुन कर आही की लालकार प्रबल!!

हैर एक्लिंग को माता नवा, लोहा लेने चल पड़ा वीर!
चेतक का चंचल वेग देख, तट महा महा लजित समीर!!

लड़ लड़ कर अखिल महिताम को, शॉड़िंत से भर देने वाली!
तलवार वीर की तड़प उठी, आही कंठ क़ातर देने वाली!!

राणा को भर आनंद, सूरज समान छम चमा उठा!
बन माहाकाल का माहाकाल, भीषन भला दम दमा उठा!!

भारी प्रताप की वज़ी तुरत, बज चले दमामे धमार धमार!
धूम धूम रन के बाजे बजे, बज चले नगरे धमार धमार!!

अपने पेन हथियार लिए पेनी पेनी तलवार लिए !
आए ख़ार, कुंत, क़तर लिए जन्नी सेवा का भर लिए !!

कुछ घोड़े पेर कुछ हाथी पेर, कुछ योधा पैदल ही आए!
कुछ ले बर्चे , कुछ ले भाले, कुछ शार से तर्कस भर ले आए!!

रन यात्रा करते ही बोले, राणा की जेय राणा की जेय !
मेवाड़ सिपाही बोल उठे, शत बार महा-राणा की जेय!!

हल्दी-घाटी की रन की जेय, राणा प्रताप के प्रन की जेय!
जेय जेय भारत माता की , देश कन कन की जेय!!

Jun 10, 2008

धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।


धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।

धन्य हुआ रे सारा मेवाड़, जहां कदम रखे थे प्रताप ने॥

फीका पड़ा था तेज़ सुरज का, जब माथा उन्चा तु करता था।

फीकी हुई बिजली की चमक, जब-जब आंख खोली प्रताप ने॥

जब-जब तेरी तलवार उठी, तो दुश्मन टोली डोल गयी।

फीकी पड़ी दहाड़ शेर की, जब-जब तुने हुंकार भरी॥

था साथी तेरा घोड़ा चेतक, जिस पर तु सवारी करता था।

थी तुझमे कोई खास बात, कि अकबर तुझसे डरता था॥

हर मां कि ये ख्वाहिश है, कि एक प्रताप वो भी पैदा करे।

देख के उसकी शक्ती को, हर दुशमन उससे डरा करे॥

करता हुं नमन मै प्रताप को,जो वीरता का प्रतीक है।

तु लोह-पुरुष तु मातॄ-भक्त,तु अखण्डता का प्रतीक है॥

हे प्रताप मुझे तु शक्ती दे,दुश्मन को मै भी हराऊंगा।

मै हु तेरा एक अनुयायी,दुश्मन को मार भगाऊंगा॥

है धर्म हर हिन्दुस्तानी का,कि तेरे जैसा बनने का।

चलना है अब तो उसी मार्ग,जो मार्ग दिखाया प्रताप ने॥..

