हठीलो राजस्थान-18

सूरापण सु-नसों सकड़,
ढील न लागै ढिंग्ग |
पीवै नीं वो डगमगै ,
पीधां बणे अडिग्ग ||११५||

शौर्य का नशा भी बड़ा प्रबल है | जिसके चढ़ने पर व्यक्ति अडिग व चुस्त हो जाता है | जो इस शौर्य के नशे को नहीं पीता वह ही डगमगाता रहता है और जो पी लेता है वह अविचलित हो जाता है |

हियै निराशा न रहै,
मुंजीपण मिट जाय |
सूरापण जिण घट बसै,
झूठ कपट झट जाय ||११६||

जिस हृदय में शौर्य निवास करता है,उस ह्रदय में निराशा व्याप्त नहीं हो सकती है व कृपणता भी विलीन हो जाती है |जिस हृदय में शौर्य निवास करता है ,उससे झूठ व कपट भी स्वत: ही दूर हो जाते है |

जग चालै जिण मारगां,
भड चालै उण नांह |
कठिण भडां सथ चालणों,
विकत भडां री राह ||११७||

संसार जिस मार्ग पर चलता है ,वीर उस मार्ग पर नहीं चलते | वीरों का मार्ग बड़ा विकट होता है अत: उनके साथ चलना बहित कठिन है |

जग अधपत नहै आदरै,
बिसरै जुग बितांह |
सूरां चित भावै सदा ,
गावै नित गीतांह ||११८||

संसार में बड़े बड़े अधिपतियों का कालांतर में कोई आदर नहीं करता | युग बीतने के साथ लोग उन्हें भूल जाते है | परन्तु शूरवीर तो सदा ही लोक-मानस में श्रद्धा से स्मरण किए जाते है तथा उनका यश नित्य गीतों में गूंजता है |

ईस चरण नमतो सदा,
कै कटतो पर काज |
केव्यां आगल किम नमै,
अनमी माथो आज ||११९||

वीर कहता है - मेरा सिर या तो ईश्वर के चरणों में झुक कर धरती को स्पर्श करता है या फिर दूसरों के हित में कट कर भूमि के चरणों में झुकता है | ऐसा मेरा स्वाभिमानी मस्तक शत्रुओं के समक्ष कैसे झुक सकता है |

आदर सूं जिणों सदा ,
आदर धरती आन |
जिण घर आदर नह रहै ,
वा घर नरक समान ||१२०||

सदैव आदर से जीना ही अच्छा रहता है क्योंकि आदर इस धरती की आन है | जिस धरती पर आदर नहीं होता ,वह धरती नरक समान होती है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत



रेत के झरने |
मेरी शेखावाटी
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हठीलो राजस्थान-17

गूद गटककै गोधणयां, हड्ड चटककै स्याल |
बूथ बटककै बैरियाँ, मंडै रण मतवाल ||९४||

जब रण के मतवाले शूरवीर क्रुद्ध होकर युद्ध करते है,तो उनके द्वारा किए गए प्रचंड नर-संहार से युद्ध-भूमि धडों व सिरों से भर जाती है | यहाँ विचरण करने वाली गिधनियाँ तृप्त होकर मांस गटकती है तथा सियार हड्डियाँ चटकते हुए छककर शत्रुओं की बोटियाँ बटकते है |
सीस फुदककै किम सखी, कमध धमककै खाग |
अरि भालै आराण में, रिंझे सिन्धु राग ||९५||

हे सखी ! रण-भूमि में वीर का ये कटा हुआ मस्तक कैसे फुदक रहा है व इसका ये धड किस कारण से तलवार चलाने में समर्थ है ?
सखी उत्तर देती है - यह कटा हुआ सिर उछल-उछल कर युद्ध क्षेत्र में दुश्मनों को देख रहा है व रण-वाद्यों के द्वारा जो सिन्धु राग गाई जा रही है ,उससे हो रहे वीर रस के संचार से ये धड बिना मस्तक के ही तलवार चलाने में समर्थ है |
सीस धरा धड पागडै, हय खुँदै होदांह |
लोहो नलां , खागां गलां , नाचै कर मोदांह ||९६||

युद्ध करते हुए वीर का मस्तक कट के धरा पर गिर पड़ा किन्तु धड यथावत घोड़े पर सवार है ,पैर पगाडों में है व घोड़े के अगले पैर,हाथी के मस्तक पर जा टिके है | सिर कटे हुए शूरवीर ने होदे में बैठे शत्रु पर तलवार से प्रहार किया है ,तलवार शत्रु की गर्दन पर जाकर लगी है जिससे खून का नाला बह चला है | इससे प्रफुल्लित होकर घोड़े पर सवार वीर का धड प्रसन्नता से नाच रहा है |
नान्हा गीगा-गीगली, जामण, कामण गेह |
भड बाल्या निज हाथ सूं, करतब ऊँचो नेह ||१०६||

जौहर के अवसर पर दूध-मुहें बच्चों,निज जननी तथा अपनी भार्या को अग्नि की लपटों के समर्पित कर वीरों ने यह सिद्ध कर दिया है,कि कर्तव्य प्रेम से भी बड़ा होता है |
कुटम कबिलौ आपरौ , सह पालै संसार |
भड बालै करतब तणों, क्षात्र धर्म बलिहार ||१०७||

अपने परिवार का पालन पोषण तो सारा संसार ही करता है ,परन्तु वीर तो कर्तव्य की वेदी पर अपने परिवार को भी झोंक देता है | निश्चय ही हम इस क्षात्र धर्म पर बलिहारी है |
सूत केसरिया धुज गही, धब केसरिया भेह |
धण केसरिया आग में ,बाली केसर देह ||१०८||

पुत्र ने केशरियां ध्वज ग्रहण किया तथा पति ने केशरिया वेश | उधर वीर पत्नी ने भी अपनी केशर सी काया को केशरिया आग की लपटों में झोंक दिया |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत


अब ऑनलाइन दर्शन कीजिए बाबा रामदेव पीर के |
मेरी शेखावाटी
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हमारा धर्म

कुमारी उत्तम कँवर नरुका-
है कौनसा ऐसा हमारा कर्म ?
है कौनसा ऐसा हमारा धर्मं ?
जो हम सब के मन को भाया !
जिससे इतिहास हमने बनाया ! !

पूर्वजो ने हमारे नाम कमाया !
इस धरा को हमने भारत बनाया !!
जिसके पालम को तत्पर रहते हम !
सर कट जाने पर भी लड़ते हम ! !

जहाँ पर मोल रहता था हरदम !
नमक का ज्यादा खून का कम ! !
उस से ही हमने सृष्टि को बचाया !
इसीलिए प्रजाने हमको राजा बनाया !!

फिर क्यों हमने उसे आज भुलाया है ?
चलो सबको कृष्ण ने रण में बुलाया है ! !
वही लक्ष्य हमारा वही है , हमारा धर्म !
वही है हम सबका प्यारा, क्षात्र-धर्म !!


पाबूजी राठौड़
गधा सम्मेलन के लिये ताऊ का सोंटा (Taau's Baton) रवाना
मेरी शेखावाटी
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परिचय:--संस्था एवं संस्थापक

कुंवरानी निशाकँवर-
राजर्षि मधुसुदन दास जी महाराज जो कि सुविख्यात "निर्वाणी अखाड़े " के खालसा के "श्री महंत" है \उन्हें "सूक्ष्म ईश्वरीय चेतना "स्वर यह दिव्य निर्देश प्राप्त है कि इस ब्रह्माण्ड ,सृष्टि को विनाश यानि क्षय से बचाने के लिए ही क्षात्र-तत्त्व कि उत्पत्ति स्वयं श्री मन्न नारायण ने अपने ह्रदय से की है |इस तत्त्व के उपासक को ही क्षत्रिय कहा जाता है |हिमालय की कंदराओ में बैठ कर तपस्या को आतुर तत्कालीन क्षत्रिय समाज के प्रतीक अर्जुन को श्री कृष्ण के रूप में श्री हरि ने यह समझाया था कि "इश्वर द्वारा निर्धारित सहजं कर्म यानि जन्म के साथ उत्पन्न स्वधर्म को छोड़ कर यदि कोई मोक्ष के लिए अन्य रह खोजता है तो यह उसके द्वारा ईश्वरीय आदेश कि अवहेलना मात्र है |जब सत्य और असत्य के मध्य ,न्याय और अन्याय के मध्य,अच्छाई और बुराई के मध्य,धर्मं और अधर्म के मध्य संघर्ष हो तब कोई तीर्थ या तपोभूमि नहीं बल्कि रणभूमि "धर्म-संग्राम स्थल" ही तपोभूमि होती है है |और आज तो पूरी मानव सभ्यता ,और सभी मानवीय मूल्यों का सर्वथा लोप हो चुका है और यह सम्पूर्ण सृष्टि महाविनाश के कगार पर खड़ी है |यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि "आज क्षात्र-तत्त्व सुषुप्त हो चुका है "|अत: इस क्षात्र-तत्त्व को जागृत करना आज की सबसे बड़ी और कठोर तपस्या है |श्री कृष्ण की यह फटकार भी मिली कि "तुम कैसे भक्त हो जो अपने इष्ट के बताये रास्ते (गीता में ) "स्वधर्म पालन "को छोड़ अपने इष्ट से मिलन ,और मोक्ष के नितांत व्यक्तिगत स्वार्थ में पड़ गए हो ?" आज कि सर्वाधिक आवश्यकता है कि क्षत्रिय अपने धर्म का पालन करे क्योंकि जब क्षत्रिय अपने धर्म का पालन नहीं करता है तब मानव तो क्या देवता पशु-पक्षी और कीट-पतंग तक भी अपने सृष्टि-धर्म का पालन बंद कर देते है जिसके परिणाम स्वरूप यह सारी सृष्टि महा-पतन की ओर बढ़ जाती है है |
राजर्षि जी को मिले इस दिव्य निर्देश के बाद राजर्षि जी ने अपने शिष्यों के चुनिन्दा समूह को मंथन के लिए अपनी तपोभूमि में बुलाया |और दो दिवसीय विचार विमर्ष के बाद "श्री क्षत्रिय वीर ज्योति' की स्थापना की |नवम्बर २००७ में स्थापित इस संगठन का वास्तविक कार्य भारत के विभिन्न क्षेत्रो में फैले क्षत्रिय संगठनो के प्रतिनिधियों के मंथन -शिविर के समापन पर स्थापित क्षत्रिय-संसद के गठन के साथ गति पकड़ेगा |इसके लिए सभी संगठनो को नवम्बर २०१० में दो दिवसीय मंथन शिविर के लिए आमंत्रित किया जारहा है|राजर्षि जी का थोडा परिचय भी इस संस्था परिचय के साथ अपेक्षित होगा |आज से करीब ८७ वर्षो पूर्व श्री कृष्ण के वंश इन्हें पहले यादव और अब जादौन भी कहा जाता है की एक रियासत करौली(राजस्थान) में है,इस राजपरिवार की जब वंश बेल में गोद लेने की जरुरत पड़ती है तो गढ़ी गाँव जिसे राजा की गढ़ी भी कहा जाता है से ही इस राजवंश की लता को बढाया जाता है ,,इसी राजा किगढ़ी में राजर्षि जी का जन्मा हुआ है |अर्थात करौली नरेश के निकट रक्त सम्बन्धी है राजर्षि जी |युवा अवस्था में विवाह हुआ और कुछ वर्षो के दांपत्य जीवन के बाद एक एक बच्ची के जन्म के बाद राजर्षि जी की पत्नी स्वर्ग सिधार गयी |काफी लोगो के दबाव के बावजूद राजर्षि जी ने दूसरा विवाह अनावश्यक बता कर ताल दिया |समयानुसार बच्ची बड़ी हुई एवं एक अच्छे राजपूत परिवार में बच्ची के विवाह के तुरंत बाद (विदाई के ही दिन) राजर्षि जी ने वैराग्य ले लिया |लोगो ने सोचा पुत्री वियोग में कही अश्रु बहा रहे होंगे |किन्तु राजर्षि जी तो पहुँच गए निर्वाणी अखाड़े के संत श्री श्री १००८ गोविन्द दास जी महाराज के आश्रम में |विदिवत गृहस्थ छोड़ वैराग्य लेने के बाद १२ वर्षो तक सिर्फ "दोपहर में एक लिटर पानी में सांठी(पुनर्वा ) घोट कर पिया |इसके अलावा न कोई अन्न,जल, फल, फूल, या कांड ही ग्रहण किया |लगातार जप एवं ताप के परिणाम स्वरूप निर्वाणी अखाड़े के संस्थापक श्री श्री १००८ श्री निर्गुणदास जी महाराज के परम शिष्य श्री श्री १००८ श्री अगरदास जी महाराज ,जिन्होंने अपने समकालीन बादशाह अकबर का दर्प राजा मान सिंह के समक्ष भंग किया था ,राजर्षि जी के साथ साक्षात् प्रकट होकर वार्तालाप करने लगे |परिणाम स्वरूप लाखो लोगो के दुःख दूर किये |पुत्र काम्येष्टि यज्ञ भी करवाए गए जिनमे अब तक कुल १२१४ बच्चो का जन्म हुआ है |जिनमे क्षत्रिय वीर ज्योति के बहुत से सदस्यों के बच्चे भी सम्मिलित है|कुम्भ में पहली झांकी श्री निर्वाणी अखाड़े की ही निकलती है |राजर्षि जी उस अखाड़े के खालसा के श्री महंत फिछले ७ वर्षो से है |इस खालसा में करीब १०००० उच्च कोटि के संत है |राजर्षि जी हर समय प्रत्येक कार्यकर्त्ता के लिए सभी प्रकार की समस्याओ पर सुझाव,परामर्श एवं उपाय बताने के लिए तत्पर रहते है |उच्च कोटि का अध्यात्मिक ज्ञान के साथ ही दिव्य शक्तियों से संपन्न है |आयुर्वेद का भी उच्च श्रेणी का ज्ञान है |राजपूतो के साथ ही जाट ,गुर्जर एवं मीणा आदि अन्य जातियों पर भी राजर्षि जी का बहुत अच्छा प्रभाव है |आशा है इतना परिचय पर्याप्त होगा |

"जय क्षात्र-धर्मं "
प्रचार प्रमुख
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति


पाबूजी राठौड़ : जिन्होंने विवाह के आधे फेरे धरती पर व आधे फेरे स्वर्ग में लिए |
मेरी शेखावाटी
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क्या थे, क्या हो गये लेकिन अब कीस ओर अपने कदम आगे बडाये...

एक समय था जब हमारे अपने पुर्वजो के आगे लोग सीर्फ़ दीन की रोजी के लीये वो जी -हजुरी करते नही थकते थे...जो बोला जाता था वही उनके लीये अन्तीम आदेश होता था.हमारा इतीहास इतना गोरवशील है की आज उस के मुकाबले ससार का पुरा इतीहास कम नजर आता हे.हजारो सालो हमारी कोम ने इस वसुन्धरा पर अपना शासन कीया ...कोम मे जितने वीर-योधा की गीनती की जाये उतनी कम है..कोम ने जीस तरह से अपने वीरता ओर प्रराकम का काम कीया वो आज कीसी भी प्रकार से ना कम है ओर ना उसकी अब कोइ बराबरी की जाती हे...प्रताप से प्रथ्वी राज च्हवान, द्रुगा दास से जेता कुपा.., उसी तरह महीलाए भी वीरता के नाम पर अपना सब कुस भुल कर अपने प्रजा ओर समाज के मान -सम्मान मे जलती ओर धधकती आग मे कुद गये....

फ़ीर एक समय आया जब धीरे-धीरे समाज के लोग आपस मे ही एक दुसरे पर अपना साम्राज्य बडा करने की मह्त्वाकाशा ने आपस मे ही लड्ना शुरु कर दीया जीसका का नातीजा यह हुआ की उसका फ़ायदा दुसरे लोगो ने उटाया..ओर यही से राजपुतो के पतन की शरुआत हो जाती हे..पतन के कारन अगर गीनने लगे तो समय भी कम पड जायेगा..पतन की शरुआत एसी होई की उसे फ़ीर रोकने पर भी ...समाज का पतन रुक नही पाया...

राजपुत शासन के लीये ही जन्म लेते है..पर आपसी खीचतान ने उस प्रतीभा को कमजोर कर दीया ..ओर उसका नतीजा यह हुआ की वीदेशी आक्रान्ता की नजर हमारे जमीन पर पडी ओर ओर वो अपनी सेना के साथ आ धमके ..ओर एक नया युग की शरुआत हो ग्यी..मुगलो ने हमारे साम्राज्य पर हमले बोल दीये...कई द्शक तक लडाईया लडी गयी...उसमे भी मुगल सफ़ल नही हो सके..आपसी लडाई ओर मुगलो से लडाई मे समाज पर बडा असर पडा ...समाज आपस मे ही बीखर गया..फ़ीर भी शासन राजपुतो का रहा...लेकीन फ़ीर ओर नये रुप मे वीदेशी आ गये..ओर उनको राजपुतो के वीरता की पता था ईसलिए उन्होने राजपुतो से बनती कोशिश सीधा लोहा ना लेकर ..राजपुतो के कमजोरी को पक्डा ओर "फ़ुट डाळॊ ओर राज करो" की नीती को अपनाया जीसमे वो सफ़ल हो गये...ओर धीरे धीरे राजपुतो के हाथ से साम्र्ज्य जाने लगा..ओर समाज एक अलग रास्ते पर चल पडा ..विदेशी लोगो की नीती ओर काम काज से भारत मे असतोस की लहर दोड चली..जगह जगह लोगो ने विरोध ओर बहीस्कार करना शुरु कर दीया था..लेकीन उस समय तक राजपुत अपनी मोज मस्ती मे ही व्य्स्त थे..भारत के आम जन -जीवन के लोगा का राजपुतो से विशवास उथ गया था..समय ने लोगो को आगे बड्णॆ का मोका दीया ...जीस का लोगो ने भरपुर फ़ायदा लीया ओर एक नये युग के द्लीज पर खडॆ हो गये...आखीरकार अग्रेजो को भारत छॊड्णा पडा....

अग्रेजो के भारत छोड्ते ही एक अलग युग की शरुआत भारत मे हो चुकी थी..अब ना विदेशीयो का ओर ना राजपुतो का शासन रहा था..एक नई सरकार बनी जिसमे हमारे समाज का प्रभाव खत्म सा हो चुका था..सरकार को नये कानुन की जरुरत थी जिसके लिए एक नयी कमटी बनी जिसमे हमारे समाज का कोई प्रतिनीधी नही था..जो कानुन बन कर हमारे समाज के सामने आया उस मे हमारे लिये खोने के सिवाय कुछ नही था..हमे हर तरह से अधिकार वीहीन करने मे कोई कसर छॊडी...समय गुजर रहा था

तभी हमारे राजस्थान मे एक एसे कानुन ने द्स्तक दी जीसका ज्यादा ओर सीधा प्रभाव हमारे राजपुतो पर पडा..उन्की जीवन बसर करने के लीये जो भी जमीने थी वो कानुन के तह्त छीन ली गयी..उस कानुन का कई हमारे राजपुतो ने भरपुर विरोध किया...एसे कई कानुन बने जिससे समाज पर गहरा असर पडा..समाज एक शात जीवन जीने लगा लेकीन उसके शानो -शोकत मे कोई कमी नही आयी...दुसरे समाज ने भी कीसी ना कीसी रुप मे समाज पर बदनामी ओर कीचड उछालने मे कोई कमी नही रखी..सरकारी सुविधा ने लोगो ने एस नयी दीशा दी ओर वो दीन ब दीन हम से आगे नीकलने लगे

RESERVATION रुपी दैत्य ने हमारे समाज मे विकास के जो कुछ काम हो रहे थे उने भी रोक रहा था. तभी हमारे सो रहे समाज मे एक चेतना रुपी लहर दोडी..अपनो ने ईस कानुन का अधीकार लेने के लिए लोगो ने जगह-जगह सभा,धरने-प्रर्दशन कीये ओर सरकार को एक बडी सभा कर अपनी ताकत का एह्सास कराने का टाईम आ गया था..उसके लिए जयपुर मे पुरे समाज की एस विशाल सभा का आयोज्न कीया गया...पुरे राजस्थान से राजपुत समाज लाखो की ताद्त मे उम्ड पडॆ...जयपुर का हर कोना-कोना केसरिया कलर मे रग चुका था..शायद समाज के ईतिहास मे पहली बार ईतनी मात्र मे राजपुत एकजुट हुए थे...राजपुतो का जोश सातवे आसमान पर था लेकीन वहा जो कुछ घटीत हुआ उससे पुरा समाज निराशा के समुद्र मे डूबा गया..भगवान ना करे फ़ीर कभी एसा समय आये..उस दीन के लीये कीसे जिम्मेवार माने ओर कीसे नही...लेकीन ये कह सकते हे की वो हमारे ईतिहास का सबसे बडा काला दीन माना गया..जो लोग जीस जोश के साथ आए थे उतनी नीराशा ओर उदासी के साथ अपने अपने घरो को लोट गये ...ओर हमारे समाज ने एक बडा मोका गवा दीया था..उसके बाद कई कमीशन बेथे ओर सरकार ने भी खाना-पुर्ति करी ..जीस का नतीजा यह हुआ की आज तक हम उस ह्क को पा नही सके..जो लोग ईस आन्दोलन के अगुवा थे वे आज बीना मिशन पाये हुए वो कीसी ना कीसी राजनीतिक द्ल मे की शोभा बडा रहे हे...

ईन सब बातो को अब भुल जाना ही अच्छा रहेगा....आज हमारा समाज एक ऎसे मोड की द्लहीज पर हॆ..जहा से हम युवा एक समाज को नयी दीशा दे सकते हे खोई प्रतिस्टा फ़िर समाज को दीला सकते हे...नये युग की शरुआत कर सकते हे..हमे ज्यादा से ज्यादा अपनी आथिक शक्ति को बडाना होगा, हमे समाज मे EDUCATION को बडाना होगा, हमे समाज मे व्यापत कु-रितियो को मिटाने का जोरदार प्रयास करना पडॆगा, व्यपार मे हमारे समाज की भागीदारी बडानी होगी..हमारे हर प्रयास सकरात्मक होने चाहीये..तो हम फ़ीर एक नये समाज की नीव रख सकते हे ..हम फ़ीर अपना राजपुताना बना सकते हे..समाज के हर युवा का दायित्व बने की वो अपने स्तर पर ही प्रयास करे..अगर मे एक घर को मजबुत बना सकु तो समाज के लाखो युवा लाखो घरो को सश्क्त ओर मजबुत बना पायेगे..हमे उस के साथ-साथ पुरानी मानसिकता को भी त्यागना पडॆगा..ओर अन्य ओगो के दील मे भरी अपने समाज के प्रति नफ़रत को भी कम करने के प्रयास करने चाहीये...

मा भवानी की दया से हमारे खुन मे वो सब गुण हे हमे कही जा के सिखने की जरुरत नही हे बस हमे उन गुणॊ को अपने आप मे पह्चानने की जरुरत हे..ओर उन गुणॊ का सदपयोग हो..



’युवा चाहे तो बहते नदी के प्रवाह को भी बद्ल सकता हे’

जय मा भवानी..खम्मा घनी सा...(आप से मेरा विन्रम-निवेदन होगा की आप ईस लेख को सकारात्मक विचोरो के साथ समजे सा..)...
श्रवण सिंह चौहान


पाबूजी राठौड़ : जिन्होंने विवाह के आधे फेरे धरती पर व आधे फेरे स्वर्ग में लिए |
ताऊ पत्रिका
मेरी शेखावाटी
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4 अक्‍टूबर को जयपुर मे "राजपूत युवा एकता वाहन रैली "

राजपूत युवाओ को एकजुट करने का प्रयास
सामाजिक मंच व मुददे पर सभी राजनैतिक पार्टियो , सभी विचारधाराओ व सभी सामाजिक सस्‍थाओ की राजपूत युवा शक्ति को समाज के नाम पर सदैव एकजुट करने का प्रयास है राजपूत युवा एकता वाहन रैली , 4 अक्‍टुबर प्रात 10 बजे भवानी निकेतन से रामनिवास बाग तक जाने वाली इस रैली मे पुरा राजस्‍थान देखेगा कि राजपुत युवाओ की राजनैतिक पार्टिया व व्‍यकिगत विचारधारा अलग अलग हो सकती है परन्‍तु समाज एक है और युवा समाज के लिए कैसरिया ध्‍वज के नीचे सदैव एक है । आप सभी इस रैली मे आयोजक के तौर पर पधारें ओर इसे ऐतिहासिक बनाते हुए सर्व समाज को संदेश देवे कि हम एक है ।

राजपूतो ने ठाना है , सम्‍मान हमे पाना है
एकता के बल पर , ताकत को दिखाना है।।

--
Shyam Prarap Singh Etawa
Pradesh Sanyojak
Shri Rajput Karni Sena
9887380511



पाबूजी राठौड़ : जिन्होंने विवाह के आधे फेरे धरती पर व आधे फेरे स्वर्ग में लिए |
ताऊ पहेली - 93
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और भ्रम ना फैलाये...!

आजकल फेसबुक या अन्य वेब के जरिये कुछ लोगों द्वारा भारत के प्राचीन इतिहास की तोड़-मरोड़ की जा रही है! यह दुर्भाग्यपूर्ण है! भारत की सभ्यता और संस्कृति अति प्राचीन काल से महान रही है और विश्व वन्दनीय भी मानी गयी है! फिर भी कुछ महाशय चंद विदेशी इतिहास कारों के द्वारा रची गयी मिथक  कल्पनाये बार-बार प्रस्तुत करके इस महान धरोहर को बदनाम करने की कवायद कर रहे है! हर समाज में कुछ अच्छाई और बुराई जरुर  होती है! लेकिन चंद बुराई की बाते उठकर किसी महान सभ्यता को बदनाम करना उचित नहीं!
मुर्ख इंसान अपने को छोड़ कर सारी दुनिया को मुर्ख समझता है और दुनिया का प्रबोधन  करने निकल पड़ता है! ऐसे लोगों को देखकर मुझे डोन क्विक्ज़ोट की याद आ जाती है! कभी वर्ण व्यवस्था या जाती व्यवस्था को लेकर ;कभी धर्म व्यवस्था या  कभी आर्य विदेशी थे या नहीं इन बातों को लेकर अक्सर मिथ्या विचारों के प्रदर्शन यहाँ होते आ रहे है! विदेशी इतिहास कार लोगोने अनगिनत भ्रम  पैदा कर रखे है जिन्हें हमारे तथा-कथित विद्वान् सत्य मानकर अपनी उट-पटांग खोज दुनिया के सामने रखने का अवडंबर करते रहे है! और हमारे लोग भी उन्ही गलत जानकारियों से भ्रमित होते जा रहे है! वास्तव में अगर इस महान इतिहास का सत्य स्वरुप अगर भारत के लोगों के सामने रखा जाये तो आज -कल के  तथा-कथित स्वार्थी तत्व को राज करना मुश्किल  हो जायेगा!
किसी भी देश को अपना सत्व और स्वत्व को कभी नहीं खोना चाहिए!
एक वचन यहाँ प्रस्तुत करना हम उचित समझेंगे," अगर दुनिया के किसी देश को---सभ्यता या संस्कृति को मिटाना चाहते हो; तो बम,बारूद या गोली की आवशकयता नहीं है; सिर्फ उस देश के इतिहास को मिटादो.....वह अपने आप मिट जायेंगे....!"
यही प्रयास हमारे बारे में कुछ लोग कर रहे है! जैसे इजिप्ट, मिस्र की संस्कृति काल के प्रहार में मिट गयी ....वैसे ही भारत की महान विरासत को नष्ट करने के अनगिनत प्रयास हुए..! लेकिन भारत की महान मिटटी में वह महान संस्कृति सिर्फ जीवित ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को प्रेरणा देती रही है! जितना प्रहार यह लोग करेंगे उनसे ज्यादा यह मजबूत होगी! यह कोई किसी द्वारा निर्मित व्यवस्था नहीं है; यह सनातन है! जिसका कोई आदि और अंत नहीं है!
जिन लोगोने इस महान धरोहर को जानी--समझी या परखी नहीं है वैसे नादाँ ही उसपर प्रहार करना पसंद करेंगे!  इस महान धरोहर को बचने के लिए अनगिनत  लोगोने अपने बलिदान दिए है! हजारो संतो ने समूचे विश्व को प्रेम और ज्ञान का सन्देश दिया! यहाँ के त्याग और बलिदान की गाथा अद्वितीय है! भारत ने कभी भी किसी राष्ट्र या सभ्यता पर प्रहार नहीं किये है! वास्तव में इतना बड़ा मानवता का उदाहरण दुनिया के किसी इतिहास में नहीं होगा! आधुनिक लोग जात-वर्ण-धर्म जैसी बाते अधूरी पढ़कर वृथा ही अपने मत-प्रदर्शन कर देते है! यह तो हमारी अस्मिता प्रहार है;जिसका जबाब हमें देना चाहिए! हर सदी में कुछ विकृत लोग ऐसा करते आये है! यह वो धरती है जिसने अपनी स्तुति ही नहीं बल्कि आलोचना भी सही है! यह परिवर्तनशील संस्कृति है, व्यापक विचार धारा वाली और सभी प्रवाह या तत्वों को गोद में समाने वाली संस्कृति है!
 पाखंडी लोग मानवता के नाम से इस महान संस्कृति पर कीचड़ उछालते है! क्या भारत जैसी महान मानवता कही दुनिया में किसी राष्ट्र में या संस्कृति में आप को दिखाई दी है? जिस पछिम की सभ्यता को ये पागल लोग महान समझते है, क्या उनके पागलपन जैसे उदाहरण यहाँ कभी देखे है? इंग्लैंड, फ़्रांस,जर्मनी तो साम्राज्यवाद के जनक थे! अमेरिका ने इराक में क्या कहर मचाया यह पूरा विश्व जनता है! क्या भारत ने ऐसा कुछ किया है? आज की बात तो क्या.....इतिहास में भी ऐसा कही नजर नहीं आया है!
आखिर में हम यह ही कहना पसंद करते है,
"वो कौमे बदनसीब होती है; जिन्हें इतिहास नहीं होता है....!
वो कौमे खुशनसीब होती है;जिन्हें इतिहास होता है.......!
और वो कौमे सबसे ज्यादा बदनसीब होती है; जिन्हें इतिहास भी होता है.......लेकिन वो इतिहास से सबक नहीं लेती है..!"
हमें इतिहास की भूलों से सबक लेना चाहिए.......और हमारे वर्तमान और भविष्य के बारे में सजग होना चाहिए...! इतिहास के कुप्रचार को जबाब देकर.....ऐसी नादाँ हरकतों को सबक सिखाकर हमारी महान सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हेतु हमें आगे आना चाहिए...!
---जयपाल सिंह विक्रम सिंह गिरासे
शिरपुर,[महाराष्ट्र]
मोबाइल ०९४२२७८८७४०
इमेल: jaypalg@gmail.com
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हठीलो राजस्थान-16

सुत गोदी ले धण खड़ी,
जौहर झालां जोर |
झालां हिड़दे धव जलै,
लाली नैणा कोर ||
जौहर के समय वीर नारी अपने पुत्र को लिए जौहर की प्रचंड ज्वाला में कूदने हेतु खड़ी है | उधर उसके वीर पति के हृदय में भी वीरत्व की ज्वाला धधक रही है तथा उसकी आँखों की कोरों में रोष की लालिमा लहक रही है |

दस सर कटतां ढह पड्यो,
धड़ नह लड़ियो धूत |
सिर इक कटियाँ रण रच्यो,
रंग घणा रजपूत ||
दसशीश रावण सिर कटते ही ढह पड़ा | उसका धड़ युद्ध में नहीं लड़ सका | धन्य है वह राजपूत वीर जो एक सिर के कट जाने के बाद भी युद्ध करते रहते है |