Jun 6, 2008

विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप


‘‘माई ऐहडा-पूत जण, जेहा राण प्रताप।
अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणे सांप ।।
भारतीय इतिहास में एक गौरवशाली रणक्षेत्र् हल्दीघाटी का नाम आते ही मन में वीरोचित भाव उमडने - घुमडने लगते हैं। अरावली पर्वतमाला की उपत्यकाओं से आच्छादित इस रणक्षेत्र् में स्थित 432 वर्ष पूर्व के विशाल वृक्ष और जल प्रवाह के नाले मूक साक्षी बने आज भी वद्यमान है। यह घाटी दूर कहीं से आ रही घोडों की टाप को रोमांचित करती आवाज और हाथियों की चिघांड से मानो गुंजायमान होने लगती है। रणभेरियों की आवाजें मन को मथने सी लगती है। उसी क्षण दूर से एक श्वेत रेखा दृष्टिगत होती है। समीप आती हुई यह रेखा चेतक का रूप ले लेती है। यही आसमानी रंग का घोडा राणा प्रताप को प्राणों की तरह प्रिय था। लगता था मानों यह अश्व अपने अद्वितीय सवार को लेकर हवा में उडा जा रहा था। दृढ प्रतिज्ञ एवं विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुम्भलगढ में हुआ । पिता उदयसिंह की मृत्यु के उपरान्त राणा प्रताप का राज्याभिषेक 28 फरवरी, 1572 को गोगुन्दा में हुआ। विरासत में उन्हें मेवाड की प्रतिष्ठा और स्वाधीनता की रक्षा करने का भार ऐसे समय में मिला जबकि महत्वाकांक्षी सम्राट अकबर से शत्र्ुता के कारण समूचा मेवाड एक विचित्र् स्थिति में था। सम्राट अकबर ने मैत्रीपूर्ण संधि के लिए एक कूटनीतिक प्रस्ताव महाराणा को भेजा परन्तु वह शूरवीर इस प्रस्ताव से गुमराह होने की बजाय मुगलिया सेना को सबक सिखाने का निश्चय कर मेवाड की राजधानी गोगुन्दा से बदल कर कुम्भलगढ कर ली। प्रताप ने अपने दूरदराज के अंचलों से भारी संख्या में भीलों को एकत्र्ति किया। उनकी सेना में दो हजार पैदल, एक सौ हाथी, तीन हजार घुडसवार व एक सौ भाला सैनिक तथा दुन्दुभि व नगाडे बजाने वाले थे। अकबर की ओर से मानसिंह के नेतृत्व में पांच हजार सैनिकों की एक टुकडी व तीन हजार अन्य विश्वस्त व्यक्तियों ने मेवाड में बनास नदी के तट पर पडाव डाल दिया। 21 जून, 1576 को प्रातः दोनों ओर की सेनायें आमने-सामने आ पहुंची। प्रताप की सेना घाटी में तथा मुगलिया सेना बादशाह बाग के उबड - खाबड मैदान में डट गई। दोनों और से पहले पहल करने की ताक में खडी सेनाओं में मुगलों की सेना के कोई अस्सी जवानों की टुकडी ने घुसपैठ शुरू कर दी। प्रताप को यह कब सहन होने वाला था ? रणभेरी के बजते ही प्रताप ने हल्दीघाटी के संकरे दर्रे पर ही मुगलों को करारी हार का प्रथम सबक सिखा दिया और ऐसा जबरदस्त प्रहार किया कि शाही सेना में खलबलाहट मच गई। देखते ही देखते यह युद्ध रक्त तलाई के चौडे स्थल में होने लगा। तलवारों की झंकार से गुंजायमान यह रणक्षेत्र् दोनों ही सेनाओं के सैनिकों के रक्त से लाल हो उठा। इस विप्लवकारी नाजुक हालत में प्रताप ने अपने चेतक घोडे को ऐड लगा हाथी पर सवार मानसिंह पर भाले से तेज प्रहार किया परन्तु हाथी के दांत में बंधी तलवार से चेतक बुरी तरह घायल हो गया। हालात ने राणा को रणक्षेत्र् छोडने के लिए विवश कर दिया। झाला मान ने मुगलिया सेना से घिरे अपने स्वामी प्रताप को राष्ट्रहित में बचाने के लिए मेवाड का राजमुकुट अपने सिर पर रखकर प्रताप को युद्ध क्षेत्र् से सुरक्षित बाहर निकालने में तो सफल हो गया परन्तु स्वयं ने लडते हुए वीरगति प्राप्त कर ली। हल्दीघाटी के इस विश्व विख्यात युद्ध में प्रताप की सीधी जीत भले ही नहीं हुई हो परन्तु मातृभूमि के रक्षक, स्वतंत्र्ता सेनानी, महान त्यागी, स्वाभिमानी, पक्के इरादों के धनी के रूप में महाराणा प्रताप राजपुताने के गौरव और उसकी शानदार परम्पराओं के द्योतक बने हुए हैं। मुगलों के अभिमान के लिए सदैव सिरदर्द बने रहे प्रताप ने अपनी नई राजधानी चावण्ड बनाई जहां 19 जनवरी, 1597 को उनका देहान्त हो गया। चावण्ड में बनी उनकी समाधि पर पहुंचते ही यह दोहा स्मृति पटल पर उभरने लगता है ः- ‘‘माई ऐहडा-पूत जण, जेहा राण प्रताप। अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणे सांप ।। कहना न होगा कि हल्दीघाटी का युद्ध एक विचार शक्ति बन कर जन मानस को आंदोलित करते हुए प्रकाश स्तम्भ के रूप में इस तरह उभरा कि विश्व की महानतम शक्तिशाली रही भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को स्वामी भक्त अश्व चेतक की समाधि तक आने के लिए विवश होना पडा। 21 जून, 1976 को राजस्थान सरकार द्वारा हल्दीघाटी स्वातन्त्र््य, संग्राम की स्मृति में आयोजित चतुःशती समारोह में इन्दिरा जी शिरकत करने हल्दीघाटी के ऐतिहासिक रणक्षेत्र् में पहुंची तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जोशी के नेतृत्व में वहां उपस्थित विशाल जन समूह ने तुमूल करतल ध्वनि से उनका स्वागत व अभिनन्दन किया। श्रीमती गांधी सीधी चेतक की समाधि पर पहुंची और अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद प्रतापी प्रताप के जिरह बख्तर के संग्रहालय का अवलोकन करने गई। उन्होंने इस रणक्षेत्र् की महत्ता को अक्षुण्य बनाये रखने के उपायों पर चर्चा करते हुए अपने अमूल्य सुझाव भी दिये। वे इस महान सपूत के अद्वितीय कृतित्व से अभिभूत हो एक नई स्फूर्ति, दिशा और संकल्प के साथ लौटी। हल्दीघाटी का विश्व विख्यात रणक्षेत्र् हमारी राष्ट्रीय धरोहर के रूप में जाना और माना जाता रहा है। परन्तु आजादी के बाद विकास की पिपासा शांत करने के लिए जिस तरह इस धरोहर का मौलिक स्वरूप ही बदल दिया गया। वह निश्चित ही ऐतिहासिक प्रतीकों को धूरि धूसरित करने से कम नहीं है। रण क्षेत्र् का मुख्य स्थल रक्त तलाई पर सरकारी भवनों का निर्माण और खेती के लिए अतिक्रमण तथा संकरे दर्रे को तोडकर चौडा स्थान बना देना, इसके साक्षात प्रमाण हैं। इसीलिए इन्दिरा गांधी ने इस स्थल को अक्षुण्य बनाये रखने की आवश्यकता प्रतिपादित की थी। आशा की जानी चाहिए कि केन्द्र और राज्य की सरकारें इस ओर कुछ करने के प्रति सचेष्ट होंगी।