बांको सुत लंकेस रो,
सुरपत बाँधण हार |
सिर कटियाँ फिर नह हिल्यो,
रण उठ कियो न वार ||
लंकापति रावण का वीर पुत्र मेघनाथ जिसने देवताओं के राजा इंद्र को भी बंदी लिया था | सिर कटने के बाद वह न तो हिल सका और न ही उठकर वार कर सका |

सिर देवै पर कारणे,
सिर झेलै पर तांण |
बीतां बातां गीतड़ा,
बढ़ बढ़ करै बखाण ||
यहाँ के शूरवीरों को धन्य है जो परकाज हित अपना मस्तक कटा देते है तथा दुसरे के संकट को अपने सिर पर झेल लेते है | कवियों के गीतों व लोककथाओं में ऐसे शूरवीरों की कीर्ति का बढ़-बढ़ कर बखान किया जाता है |

रजवट खूंटो नीमणों,
टूटे नांह हिलंत |
विध बांधी बल-बरत सूं ,
वसुधा देख डिगन्त ||
रजवट (क्षत्रियत्व) वह मजबूत खूंटा है जो न तो हिल सकता है ,न टूट सकता है | इसीलिए विधाता ने इस विचलित होती हुई पृथ्वी को शक्ति की रज्जू (रस्सी) से रजवट के खूंटे से बाँधा है (क्षत्रिय के शासक होने का यही सिद्धांत है)|

सुरावण सकती सकड़,
मेटे विधना मांड |
देय हथेली थाम दे ,
डगमगतौ ब्रह्माण्ड ||
शौर्य में इतनी सामर्थ्य है कि वह विधाता के लेख को भी मिटा सकता है | वह डगमगाते ब्रह्मांड को भी अपनी हथेली लगाकर रोक सकता है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

अब ऑनलाइन दर्शन कीजिए बाबा रामदेव पीर के |
ताऊ डाट इन: "अपने अपनों को रेवडी कैसे बांटे?"
कुछ यादे गांधीजी के समय की -बाबू के जी महेश्वरी
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करणी सेना का चौथा स्थापना दिवस

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हठीलो राजस्थान-15

नर चंगा निपजै घणा,
घणा थान देवात |
दिल्ली सामी ढाल ज्यूँ ,
धरा धींग मेवात ||८८||

जिस मेवात की वीर-भूमि में उत्कृष्ट वीर पैदा होते है ,जहाँ अनेक देवालय है तथा जो दिल्ली के आक्रान्ताओं के लिए ढाल स्वरूप रही है ; ऐसी यह प्रबल और प्रचंड मेवात की धरती है |

कांपै धर काबुल तणी,
पतशाही पलटाय |
आंटीला आमेर री,
दिल्ली दाद दिराय ||८९||

जिसके प्रताप से काबुल की धरती कांपती है तथा जो बादशाही को पलटने में समर्थ है,इस प्रकार के गौरवशाली आमेर की महिमा को दिल्ली भी स्वीकार करती है |

सरवर तरवर घाटियाँ
कोयल केकी टेर |
झर झरता झरणा झरै,
आछी धर आमेर ||९०||

जहाँ तालाबों,पेड़ों व घाटियों में कोयल व मोरों की ध्वनी सुनाई देती है तथा जहाँ पर झर-झर करते निर्झर झरते है ,आमेर की भूमि ऐसी सुहावनी है |

गंधी फूल गुलाब ज्यूँ,
उर मुरधर उद्याण |
मीठा बोलण मानवी,
जीवण सुख जोधांण ||९१||

मरुधरा का हृदय स्वरूप जोधपुर , उद्यान में खिले हुए सुगन्धित गुलाब के फूल के सामान है | यहाँ के लोग मीठी बोली बोलने वाले है अत: जीवन का वास्तविक सुख यहीं प्राप्त होता है |

उतरी विध उदयांण में ,
साज सुरंगों भेस |
दीलां बिच आछौ फबै,
झीलां वालो देस ||९२||

रेतीले राजस्थान के बीच झीलों वाला प्रदेश मेवाड़ ऐसे शोभायमान हो रहा है मानों विधाता श्रंगार करके किसी उद्यान अवतरित हो गई हो |

गाथा भल सुभटा नरां ,
पेच कसूमल पाग |
साहित वीरा रस सदां,
रागां सिन्धु राग ||९३||

जहाँ शूरवीर,सुभटों की गाथाएं गाई जाती हो,कसूमल पाग के पेच कसे जाते है,वीर रस से ओतप्रेत साहित्य का सृजन होता है तथा वीरों को जोश दिलाने वाला सिन्धु राग गाया जाता है | ऐसी यह मरुभूमि धन्य है |



बंजर जमीं |
मेरी शेखावाटी
हरयाणवी ताऊनामा
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हठीलो राजस्थान-14


होतो नह मेवाड़ तौ,
होती नह हिन्दवाण |
खान्ड़ो कदै न खडकतौ,
भारत छिपतो भाण ||८२||

यदि मेवाड़ नहीं होता तो कभी युद्ध भी नहीं होता व हिंदुत्व भी रक्षित नहीं होता; व इस प्रकार भारत का सूर्य भी अस्त हो जाता है |

बागड़ धर बैसाख में,
आम घणेरा आय |
चावल निपजै चाव सूं,
सुराई सजलाय ||८३||

बागड़ की इस धरती में बैसाख मॉस में आम बहुतायत से होते है | इस प्रदेश के शूरवीरों की वीरता की पांण से भूमि सजल हो गई है इसलिए यहाँ चावल भी बहुतायत से पैदा होता है |

अमल धरा पर उपजै,
चम्मल रौ परताप |
संबल दुखियां दीं री,
हाडौती बल आप ||८४||

हाडौती की धरती पर अमल तो चम्बल नदी के प्रताप से उत्पन्न होता है | किन्तु दीन दुखी लोगों को आश्रय तो हाडौती की यह धरती स्वयं अपने ही बल पर देती है |

सिर ओही लूंठी धरा,
रोही लूंठी ख़ास |
वा नर-सिंघा आसरो ,
(आ) सिंघा रो रहवास ||८५||

सिरोही की भूमि व जंगल दोनों ही बलवान है | एक में नर-सिंह व दुसरे में वन-सिंह निवास करते है |

कहसी भेद सु सकल जन,
सिर धरियौ जिण ताज |
जो रहसी अजमेर पर,
करसी भारत राज ||८६||

सभी लोग यही मर्म की बात कहेंगे कि जो शासक सिर पर मुकुट धारण कर अजमेर पर शासन करेगा वही भारत पर पर भी राज्य करेगा | (राजस्थान में यह किवंदती प्रचलित है कि अजमेर के शासकों का ही दिल्ली पर पुन: आधिपत्य होगा) |

वसुधा भोगी बाहुबल,
अगनी तेजस अंस |
आबू पर अवतारिया,
चारुं अगनी बंस ||८७||

जिन्होंने अपने बाहुबल से पृथ्वी का उपभोग किया है ,जो अग्नि के तेजोमय अंश है ,क्षत्रियों के ऐसे प्रतापी चरों ही अग्नि वंश इस आबू पर्वत पर अवतरित हुए है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत


पहेली से परेशान राजा और बुद्धिमान ताऊ |
मेरी शेखावाटी
ताऊ पत्रिका
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हठीलो राजस्थान-13

रगत बहायौ रोसतां,
रंगी धर, फण सेस |
दिल्ली-जड़ ढिल्ली करी,
मारू मुरधर देस ||७६||

मरुधर देश राजस्थान ने जब क्रोध किया ,तो रक्त बह उठा जिसने शेषनाग के फण पर टिकी धरती रंग गई और दिल्ली की जड़े ढीली हो गई | अर्थात दिल्ली के शासकों को भी विचलित कर दिया |

सूरां सतियाँ सेहरो,
सेखा धरती सान |
तो माटी में निपजै,
बढ़ बढ़ नर बलवान ||७७||

यह शान वाली शेखावाटी की धरा वीरों सतियों का सेहरा है | इस धरती पर एक से एक महान वीर पैदा होते है |

धरती आ ढुंढ़ाड़ री,
दिल्ली हन्दी ढाल |
भुजबल इण रै आसरै,
नित नित देस निहाल ||७८||

ढुंढ़ाड़ (जयपुर,आमेर राज्य) की यह धरती सदा दिल्ली की रक्षक रही है | इसके बल के भरोसे ही देश हमेशा कृतार्थ व सुरक्षा के प्रति निश्चिन्त रहा है |

धरती आ जैसाण री,
बरती कदै न और |
पाणी जठे पातळ में,
नारी नैणा कौर ||७९||

जैसलमेर की वीर भोग्या वसुंधरा को कभी भी कोई आक्रान्ता अधिकृत नहीं कर सका | इस क्षेत्र की विशेषता है कि यहाँ पर पानी या तो पाताल में है या नारी के नेत्रों में |

सूर,धनी, चंगों मनां,
व्हालो, नेह विसेस |
देस विदेसां जाणसी,
जांगल देस हमेस ||८०||

जहाँ शूरवीर,धनी व निर्दोष मन वाले तथा विशेष स्नेही लोग निवास करते है, ऐसा बीकानेर का क्षेत्र (जांगल देश) देश व विदेशों में सर्वत्र विख्यात है |

करता बांटी कायमी,
राजपूती एक सत्थ |
हाजर एक मेवाड़ जद,
बिजां लगी न हत्थ ||८१||

विधाता ने दृढ़ता और वीरता एक साथ ही बांटी थी | उस समय केवल मेवाड़ ही वहां उपस्थित था | इसलिए अन्य किसी को वीरता व दृढ़ता नहीं मिल सकी ||



मेरी शेखावाटी
शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सिर काटकर दुर्ग में फेंक दिया |
ताऊ पत्रिका
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हठीलो राजस्थान-12

डिगीयौ नह गढ़ डीग रो,
तोपां ताव पड़ंत |
कोरां खांडी नीं हुई,
गोरां डिंग गलन्त ||७०||

वीर सूरजमल का शौर्य स्मारक डीग का दुर्ग तोपों की मार से भी डिगा नहीं | यद्धपि गोरों (अंग्रेजों) की डींग(बड़ी-बड़ी बातें) नष्ट हो गयी परन्तु इस दुर्ग की कोर भी खंडित नहीं हुई |

वीर धरा रजथान री,
सूरां में सिर मोड़ |
हल्दी घाटी घाटियाँ,
गढ़ां सु गढ़ चितौड़ ||
राजस्थान की यह वीर भूमि,वीर-भूमियों में शिरोमणि है | घाटियों में हल्दी-घाटी व दुर्गों में चित्तौड़ दुर्ग श्रेष्ठ है |

हल्दी घाटी साख दे,
चेटक झाला पाण |
इण घाटी दिसै सदा,
माटी माटी राण ||72||


हल्दी घाटी आज भी चेतक व झाला मान सिंह की कर्तव्य निष्ठा की साक्षी दे रही है | इस घाटी के कण-कण में आज भी महाराणा प्रताप के दर्शन होते है |

माथा बात भारवियो,
खनवा खेत सधीर |
धार तराजू तोलियो,
भारत भाग अखीर||७३||

खानवा के रण-क्षेत्र में तलवार की तराजू पर मस्तक के बाटों से भारत का भाग्य अंत में राणा सांगा के हाथों ही तोला गया |

बोल्यो सूरी बैण यूँ,
गिरी घाट घमसाण |
मूठी खातर बाजरी,
खो देतो हिंदवाण ||७४||

शेरशाह सूरी सुमेरगिरी गांव की घाटी में युद्ध करने के बाद बोला -' मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान का राज्य खो देता |' इस युद्ध में जोधपुर के सेनापति राव जैता व कुम्पा ने दस हजार राजपूत सैनिकों के साथ सूरी की अस्सी हजार सैनिको वाली सेना के चालीस हजार सैनिक काट डाले थे और सूरी पराजित होते होते बचा था इस पर उसके मुंह से उपरोक्त वचन अनायास ही निकल पड़े थे |

सुर सारा अद्रस रमै,
नर-मुनि सुरपुर काज |
पाप नसाणो पुहुमिरा,
गुरुवर पुस्कर राज ||७५||

भूमि पर सभी के पापों को नष्ट करने वाला तीर्थराज पुष्कर सब तीर्थो में श्रेष्ठ है | यहाँ श्रेष्ठ नर,मुनि व अदृश्य रूप से देवता स्वर्ग का हित करने के लिए निवास करते है | अर्थात यहाँ स्नान करने वालों को स्वर्ग प्रदान कर ये देवता और मुनि स्वर्ग का ही हित करते है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत



शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सिर काटकर दुर्ग में फेंक दिया |
मेरी शेखावाटी
ताऊ पत्रिका
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क्षत्रिय

पृथ्वी पर है यह कौन ! खोयी सी आभा जिस पर दमक रही है !
मानो कीचड़ में कमल की पंखुडियां जैसी चमक रही है !१!
यह अरुणाई जो महलों में थी, क्यों धक्के खा रही है ?
दानवीर बनकर भी सहारा जीनेका, औरोसे क्यों पा रही है ?2

काँटों में राह बना कर, आगे बढ़ता जाता है !
रक्षक है प्रजा को अमृत दे कर, खुद जहर पिता जाता है !3!
रजपूती हुई लाचार, शक्ति की हार, भारत रोता !
वीरता हुई बेकार, कायरता का अंत यही तो होता !4!

अरे दोष देने वालो, तरुवर कब फल खाता है !
दोष इसे सब देते, अपना ध्यान किसे आता है !५!
कुर्सियों पर वाचाल, सडकों पर यह वीर राजपूत !
स्वार्थ हुए नेता, भारत के तक़दीर में थे ये वानीदूत !६!

सूर्य अमर हुआ तप-तपकर, क्या अग्नि से होगा ?
करते रहो शासन, कष्ट तो क्षत्रिय ही ने भोगा !७!
कष्टों में साहस भी होता, मत हमसे यूँ अटको !
शोषण करने वालो जागो, मत मदसे हूँ भटको !८!

यदि रजपूती को लल करोगे, तो लौटेगा चन्द्रगुप्तवीर !
हेलन लेकर, भगा यूनान अपमानित कर देगा वह रणवीर !९!
क्षत्रियों को पद दलित, हाय! यह त्रुटि हो गई है भारी !
रोती है, तड़फती है, भारत माता फिरती देश-देश मारी !१०!

दुर्गे कहों क्यों शत्रु मारे, क्यों फिरंगी अंग्रेज भगाए ?
क्यों आजाद किया राष्ट्र को, क्यों भगत जैसे फंसी चाहिए !११!
अंग्रेजों ने किया शासन,नैतिकता को नहीं इतना तोडा!
कष्टों में नहीं आजकी तरह,कर्त्तव्य से यूँ मुंह मोड़ा !१२!

बना रहे थे अंग्रेज भारत को,आर्थिक शक्ति और धन संपन्न!
स्वराज्य ने!डंकल अपना कर,भारत को किया विपन्न !१३!
नहीं चाँद में दाग, वह समय के दर्द की है परछाई !
क्षत्रिय ने शोषण नहीं किया,गर्दन भी कहाँ झुकाई!१४!

प्रजातंत्र में दुखी प्रजा, क्या क्या कष्ट उठा रही है ?
जिसकेहित घोड़े कीपीठ पर मरा,वहीभू इज्जत लुटा रही है! १५!
क्षत्रिय तो हट गया भारत माता!कर लेने दो इनको मन मानी!
जो गया पतालो में,तलवारों का,तड़फ रहा अब वह पानी !१६!

झूंठे आश्वाशन देकर,चुनाव लड़कर,कुर्सी ले सकता है !
तोड़कर वोट बैंक इनके, ऊपर शासन कर सकता है ! १७!
किन्तु जनता इसकी अपनी है, कैसे उसे यह बहकाए?
गर्दन उठा कर जो चलता आया,कैसे सर आज झुकाए?१८

जितना प्यार जनता से है मुझको क्या नेताजी को होगा?
तेरे लिए सीता त्यागी, पुत्र छोड़े, हर कष्ट को भोगा !१९!
तेरे लिए मित्रता भुला कर , बाबर से भी हारा !
भारतीयता सेथा प्यार मुझको राज्य कब था प्यारा!२०!

राज्य करते हो तुम, इसीलिए तो जनता डरती है!
क्षत्रिय पराधीन नहीं मुक्त है,प्रजा उसकी पूजा कराती है!२१!
नेताओ की चापलूसी, कर-कर पुल बाँधने वालो!
खुले जनालय में ,कोई क्षत्रिय से आंख मिलालो !२२!

त्याग नेहरु परिवार का नहीं, कुंवर सिंह का त्याग हुआ है भारी !
त्यागी थे गाँधी, सुभाष, चन्द्र, भगत सिंह कांग्रेस पर है भारी !२३!
क्षत्रियों को पदच्युत, भारत के लिए हम दुःख सुख सहते !
जल रहा है जिगर, आँखों से आंसू भी अब नहीं बहते !२४!

भारत वर्ष की रक्धा का भार,नयन नीर से भर आते !
इसीलिए मुंह तक आकर भी, प्राण फिर लौट जाते !२५!
नहीं बढ़ेगी,नहीं बढ़ेगी,अब नेताओ की यह क़तर!२७!
तड़फ उठा भूमंडल क्षत्रियने,जब क्षत्रित्वता छोडनी चाही!
रोया भारत,रोई प्रजा, सिंह छोड़ दुर्गा बढ़ी जग माहीं!२८!

"क्षत्रिय युवक संघ"की सत्य वाणी, धर्मं बचाने आई !
मिटने का था भारत, एक विचार आ जिंदगी बनाई !२९!
कौन एक संघ, क्षत्रिय के आगे, नया विचार लाया !
समर्थ बनो, समर्थ बनाओ, का नया दीप जलाया !३०!

बहुत लादे हो, और भी लड़ना, युद्ध में ही सुख है !
अपना जीवन देकर, तुम लेलो,जो अमर सुख है !३१!
इसे चलो इस भूपर,कदम तुमारे मिट न पाये !
जिसने हटाया तुम्हे,वाही स्वागत करने आये !३२!

...निराश हुआ जब क्षत्रिय ही तो, औरो का क्या कहना !
सागर ही सूख गया तो, अब नदियों का क्या बहाना !३३!
मुर्गा ही यदि सो गया तो, औरो को क्या कहते हों !
क्षत्रियही यदि हाथ पसारे, तो भिखारियों को क्या कहते हो!३४!

जो सब का अन्न दाता है, यदि वही अन्न को तरसे !
यज्ञ ही न हो तो फिर , इन्द्र बादल बन क्यों बरसे !३५!
कहाँ गयी वह शक्ति, जिससे जग जय करना था ?
कहाँ गया वह हिमालय, जिससे गंगामाँ को बहना था!३६!

किस्मत के फेरे देखो, भूले ही अब नहीं मिलती !
जलना ही जिसका कम है, वह तीली ही नहीं जलती !३७!
सब कुछ लुटा कर, अब क्या बटोरने चले हो ?
पहिचाने बिना ही, हर किसी से मिलेते गले हो !३८!

अपना मार्ग भूल कर, औरो के पर क्यों चल रहे हो !
प्रजा पालक थे, अब औरो के टुकडो पर पल रहे हो !३९!
तुम दुखड़ा अपना रोते, रोने ही अब रह गया !
पानी जो था तलवारों में, वह कहाँ अब बह गया !४०!

तुम्हे पद-दलित किया है , सहानुभूति मुझे तुमसे !
किन्तु क्या तुम लायक थे, क्या शासन होता तुमसे !४१!
विधना ने परीक्षा ली तुम्हारी, दुष्टों ने मांगी नारी !
पृथ्वी औरो की माता है, किन्तु तेरी तो थी नारी !४२!

तुमने कायरता अपना कर , साथ छोड़ा इसका !
स्वार्थो का नाता है ! है कौन यहाँ प्यारा किसका !४३!
अब क्या करना है, मै तुमसे कुछ नहीं कहता !
किसी के कहने से कौन, सही रास्ते पर चलता !४४!

तुझे क्या करना है , यह तू ही जाने !
पर जीते है वही जो मौत को ही जिंदगी माने !४५!
मै इतना अवश्य कहता हूँ, लड़ने वाले ही जीते है !
मरना तो है ही पर, यहाँ मरने वाले ही जीते है !४६!

इतना सुना कर, अपना केशरिया लिए बड़ा वह आगे !
कुछ मौन रह कर, क्षत्रिय भी, नंगे पैर आयें भागे !४७!
प्यार जो सबको देता, वही संघ बाहें फैलाये खड़ा !
मिलन अदभुत देख कर, भ्रातृत्व प्रेम भी रो पड़ा !४८!

कैंप लगने लगे , एक से एक बढ़ - बढ़ कर !
क्षत्रिय का बाल , उमड़ने लगा चढ़ - चढ़ कर !४९!
शिविरों में मिट्ठी में, बैठ कर दाल रोटी खाते है !
जो नहीं स्वर्ग में भी , ऐसा सूख ये पाते है !५०!

प्रात: काल सीटी बजने पर, इक्कठे होते है जगकर !
बुलाओ एक को, चार आते है भग भगकर !५१!
प्रेम यहाँ का देख कर, भरत मिलाप याद आता है !
जीवन यहाँ का देख कर, ऋषियों का आश्रम सरमाता है !५२!

कौन सूर्य वंशी? कौन चन्द्र वंशी? सब धरती पर लेटे है !
सबका धर्मं एक , सब ही एक माँ दुर्गे के बेटे है !५३!
उधर भ्रष्ट - तंत्र के कुचक्र से , भारत देश रोता है !
इधर खेल खेल में ही , कभी उपदेश होता है !५४!

खेल खेल में क्षत्रिय, लगा शस्त्र चलाने !
क्षत्रित्वता से ओत-प्रोत, होने लगा इसी बहाने !५५!
रुखी सुखी खाकर , अतुलित आनंद पाता !
राजपुत्रो के जीवन में, संघ इतिहास नया बनाता !५६!

कभी कभी राजे महाराजे, मनोरंजन के लिए आते !
स्वयं के वैभव को देख, स्वजीवन पर वे शरमाते !५७!
सोचते और कभी कहते, धन्य धन्य जीवन इनका !
कोई क्या कर सकता है, युद्ध स्वागत करता जिनका !५८!

इसी तरह संघ, बढता चला अगाड़ी !
खेल खेलने में क्षत्रिय था बहुत खिलाडी !५९!
कहते थे संघप्रमुख, कभी न उठाओ बैसाखी !
घूमों घर-घर, क्षत्रिय का अंग रहे न बाकी !६०!

स्वाभाव वनराज सा,इसीलिए एक न होंगे कभी!
पल-दोपल की एकता है.सोचने लगे ऐसा सभी!६१!
संघ-प्रमुख भी बेखबर न थे, मानते थे इनको मोती!
...लाख कोशिश करो, पर इनकी भी ढेरी कहाँ होती !६२!

जितना पास लाते है,उतने ही दूर होते है भाग कर !
किन्तु वे उदास न थे,विचार दिया स्थिति को भांप कर!६३!
जल धरा जिधर बहना चाहती है, बहाने दो !
मोती जहाँ पड़ा है, उसे वहीँ पड़ा रहने दो !६४!

जगह-जगह जा कर मोती ही में छेड़ करो !
जिस में हो सके न छेड़,उस पर ही खेद करो!६५!
यह काम करेगा "क्षत्रिय युवक संघ " हमारा !
"जय संघ शक्ति"बोल उठी है, जल धारा !६६!

सुई धागा हाथ में लेकर, "क्षत्रिय वीर ज्योति " आयी !
छिद्र पहले से ही थे, इसीलिए यह सबको भायी !६७!
घृणा अश्व, अपमान कवच, वेद ढाल बन गये !
वीरता के अस्त्र, सहस का बना शस्त्र, सब तन गये !६८!

इसी तरह, " क्षत्रिय वीर ज्योति" ने कटक बनाई !
दशहरा ही नहीं, दिवाली, होली भी खूब मनाई !६९!
भारतीयता को पदाक्रांत देख, वीर ज्योति हुंकारी !
जैसे नाग के मरने पर,नागिन हो फुंकार भरी |७०
पग-पग पर आक्रान्ता, है नेता बनने वाले !
भूमि तुम्हारी ही होगी, लेकिन होंगे डंकल के ताले !७१!

कदम कदम पर बंधन, है प्रजातंत्र यह कैसा !
हमारी "माता" को खरीदता है, विदेशियो का पैसा !७२!
जब पैसे का मद, आँखों में आग भर देता है !
तभी पराया वैभव, मन को पागल कर देता है !७३!

कृषकों के खेतो पर, खाद बीज विदेशियो के चलते है !
बीज स्वयंके ही होगे पर, विदेशियो के आदेश से डलते है!७४!
"जय क्षात्र-धर्मं"

"कुँवरानी निशा कँवर नरुका "
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति .


राजा मानसिंह आमेर |
तीन लघु कविताएं
ताऊ पहेली - 92
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भू-स्वामी आन्दोलन

भारत सरकार ने जागीरदारी उन्मूलन कानून बनाकर जब राजस्थान में जागीरे जब्त की तब राजस्थान के भू-स्वामियों ने १९५५-५६ में भारत की तत्कालीन सरकार के खिलाफ एक बड़ा सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा | जिसका नेतृत्व ठाकुर मदनसिंह दांता ने श्री तनसिंह बाढ़मेर,आयुवानसिंह हुडील,सौभाग्यसिंह भगतपुरा,रघुवीरसिंह जावली,शिवचरणसिंह निम्बेहेड़ा,सवाईसिंह धमोरा आदि के सक्रिय सहयोग से किया था | इस सत्याग्रह को इतिहास में भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से जाना है |
पेश है उसी आन्दोलन की पूरी जानकारी, आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले श्री सौभाग्यसिंह जी भगतपुरा की कलम से काव्य रूप में -


भौम बिहूणा भौमियां,
कार नहीं बेकार |
भूख भूपाला भटकता,
रोजी बिन रुजगार ||१

जमीं गई जमीयत गई,
ठौड़ ठाकरी ठाण |
ठिकाणां ठिकाणे लगा,
रजवाडी मौखाण ||२


आन्दोलन आकर अड्या,
पकड्या पांच हजार |
जैपर अलवर जोधपुर,
दिया जेल में डार ||३

रापट रोळी राज में,
पूछ न दाद पुकार |
ठौड़ ठौड़ थाणां थरप,
सुणण लागा जैकार ||४


रुल सभा जागीर बिल,
पेस हुवो जिण ठाण |
दस सत्याग्रही बिल समै,
कपि जिम लिवि कूदांण ||५

हाक वाक् होगी हवा,
सट पटाय मिम्बराण |
लंक गढ़ी कपिराण जिम,
थर थर लागा कम्पाण ||६


सीट छोड़ न्हाटा सदसे,
चैयर टेबलां हेट |
सत्याग्रही स्व सेवकां,
झेल सक्या नी फेंट ||७

कथित सैनानी सुतंत्र्ता,
जंग आजादी जोद |
मिटा मरदसी मांडणा,
मांडाणी मन मोद ||8


जब्ती बिल जागीर रो,
विधान सभा में पेस |
दस सिर वाली लंक जिम,
कूद पड्या कपि भेस ||९

कमर बाँध भेलो हुवौ,
सगलो क्षत्र समाज |
गति छछूंदर नागसी,
दुविधा विकट दराज ||१०


कुरुखेत पारथ जिसी,
बणी स्थिति आंण |
मोह छोह बांधव सगां,
करतव लियो पिछांण ||११

श्रीनाथ क्रपा करी,
करतब ग्यान करांण |
सत मत पथ राखे मती,
भय नह मन में आंण ||१२


छबि बिगाड़न छिपकला,
चमचा चाटुकार |
मुलक कुटिल दिल मानवां,
दूर रखै सुभकार ||१३

सात दिवस चिंतण सिविर,
सारणेस सिव थांन |
आन्दोलन रचना रची,
सगळी रो मो भान ||१४


आन्दोलन प्रभाव फल,
हणू सवाई देव |
सरविस सरकारी लगा,
जाणू सारो भेव ||१५

दांतै हुडील जावली,
बाढ़मेर निम्बहेर |
राजपुरै हरजी मुणा,
साथ सवाई फेर ||१६


आँदोलण चौपासणी,
भू-स्वामी सह बात |
भगतपुरै सौभागसी,
सारी विध रिय साथ ||१७

मुरब्बा बावीस संघनै,
समझौते सरकार |
दियै जिकण रै कारणे,
संघरी व्ही दो फार ||१८


खिंदासर उम्मीदसिं,
पूंख नेवरी बाग़ |
जाणे सारा रहसनै,
भगतपुरै सौभाग ||१९

कारण जो महामहिमकथै,
आन्दोलन आधार |
असैम्बली री मिनिट्स में,
बांच करै निरधार ||२०




ठाकुर सौभाग्य सिंह शेखावत,भगतपुरा
1 फरवरी 2004
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हठीलो राजस्थान-11

तीनों पोल्यां देवल्यां,
देवल तीन खड़ीह |
धव पहली सुत दूसरी,
तीजी आप लड़ीह ||६४||
दुर्ग के तीनों द्वारों की देहलियों पर तीन देवलियां है | पहली पति पर,दूसरी पुत्र पर तथा तीसरी स्वयं पर है जहाँ पर वह लड़ी थी |

चारों जुग तिहूँ लोक में,
ठावी एकज ठौड़ |
सूर-सती सुमरै सदा,
तीर्थ गढ़ चितौड़ ||६५||
चारों युगों व तीनों लोकों में एक ही तीर्थ स्थान चितौड़गढ़ धन्य है,जिसका सभी वीर व सतियाँ सदा स्मरण करती है |

बल बंकौ रण बंकड़ो,
सूर-सती सिर मोड़ |
प्रण बंकौ प्रबली धरा,
चंगों गढ़ चितौड़ ||६६||
बल में बांका,रण-बांकुरा,शूरों व सतियों का सिर-मौर,वचनों की टेक रखने वाला तथा आंटीला चितौड़ दुर्ग ही सर्व-श्रेष्ठ है |

रण रमियो,रण रोति सूं,
रणमल रणथम्भोर |
राख्यो हठ हमीर रौ,
कट-कट खागां कोर ||६७||
कवि रणथम्भोर की प्रशंसा करता हुआ कहता है कि युद्ध की परम्परा को निभाने वाला वीरों का रण-स्थल यह रणथम्भोर दुर्ग अविचल है,जिसने स्वयं असिधारा से खंड खंड होकर भी वीर हमीर के हठ को अखंड रखा |

सूरो गढ़ जालौर रो,
सूरां रौ सिंणगार |
अजै सुनीजै उण धरा,
वीरम दे हूंकार ||६८||
जालौर का यह वीर दुर्ग वीरों का श्रृंगार है | उसके कण-कण में आज भी विरमदेव की हूंकार सुनाई देती है |

पच्छिम दिस पहरी सदा,
गढ़ जैसाणों सेस |
अजै रुखालो सूरतां,
अजै रुखालो देस ||६९||
जैसलमेर का यह दुर्ग सदा से ही पश्चिम दिशा का प्रहरी रहा है | यह दुर्ग आज भी वीरता की रखवाली करता हुआ देश की रक्षा कर रहा है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

पहेली से परेशान राजा और बुद्धिमान ताऊ |
तीन लघु कविताएं|
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हठीलो राजस्थान-10

देणी धरती दान में,
देणी नह खग जोर |
लेणों भाला नोक सूं,
वा धर रहणी ठौर ||५८||
धरती दान में तो देनी चाहिए किन्तु तलवार के जोर इसे किसी को नहीं देनी चाहिए | भालों की नोक के बल पर जो इस धरती को लेता है,यह उसी के पास रहती है | अर्थात पृथ्वी वीर भोग्या है |

डूंगर चोटयां गढ़ घणा,
टणकां राखी टेक |
रखवाला रजथान रा,
अनमी सीस अनेक ||५९||
राजस्थान में गिरी-शिखरों पर अनेक गढ़ बने हुए है,जिनकी शूरवीरों ने रक्षा की | राजस्थान में कभी नहीं झुकने वाले ऐसे अनेक रक्षकों के मस्तक आज भी गौरव से उन गढ़ों से भी अधिक ऊँचे दिखाई देते है |

जस चमकाव जगत में ,
आप दुरग इतिहास |
जडिया इण विध भाकरां,
तारां जिम आकाश ||६०||
अपनी शौर्य गाथाओं से जो जगत में अपने सुयश का प्रकाश फैलाते है,ऐसे अनेक दुर्ग,पहाड़ों पर ऐसे शोभायमान हो रहे है जैसे आकाश में तारे |

वो गढ़ नीचो किम झुकै,
ऊँचो जस-गिर वास |
हर झाटे जौहर जठै,
हर भाटे इतिहास ||६१||
वह गढ़ भला नीचे कैसे झुक सकता है,जिसका निवास सुयश के ऊँचे शिखर पर हो ,जिसके हर द्वार पर जौहर की ज्वाला जगी हो तथा जिसके हर पत्थर पर इतिहास अंकित हो |

ऊपर गढ़ में हूँ गयो,
नम नम नायो माथ |
जठै बळी इक भामणी,
दो टाबरियां साथ ||६२||
मैं पर्वत पर स्थित उस गढ़ में गया तथा श्रद्धा से झुक कर वहां बारम्बार नमन किया ,जहाँ एक वीरांगना ने अपने दो अबोध बालकों के साथ अग्नि स्नान (जौहर) किया था |

वो गढ़ दिसै बांकड़ो ,
पोल्याँ जिण रे सात |
सातूं पोल्याँ देवल्यां,
सातां मंडिया हाथ ||६३||
वह गढ़ निश्चय ही बांका है,जिसके सात दरवाजे है और सातों ही दरवाजों पर देवलियां तथा हथेलियों के चिन्ह अंकित है | अर्थात जहाँ सातों ही दरवाजों पर वीर जुझार हुए है व सातों दरवाजों पर वीरांगनाए सतियाँ हुई है |


राजा मानसिंह आमेर |
तीन लघु कविताएं
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फिर से जीवित हो क्षात्र-धर्मं

कुँवरानी निशा कँवर नरुका -
पर-ब्रह्म परमेश्वर ने सृष्टि को रच दिया !
क्षरण से इसकी रक्षा का भार किसे दिया ?१?
कौन इसे क्षय से BACHA कर जीवन देगा ?
कौन इसे पुष्प दे कर स्वयं काँटे लेगा ?२?
नारायण ने ह्रदय से क्षत्रिय ,को पैदा किया है !
सृष्टि को त्राण क्षय से ,कराने का काम दिया है !३!
शौर्य, तेज़, धैर्य, दक्षता,और संघर्ष से न भागो !
दान-वीरता ,और ईश्वरीय भाव अब तो जागो !४!
इतने सारे स्वभाविक गुण ,दे दिए भर-कर !
हर युग,हर संघर्ष में जीवित रहो ,मर मर-कर!५!
हर क्षेत्र,हर काल में हमने चरम सीमा बनायीं !
चिल्ला चिल्ला-कर ,इतिहास दे रहा है, गवाही !६!
खता उसी फल को सारा जग,जिसे तू बोता था !
अखिल भूमि पर, तेरा ही शासन तो होता था !७!
किन्तु महाभारत के बाद ,हमने गीता को छोड़ दिया !
काल-चक्र ने इसीलिए ,हमे अपनी गति से मोड़ दिया!८!
जाने कहाँ गया वह गीता का ज्ञान जो हमारे पास था ?
समस्त ब्रह्माण्ड का ज्ञान, उस समय हमारा दास था !९!
यवनों के आक्रमण पर इसीलिए रुक गया हमारा विकास !
अश्त्र-सशत्र सब पुराने थे ,फिर भी हम हुए नहीं निराश !१०!
उस समय हमारे भी अश्त्र समयानुकूल होते काश !
तो फिर अखिल विश्व हमारा होता,हम होते नहीं दास !११!
यवन, मुग़ल, और मलेच्छ , इस देश पर चढ़े थे !
हम भी कम न थे ,तोप के आगे तलवार से लड़े थे !१२!
किन्तु कुछ तकनिकी ,कुछ दुर्भाग्य ने हमारा साथ निभाया !
अदम्य सहस और वीरता को ,अनीति और छल ने झुकाया !१३!
विदेशी अपने साथ अनीति और अधर्म को साथ लाये थे !
मेरे भोले भारत को छल कपट और अन्याय सिखाये थे !१४!
तब तक हम भी, क्षत्रिय से ,हो गये थे राजपूत !
गीता ज्ञान के आभाव में नहीं रहा था शांतिदूत !१५!
हिन्दू ,राजपूत और सिंह जैसे संबोधन होने लगे !
अपने ही भाईयों को,क्षत्रिय इस चाल से खोने लगे !१६!
कुछ राजा और राजपूत अलग हो गये छंट-कर !
पूरा क्षत्रिय समाज छोटा होता गया बंट बंट-कर !१७!
फिर फिरंगी, अंग्रेज, भारत में आये धोखे से !
हम राज्य उन्हें दे बैठे , व्यापर के मौके से !१८!
लॉर्ड मेकाले ,सोच समझ कर सिक्षा निति लाई !
क्षत्रियो के संस्कार पर अंग्रेज संस्कृति खूब छाई !१९!
क्या करे और कैसे कहे ,वह पल है दुःख दायी !
सबसे पहले एरे ही अलवर को वो सिक्षा भायी !२०!
हमने अपना कर विदेशी संस्कृति को क्षत्रियता छोड़ दी !
अपने साथ उसी समय ,भारत की किस्मत भी फोड़ दी !२१!
आज उसी का फल सारा जग हा हा कार कर रहा है !
धर्मं, न्याय ,और सत्य हर पल ,हर जगह मर रहा है !२२!
अधर्म, अन्याय ,और असत्य का नंग नाच हो रहा है !
हर नेता ,हर जगह ,हर पल ,भेद के बीज बो रहा है!23!
कहीं जाति के नाम ,कहीं आतंक के नाम शांतिको लुटा दिया !
धर्मं, न्याय और सत्य का ध्वज हर जगह झुका दिया !24!
वायु से लेकर जल तक ,हर जगह गंध मिला दिया !
सारे ब्रह्माण्ड का गरल ,मेरी जनता को पिला दिया !२५!
जिसकी रक्षा के लिए क्षत्रिय बने , उसी को रुला दिया !
फिर भी क्षत्रिय को ,न जाने किस नशे ने, सुला दिया !२६!
स्वार्थी नेताओ ने ,जनता को खूब भरमाया है !
हमारे विरुद्ध न जाने, क्या-क्या समझाया है !27!
इतिहास को तोड़-मरोड़ ,नेहरु और रोमिला ने भ्रष्ट कर दिया !
जन-बुझ कर, उसमे से ,क्षत्रिय गौरव को नष्ट कर दिया !२८!
क्योंकि वे जानते थे ,कि इनकी हार में, भी थी शान !
और जनता भी बेखबर, न थी ,उसे भी था भान !२९!
गुण-विहीन ,तप-विहीन ,धर्म-हीन कोई क्षत्रिय हो नहीं सकता !
क्षत्राणी कि कोख मात्र से, पैदा होकर क्षत्रिय हो नहीं सकता !३०!
जब तक न गीता का रसपान करेगा जीत न सकेगा समर !
रण-चंडी बलिदान मांग रही है ,तू कस ले अपनी कमर !३१!
कभी प्रगति ,कभी स्वराज्य का सपना दिखा खूब की है मनमानी !
प्रगति तो खाक की है ,चारोओर आतंक है पीने को नहीं है पानी !३२!
फिर भी कभी कर्जे माफ़ी ,कभी आरक्षण के सहारे होता है चयन !
राष्ट्र जाये भाड़ में ,शांति जाये पाताल में , वोटो पर होते है नयन !३३!
कभी बोफोर्स, कभी चारा, कभी तेल घोटाले से बनता है पेशा !
खूब लुटा है भोली जनता को ,यह प्रजातंत्र चलता है कैसा !३४!
यों तो कुकुमुत्ते की तरह गली-गली में दल है अनेक !
लूटने में भारत माता को, भ्रष्टाचार में लिप्त है हरेक ! ३५!
गरीब का बसेरा सड़क पर , और नंगे पैर चलता है !...
सकल-घरेलु उत्पाद का अधिकांश धन,विदेशी बैंकोमें डलता है ! ३६!
भारतीयता से घृणा कर, हर चीज ...,विदेशी खाते है !
भारत की जनता को लूटने में फिर भी वो नहीं शरमाते है !३७ !
हर त्यौहार ,हर ख़ुशी में बच्चो को सौगात विदेशी लाते है !
हद तो तब होती है, जब चीज ही नहीं बहू भी विदेशी लाते है! ३८!
स्वतंत्रता के नाम पर हमने ...जला दिए विदेशी परिधान !
किन्तु आजादी के बाद हमने लागु कर दिया विदेशी विधान!३९ !
अपराध -संहिता ,दंड-संहिता,अंग्रेजो का चल रहा है विधान !
६३ वर्ष गवाँ दिए हमने फिर भी खोज नहीं सके निधान !४०!
चारोऔर तांडव महा -विनाश का, तेजी से चल रहा है !
हर बच्चा ,हर माँ रो रही ,मेरा सारा भारत जल रहा है ! ४१!
सब कुछ खो कर ,मृत जैसा आराम से क्षत्रिय सोया है !
महा पतन का कारण एक ही,क्षत्रिय ने राज्य खोया है !४२!
न जाने किस धर्म की ओट लेकर, क्षत्रिय कहाँ भटक गया ?
किस जीवन स्तर,किस विकास के चक्कर में अटक गया !४३?
दुनिया के अन्धानुकरण ने ,क्षात्र-धर्मं को दे दिया झटका !
जाट,गुजर,अहीर मीणा ही नहीं,अब तो राजपूत भी भटका !४४!
अपना धर्मं. अपना कर्म छोड़ चा रहा है ,झूंठा विकास !
बहाना लेकर , कर्म छोड़ कर, हो रहा है समय का दास !४५!
समय का दास बन ,अपने आपको बदल कर होरहा है प्रसन्ना !
भूल रहा है तेरी इसी ही हरकत से भारत हो गया है विपन्न !४६!
जग में हो कितना ही दर्द ,क्षत्रिय ही को तो हरना है !
अपने मरण पर जीवन देता, क्षत्रिय ऐसा ही तो झरना है!४७!
रास्ता बदल दे सूर्य देव ,अपनी शीतलता चाँददेव छोड़ दे !
है सच्चा क्षत्रिय वही , जो वेग से समय का मूंह मोड़ दे !४८!
जितना मन रखा ,उतना ताकतवर है नहीं समय का दानव !
समय की महिमा गाने वालो,ज्यादा ताकत रखता है मानव !४९!
प्राण शाश्वत है ,मरता नहीं ,किसी के काटे कटता नहीं !
प्राण बल को प्रबल करो, प्राणवान संघर्ष से हटता नहीं !५०!
अर्जुन भी हमारी ही तरह, पर-धर्मं को मानते थे !
भलीभांति श्री कृष्ण इस गूढ़ रहस्य को जानते थे !५१!
इसीलिए साड़ी गीता में नारायण ने ,उसको धर्म बताया !
उस सर्वश्रेष्ट धनुर्धर को, क्षत्रिय का क्षात्र-धर्म बताया !५२!
जब तक सत्य-असत्य,धर्मं-अधर्म का अस्तीत्व बना रहेगा !
इस ब्रहामंड की रक्षा के लिए हमारा भी क्षत्रित्व बना रहेगा !५३!
जब आज अधर्म,अन्याय ,असत्य और बुराई का राज है !
तो फिर पहले से कहीं ज्यादा, जरुरत क्षत्रिय की आज है !५४!
मरण पर मंगल गीत गा कर ,क्षत्राणी सदा बचाती धर्मं !
हम सब का एक ही कर्म फिर से जीवित हो क्षात्र-धर्मं !५५!
"जय क्षात्र-धर्मं"

"कुँवरानी निशा कँवर नरुका "

श्री क्षत्रिय वीर ज्योति



पहेली से परेशान राजा और बुद्धिमान ताऊ |
बाते फ्री में बात करवाने वाले जुगाड की
ताऊ डाट इन: महाराज ताऊ धृतराष्ट्र द्वारा गधा सम्मेलन 2010 आहूत
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कब तक इतिहास पर गर्व करते रहोगे ?

कुँवरानी निशा कँवर नरुका
इतिहास का संधि विच्छेद है इति + हास अर्थात यह हो चूका है ! यदि किसी विद्वेष की भावना को दूर रखा जाय तो जो निश्चय ही हो चूका है वही इतिहास में लिखा जाना चाहिए ! किन्तु जैसा कि हम पहले ही कह चुके है कि भारतीय इतिहास में तोड़मरोड़ कि गई है , उ...सके साथ छेड़छाड़ किया गया है अत: कुछ स्वार्थी तत्वों ने अपने स्वार्थ के लिए , उसमे कुछ शब्द जोड़े एवं बहुतसे शब्द घटा दिए है ! बावजूद इस सबके भारतीय इतिहास में क्षत्रियो की गौरव गथाओ कि कोई कमी नहीं है ! पूर्व प्रधान मंत्री श्री चन्द्र शेखर ने तो कहा है कि " यदि भारतीय इतिहास मेंसे राजपूत इतिहास को निकल दे तो शून्य शेष रह जायेगा " ! निसंदेह तमाम जोड़ तोड़ के बावजूद राजपूतो को इतिहास में एक प्रमुख स्थान है ! इसके लिए राजपूत , इतिहासकारों का अहसानमंद नहीं हो सकता क्योकि राजपूतो ने अपनी वीरता, त्याग एवं बलिदान का जो कौशल दिखाया; वह संसार कि किसी जाति ने प्रदर्षित नहीं किया !
कर्नल टोड ने " हिस्टरी ऑफ़ राजपुताना " में लिखा है कि " विश्वास ही नहीं होता है कि राजपूत जैसी जाति मूलतः भारतीय ही हो "! उसने आगे लिखा है कि राजपूताने की चप्पा-चप्पा भूमि थर्मपोली है ! संसार में वीर जातियों की कोई कमी नहीं है ! बहुत सी जातियों ने वीरता का परिचय दिया है ! संसार में युद्ध प्रिय या युद्धकला में पारंगत जातियों की भी कोई कमी नहीं है ! और शासन करने में पारंगत जातियों की भी कोई कमी नहीं है ! और शायद दानी एवं उदार जातियों की भी कोई कमी नहीं रही है ! लेकिन इन सरे गुणों का समावेश किसी एक जातिमे हो एसा उदहारण किसी जाति में आज तक देखने को नहीं मिला है ! राजपूत जाति प्रसिद्ध इसलिए नहीं है की उसने लम्बे समय तक शासन किया है बल्कि वह अपने गुणों की वजह से श्रद्धयोग्य रही है ! राजपूतो में त्याग, बलिदान, वीरता, एवं न्यायप्रियता तथा उदारता का अद्भुत संगम का समावेश है ! सर काटने बाद घंटो लड़ाई जरी रखने का उदहारण केवल और केवल राजपूत जाति में ही देखने को मिला है |

परिणय एवं प्रण मेसे हमने हामेशाही प्रण को ही स्वीकार किया है .विवाह के गठजोड़ो को हमने काटकर युद्धों में प्रवेश किया है ! हार या मौत निश्चय जानकर भी हमने युद्ध किया है ! हमने कभी भी मौत का भय नहीं माना ! संसार की अधिकांश वीर जातियों में केवल उनके पुरुष वर्ग की वीर गाथाये है ! किन्तु अकेली राजपूत जाति ऐसी है जिसमे क्षत्रानियो को क्षत्रियो से ज्यादा जाति के गौरव का श्रेय जाता है ! सतीत्व की जो अनोखी मिसाल क्षत्रानियो ने प्रस्तुत कि; वह वाकई आश्चर्य जनक है ! केवल मर जाने के बाद पति के साथ चिता में जलना ही सतीत्व नहीं है ....बल्कि पति के अधूरे कार्य एवं लक्ष्य में अपने को समर्पित कर देना उससे भी बड़ा सतीत्व है ! और क्षत्रानियो ने इस कर्तव्य को बखूबी निभाया है ! यह कौन मुर्ख है जो इसे उस ज़माने की परम्परा कह रहा है ? विधवा का पुन: विवाह के बारे में, मै यहाँ ज्यादा कुछ नहीं लिखना चाहता इसके असली कारण है की विधवा पुन: विवाह की बात वे ही लोग कर सकते है जो कि विवाह को एक सौदा मानते है !
जरा ध्यान करो एवं मनन करो की हमने ऐसी कौनसी व्वस्था की है कि विपरीत समय निकल जायेगा और अच्छा समय आने पर फिर से क्षात्र धर्मं का पुनरुद्धार होगा ! हम हर रोज कोई न कोई क्षत्रिय कर्म छोड़ते जारहे है ! ...तथा एक दिन ऐसा भी आयेगा कि हम में कोई क्षत्रिय गुण शेष है या नहीं, लोग इस पर भी सट्टा लगायेंगे ! हमारे पास क्षात्र धर्मं को पुनर्स्थापित करने की कोई योजना है ? योजना तो दूर की बात है हम तो उस बारे में सोचते भी नहीं, जैसे समय एवं व्वस्था ने हमे बिलकुल हरा दिया है, पंगु बना दिया है !
अपने खोये गौरव को प्राप्त करने के लिए हमको ही कुछ करना होगा ! इस कार्य हमारी सहायता करने नहीं आयेगा ! हाँ यदि हम अपनी कमर कश कर मैदान में उतरोगे, तो सहायता के लिए स्वयं श्री कृष्ण सारथी बनकर फिर से गीता का रसपान कराने आयेंगे पर शायद हम उन्हें पहचान न सके ! केवल अपना ममेरा, चचेरा, फुफेरा या जाति भाई ही मान सके, पर यदि अर्जुन की तरह हमने उसे अपना गुरु एवं शखा भी मान लिया तो इस महाभारत को अवश्य जीत लेंगे ! आपको इतनी सारी कड़वी सच्चाई भी बताई गयी है ! आप स्वयं जानते है की हमने आज यदि आलस्य नही छोड़ा तो हम अपना क्षत्रित्व, अपना पुरुषार्थ, अपना धर्मं, सतीत्व, अपनी पहिचान सब कुछ गवां देंगे ! आज हमारे पास जो बचा है उससे संतोष मत करो, अपने क्षत्रित्व को बढाओ ! हमे अपना खोया गौरव प्राप्त करना है ! मरे हुए शारीर को कोई भी अपने घर में नहीं रखता है , उसे श्मशान में अंतिम क्रिया के लिए लेजाया जाता है ! आप अपने को मरा हुआ मत दिखाओ, नहीं तो यह संसार क्षण मात्र में हमे फूंक आयेंगे और तब क्षत्रिय केवल " भाप का इंजन " बनकर रह जायेगा, जो केवल इतिहास की वस्तु मात्र है ! इतिहास पर गर्व करो पर अपने वर्तमान को भी अपने पूर्वजों के इतिहास के तुल्य तो बनाओ, जिससे लोग कमसे कम इस बात पर विश्वास तो करें कि हम भगवान श्री राम एवं श्री कृष्ण के वंशज है |
"जय क्षात्र-धर्मं "
कुँवरानी निशा कँवर नरुका
"श्री क्षत्रिय वीर ज्योति "


शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सिर काटकर दुर्ग में फेंक दिया |
बहुत काम की है ये रेगिस्तानी छिपकली -गोह|
एक साधारण पर एतिहासिक जगह
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हठीलो राजस्थान-9

धुण हिड़दै इक सांभली,
भणतां खुद भगवान |
राग सदा सत वाहिनी,
संदेसो सत -ग्यान ||५२||
हे सखी ! भगवान का भजन करते करते मुझे हृदय में स्वयं भगवान की एक धुन सुनाई देती है | उस ध्वनि से मेरे हृदय में,सत्य के कम्पन से उत्पन्न हुई एक अनुपम राग,अनुभव होती है व सत्य-ज्ञान का संदेश कानों में सुनाई देता है |

माई मां, निज मात रो,
जाणे भेद जहाण |
निज धरमा मरणो भलो ,
पर धरमां नित हांण ||५३||
सौतेली मां व अपनी जन्म दात्री मां में कितना अंतर होता है -इसे सारा संसार जानता है | ठीक एसा ही भेद स्व-धर्म और पर-धर्म में होता है | स्वधर्म के लिए मरना सदा ही श्रेयष्कर है, जबकि परधर्म सदा हानिकारक होता है |

सींचै रुधिर सजागणो,
सिर सूंपै मम सैण |
उण घर रही ज आज लग,
बोले आ धर बैण ||५४||
यह धरती कहती है कि जो जागृत रहकर मुझे रक्त से सींचते है और मेरे इंगित मात्र पर अपना सिर समर्पित कर देते है, उसी घर में मैं आज तक रही हूँ | अर्थात अपना सर्वस्व बलिदान करने को तत्पर रहने वाले वीरों के ही अधिकार में मैं रही हूँ |

रगतां न्हाती नित रहै,
साजै नित सिंणगार |
परणी सूं धरणी प्रबल,
नखराली आ नार ||५५||
यह धरती प्रतिदिन रक्त से स्नान करती है और प्रतिदिन नविन श्रंगार करती है | इस प्रकार यह धरती पत्नी से भी ज्यादा श्रंगार प्रिय व प्रबल है ||

इस माथै सती अमर,
सतियाँ में सिरताज |
बल परणी,धरणी बली,
एकला दिसै आज ||५६||
इस पृथ्वी पर सती अमर है | ऐसी सतियाँ में बल के साथ विवाह होने के कारण बलवती हुई यह धरती आज महान दिखती है |

उबड़ खाबड़ अटपटी,
उपजै थोड़ी आय |
मोल मुलायाँ नह मिलै,
सिर साटे मिल जाय ||५७||
उबड़-खाबड़,बेढंगी व कम उपजाऊ होते हुए भी यह धरती किसी मोल पर नहीं मिल सकती | परन्तु जो इसके अपने मस्तक का दान करते है उसको यह धरती अवश्य मिल जाती है | अर्थात राजस्थान की यह उबड़-खाबड़ अनुपजाऊ भूमि किसी मुद्रा से नहीं मिलती इसे पाने के लिए तो सिर कटवाने पड़ते है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत,हुडील


शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सिर काटकर दुर्ग में फेंक दिया |
ताऊ पहेली - 91 (Bhoram Dev Temple-Chattisgarh)
बहुत काम की है ये रेगिस्तानी छिपकली -गोह
एसिडिटी और मोटापे से कैसे बचे ?
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हठीलो राजस्थान-8

नैणा नाथ न निरखियौ,
परणी खांडै साथ |
बलती झाला वा रमी ,
रगड़े हन्दी रात ||४६||
उस वीरांगना ने अपनी आँखों से पति के कभी दर्शन नहीं किये ,क्योंकि विवाह के अवसर पर उसका पति युद्ध-क्षेत्र में चला गया था ,अत: पति की तलवार के साथ ही उसका विवाह हुआ था | युद्ध क्षेत्र में पति की वीर-गति का समाचार आने पर वही पत्नी,जिसके हाथों से हल्दी का रंग भी नहीं मिटा था ,अपने आप को अग्नि के समर्पित कर सती हो जाती है |

संग बल्तां लाड़ी बणे,
मांगल राग नकीब |
रण ठाडो लाडो सजै,
इण घर रीत अजीब ||४७||
चिता पर अपने वीर पति के शव के साथ सहगमन करते समय यहाँ की महिलाऐं दुल्हन का वेश धारण करती है व वीर युद्ध के लिए प्रस्थान हेतु दुल्हे का सा केसरिया वेश धारण करते है | इन दोनों अवसरों पर ही मंगल राग वाध्यों द्वारा बजाई जाती है | इस वीर भूमि का यही रिवाज है |

घर व्हाली धण सूं घणी,
धर चूमै पड़ खेत |
रगतां रंगे ओढ़णी,
रगतां बाँदै रेत ||४८||
वीरों की धरती अपनी पत्नी से भी अधिक प्यारी है | इसीलिए धराशायी होने पर वे धरती को ही चूमते है तथा अपने रक्त से उसकी मिटटी रूपी चुन्दडी को रंगते है व अपने रक्त रंजित शरीर के साथ मिट्टी को लपेट कर स्वर्ग में साथ ले जाते है |

भड पडियो रण-खेत में,
संचै पूँजी साथ |
राज सांधे निज रगत सूं,
पिण्ड- दान निज हाथ ||49||
वीर-योद्धा रण-क्षेत्र में धराशायी हो गया,किन्तु सत्य की संचित सम्पत्ति फिर भी उसके साथ है | इसीलिए किसी दुसरे को उसका पिंडदान कराने की आवश्यकता नहीं है | वह स्वयम ही अपने रक्त से भीगी हुई मिट्टी के पिण्ड बनाकर अपने ही हाथ से अपने लिए पिंडदान करता है |
(इतिहास में खंडेला के राजा केसरीसिंह द्वारा रण-भूमि में अपने रक्त से अपना पिंडदान करने का उदहारण मौजूद है राजा केसरीसिंह पर ज्यादा जानकारी जल्द ज्ञान दर्पण पर प्रस्तुत की जाएगी)


पग-पग तीरथ इण धरा ,
पग- पग संत समाध |
पग- पग देवल देहरा ,
रमता जोगी साध ||५०||
इस धरती पर स्थान-स्थान पर तीर्थ है,स्थान -स्थान पर संत-महात्माओं की समाधियाँ है ,स्थान-स्थान पर देवल और देवालय है तथा स्थान-स्थान पर यहाँ योगी और साधू महात्मा विचरण करते है |

कर भालो,करवाल कटि,
अदृस हय असवार |
इण धरती रै उपरै,
लड़ता नित जुंझार ||५१||
हाथ में भाला और कमर में तलवार बाँध कर तथा अश्व पर सवार होकर अदृश्य जुंझार इस धरती पर हमेशा लड़ते थे (युद्धरत रहते थे)

स्व.आयुवानसिंह शेखावत


शर्त जीतने हेतु उस वीर ने अपना सिर काटकर दुर्ग में फेंक दिया
ब्लोगिंग के दुश्मन चार इनसे बचना मुश्किल यार
ताऊ डाट इन: ताऊ पहेली - 91
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हे राम........!

क्या आपने आज का "आज तक " चैनेल देखा? "हे राम !" नाम के प्रोग्राम के जरिये उन्होंने संत श्री आसाराम जी बापू, श्री सुधांशु जी महाराज, श्री दान्ति महाराज आदि अध्यात्म से जुड़े दिग्गजों पर स्टिंग ओपरेशन चलाया है और उनकी पोल खोलने की कवायद की है .....! आज तक की यह बात सही हो या गलत; लेकिन उन तमाम लाखो भक्तों की श्रद्धा को ठेंच पहुची है! जिनकी ओर समाज की आँखे श्रद्धा भाव से देखती है ; उन्हें अपने चरित्र के बारे में ....अपने हर कदम के बारे में अति सजग रहना चाहिए...! और जब आप उस स्थान से गिर जाते है तो आप कानून ,सरकार या अदालत के मुजरिम नहीं बल्कि आप मुजरिम है उन भोले-भाले श्रद्धालु लोगों के जिन्होंने आप में प्रभु का रूप देखा था! संत-महात्मा जैसे शब्द केवल अर्थ से महान नहीं वे कर्म से भी महान होते है! जो निर्मोही हो, जो धन-मान-वासना या सत्ता से दुरी रखे वही संत या महात्मा कहलाने के अधिकारी है! संत जो अपने ज्ञान से --कर्म से इस सृष्टि को पावन करे...जन-मन का उद्धार करे...! सभी संत गलत नहीं होते है! आज भी ऐसे कई संत है जो वाकई में इस महान पद के हक़दार है लेकिन कुछ महाशय संत शब्द को बदनाम करते है यह दुःख दायी है! यह वो भूमि है जिसे पतंजलि,वशिष्ठ जैसे महान मुनि; संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, संत गुरुनानक देव जैसे महान संतों ने अपने कर्म से पावन की..है! कितने नाम हम यहाँ दे सकते है!


संतों को मोह-माया-मत्सर से दूर रहना चाहिए...! गलत काम करने वाले तथाकथित लोग अपने कर्म से समूची संत जाती को बदनाम तो कर ही रहे है बल्कि यहाँ की महान संस्कृति को भी बदनाम कर रहे है!अगर ऐसे फाइव स्टार संत धन की राशी ज़माने लगे .....तो पाखंडी दुनिया अपनी महान संस्कृति भी बदनाम करने की कोशिश करेगी! अब यह भक्तों की जिम्मेदारी है जो सही संत पहचाने ....परखे..और सजग रहे ताकि कोई मायावी फिर से उनकी श्रद्धा को ठेंच ना पहुचाये!
इस कार्यक्रम में आचार्य धर्मेन्द्र और बाबा रामदेव जी ने भी  ऐसी बात पर दुःख जताया है जो जन-भावना का प्रतिबिम्ब है!
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हठीलो राजस्थान -7

बौले सुरपत बैण यूँ ,
सुरपुर राखण सान |
सुरग बसाऊं आज सूं,
नान्हों सो रजथान ||४०||
सुर-पति इंद्र कहता है कि स्वर्ग की शान रखने के लिए आज से मैं यहाँ भी एक छोटा सा राजस्थान बसाऊंगा | (ताकि लोग स्वर्ग को भी वीर भूमि समझे )

दो दो मेला भरे,
पूजै दो दो ठौड़ |
सिर कटियो जिण ठौड़ पर ,
धड़ जुंझी जिण ठौड़ || ४१||
एक ही वीर की स्मृति में दो दो स्थानों पर मेले लगते है और दो स्थानों पर उनकी पूजा होती है | एक स्थान वह है ,जहाँ युद्ध में उस वीर का सिर कट कर भूमि पर गिरा तथा दूसरा स्थान वह है जहाँ सिर कटने के उपरांत उसकी धड़ (शरीर) लडती (जूझती)हुई धराशायी हुई | क्योंकि सिर कटने के बाद भी योद्धा का धड़ युद्ध करता हुआ कई मीलों तक आगे निकल जाता था |

मरत घुरावै ढोलडा,
गावै मंगल गीत |
अमलां महफल ओपणी,
इण धरती आ रीत ||४२||
यहाँ मरण को भी पर्व मानते हुए मृत्यु पर ढोल बजवाये जाते है एवं मंगल गीत गवाए जाते है | अमल-पान की महफ़िल होती है | इस वीर-भूमि की यही रीत है |

उण घर सुणिया गीतडा,
इण घर ढोल नगार |
उण घर परण त्युहार हो ,
इण घर मरण त्युंहार ||४३||
विवाह के उपलक्ष्य में कन्या पक्ष के यहाँ मंगल गीत गाए जा रहे थे ,उसी समय युद्ध की सूचना मिलने पर वर के घर पर युद्ध के ढोल नगारे आदि रण-वाध्य बजने लगे | उधर परण-त्योंहार मनाया जा रहा था तो इधर मरण-त्योंहार की तैयारियां हो रही थी |

देवलियां पग पग खड़ी,
पग पग देव निवास |
भूलोड़ा इतिहास रौ,
गावै नित इतिहास ||४४||
राजस्थान में स्थान स्थान पर देवलियों के रूप में प्रस्तर के वीर स्मारक खड़े है और स्थान स्थान पर ही वीरों के देवालय है जो हमारे विस्मृत इतिहास का नित्य इतिहास गान करते है अर्थात विस्मृत इतिहास की स्मृति कराते है |

कुवांरी काठां चढ़े,
जुंझे सिर बिण जंग |
रीठ-पीठ देवै नहीं ,
इण धरती धण रंग ||४५||
किसी वीर को पति बनाने का संकल्प धारण कर लेने के बाद यदि उस वीर की युद्ध में मृत्यु हो जाय तो संकल्प करने वाली वह कुंवारी ही सती हो जाया करती थी तथा यहाँ के शूरवीर सिर कटने के बाद उपरांत भी युद्ध करते थे व युद्ध भूमि में पीठ नहीं दिखाते | ऐसी यह वीर-भूमि बारम्बार धन्य है |

आयुवानसिंह शेखावत,हुडील


जोधपुर राजघराने में गूंजेगी शहनाइयाँ |
ताऊ डाट इन: ताऊ पहेली - 91
बाते फ्री में बात करवाने वाले जुगाड की
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संघर्ष एवं क्षत्रिय

हर सिक्के के दो पहलु है |इसी तरह इस संपूर्ण सृष्टि में भी हर वस्तु,हर चीज के के दो पहलु है |यहाँ अच्छाई है तो बुराई भी है,यहाँ अमृत है तो ,बिष भी है, यहाँ आदि है तो अंत भी है,जीवन है तो मृत्यु भी है|कडुवा है तो मधुर भी है ,आग भी है तो पानी भी है |अर्थात प्रत्येक चीज के दो पहलु है, यह स्वयंसिद्ध है |अब एक और भी बात है कि ,यही सब विपरीत चीजे मनुष्य के मानस पटल पर भी दोनों पहलु है ,|मानस-पटल पर न्याय है तो अन्याय भी है,धर्मं है तो अधर्म भी है ,सत्य है तो असत्य भी है ,कडुवाहट और मधुरता भी है |दोनों तरह की प्रवृतिया मानस-पटल पर हर समय होती है |अच्छाई युक्त प्रवृतियों को अमृतमयी प्रवृतिया और बुराई-युक्त प्रवृतियों को बिष-मयी प्रवृतिया कहते है|और इन दोनों प्रवृतियों में सतत:संघर्ष होता रहता है |यह संघर्ष "श्री गुलाब कोठारी जी" ने अपनी कृति "मानस-३" में "संघर्ष" नाम से बड़े रोचक एवं तथ्य-परख तरीके से व्यक्त किया है |संघर्ष के बिना सृष्टि आनंद-मयी नहीं होसकती क्योंकि इस समुद्र-मंथन जैसे संघर्ष के बाद अमृत-रूपी आनंद प्राप्त होता है |सृष्टि के अस्तीत्व के लिए इन दोनों प्रवृतियों का अस्तीत्व भी आवश्यक है |बिष-मयी प्रवृतिया जिने आसुरी प्रवृतिया भी कहा जाता है पतन के मार्ग पर लेजाती है है ,और अमृत-मयी प्रवृतिया जिन्हें दैवीय गुण या प्रवृतिया भी कहा जाता है उत्थान की ओर लेजाती है | जैसे कि पतन की यानि नीचे की ओर जल की गति स्वत: होती है, उसे किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती है, वैसे ही आसुरी प्रवृतियों (बिष- मयी प्रवृतियों )का उपार्जन नहीं करना पड़ता, यह तो स्वत:ही हमारे मानस-पटल पर छाजाती है | और उत्थान की यानि जल को ऊपर की ओर चढाने के लिए कठिन प्रयास करने पड़ते है, तब कहीं जाकर जल ऊपर चढ़ पता है वो भी धीमी गति से, वैसे ही अमृत-मयी प्रवृतियों और दैवीय गुणों का उपार्जन बड़ी कठिनाई से करना पड़ता है | इस प्रकार के कठिन प्रयासों का ही नाम ही तपस्या है,| मन के अन्दर जो स्वत;विकार पनप जाते है ,और यदि उन पर नियंत्रण नहीं किया जाये तो वह पूरे मानस-पटल को बिष-मयी प्रवृतियों से घेर लेते है ,तथा हमारा मन पतन की ओर अग्रसर हो जाता है |मनुष्य का शारीर नौ-द्वारो वाली एक स्थूल काया है ,जोकि पाँच महाभूत (आकाश,वायु,अग्नि,पृथ्वी और जल),के कारण बनता है ,जिसमे पाँच ज्ञानेन्द्रिया(श्रोत्र,त्वचा,चक्षु,जिव्हा एवं,घ्राण),पाँच कर्मेन्द्रिया,( वाक़,हस्त,पाद,पायु,उपस्थ) ग्यारहवां उनका स्वामी मन,पाँच विकार(शब्द ,स्पर्श, रूप ,रस,एवं गंध ) ,बुद्दी,अहंकार और अव्यक्त परा प्रकृति प्राण इस प्रकार कुल चौबीस होते है | इस स्थूल शरीर से ,इन्द्रिया बलवान है ,तथा इन्द्रियों से मन बलवान है ,मन से ज्यादा बुद्धि बलवान है और बुद्धि से ज्यादा अव्यक्त परा-प्रकृति प्राण है ,| शरीर एक रथ है, जिसमे इन्द्रिया अश्व है ,तथा मन सारथि है ,प्राण रथी है | यदि अश्वो (इन्द्रियों) पर सारथि(मन) का कब्ज़ा हो और सारथि (मन),रथी (प्राण) के आदेशानुसार घोड़ो (इन्द्रियों) को वश में रखे तो मंजिल (मोक्ष) आसानी से तय की जा सकती है |शारीर के क्षेत्र में निंतर युद्ध होता रहता जहाँ अमृत-मयी,पुण्य-मयी,दैवीय प्रवृतियों का बिष-मयी,पाप-मयी,आसुरी-प्रवृतियों के साथ निरंतर युद्ध होता रहता है |जिसमे पुण्य-मयी,अमृत-मयी,दैवीय प्रवृतियों की रक्षा के लिए प्राण अपना रथ लेकर सहायता के लिए उपस्थित होता है |,जिससे आसुरी-प्रवृतियों को नियंत्रित किया जाता है और इनसे दैवीय प्रवृतियों का अस्तीत्व बना रहता है| किन्तु जब प्राण कमजोर पड़ जाता है तो मन का रुख इन्द्रियों की तरफ हो जाता है ,और इन्द्रियों पर मन यानि सारथि का कोई कब्ज़ा नहीं होता जिससे प्राण पुण्य-मयी दैवीय प्रवृतियों की रक्षा नहीं कर माता परिणाम होता है मनुष्य का पतन,..,,,|इस प्राण से ही शारीर कि समस्त कार्य प्रणाली संचालित होती है | इस प्राण के कमजोर होने पर पूरा शारीर का पतन यानि क्षत होना निश्चित है |प्राण के द्वारा शारीर त्याग देने के बाद मृत्यु हो जाती है |
इस प्राण का निवास स्थान है हृदय, जहाँ पर प्राण और आत्मा दोनों रहते है | मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि क्षत्रिय कि उत्पत्ति भी ह्रदय से ही हुई है जैसा कि सभी उपनिषद एवं शास्त्र कहते है | देखिये बाल्मीकि रामायण में चारो वर्णों कि उत्पत्ति के विषय में उल्लेख है कि :-
"मुखतो ब्राहमण! जाता, ,उरस:क्षत्रियास्तथा !
ऊरुभ्यां जज्ञिरेवैश्या:पद्भ्यां शूद्रा इति श्रुति !30!"
' अरण्य कांडे-चतुर्दश-सर्ग'
महाभारत के कर्ण पर्व अध्याय-१३ के ३२ वे श्लोक को देखे :--
" ब्राह्मणा ब्रह्मणा सृष्टा मुखात्क्षत्रमथोरस: !
ऊरुभ्याम स्रुज्द्वैश्यान्शुद्रन्पदभ्यामिति श्रुति: ! ३२!"
इसी लिए जो गुण प्राण का है वही गुण क्षत्रिय का भी है |जो स्वभाव प्राण का है वही क्षत्रिय का भी है |जिस प्रकार प्राण शारीर के अन्दर मानस-पटल पर चल रहे संघर्ष में पुण्य-मयी,दैवीय-प्रवृतियों कि रक्षा के लिए उपस्थित है ठीक उसी तरह बाहरी सृष्टि जो कि निरंतर युद्ध में रत है |जहाँ अच्छाई का बुराई से ,धर्मं का अधर्म से , पुण्य का पाप से ,सत्य का असत्य से ,न्याय का अन्याय से ,अर्थात अमृत का बिष से,पुण्य-मयी,दैवीय प्रवृतियों का पाप-मयी आसुरी-प्रवृतियों से निरंतर युद्ध चलता रहता है |जिसमे दुसरे प्रकार कि प्रवृतिया पहले प्रकार कि पुण्य-मयी प्रवृतियों का दबा लेता है |तब यह बिष मयी दानवी शक्तिया इस सृष्टि को महा विनाश जिसे क्षय कहा जाता है की ओर धकेल देती है | इस क्षय (विनाश) से त्राण(रक्षा) करने के लिए क्षात्र-तत्त्व ही है, जोकि आसुरी प्रवृतियों और शक्तियों को नियंत्रित कर इस सृष्टि का अस्तीत्व बनाये रख कर पुन: सत्य,धर्मं,न्याय,एवं अमृत की स्थापना करता है | अब यह तो कोई नहीं कह सकता कि इस सृष्टि से आसुरी प्रवृतिया स्थायी रूपसे समाप्त हो गयी है या होजायेंगी ,क्योंकि यह सृष्टि द्वन्दात्मक है और दोनों ही प्रवृतियों का अस्तीत्व रहेगा |और जब तक दोनों प्रवृतियों का अस्तीत्व है, तब तक क्षात्र-धर्मं की आवश्यकता बनी रहेगी | फिर यह कौन मुर्ख है ,जो कह रहा है कि" समय बदल गया है ,और अब क्षात्र-धर्मं बीते युग यानि इतिहास की बात रह गयी है"?? आज जितना अधर्म,असत्य और अन्याय का बोलबाला है उतना तो इतिहास में कभी रहा ही नहीं था |आज सत्य अपने अस्तीत्व के लिए छटपटा रहा है ,न्याय तो अन्याय के ढेर में कही दब कर रह गया है |धर्मं तो अपनी अंतिम श्वांश ले रहा है| तो फिर आज तो सर्वाधिक आवश्यकता है क्षात्र-धर्मं की | जिस प्रकार यह अटल सत्य है की यह सृष्टि निरंतर युद्धरत है, तो यह भी अटल सत्य है कि उस क्षत्रिय की भी निरंतर आवश्यकता है |जिस प्रकार एक शारीर प्राण के बगेर क्षत हो जाता है, उसी प्रकार यह सृष्टि भी प्राण-तत्त्व से उत्पन्न क्षात्र-धर्मं के बगेर क्षत यानि विनाश यानि पतन को प्राप्त हो रही है |अत: अब यह सभी प्रबुद्ध नागरिक ,मनीषी,साधू-जन एवं समस्त मानव-जाति का परम कर्तव्य है कि "क्षात्र-धर्मं को पुनर्स्थापित कर इस सृष्टि को समस्त चर-अचर जीवो के रहने योग्य बनाया जा सके" |

" जय क्षात्र-धर्मं "

"कुँवरानी निशा कँवर नरुका "
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति


एक वीर जिसने दो बार वीर-गति प्राप्त की |
pc to phone काल करे जी मेल के द्वारा
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राजनैतिक दल और क्षत्रिय

यूँ तो जिस निति से राज चलाया जाता है उसे राजनीति कहा जाता है |किन्तु शायद जितना बदनाम यह शब्द हुआ उतना शायद ही अन्य कोई शब्द बदनाम हुआ हो|आज मानवीय चरित्र की जतनी भी बुराईयां किसी एक व्यक्ति में हो तो उसे एक अच्छा और बड़ा राजनीतक बनाने की दिशा में उतनी ही सफलता मणि जाती है |आधुनिक भारत के विभाजन और अंग्रेजो के जाने से लेकर आज तक ऐसा कोई राजनीतिज्ञ नहीं हुआ जिसने राजनीति को कोई सम्मान जनक स्थान दिलाया हो |महात्मा गाँधी और शास्त्री जी ने इस दिशा में थोडा प्रयास किया था किन्तु महात्मा गाँधी की अहिंसा की नई परिभाषा एवं अतिवादी दृष्टिकोण उनके सच्चे अनुयायी पैदा करने में सफल नहीं हुए | और शास्त्री जी ३२ दांतों के बीच जीभ साबित हुए |किन्तु ये ऐसे राजनीतिज्ञ थे की इनके अपने पुत्र और पोत्रो ने भी इनका अनुगमन न करके इनके रश्ते को अव्यवहारिक साबित कर दिया |राजनितिक पटल पर नई अव्धार्नाओ ने जन्म लिया ,राष्ट्र-वाद और पंथ-वाद कालांतर में प्रांतीयता,भाषावाद,और जाती-वाद की अवधारनाये पनप गयी |साम्य-वाद के नाम पर ,समाज-वाद के नाम पर ,राष्ट्र-वाद और पंथ-वाद के नाम पर राजनैतिक दलों का निर्माण हुआ |इन वादों के नाम पर लुभावने नारे सब्जबाग दिखने का ढोंग हुआ |राष्ट्र को धर्म के नाम पर बनता गया |अपने निहित स्वार्थ वश जनता को भरमाया गया ,आजादी के नाम पर लोगो को ऐसा सब्जबाग दिखया की जनता मंत्र-मुग्द सी एक कठपुतली की तरह राजनेताओ को अपना भग्य-विधाता समझ उनके इशारो पर नृत्य करती रही |तत्कालीन क्षत्रिय-समाज अपने आपको साडी जिम्मेदारियों से निवृत समझ मूक-दर्शक बना रहा |फिर लुभावने राष्ट्र-वादी नरो के रोग से न बचकर कांग्रेस धर्म के नाम और अपने ही पूर्वजो के नाम को राजनितिक सीढ़ी बना रही जन संघ एवं भाजपा के चंगुल में भी फंसने से अपने आपको नहीं रोक पाया |धीरे धीरे इन्ही दो पार्टियों में अपना एवं देश का भविष्य खोजने लगा |साम्यवाद की जटिल नास्तिकता ,क्षत्रियो को कभी रास नहीं आयी|हाँ समाज-वाद के शिकंजे में भी जा फंसा |
वर्तमान समय के लगभग सभी राजनैतिक दल एक-एक व्यक्ति की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी जैसे है और जिनका एक प्रबंध निदेशक है और उसी के इशारो पर पूरी कम्पनी कार्यरत है ,|इन सभी राजनैतिक दलों में दूसरी एवं तीसरी पंक्ति में जन्म से क्षत्रिय राजनेता जा पहुंचे |दरअसल वे होते तो अंतिम पंक्ति में किन्तु चूँकि ये सभी क्षत्रिय-वर्ग से आते है ,तो इन लिमिटेड कंपनियों के प्रबंध-निदेशकों की बनिक सोच ने इन्हें हनी लाभ के तराजू पर तौल कर देखा तो पाया की अपने पीछे कुछ चाटुकार और चोलुश लोगो की आवश्यकता है जो कि पुरे क्षत्रिय-समाज को यह भरमाने के लिए पर्याप्त होगा कि ,हमारे इस राजनीतिक दल में क्षत्रिय किस कदर नंबर ३ एवं ४ कि स्थिति में है |और इन नंबर ३-४ कि स्थिति यह है अपने आपको अपनी योग्यता के आधार पर इस क्रम में मन कर चल रहे है ,जबकि उनका जन्म से क्षत्रिय होना ही उनका यहाँ तक पहुँचने का आधार है|इस प्रकार के क्षत्रिय राजनेताओ ने एक ने भी अपनी पार्टी का प्रबंध निदेशक जैसा बनाने का कोई सपना आज तक नहीं पला है |यह इसी में खुश है कि हमारी मित्रता इन प्रबध निदेशको से या उनके बेटे बेटी से है ,जबकि इनकी मित्रता ऐसी है जैसी कि निषाद-राज और श्री राम कि थी जिसमे एक रजा तो दूसरा सेवक मात्र है |ये लोग चाहते है कि पूरा समाज इनके पीछे चले और ये स्वयं कोई सोनिया के पीछे,कोई कोई अडवाणी के पीछे ,कोई मुलायम के पीछे तो कोई सर्वथा सिद्धांतो से दूर मायावती के पीछे चलने में अपना अहोभाग्य मानते है |पूरे समाज को एक करना चाहते है लेकिन अपने आकाओ के हित-साधन के लिए |सभी राजनितिक दलों ने जम कर दोहन किया है क्षत्रिय-समाज का |जब जिसको जितने निष्ठावान कार्य-कर्ताओ कि जरुरत हुई आगया समाज कि शरण में ,एवं क्षत्रिय-रक्त और भाई होने का अधिकार जताया , काम निबटा,जा पहुंचा हाई कमान के चरणों में |कब तक ऐसा चलेगा ??आखिर समाज कब तक इन चाटुकारों के पीछे अपना भविष्य तलाशता रहेगा ? और यह कब तक आला-कमान का खौफ दिखा कर समाज को दुत्कारते रहेंगे ?? और कब तक इन्हें लुक -छिप कर अपने आपको क्षत्रिय-समाज का अंग बताना होगा,??
जब तक क्षत्रिय-समाज अपनी बिखरी पड़ी सभी जातियों को समझ नहीं जायेगा |जब तक अपने वर्ग शत्रुओ द्वारा क्षत्रिय जातियों में जो भेद की कार-गर निति अपने गयी है ,को समझ नहीं जाता है |जब तक क्षत्रिय-समाज समझ नहीं जाता है कि अपने सभी भाइयो ,जिनमे जाट, गुर्जर,मीना,भील ,अहीर और राजपूतो के अतिरिक्त वे जातिया भी है जो न तो ब्राहमण है,न वैश्य है और न ही शूद्र है तो ,वे क्षत्रियो के अतिरिक्त और क्या हो सकती है ?हमारी इन सभी जातियों को धीरे-धीरे क्षत्रिय संस्कारो से संस्कारित करना होगा |और धर्म के वास्तविक रूप को समझ पंथ-वाद के झमेले से ऊपर उठकर धर्म एवं सत्य पर आधारित धर्म के नेतृत्व वाले राजनैतिक दल कि स्थापना करनी होगी |राजनीति सत्य ,धर्मं ,न्याय एवं मानवीय मूल्यों पर आधारित हो और राजनीति को,जिसे आज पेशा मन लिया गया है,और व्यवसाय का दर्जा है ,से ऊपर उठाना होगा |राजनीति को एक सम्मान जनक स्थिति में लाना होगा |पद-लोलुपता ,स्वार्थ-परकता ,मूल्य-हीनता ,भ्रष्ट-आचरण ,ढोंग चिल्ला-चिल्ला कर,झूंठ को सच्च साबित करने कि प्रचार-व्यवस्था जैसी बुराईयों से राजनीति को आजाद करना होगा |६३ से ६७ % क्षत्रिय-जनता, को२० से २५ % शूद्रों को यह व्यवस्था रास आएगी |स्वस्थ मानसिकता वाले वैश्य एवं ब्राहमण भी यदि सत्य धर्म पर आधारित है, तो इस दल के साथ हो सकेंगे |किन्तु वर्तमान जितने भी राजनीतिज्ञ है चाहे वे ग्रामीण और स्थानीय निकायों के हो या संसद-सदस्य ,वे वर्तमान गन्दी राजनीति के आदी है और वे अपने साथ संक्रामक रोग अवश्य लेकर आयेंगे और इस नए राजनितिक दल एवं कार्य-प्रणाली को संक्रमित करदेंगे |अत: ऐसे लोगो के लिए इस दल के दरवाजे लगभग बंद ही करने होंगे |
इस कार्य में समय थोडा ज्यादा लग सकता है किन्तु इसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है |सभी क्षत्रिय संघठनो एवं प्रबुद्ध क्षत्रिय इस पर विचार कर शीघ्र अति- शीघ्र इस प्रकार के दल के गठन कि प्रक्रिया शुरू करे ,तो यह एक सार्थक प्रयास होगा|
"जय क्षात्र-धर्म "

"कुँवरानी निशा कँवर नरुका "
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति


राजऋषि ठाकुर श्री मदनसिंह जी,दांता |
पत्थरी के रोग में बहुत उपयोगी है गोखरू
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क्षत्रिय कौन ?

राजपूत के घर में जन्‍म लिया हुआ प्रत्‍येक व्‍यक्ति क्‍या "क्षत्रिय" है ? क्‍या जाति मात्र किसी के क्षत्रिय कहलाने के लिए काफी है ! शायद नही .... "क्षत्रिय" शब्‍द इतने विशाल कर्म ब उदेश्यों से जुडा है कि इसे शब्दों मे परिभाषित करना असम्‍भव है , क्षत्रिय जन्‍म से नही बल्कि कर्म से होता है , व्‍यक्तिगत र्स्‍वाथ पूर्ति को किनारे कर सम्‍पूर्ण समाज व संसार के सभी वर्गो के हितो कि रक्षा के लिए प्रयत्‍नशील व्‍यक्ति ही सही मायने में क्षत्रिय है ,अर्थात जब आपको ऐसी जाति मे जन्‍म लेने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है जहां आप क्षत्रिय कहला सके तो सदा अपने से निम्‍न वर्ग को साथ लेकर चलो तथा जब भी किसी अत्‍याचार व अन्‍याय के खिलाफ खडे होने कि बात हो तो सदैव अग्रिम पक्तिं में नजर आएं !!!!!!
--
Shyam Prarap Singh Etawa
Pradesh Sanyojak
Shri Rajput Karni Sena
9887380511


एक वीर जिसने दो बार वीर-गति प्राप्त की |
आइये मोबाईल द्वारा अपने पीसी या लैपटोप पर नेट चलाये
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पतन का उत्तरदायी कौन ?

आज सबसे अहम् सवाल है की समाज को कैसे बचाया जाये? इस विषेले वातावरण जहाँ चंहु ओर विषाणु फैल रहे है,के दुष्प्रभाव से आज का क्षत्रिय स्वयं को कैसे बचाए ताकि वे समाज को विनाश से बचा स...के |क्योंकि क्षय से त्रान करना ही क्षत्रिय का धर्मं है |क्षत्रिय अपने आपको कमल की तरह इन किचड डड बुराइयों बचाएं |इस कार्य में क्षत्रियों से ज्यादा जिम्मेदारी हम क्षत्रानियो को लेनी होगी | हम क्षत्रानियो कोआज फिर उन्ही संस्कारो को अपने बच्चो में देना होगा जो हम आदि काल से देती आरही है |और उसके परिणामस्वरूप यह क्षत्रिय समाज प्रगति की चरम सीमा तक पहूँचा | आज तक विश्वामित्रजी ज्यादा तपस्या किसी ने नहीं की |श्री राम से अच्छा शासन किसी ने नहीं दिया |भीष्म से बड़ी किसी ने प्रतिज्ञा नहीं की |श्री कृष्ण से बड़ा ज्ञानी पैदा नहीं हुआ |युधिष्टर से बड़ा धर्मज्ञ नहीं हुआ |करना से बड़ा दानी नहीं हुआ |राजा हरिश्चंद्र से बड़ा सत्यवादी नहीं हुआ ,महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध से बड़ा अहिंसक वीर नहीं हुआ |पृथ्वी राज चौहान से बड़ा क्षमाशील (उदार) नहीं हुआ |राणा साँगा से ज्यादा किसी ने युद्ध में किसीने घाव नहीं खाये |राजकन्या मदालसा सी माता ही निर्माता नहीं हुई |गंगा,यमुना,सरस्वती,पार्वती,सावित्री,तारावती,माता सीता ,द्रौपदी से बड़ी तपस्वनी नहीं हुई ,जिन्होंने अपने आपको इतना तपाया की कोई नदी रूप में प्रवाहित हुई ,तो किसीने भगवान सदाशिव को ही पति रूप में प्राप्त कर लिया |किस किस के नाम गिनाये ,यदि क्षत्रिय पात्रो के आदर्शों का थोडा सा भी वर्णन किया जाये तो सारे विश्व का कागद एवं स्याही कम पद जाएगी |बस इतना जान लीजिये की इतिहास में से क्षत्रिय इतिहास को निकाल दिया जाय तो शून्य शेष रह जायेगा |
आचार्य रजनीश कहा करता था की रोजाना १० हजार सैनिकों को युद्ध में मारने वाले पितामह भीष्म भी क्षत्रिय थे ,और चींटी आदि कीड़ों को भी न मारने का उपदेश देने वाले जीतेन्द्र महावीर स्वामी भी क्षत्रिय ही थे |पति के साथ चिता में कूदकर सटी होने का अनुपम उदहारण पेश करने वाली भी अनेको सतियाँ क्षत्रानियाँ हुई है,और यमराज को अपने नियम बदलने के लिए विवश कर पति को पुन:जीवित कराने में सफल रही सावित्री भी तो क्षत्राणी ही थी |इसके अलावा बालपन में विधवा होकर जीवन भर पति को समर्पित रह कर तपकर ४३ वर्षो अन्न-जल के बगेर जीवित रहने का अनुपम उदहारण आधुनिक काल में पेश करने वाली बाला सतीजी भी तो क्षत्राणी ही थी |विधवा होने पर अपने पति के अधूरे कार्य एवं जिम्मेदारियों को निभाने वाली भी आदि काल सेसे लेकर आजतक क्षत्रिय परिवारों में घर घर में रही है |विश्व इतिहास में भारत जसे और क्षत्रिय योद्धाओं जैसे और भी उदहारण शायद मिलसकते है किन्तु मध्य काल में सर कट जाने के बाद ५-५ घंटे और ५-५ कोस तक युद्ध लड़ने वाला राजपूतो के अतिरिक्त कोई नहीं मिलेगा |
राजपूतो के अतिरिक्त कोई नहीं मिलेगा |ऐसा गौरव शाली अतीत जिस जाति या वागा का रहा है,आज उसकी क्या हालत है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है |जिस वर्ग ने विकास की सारी सीमाये पार की आज उसी समा...ज का चहुँ ओर पतन होरहा है |संस्कारो से लेकर संस्कृति तक ,तपश्या से लेकर ऐश्रव्य तक,शारीरिक शक्ति से लेकर आर्थिक एवं बौधिक बल तक चारो ओर से पतन की रह पर आखिर यह समाज क्यों चल निकला ?और इसको इस रह से कैसे बचाया जाये ,आज का यही यक्ष प्रश्न हर क्षत्रिय एवं समाजवेत्ता के सामने मुहं बाये खड़ा है |
राष्ट एवं जनता राज्यविहीन एवं दिशाहीन होकर पतन के गहरे भंवर में फँस चुके है |राज्य का प्रथम एवं अत्यावश्यक कर्त्तव्य है जनता के धन एवं सम्मान की सुरक्षा |आज राज्य सुरक्षा के अपने दायित्व से पल्ला झड चूका है |हर जगह ,हर पल ,हरेक अपने आपको आतंकवादियों के निशाने पर खड़ा पा रहा है |असुरक्षा की भावना सभी के मन में गहरी गाँठ बना चुकी है|आतंकवादियों के हौसले बुलंद है |जनता अपने आपको असुरक्षित पारही है |धन एवं सम्मान तो दूर की बात है,अब लोगो की जान भी सुरक्षित नहीं रही |ऐसे में राज्य अपनी कौनसी जिम्मेदारी निभारहा समझ से परे है |
क्षत्रिय समाज का पतन और जनता का सर्वांगीन पतन,कहीं इन दोनों बातो का आपस में कोई संबंध तो नहीं !कहीं ऐसा तो नहीं जनता एवं राष्ट के पतन का संबंध हम क्षत्रियों के पतन से हो!और यदि ऐसा है तब तो इस राष्ट्र एवं जनता पतन की उत्तरदायी हम क्षत्रानिया ही होंगी |क्योंकि क्षत्रियों के निर्माण का उत्तरदायित्व तो हम क्षत्राणियों पर ही है |
पुराणी कहावत है की "चोर नहीं चोर की माँ को मारना चाहिए "|अर्थात संतान के हर अच्छे बुरे कार्य के लिए उसकी माँ ही जिम्मेदार है|तो फिर क्षत्रियों की हालत के लिए भी क्षत्रियों की माताएं हम क्षत्राणियों की ही जिम्मेदारी है |अत:आशा है हर क्षत्राणी अपने इस कर्तव्य को समझे एवं इमानदारी से अपने उत्तरदायित्व को मान कर आज और अभी से क्षत्रियों के निर्माण में सम्मिलित होकर अपनी मत्वपूर्ण भूमिका अदा करे |

" कुँवरानी निशा कँवर"

श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

एक वीर जिसने दो बार वीर-गति प्राप्त की |
आइये मोबाईल द्वारा अपने पीसी या लैपटोप पर नेट चलाये
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हठीलो राजस्थान-6

छीन ठंडी छीन गरम है,
तुनक मिजाजी नेस |
भोली सूर सभाव री,
धरती दोस न लेस ||३४ ||
राजस्थान की भूमि क्षणभर में ठंडी व क्षण भर में गर्म हो जाती है | इसमें इस धरती का तनिक भी दोष नहीं है,और न ही यह स्थिर स्वभाव की द्योतक है बल्कि यह शूरवीर के भोले स्वभाव का प्रतीक गुण है |

निपजै नारी पद्मणी
घर घर वीरां खाण |
सारा देसां सूं सिरे ,
रेतीलो रजथान ||३५||
यहाँ घर-घर में पद्मिनी जैसी नारियां पैदा होती है व यहाँ का हर का प्रत्येक घर वीरों को उत्पन्न करने वाली खान है | इसीलिए यह राजस्थान प्रदेश सब प्रदेशों से श्रेष्ठ है |

धोला मन, धोली खगां,
धोला धोरां वान |
केव्या मुख कालो करै,
रोसंतां रजथान ||३६||
यहाँ उज्जवल मन और उज्जवल खड्ग धारण करने वाले वीर निवास करते है | यहाँ श्वेत बालू रेत के टीले भी उजले है | परन्तु राजस्थानी वीर क्रुद्ध होने पर शत्रुओं का मुंह काला कर देते है |

सूखा गिरवर, बन पवन,
सूखी सह नदियांह |
झरना झारै निस दिवस,
अरि धण री अखियांह ||३७||
इस प्रदेश के पर्वत,वन,पवन तथा समस्त नदियाँ सूखी है | किन्तु शत्रुओं की स्त्रियों की आँखों से दिन रात झरने बहते है अर्थात आंसू टपकते रहते है |

दिल कठोर कोमल बदन,
अदभुत रीत निभाय |
अरि रेलों सोखे उदर,
रेलों रुधिर बहाय ||३८||
राजस्थान की भूमि व यहाँ के वीरों का दिल कठोर व शरीर कोमल होता है | फिर भी यह अदभुत है कि अपने खून की नदी बहाकर यह दुश्मन की सेना के प्रवाह को अपने पेट में समाहित कर लेते है अर्थात नष्ट कर देते है |

सीतल गरम समीर इत,
नीचो,ऊँचो नीर |
रंगीला रजथान सूं ,
किम रुड़ो कस्मीर ? ||३९||
राजस्थान वैविध्य युक्त है | यहाँ कभी ठंडी तो कभी गर्म हवा चलती है तथा पानी भी कहीं उथला तो कहीं गहरा है | ऐसे में रंगीले (हर ऋतू में सुहावने)राजस्थान से कश्मीर (जहाँ सिर्फ शीतल पवन और भूमि की उपरी सतह पर पानी है)किस प्रकार श्रेष्ट कहा जा सकता है ?


स्व.आयुवानसिंह शेखावत

एक वीर जिसने दो बार वीर-गति प्राप्त की |
विश्व के मानचित्र पर पहचान बनाने वाला गाँव - बख्तावरपुरा
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